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अपने कक्ष में आराम फरमाते महाराज कमलसिंह ने मेज पर पड़ी शराब की प्याली को उठाया और एक घूंट में पी गए। महाराज ज्यादातर भोग विलास में मस्त रहते... राज्य का कार्यभार राजमाता ही संभालती। कमलसिंह हर वक्त मदिरा, मैथुन और शिकार में ही व्यस्त रहते... मध्यम कद के लिंग वाले इस महाराज की यौन इच्छा काफी प्रबल थी... और राजा होने के नाते उन्हे चोदने के लिए लड़कियों और औरतों की कभी भी कमी महसूस नहीं हुई थी... उनके सेवक इस कमजोरी का पूरा लाभ उठाते... जब राजा का मन रानियों को चोद चोद कर भर जाता तब उनके चमचे वेश्या और गणिकाओं को राजा के समक्ष हाजिर कर तगड़ी भेंट सौगाद जुगाड़ लेते। महाराज की एक सशक्त महिला संरक्षक भी थी जिसका नाम चन्दा था।
शराब के नशे में चूर होकर उन्होंने अपने खास सेवक सुखिया को बुलावा भेजा... वह तुरंत हाजिर हुआ...
"जी महाराज... फरमाइए.. " सलाम करते हुए सुखिया ने कहा
"सुखिया... तेरे रहते हुए महाराज का बिस्तर खाली क्यों पड़ा है?? कोई हसीन चीज पेश कर वरना मेरे क्रोध को तो तू जानता ही है" नशे में डोलते हुए कमलसिंह ने कहा
"क्षमा करें महाराज, में आज रात को ही आपके बिस्तर को गरम करने का प्रबंध करता हूँ"
"हम्म.. और कोई अच्छी चीज लाना... जो मेरे लंड पर मस्ती से कूद सके... पिछली बार की तरह सुखी ककड़ी जैसी बदसूरत लड़की लाया तो तेरी गांड में गरम सरिया घुसेड़ दूंगा"
"साले, तेरी अंगूठे भर की नून्नी पर कौन सी लड़की कूदेगी... " गुस्से से मन में सोच रहा था सुखिया पर चेहरे पर मुस्कान के साथ उसने कहा "आप चिंता न करे महाराज, ऐसी कटिली चीज लाऊँगा की आपका मन प्रसन्न हो जाएगा"
"हम्म ठीक है... रात होने से पहले उसे पेश करना... और यहाँ लाने से पहले उसे शाही गुसलखाने में दासियों से स्नान और मालिश करवाकर हाजिर करना, समझा !!"
"जी महाराज, आप से एक अरज करनी थी" सुखिया ने अपना पासा फेंका
"बोल... "
"परिवार बड़ा होता जा रहा है... आपकी कृपा से दोनों बेटों का विवाह हो गया है और खाने वाले मुंह बढ़ गए है.. खेत अब छोटा पड़ रहा है... थोड़ी सी महरबानी हो जाती तो... " कुटिल सी मुस्कान के साथ सुखिया ने कहा
"ठीक है... दीवानजी से कहना मेरा आदेश है की दो खेत तेरे नाम कर दिए जाए... " शराब को प्याली में डालते हुए महाराज ने कहा
"महाराज की जय हो... आप बड़े कृपालु है" सलाम करते हुए सुखिया खुशी खुशी चला गया।
रात्री का समय होते ही भोजन के पश्चात महाराज अपने कक्ष में व्याकुल होकर अपने चुदाई के प्रबंध की प्रतीक्षा कर रहे थे। कुछ देर तक कमरे में यहाँ वहाँ चक्कर काटने के बाद उन्होंने सैनिक से पूछने पर पता चला की एक खास गणिका को गुसलखाने में तैयार किया जा रहा था।
महाराज ने अपने उपरार्ध के वस्त्र निकाल दिए और केवल धोती में अपनी कुर्सी पर बैठ गए।
थोड़े अंतराल में ही उनके कक्ष का दरवाजा खुला और २५ की उम्र की एक आलीशान कद-काठी वाली लड़की ज़रीदार साड़ी पहने अपनी आँखें नचाती हुई कक्ष में दाखिल हुई। उसे देखते ही महाराज की आँखों में चमक आ गई।
चमकीली चोली में उसके शानदार सुगठित स्तन और उसकी चाल में ताल से ताल मिलाते हुए उसके सुंदर फूले हुए कूल्हे। वह कद में लंबी थी और उसके गहरे काले लंबे बाल थे, दांत मोती जैसे सफेद और सुगठित थे, होंठ छोटे लाल थे, उसके शरीर से मीठी गंध आ रही थी। गुसलखाने में दासियों ने विपुल मात्रा में इत्र का छिड़काव जो किया था। गोलाकार मुलायम अड़तीस इंच या इससे ऊपर के स्तन थे और गर्दन शानदार नाजुक चिकनी त्वचा से बनी थी जो देखने में बेहद कामुक लग रही थी।
