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राजमाता कौशल्यादेवी

सुबह का आगाज होते ही, शक्तिसिंह अपने खेमे के साथ सूरजगढ़ की तरफ चल पड़ा। अपने तंबू में बड़े ही आराम से, संभोग की थकान उतारते हुए राजमाता, अपने पलंग पर लैटी हुई थी। एक अद्वितीय सी संतृप्ति उनके सोये हुए चेहरे से झलक रही थी। संभोग के पश्चात आती निंद्रा सब से उत्कृष्ट होती है। उन्होंने ओढ़ी हुई मखमली चद्दर के नीचे वह नग्नावस्था में सोई हुई थी। जबरदस्त चुदाई के कारण उनका शरीर इतना संवेदनशील हो चला था की वह अपने शाही जिस्म पर वस्त्र भी बर्दाश्त नही कर पा रही थी। उनके गुप्तांग में अभी भी मीठे दर्द की झुरझुरी सी चल रही थी।

तंबू के करीब से गुजरते हुए घोड़ों के कदमों की आवाज से उनकी नींद खुल गई। अपनी दोनों जांघों को आपस में घिसकर वह अपनी योनि में लिप्त आद्रता को महसूस करते ही मुस्कुरा उठी। उन्होंने करवट ली और तकिये पर अपनी कोहनी रखकर जिस्म को उसके ऊपर टीकाकर वह गहरी सोच में डूब गई। उन्हे यकीन था की शक्तिसिंह के साथ उन्होंने जो कारनामा किया था उसका समाचार महारानी पद्मिनी के कानों तक जरूर पहुँच चुकी होगी। स्त्री-सहज ईर्षा और मालिकी-भाव से पीड़ित होकर महारानी जरूर कुछ ना कुछ करना चाहेगी, पर कर नही पाएगी। ज्यादा से ज्यादा वह इसके बारे में राजा कमलसिंह को बता देगी... फिर भी राजमाता आश्वस्त थी की कोई उनका कुछ भी बिगाड़ न पाएगा। उनका पुत्र, राज्य के सारे कारभार के लिए उन पर निर्भर था और वह उनके विरुद्ध जाने की हिम्मत नही कर पाएगा।

शक्तिसिंह रूपी खिलौना प्राप्त कर राजमाता इतनी आनंदित थी की वह किसी भी सूरत में उसे अपने पास से किसी को छीनने नही देने वाली थी। उनका शातिर दिमाग, उत्पन्न होने वाली सारी समस्याओं की कल्पना कर चुका था और उसके हल भी ढूंढ चुका था। फिलहाल वह कुछ दिनों के लिए इस जगह पर आराम कर, वापिस लौटना चाहती थी। जिस काम के लिए यहाँ तक आए थे, वह काम तो बीच रास्ते ही मुकम्मल हो चुका था। इसलिए यहाँ ज्यादा समय व्यतीत करने का कोई कारण नही था। वह बस इतना ही वक्त बिताना चाहती थी जो महाराज को यकीन दिलाने के लिए काफी हो। वैसे महारानी के गर्भवती होने की संभावना का पता चलते ही, महाराज ज्यादा कुछ पृच्छा करे ऐसी गुंजाइश कम ही थी।

वहाँ अपने तंबू में लैटे हुए, दासी से पैर दबवा रही थी और उनके मुंह से चुगलियाँ सुन रही थी। दासी ने बड़े ही चाव से, चटकारे लेते हुए, सारा किस्सा सुनाया। हालांकि जिस वक्त शक्तिसिंह और राजमाता उस कुटिया में चुदाई कर रहे थे, तब वहाँ कोई मौजूद नही था, पर उनकी कराहने की आवाज, राजमाता की बाहर तक सुनाई देती सीसीकियाँ, और जब वह दोनों बाहर निकले तब जिस तरह उन दोनों के वस्त्र अस्त-व्यस्त थे, वह देखकर कोई अबुद्ध व्यक्ति भी समझ सकता था की अंदर क्या गुल खिलाए जा रहे थे। राजमाता का खौफ इतना था की कोई खुले मुंह ऐसी बातों को जिक्र करने से बचता।

"हाय... जरा घुटनों के ऊपर तक दबा.. बहुत दर्द हो रहा है!!" महरानी ने आह भरते हुए कहा

"जी रानी साहिबा... आप कहो तो गुनगुने तेल से थोड़ी मालिश भी कर दूँ?"

"थोड़ी देर बाद... तू यह बता की जब राजमाता और शक्तिसिंह बाहर निकले तब उनका हाल कैसा था?"

"क्या बताऊ? शर्म आती है मुझे" खिलखिलाकर हँसते हुए दासी बोली

"ज्यादा होशियार मत बन... मुझे सब पता है तू रात को जंगल में उस घुड़सवार के साथ जाकर क्या क्या करती है.. चुदवा चुदवा कर तेरे कूल्हे कितने बड़े हो गए है.. और अब बात करने में शर्म आ रही है तुझे!!"

"क्या महारानी जी, आप भी!! अरे वो दोनों जब बाहर निकले तब में उस घने पेड़ के पीछे से देख रही थी... शक्तिसिंह तो ठीकठाक दिख रहा था पर राजमाता का घाघरा सिलवटों से भरा हुआ था.. चोली भी ठीक से नही बांधी थी.. और बाल बिखरे हुए थे। चलते चलते वह लड़खड़ा रही थी। ही..ही.. ही.. लग रहा था की बड़ी ही दमदार चुदाई हुई होगी राजमाता की" हँसते हँसते दासी ने विवरण दिया

"और उसके बाद क्या हुआ?"

"उसके बाद तो शक्तिसिंह अपने तंबू में चला गया और राजमाता अपने तंबू में... कब से खर्राटे मारकर सो रही है.. सभी दासियों को आदेश दिया गया है की जब तक वह सामने से न बुलाए, कोई उनके तंबू में नही जाएगा..."

"हम्ममम... " रानी ने अपनी टांगों को मोडकर अपने घाघरे को थोड़ा सा ऊपर तक उठा दिया..

"तू ठीक से मालिश कर.. तेरे हाथों में अब पहले वाला जोश नही रहा"

"क्या बात कर रही हो रानी जी... मेरा जोर तो पहले जैसा ही है... शायद आज भारी परिश्रम के कारण दर्द कुछ ज्यादा ही हो रहा है आपको.. ही..ही..ही.."

"बड़ी हंसी आ रही है तुझे... लगता है राजमहल पहुँच कर तेरा तबादला रसोईघर में करना पड़ेगा..."

"क्षमा कीजिए महारानी जी, अगर कोई गुस्ताखी हो गई हो तो... पर कृपया मुझे रसोईघर में ना भेजे... वह खानसामा पूरा दिन इतना काम करवाता है और रात को भी चैन नही लेने देता..."

"क्या बात कर रही है!! वो बूढ़ा बावर्ची भी चढ़ता है क्या तुझ पर?"

"अरे बात ही जाने दीजिए.. कमीना सिर्फ चेहरे से ही बूढ़ा है... पर उसका हथियार एकदम सख्त और हिंसक है... एक बार चढ़ाई करता है तो दो दिन तक में ठीक से चल नही पाती... "

"ठीक है, ठीक है... अब बातें कम कर और हाथ तेजी से चला... ऊपर जांघों तक मालिश कर.. और फिर कमर पर जरा तेल लगा दे... पूरा जिस्म दर्द कर रहा है आज तो.. "

महारानी पद्मिनी अब करवट लेकर उल्टा लेट गई। दासी उनके ऊपर सवार होकर दोनों हाथों से कमर पर तेल मलने लगी।

"जरा घाघरा नीचे सरका दीजिए ताकि में आपके पिछवाड़े पर ठीक से मालिश कर सकूँ"

महारानी ने अपना नाड़ा खोला और घाघरे को नीचे की तरफ सरका दिया

"हाय... कैसे गोरे गोरे चूतड़ है आपके महारानी जी... ऐसा लग रहा है जैसे मक्खन के दो पिंड हो.. "

"तू ज़बान कम चला अपनी... "महारानी थोड़ी शर्मा गई

दोनों कूल्हों पर गुनगुना तेल घिसते हुए दासी ने दोनों चूतड़ों को हल्का सा फैलाया... महारानी का बादामी रंग का छेद नजर आते ही वह मुस्कुरा दी... तेल की कुछ धाराएँ उस छेद तक जाने दी... और उंगली से उसके इर्दगिर्द मलने लगी...

"हाय... क्या कर रही है रे तू?" गांड के छेद पर स्पर्श होते ही महारानी सिहर उठी...

"अरे मालिश कर रही हूँ... कोई भी कोना छूटना नही चाहिए.. नही तो फिर आप ही वापिस रसोईघर में भेजने की बात कहेगी"

"पर देख तो सही तू कहाँ उंगली कर रही है!!"

"आप कहे तो ना करू"

"अमम करती जा.. पर जरा संभाल कर"

"जी महारानी"

दासी ने कुछ देर तक गांड के छिद्र पर गोल गोल उंगली घुमाई... महारानी को इतना मज़ा आने लगा... कभी सोचा नही थी उन्होंने की इस जगह से भी मज़ा लिया जा सकता था... हालांकि उन्होंने काम-शास्त्र के पठन के वक्त, गुदा-मैथुन के बारे में सुना जरूर था... पर दासियों के मुंह से भी यह बातें भी सुनी थी की यह कितना दर्दनाक होता है॥

दासी ने छिद्र को तेल से लसलसित कर अपनी उंगली को धीरे से अंदर घुसा दिया।

"ऊईई माँ... क्या कर रही है तू... " रानी थरथरा गई

"थोड़ा सा तेल अंदर डाल रही हूँ... इससे आपको अच्छा भी लगेगा और सुबह मलत्याग में भी सरलता रहेगी"

महारानी कुछ भी बोले बगैर उस अनोखे एहसास को महसूस करते हुए लैटी रही... इतना आनंद आ रहा था की वह चाहती थी यह मालिश चलती ही रहे। कुछ देर अंदर बाहर करने के बाद दासी ने उंगली बाहर निकाल ली और चूतड़ों पर मालिश करने लगी।

"तूने उंगली डालना बंद क्यों कर दिया?"