वह गांड मटकाती हुई महाराज के पास आई और उन्हे गुलाब के फूलों की माला पहनाई।
महाराज ने माला स्वीकार करने के लिए अपना सिर झुकाया और उसकी चिकनी मुलायम भुजाओं को बुरी तरह से रगड़ा और उसकी चोली की गहरी खाई और उसमें छिपे नरम-नरम स्तनों को घूरने से खुद को रोक नहीं पाएं। उसमें एक मादक सुगंध थी जो महाराज को बेहद उत्तेजित करती थी।
महाराज ने उसे बाहुपाश में जकड़ लिया और पीछे से ही उसके घाघरे में अपने हाथ डाल दिए। उसकी कमर छोटी थी लेकिन छूने में काफी मुलायम थी और उसके नितंब साफ़ त्वचा वाले और कोमल मांसपेशियों से भरे हुए थे.... रेशम की तरह चिकने और मस्त।
महारज की उंगलियाँ उसके दोनों कूल्हों पर घूम रही थीं, उनके नुकीले नाखून उसकी जाँघों के मूल पर नरम, संवेदनशील त्वचा को बेरहमी से खरोंच रहे थे, जिससे वह कामुक आनंद में छटपटा रही थी और बड़बड़ा रही थी, साथ ही साथ वह अपने मजबूत पैरों को पटक रही थी और चुपचाप सहन कर रही थी।
वह जानबूझ कर रेशमी साड़ी के नीचे बिना किसी अन्तःवस्त्रों के आई थी और महाराज के हाथ उसके नितंबों की कोमलता से प्रसन्न होकर उन्हे सहलाये जा रहे थे। उस लड़की के चूतड़ों को घाघरे के अंदर ही हाथों से फैलाकर अपनी एक उंगली को उसके गांड के छिद्र को छेड़ने लगे। आँखें बंद कर वह लड़की, इन हसीन स्पर्शों का पूर्ण आनंद ले रही थी।
"क्या नाम है तुम्हारा" महाराज ने पूछा
"जी, मुझे मेनका कहकर पुकारते है" ज्यादातर गणिकाए इस पेशे के लिए अपना नाम बदलकर कोई उत्तेजक सा नाम रख लेती है
"बड़ी सुंदर हो तुम मेनका... यह तुम्हारी खुशकिस्मती है की तुम्हें इस राज्य के महाराजा को खुश करने का मौका प्राप्त हुआ है... "
"जी, इस अवसर के लिए में कृतज्ञ हूँ.. में वचन देती हूँ की आपको स्वर्गीय सुख प्रदान करूंगी... में इस कार्य में बेहद निपुण हूँ " आँखें झुकाकर उसने कहा
सुनते ही राजा प्रसन्न हो गए... मेनका को खींचकर बिस्तर पर बैठाते हुए उन्होंने एक झटके में अपनी धोती की गांठ खोल दी और पूर्ण नग्न हो गए। उनकी तीन इंच की लौड़ी तनी हुई थी। देखकर एक पल के लिए मेनका की हंसी छूट जाने वाली थी पर व्यावसायिक कौशल ने उसे ऐसा करने से रोक लिया। वह ऐसे नाटकीय भाव से भाव-विभोर होकर महाराज के लंड को देखने लगी जैसे कभी उसने ऐसा बड़ा लंड देखा ही न हो...!!
"अपने वस्त्र उतारो, मेनका.. " महाराज ने आदेश दिया
यह सुनते ही वह बिस्तर से खड़ी हो गई... बेशर्मी से उसने महाराज के सामने अपने कपड़े उतारने लगी, अपनी सुनहरी ब्रोकेड वाली रेशम की साड़ी को आसानी से उतार कर सिर्फ एक छोटी सी चोली में खड़ी थी, जो उसके शानदार स्तनों को अप्रभावी रूप से नियंत्रित करने के लिए दबाव डाल रही थी।
महाराज ने दोनों हाथों से उस छोटी सी चोली को अलग कर लिया और वह रेशमी चोली के फटने की आवाज आई। चोली के फटते ही मेनका कराह उठी और महाराज ने दर्द भरे जुनून के साथ उसके चमकते देवदूत जैसे गोरे शरीर को गले लगा लिया।
उसके लाल रसीले होंठों को महाराज पागलों की तरह चूमने लगे और उसके गर्म हाथ ने उनके लंड को अपने हाथ में ले लिया। महाराज का लोडा मेनका की हथेली में उछल-कूद करने लगा। बड़ी ही कुशलता से उसने महाराज के टट्टों को भी सहलाया।
शराब के नशे में चूर होकर उन्होंने अपने खास सेवक सुखिया को बुलावा भेजा... वह तुरंत हाजिर हुआ...