"मुझे लगा की आपको तकलीफ हो रही होगी... इसलिए... " दासी ने सकपकाकर कहा

"थोड़ी देर और कर... ठीक से तेल जाने दे अंदर"

"ठीक है महारानी साहिबा" दासी ने आश्चर्यसह वापिस अपनी उंगली अंदर डाल दी।

दासी ने देखा की जब भी वह उंगली गांड के अंदर डालती तब महारानी के चुत के होंठ भी सिकुड़ जाते... उंगली बाहर निकालते ही वह पूर्ववत हो जाते। कुछ देर ऐसा करने पर उनकी चुत के होंठ और झांटों पर गीलापन नजर आने लगा। दासी समझ गई की क्यों महारानी ने वापिस उंगली करने को कहा। वह मन ही मन मुस्कुराने लगी।

"जरा तेजी से आगे पीछे कर" भारी आवाज में महारानी ने कहा।

दासी ने आदेश का पालन किया। उसने देखा की महारानी ने अपने एक हाथ से स्तन को धर दबोचा था और वह चोली के ऊपर से ही अपनी निप्पल को मरोड़ रही थी। पता चल गया की क्यों दोबारा उन्होंने गांड में उंगली करने को कहा!! महरानी को इसमे बेहद मज़ा आ रहा था। दासी भी इस नई खोज पर खुश हो गई... महारानी को खुश रखने पर... आए दिन वह तोहफे दिया करती थी। किस्मत अच्छी रहे तो कभी कभार एकाद सुवर्ण मुद्रा भी मिल जाती थी।
 
दासी ने अपनी उंगली तेजी से अंदर बाहर करना शुरू कर दिया... साथ ही साथ वह थोड़ा थोड़ा तेल भी डालती रहती ताकि महारानी के गांड के छेद को जरा सी भी तकलीफ ना हो। महारानी पद्मिनी अब आँखें बंद कर आहें भर रही थी। उनकी चुत भी अच्छी खासी मात्रा में द्रवित हो चुकी थी। साथ साथ वह अपने घुटनों के सहारे चूतड़ों को ऊपर नीचे करते हुए, दासी की उंगली के साथ ताल मिला रही थी। महारानी के पूरे जिस्म में खून तेजी से दौड़ रहा था... पूरा जिस्म पसीने और तेल से तरबतर हो चुका था। महारानी को इस स्थिति में देखकर दासी की जांघों के बीच भी चुनचुनी होने लगी। वह अपने घाघरे के ऊपर से ही अपनी चुत को बारी बारी दबा कर उसे चुप बैठने के लिए कह रही थी...

महारानी की चुत का सब्र का बांध अब टूटने ही वाला था। इस नए अनुभव को उनका शरीर बड़े ही चाव से महसूस कर रहा था... उनकी निप्पल कड़ी होकर चोली के भीतर बगावत कर रही थी। उनकी चुत सिकुड़ सिकुड़ कर किसी भी वक्त अपना इस्तीफा देने की धमकी दे रही थी। शरीर तेजी से कांप रहा था... उलटे मुंह लेटी महारानी हर सांस के साथ कराह रही थी। स्खलन बेहद नजदीक दिखाई पड़ रहा था...

तभी अचानक पीछे से आवाज आई...

"क्या हो रहा हैं यहाँ?" राजमाता की सत्तावाही आवाज ने दोनों को चोंका दिया

दासी ने तुरंत पास पड़ी चादर से महारानी के खुले चूतड़ ढँक दिए, पलंग से उठ खड़ी हुई और गर्दन झुकाकर खड़ी हो गई... राजमाता चलते चलते पलंग के करीब आई... उनके इस खलल से महारानी थोड़ी सी क्रोधित जरूर हुई पर गुस्से को व्यक्त करने की हिम्मत नही थी। उन्होंने अपने ऊपर पड़ी चद्दर को पकड़े रखा और करवट लेकर सीधी हो गई।

"वो जरा मालिश करवा रही थी में... !!" बड़ी सहजता से महारानी ने कहा

"तुम अब जा सकती हो" राजमाता ने दासी से कहा। दासी सलाम कर वहाँ से चली गई।

राजमाता का मन यह सोच रहा था की अगर मालिश ही हो रही थी तो महारानी इतनी बुरी तरह कराह क्यों रही थी!!

"महारानी, में तुम्हें यह पूछने आई हूँ की क्या तुम शक्तिसिंह द्वारा किए हुए कार्य से संसतुष्ट हो?"

रानी का मन द्विधा में यह सोच रहा था की राजमाता किस तरह की संतुष्टि की बात कर रही थी

कोई उत्तर ना मिलने पर राजमाता ने खुद ही स्पष्टीकरण किया

"क्या तुम्हें विश्वास है की तुम गर्भवती हो जाओगी?"

थोड़ी सी हिचक के साथ महारानी ने कहा "जी, लगता तो है... पर ओर तसल्ली के लिए एक-दो बार ओर अगर... " वह आगे बोल न पाई

राजमाता ने क्रोधित नजर से महारानी की ओर देखा। वह समज गई की इस चुदैल को अब शक्तिसिंह का लंड भा गया था। और उसे किसी भी सूरत में राजमहल लौटकर शक्तिसिंह से दूर ही रखना था।

"मुझे लगता है की जितना भी हुआ है वह पर्याप्त है.. आखिर बीज को फलित होने के लिए और कितनी मात्रा में द्रव्य चाहिए?"

"जी, जैसा आप ठीक समझे" महारानी ने नजर झुका ली

शक्तिसिंह से संभोग किए हुए बस एक ही दिन गुजरा था पर महारानी के जिस्म का हर कतरा शक्तिसिंह के स्पर्श को याद कर रहा था।

"हम्म... तो फिर हम २ दिन और आराम कर, सूरजगढ़ वापिस लौटने की यात्रा करेंगे। में सिपाहियों को तैयारी करने के आदेश दे रही हूँ, तुम भी तैयार रहना.. "

"जी राजमाता.." महारानी ने उत्तर दिया।

राजमाता सख्त मुंह बनाए वहाँ से चली गई... महारानी को यह पता न चला की वह किस बात पर क्रोधित थी...!! कहीं उन्हे उसके और दासी के गांड-उंगली के खेल के बारे में पता तो नही चल गया? वैसे ऐसी गुंजाइश तो नहीं थी चूंकि तंबू के दरवाजे से इतनी बारीकी से नजर आना असंभव था... फिर भी...!!

दो दिनों के बाद, राजमाता और महारानी अपने दस्ते के साथ सूरजगढ़ लौटे। राजमहल में उनका भव्य स्वागत किया गया। सब को यही मालूम था की वह दोनों धार्मिक यात्रा कर वापिस लौटे थे। उनके अलावा महाराज कमलसिंह को यह बात ज्ञात थी और वह बड़ी बेसब्री से उनके लौटने का इंतज़ार कर रहे थे। वह इस यात्रा के परिणाम को जानने के लिए बेहद उत्सुक थे।

राजमाता अपने कक्ष में पहुंचकर बिस्तर पर लेट गई। वह आँखें बंद कर पिछले एक हफ्ते के घटनाक्रम का मन में ही विश्लेषण कर रही थी। उन्होंने जिस तरह से सोचा था उसी हिसाब से सब हुआ। हालांकि एक डर उन्हे सताये जा रहा था और वह था महारानी पद्मिनी और शक्तिसिंह के बीच उत्पन्न हो चुकी नजदीकी का। उनका आदेश बड़ा स्पष्ट था की महारानी और शक्तिसिंह को किसी भी तरह की भावनाओ में बहने की अनुमति नही थी। पर जिस तरह से दो बार रानी और सैनिक, उनकी बगैर जानकारी के, संभोग करते हुए पकड़े गए थे, उन्हे यह डर था की कहीं वह दोनों छिप-छिपाके वापिस चोदने ना लग जाए। उन दोनों को रोकने के लिए राजमाता का शातिर दिमाग योजना बनाने लगा। कुछ देर पश्चात उन्होंने महाराज कमलसिंह को बुलावा भेजा।

महाराज के आते ही राजमाता सक्रिय हो गई और बिस्तर पर बैठ गई। पास पड़े आसन पर महाराज बिराजमान होकर यात्रा की जानकारी प्राप्त करने बेसब्र हो उठे।

"कैसी रही आपकी यात्रा, माँ"

"हम्म ठीक ही रही... में आश्वस्त हूँ की हमारा लक्ष्य प्राप्त हो जाएगा"

महाराज के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई। वह जानते थे की उनके वारिस का होना राज्य के लिए कितना महत्वपूर्ण था।

"हमे बड़ी ही प्रसन्नता हुई यह जानकर... वह योगी से इस कार्य के लिए पूर्ण सहयोग मिला होगा... उस जगह से हमारे परिवार का दशकों से संबंध रहा है... मुझे यकीन था की वह इस कार्य में हमारी सहायता जरूर करेंगे"

राजमाता ने कोई उत्तर ना दिया... मंजिल को कैसे हासिल किया गया था वह केवल राजमाता, महारानी और शक्तिसिंह ही जानते थे।

"क्या हुआ माँ? आप कुछ बोल नही रही..!!"

"कुछ नही.. बस थोड़ी सी थकान है... मैंने तुम्हें एक महत्वपूर्ण बात करने बुलाया है"

"जी बताइए माँ"

"पहली बात तो, में यह चाहती हूँ की महारानी के गर्भवती होने की बात को गोपनीय रखा जाए। रानी महल में सुरक्षा भी सख्त करनी है। हमारे दुश्मन तक अगर यह बात पहुंची तो महारानी की जान को खतरा हो सकता है।" राजमाता ने गंभीरता से कहा

"जी जरूर... में तुरंत आदेश देकर सुरक्षा के कड़े इंतेजाम करवाता हूँ... जनाना महल में सिर्फ विश्वसनीय दासियों को ही नियुक्त किया जाएगा...किसी भी अनजान व्यक्ति के प्रवेश को प्रतिबंधित किया जाएगा"

"हम्म... पर इतना पर्याप्त ना होगा.. में चाहती हूँ की तुम जनाना महल में शक्तिसिंह को नियुक्त करो। वह वफादार और बहादुर है और उसके नेतृत्व में कुछ सैनिक रानी महल का ध्यान रखेंगे।"

महाराज को यह सुन आश्चर्य हुआ

"माँ, शक्तिसिंह तो सैन्य का हिस्सा है... यहाँ महल में और काफी सैनिक है जो इस जिम्मेदारी को बखूबी निभा सकते है"

"नहीं, में चाहती हूँ की महारानी और रानी महल के लिए शक्तिसिंह को ही नियुक्त किया जाए। मुझे उसकी बहादुरी और वफादारी पर पूर्ण विश्वास है... सैन्य के कार्यों के लिए किसी और सैनिक को नियुक्त कर सकते है।" राजमाता ने आदेशात्मक स्वर में कहा

महाराज के पास राजमाता की बात को स्वीकार करने के अलावा और कोई विकल्प न था। उन्होंने जरूरी निर्देश दिए और दूसरे ही दिन शक्तिसिंह को रानीमहल की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई।