"जी महाराज... फरमाइए.. " सलाम करते हुए सुखिया ने कहा
"सुखिया... तेरे रहते हुए महाराज का बिस्तर खाली क्यों पड़ा है?? कोई हसीन चीज पेश कर वरना मेरे क्रोध को तो तू जानता ही है" नशे में डोलते हुए कमलसिंह ने कहा
"क्षमा करें महाराज, में आज रात को ही आपके बिस्तर को गरम करने का प्रबंध करता हूँ"
"हम्म.. और कोई अच्छी चीज लाना... जो मेरे लंड पर मस्ती से कूद सके... पिछली बार की तरह सुखी ककड़ी जैसी बदसूरत लड़की लाया तो तेरी गांड में गरम सरिया घुसेड़ दूंगा"
"साले, तेरी अंगूठे भर की नून्नी पर कौन सी लड़की कूदेगी... " गुस्से से मन में सोच रहा था सुखिया पर चेहरे पर मुस्कान के साथ उसने कहा "आप चिंता न करे महाराज, ऐसी कटिली चीज लाऊँगा की आपका मन प्रसन्न हो जाएगा"
"हम्म ठीक है... रात होने से पहले उसे पेश करना... और यहाँ लाने से पहले उसे शाही गुसलखाने में दासियों से स्नान और मालिश करवाकर हाजिर करना, समझा !!"
"जी महाराज, आप से एक अरज करनी थी" सुखिया ने अपना पासा फेंका
"बोल... "
"परिवार बड़ा होता जा रहा है... आपकी कृपा से दोनों बेटों का विवाह हो गया है और खाने वाले मुंह बढ़ गए है.. खेत अब छोटा पड़ रहा है... थोड़ी सी महरबानी हो जाती तो... " कुटिल सी मुस्कान के साथ सुखिया ने कहा
"ठीक है... दीवानजी से कहना मेरा आदेश है की दो खेत तेरे नाम कर दिए जाए... " शराब को प्याली में डालते हुए महाराज ने कहा
"महाराज की जय हो... आप बड़े कृपालु है" सलाम करते हुए सुखिया खुशी खुशी चला गया।
रात्री का समय होते ही भोजन के पश्चात महाराज अपने कक्ष में व्याकुल होकर अपने चुदाई के प्रबंध की प्रतीक्षा कर रहे थे। कुछ देर तक कमरे में यहाँ वहाँ चक्कर काटने के बाद उन्होंने सैनिक से पूछने पर पता चला की एक खास गणिका को गुसलखाने में तैयार किया जा रहा था।
महाराज ने अपने उपरार्ध के वस्त्र निकाल दिए और केवल धोती में अपनी कुर्सी पर बैठ गए।
थोड़े अंतराल में ही उनके कक्ष का दरवाजा खुला और २५ की उम्र की एक आलीशान कद-काठी वाली लड़की ज़रीदार साड़ी पहने अपनी आँखें नचाती हुई कक्ष में दाखिल हुई। उसे देखते ही महाराज की आँखों में चमक आ गई।
चमकीली चोली में उसके शानदार सुगठित स्तन और उसकी चाल में ताल से ताल मिलाते हुए उसके सुंदर फूले हुए कूल्हे। वह कद में लंबी थी और उसके गहरे काले लंबे बाल थे, दांत मोती जैसे सफेद और सुगठित थे, होंठ छोटे लाल थे, उसके शरीर से मीठी गंध आ रही थी। गुसलखाने में दासियों ने विपुल मात्रा में इत्र का छिड़काव जो किया था। गोलाकार मुलायम अड़तीस इंच या इससे ऊपर के स्तन थे और गर्दन शानदार नाजुक चिकनी त्वचा से बनी थी जो देखने में बेहद कामुक लग रही थी।
वह गांड मटकाती हुई महाराज के पास आई और उन्हे गुलाब के फूलों की माला पहनाई।
महाराज ने माला स्वीकार करने के लिए अपना सिर झुकाया और उसकी चिकनी मुलायम भुजाओं को बुरी तरह से रगड़ा और उसकी चोली की गहरी खाई और उसमें छिपे नरम-नरम स्तनों को घूरने से खुद को रोक नहीं पाएं। उसमें एक मादक सुगंध थी जो महाराज को बेहद उत्तेजित करती थी।