शक्तिसिंह को इस बात का अंदेशा था ही..!! जिस तरह से रानी और राजमाता उसके लंड के कायल हो गए थे वह जानता था की उसे करीब लाने के लिए ऐसी प्रयुक्ति, राजमाता जरूर आजमाएगी। फिलहाल उसे राजमाता से ज्यादा, महारानी पद्मिनी के करीब जाने में ज्यादा दिलचस्पी थी। महारानी के गोल गुंबज जैसे स्तन और गोरे गोरे भारी चूतड़, शक्तिसिंह के दिमाग से निकलने का नाम ही नही ले रहे थे। उनकी याद आते ही शक्तिसिंह का लंड इतना सख्त हो जाता था की धोती में छुपाना मुश्किल हो जाता।

महारानी को जैसे ही शक्तिसिंह के महल में नियुक्त होने के समाचार मिले... वह चहकने लगी। उनकी खुशी का कोई ठिकाना न रहा... शक्तिसिंह के दमदार लौड़े से ठुकने के बाद उनकी चुत की प्यास और बढ़ चुकी थी। यात्रा से लौटते वक्त वह अमूमन यह सोच रही थी की वापिस फिर महाराज के ढीले लंड से चुदवाना पड़ेगा... शक्तिसिंह के मूसल के मुकाबले महाराज का लंड को तो नून्नी ही कहा जा सकता था। अब शक्तिसिंह के महल में आ जाने से फिर से वह उसके शक्तिशाली लिंग से खेल सकती थी... और चुदाई का पूर्ण आनंद ले सकती थी।

अपने खंड से बाहर निकलकर वह बरामदे के और चलती हुई उस स्थान पर जा पहुंची जहां शक्तिसिंह अपने दो सैनिकों के साथ पहरा दे रहा था। महारानी को देखकर उसकी आँखें चमक उठी। महारानी का इशारा पाते ही शक्तिसिंह ने दोनों सैनिकों को महल का चारों और से मुआयना करने जाने का निर्देश दिया। दोनों सैनिक अलग अलग दिशा में चल दिए। उनके नजर से ओजल होते ही महारानी ने शक्तिसिंह को अपनी बाहों में भर लिया!! शक्तिसिंह भयभीत हो उठा... अगर इस स्थिति में कोई उसे देख ले तो तुरंत ही उसका सर कलम दिया जाता। उसने महारानी को रोकना चाहा पर महारानी ने उसे कसकर जकड़ रखा था। वह बेतहाशा शक्तिसिंह को चूमे जा रही थी। उनके हाथ अब धोती के ऊपर से लंड को सहलाने लगे थे। वास्तविकता से अनजान उसका लंड हरकत में आकार महारानी की हथेलियों संग खेलने लगा।

महारानी ने अपना हाथ धोती में सरका दिया और शक्तिसिंह के मूसल को पकड़कर उसकी चमड़ी ऊपर नीचे करने लगी। शक्तिसिंह के आँखों के आगे अंधेरा सा छा गया। वह चाहते हुए भी महारानी को सहयोग नही दे पा रहा था। वह इतना डरा हुआ था फिर भी उसका लंड पूर्णतः सख्त हो गया था। महारानी ने एक ही पल में उसका लंड धोती से बाहर निकाल दिया।

"यह क्या कर रही है महारानी जी!!! कोई आ गया तो आफत आ जाएगी..." सकपकाते हुए शक्तिसिंह ने कहा

महारानी ने उसकी बातों को अनसुना करते हुए घुटनों को मोड़ा और नीचे की और गई। अब शक्तिसिंह का लंड महारानी के मुख के बिल्कुल सामने तोप की तरह तना हुआ था। महारानी के हाथ लंड पर तेजी से आगे पीछे हो रहे थे। अपनी मुठ्ठी में लंड को भरकर जब वह अंदर की तरफ दबाती तब शक्तिसिंह का लाल सुर्ख सुपाड़ा अपने दर्शन देकर महारानी को प्रफुल्लित कर देता...

बिना वक्त जाया किए महारानी ने शक्तिसिंह के सुपाड़े को अपनी मुंह में ले लिया। शक्तिसिंह की आँखें बंद हो गई। अति-आनंद और घबराहट के बीच शक्तिसिंह झूल रहा था। वह हर दूसरे क्षण दोनों दिशाओं में देखता रहता था... महारानी पागलों की तरह उसका लंड चूसे जा रही थी। उसके लंड का जादू इस कदर सर पर सवार था की उनका दिमाग और कुछ सोच ही नही पा रहा था। शक्तिसिंह का फनफनाता लंड इस उत्तेजना को झेल पाने के लिए असमर्थ था और किसी भी वक्त अपना इस्तीफा दे सकता था। बड़ी ही मुश्किल से शक्तिसिंह ने उसे रोके रखा था।
 
लंड चूसते हुए महारानी अब शक्तिसिंह के टट्टों को भी सहला रही थी.... शक्तिसिंह की बर्दाश्त की सारी सीमा पार हो गई थी... महारानी के मुंह की गरम गलियों में गश्त लगाते हुए लंड पूरे उफान पर था। तीन चार बार और जोर से चूसने पर लंड ने हथियार रख दिए... फुले हुए सुपाड़े ने महारानी के मुख में वीर्य की बौछार कर दी। तीन चार जबरदस्त पिचकारियाँ लगते ही महारानी का दम घुटने लगा... पर वह फिर भी चूसे जा रही थी... लंड के अनूठे शक्ति-रस का पान कर वह धन्य हो गई थी!! शक्तिसिंह का लंड अब अपनी सख्ती छोड़ रहा था... यह महसूस होते ही महारानी ने लंड मुंह से निकाला और खड़ी हो गई। उसने शक्तिसिंह के चेहरे को पकड़ा और उसके होंठ पर अपने होंठ रख दिए। शक्तिसिंह अपने वीर्य की गंध को महसूस कर रहा था... एक गहरा चुंबन देकर महारानी ने फुसफुसाते हुए शक्तिसिंह के कानों में कहा

"रात को चुपके से मेरे कक्ष में आ जाना... ध्यान रहे किसी को इस बात का अंदेशा नही लगना चाहिए"

उन्होंने अपने वस्त्र को ठीक किया और एक शरारती मुस्कान देते हुए वहाँ से चल दी... शक्तिसिंह ने भी अपने लंड को तुरंत धोती के अंदर डाल दिया और पूर्ववत हो कर पहरा देने लगा। अभी जो कुछ भी हुआ था उसका विश्वास उसे अभी भी नही हो रहा था। महारानी की इस हिम्मत को देख वह दंग रह गया था!!

....................

कुछ ही देर में दोनों सैनिक गश्त लगाकर लौट आए। उन में से एक ने शक्तिसिंह को बताया की राजमाता ने उसे हाजिर होने का हुकूम दिया है। आश्चर्य सह शक्तिसिंह राजमाता के कक्ष की और चल दिया। रानी महल के दूसरे हिस्से में उनका निवास था। उनके कक्ष में प्रवेश करते ही उसने देखा की वह बिस्तर पर टाँगे फैलाए बैठी थी और दो दासियाँ उनके पैर दबा रही थी।

शक्तिसिंह को देखते ही राजमाता ने आँखों से इशारा किया और दोनों दासियाँ उठकर कक्ष से बाहर चली गई।

शक्तिसिंह नतमस्तक होकर खड़ा रहा।

"हम्म तो कैसे हो तुम शक्तिसिंह?"

"आपकी कृपा है राजमाता" शक्तिसिंह ने हाथ जोड़कर कहा

"तुम्हें रानी महल की सुरक्षा की जिम्मेदारी मिलने पर हैरानी तो जरूर हुई होगी... है ना!!"

"में तो इस राज्य का सेवक हूँ राजमाता... मेरा परिवार पीढ़ियों से राजमहल की सुरक्षा करता आया है... यह तो मेरा सौभाग्य है की मुझे इस जिम्मेदारी के लिए काबिल समझा गया... में किसी भी प्रकार की सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहूँगा" सिर झुकाकर शक्तिसिंह ने कहा। उसके मुरझाए लंड से वीर्य की बचीकूची बूंदें उसकी जांघों को गीला कर रही थी।

राजमाता के चेहरे पर एक कुटिल सी मुस्कान दौड़ गई। सारी स्थिति पर अपना पूर्ण नियंत्रण का एहसास होने पर वह मन ही मन बहुत खुश थी। शक्तिसिंह की सेवा के लिए उनका शाही भोंसड़ा पिछले कई दिनों से तड़प रहा था। शक्तिसिंह को अपने करीब लाने के लिए जो व्यवस्था उन्होंने आयोजित की थी वह सफल होती नजर आई..

"तुम आज से मेरे कक्ष की रखवाली करोगे... " राजमाता ने आदेश दिया

"क्षमा कीजिए राजमाता... पर मुझे तो महारानी पद्मिनी के कक्ष की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आदेश दिया गया है!!" शक्तिसिंह राजमाता के इस खेल को अभी समझ नही पा रहा था

"अब तुम मुझे बताओगे की कैसे और क्या करना है?" राजमाता ने क्रोधित स्वर में कहा

"माफ कीजिए राजमाता जी, में तो केवल वही बता रहा था जिसका मुझे आदेश दिया गया था"

"अब से जो में कहूँगी, वही तुम्हारे लिए आदेश होगा, समझे!!" राजमाता ने बड़ी ही कड़ी आवाज में कहा। शक्तिसिंह का लाभ उठाने के लिए उसे वश में करना अत्यंत आवश्यक था।

"जी राजमाता, जैसी आपकी आज्ञा" गर्दन झुककर शक्तिसिंह ने स्वीकार किया

"दूसरी बात... रात के वक्त मेरे कक्ष के बाहर केवल तुम ही पहरा दोगे... बाकी सारे सैनिकों को महारानी की सुरक्षा के लिए भेज दिया जाए"

शक्तिसिंह को अब बात धीरे धीरे समझ में आने लगी थी। पहले तो राजमाता ने अधिक सुरक्षा का प्रश्न उठाकर शक्तिसिंह को महल में तैनात करवा दिया और अब महारानी की सुरक्षा का बहाना बनाकर सारे सैनिकों को वहाँ भेजने की बात कही। उनका उद्देश्य स्पष्ट था।