महाराज ने उसे बाहुपाश में जकड़ लिया और पीछे से ही उसके घाघरे में अपने हाथ डाल दिए। उसकी कमर छोटी थी लेकिन छूने में काफी मुलायम थी और उसके नितंब साफ़ त्वचा वाले और कोमल मांसपेशियों से भरे हुए थे.... रेशम की तरह चिकने और मस्त।
महारज की उंगलियाँ उसके दोनों कूल्हों पर घूम रही थीं, उनके नुकीले नाखून उसकी जाँघों के मूल पर नरम, संवेदनशील त्वचा को बेरहमी से खरोंच रहे थे, जिससे वह कामुक आनंद में छटपटा रही थी और बड़बड़ा रही थी, साथ ही साथ वह अपने मजबूत पैरों को पटक रही थी और चुपचाप सहन कर रही थी।
वह जानबूझ कर रेशमी साड़ी के नीचे बिना किसी अन्तःवस्त्रों के आई थी और महाराज के हाथ उसके नितंबों की कोमलता से प्रसन्न होकर उन्हे सहलाये जा रहे थे। उस लड़की के चूतड़ों को घाघरे के अंदर ही हाथों से फैलाकर अपनी एक उंगली को उसके गांड के छिद्र को छेड़ने लगे। आँखें बंद कर वह लड़की, इन हसीन स्पर्शों का पूर्ण आनंद ले रही थी।
"क्या नाम है तुम्हारा" महाराज ने पूछा
"जी, मुझे मेनका कहकर पुकारते है" ज्यादातर गणिकाए इस पेशे के लिए अपना नाम बदलकर कोई उत्तेजक सा नाम रख लेती है
"बड़ी सुंदर हो तुम मेनका... यह तुम्हारी खुशकिस्मती है की तुम्हें इस राज्य के महाराजा को खुश करने का मौका प्राप्त हुआ है... "
"जी, इस अवसर के लिए में कृतज्ञ हूँ.. में वचन देती हूँ की आपको स्वर्गीय सुख प्रदान करूंगी... में इस कार्य में बेहद निपुण हूँ " आँखें झुकाकर उसने कहा
सुनते ही राजा प्रसन्न हो गए... मेनका को खींचकर बिस्तर पर बैठाते हुए उन्होंने एक झटके में अपनी धोती की गांठ खोल दी और पूर्ण नग्न हो गए। उनकी तीन इंच की लौड़ी तनी हुई थी। देखकर एक पल के लिए मेनका की हंसी छूट जाने वाली थी पर व्यावसायिक कौशल ने उसे ऐसा करने से रोक लिया। वह ऐसे नाटकीय भाव से भाव-विभोर होकर महाराज के लंड को देखने लगी जैसे कभी उसने ऐसा बड़ा लंड देखा ही न हो...!!
"अपने वस्त्र उतारो, मेनका.. " महाराज ने आदेश दिया
यह सुनते ही वह बिस्तर से खड़ी हो गई... बेशर्मी से उसने महाराज के सामने अपने कपड़े उतारने लगी, अपनी सुनहरी ब्रोकेड वाली रेशम की साड़ी को आसानी से उतार कर सिर्फ एक छोटी सी चोली में खड़ी थी, जो उसके शानदार स्तनों को अप्रभावी रूप से नियंत्रित करने के लिए दबाव डाल रही थी।
महाराज ने दोनों हाथों से उस छोटी सी चोली को अलग कर लिया और वह रेशमी चोली के फटने की आवाज आई। चोली के फटते ही मेनका कराह उठी और महाराज ने दर्द भरे जुनून के साथ उसके चमकते देवदूत जैसे गोरे शरीर को गले लगा लिया।
उसके लाल रसीले होंठों को महाराज पागलों की तरह चूमने लगे और उसके गर्म हाथ ने उनके लंड को अपने हाथ में ले लिया। महाराज का लोडा मेनका की हथेली में उछल-कूद करने लगा। बड़ी ही कुशलता से उसने महाराज के टट्टों को भी सहलाया।