"मेरे हुकूम की आज से... बल्कि अभी से ही पालन हो... अब तुम जा सकते हो... में रात्री के प्रहार पूरी सुरक्षा का मुआयना करने आऊँगी। अगर जरा सी भी कोताही बरती गई तो में किसी को भी जिंदा नही छोड़ूँगी" आदेशात्मक स्वर में बोलकर राजमाता बिस्तर पर लेट गई और अपने दोनों घुटनों को मोड लिया। उनका घाघरा घुटनों तक ऊपर चढ़ गया और शक्तिसिंह को उनकी मांसल गोरी जांघें नजर आने लगी। हालांकि अभी कुछ देर पहले ही स्खलन हुआ था पर फिर भी शक्तिसिंह के लंड ने हरकत करना शुरू कर दिया। वह आँखें फाड़कर उनकी मलाई जैसी गोरी पिंडियों को देख रहा था।

"क्या देख रहे हो ?" राजमाता ने उसकी तरफ देखकर कहा

शक्तिसिंह ने अपनी आँखें झुका ली। अपनी चोरी पकड़ी जाने पर वह शर्मा गया।

"अब तुम जा सकते हो" राजमाता ने आँखें बंद करते हुए कहा

शक्तिसिंह उलटे पैर वापिस लौट गया। उसने अपने दल को महारानी के कमरे के बाहर पहरा देने का निर्देश दिया। कुछ देर बाद वह महारानी के कमरे में जा पहुंचा... महारानी उस वक्त अपने खंड में अकेली थी। शक्तिसिंह को देखते ही उनकी आँखें चमक उठी।

"अरे, तुम तो बड़ी जल्दी आ गए... भूल गए क्या, मैंने तुम्हें रात को आने के लिए कहा था" बड़े ही धीमे स्वर में महारानी ने कहा

शक्तिसिंह तय नही कर पा रहा था की बात की शुरुआत कैसे करें

"जी में... वो आपको... " शक्तिसिंह के गले में शब्द अटक गए थे

"साफ साफ बोलो, क्या कहना चाहते हो... "

"जी में यह सूचित करने आया था की आपसे मिलने आज रात में नही आ पाऊँगा"

"वह क्यों भला... एक ही बार में तुम्हारा हथियार थक गया क्या? यात्रा के दौरान तो जब देखो तब वह खड़ा ही दिखता था!! पर चिंता मत करो, रात होने में अभी वक्त है... तब तक तुम जरूर तैयार हो जाओगे इसका मुझे पूर्ण विश्वास है.. " महारानी पद्मिनी ने मुसकुराते हुए कहा

"जी बात वो नही है... " शक्तिसिंह ठीक से समझा नही पा रहा था

"दरअसल मुझे राजमाता के कक्ष की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई है इसलिए.... " सकपकाते हुए शक्तिसिंह ने कहा

"क्या? किसने कहा तुमसे? महाराज का आदेश स्पष्ट था... इन अतिरिक्त सैनिकों को मेरी सुरक्षा के लिए ही भेजा गया है... और मेरा उद्देश्य तो यह है की जब तक गर्भधारण का समाचार ना मिले तब तक ज्यादा से ज्यादा संभोग कर में उसे सुनिश्चित कर सकूँ। इस बात को तुम हम दोनों के बीच तक ही सीमित रखना। तुम चिंता मत करो, में महाराज से बात करती हूँ"

"जी मुझे इस बात का आदेश राजमाता ने दिया है" डरते डरते शक्तिसिंह ने कहा

यह सुनते ही महारानी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। पर वह कुछ बोल नही पाई। उसे मालूम था की कमलसिंह नाम मात्र के राजा थे, असली राज तो राजमाता ही चलाती थी। पूरे राजमहल में किसी की हिम्मत नही थी की वह राजमाता के आदेश को अनसुना करे।

"शक्तिसिंह तुम अभी आ ही गए तो कक्ष का दरवाजा बंद कर लो... रात होने में अभी वक्त है.. तब तक हम थोड़ी देर... " शैतानी मुस्कान के साथ आँखें नचाते हुए महरानी ने कहा

"पर महारानी जी, बाहर खड़े सैनिकों ने मुझे अंदर आते देखा है... यहाँ ज्यादा समय व्यतीत करना अयोग्य होगा और उनको शंका हो जाएगी"

"तुम उनके सरदार हो... उन्हे कैसे संभालना वह तुम जानो... अभी फिलहाल में जैसा कह रही हूँ वैसा करो " महारानी के सर पर हवस का भूत सवार था। वह कैसे भी कर अपनी मखमली चुत में शक्तिसिंह का साबुत डंडा लेना चाहती थी।

"राजमाता ने कहा है की वह सुरक्षा व्यवस्था का मुआयना करने कभी भी आ सकती है... ऐसी सूरत में इतना बड़ा जोखिम उठाना उचित नही होगा महारानी जी" शक्तिसिंह ने डरते हुए कहा
 
राजमाता का नाम सुनते ही महारानी का दिमाग कलुषित हो गया... उनकी इस दखलंदाज़ी के कारण वह शक्तिसिंह को प्राप्त नही कर पा रही थी। उसे गुस्सा तो बहुत आ रहा था पर शक्तिसिंह की बात भी सही थी। ऐसा जोखिम उठाना ठीक नही था। उन्होंने आँखों से इशारा कर शक्तिसिंह को जाने के लिए कहा। शक्तिसिंह के जाते ही उन्होंने अपनी खास दासी को बुलाया

"जी महारानी जी... आपने याद किया?"

"उस दिन जैसे फिर से मालिश कर दे मेरी कमर की" महारानी ने चोली खोलकर उलटे लेटते हुए कहा। उनको दोनों उरोज सफेद कबूतरों की तरह बाहर झूलने लगे। दासी की आँखें उनपर चिपक सी गई। तभी उन्होंने अपने घाघरे को थोड़ा सा नीचे सरकाते हुए लगभग घुटनों तक ला दिया। उनके दोनों चूतड़ उजागर हो गए। दासी समझ गई की महारानी क्या चाहती थी। उसने तेल की शीशी लेकर मालिश करना शुरू कर दिया।

इस तरफ राजमाता अपने कक्ष से बाहर चलते हुए महल के उस हिस्से की तरफ चलते हुए आ रही थी जहां महारानी का खंड था। बीच रास्ते में उन्हे शक्तिसिंह अपनी ओर आता दिखा... पास से गुजरने पर भी शक्तिसिंह ने आँखें उठाकर राजमाता की तरफ नही देखा और चलता गया। राजमाता ने विजयी मुस्कान के साथ उसकी तरफ एक नजर देखा और आगे चल दी।

महारानी के कक्ष के बाहर तीन सैनिक खुली तलवार लिए पहरा दे रहे थे। शक्तिसिंह की इस व्यवस्था से संतुष्ट होकर राजमाता ने महारानी के कक्ष में प्रवेश किया। महारानी का कक्ष दो हिस्सों में बंटा हुआ था। कमरे के आगे के हिस्से में शाही साज सजावट थी और आगे चलते ही परदे के पीछे दूसरे हिस्से में महारानी का बिस्तर था। शाम होने को थी और कक्ष में काफी अंधेरा हो रहा था। महारानी के बिस्तर के इर्दगिर्द जल रहे दीयों से चारों ओर प्रकाश फैला था। हालांकि कमरे का आगे का हिस्सा अंधेरे में डूबा हुआ था। दबे पाँव चली आ रही राजमाता की भनक दासी या महारानी किसी को ना हुई। राजमाता एक स्तम्भ के पीछे खुद को छुपाकर, परदे के पीछे बिस्तर पर चल रही गतिविधियों को देखने लगी। यात्रा के दौरान जब वह महारानी के तंबू में आई थी तब उन्हे यकीन था की उन्होंने महरानी की सिसकियाँ साफ सुनी थी। उन्हे संदेह था की दासी के साथ वह कुछ तो गुल खिला रही थी।

"आह... वैसे ही करती जा... थोड़ा सा और तेल लेकर उंगली डाल" महारानी कराहते हुए बोली

राजमाता को अपनी आँखों पर विश्वास नही हो रहा था...!! महारानी अपने बड़े बड़े कूल्हे फैलाए लेटी थी और उनकी दासी अपनी उंगली महारानी की गांड के छेद में डालकर आगे पीछे कर रही थी...!! यह देख राजमाता का जबड़ा लटक गया... हालांकि गुदा मैथुन के बारे में वह विस्तार से जानती थी पर ना तो कभी उन्होंने वास्तविकता में उसे देखा था और ना ही कभी महसूस किया था। वास्तव में वह मानती थी की गाँड़ के सिकुड़े छेद में लंड डलवाना काफी दर्दनाक होता होगा। पर महारानी को उंगली डलवाते हुए देख वह अचंभित थी क्योंकी रानी के चेहरे पर दर्द का कोई निशान दिख नही रहा था। वह तो बड़े चाव से इस उंगली-चोदन का आनंद ले रही थी।

महारानी अपनी चूचियाँ खुद ही मसल रही थी। राजमाता क्रोधित होकर हस्तक्षेप करने ही वाली थी पर कुछ सोचकर वह रुक गई और यह पूरा तमाशा देखने लगी।

दासी महारानी की गाँड़ में उंगली डालते हुए अपने अंगूठे से उनकी चुत के होंठों को भी ऊपर से रगड़ रही थी। महारानी सातवे आसमान पर पहुँच चुकी थी... वह हर दूसरे पल अपने चूतड़ को उछाल रही थी... अस्पष्ट शब्दों की बकवास किए जा रही थी... और साथ ही साथ अपनी निपलों को मरोड़े जा रही थी।

"और तेजी से अंदर बाहर कर... आह आह... ऊई...!!!" चूतड़ उछाल उछालकर वह दासी की उंगली का पूर्ण आनंद ले रही थी। महारानी की चुत बेतहाशा पानी छोड़ रही थी। उनका पूरा जिस्म पसीने से तर हो चुका था। साँसे भी तेज चल रही थी।

महारानी की इस अवस्था को देख राजमाता के पूरे जिस्म में झुरझुरी सी होने लगी। उनकी साँसे फूलने लगी। उन्हे पता ही नही चला की कब उनका एक हाथ घाघरे के ऊपर से उनके भोंसड़े को मलने लगा था। वस्त्र के ऊपर से ही अपनी चुत को पकड़कर वह दबाने लगी और दूसरे हाथ से अपने स्तनों को सहलाने लगी। अगर वह स्तम्भ का सहारा लेकर ना खड़ी होती तो उत्तेजना के मारे वही गिर जाती।

"अब तू दो उंगली एक साथ डाल दे... " हांफते हुए महरानी ने कहा

"जी महारानी, ऐसा करूंगी तो आपको दर्द होगा" दासी इस आदेश से थोड़ा हिचकिचाई

"जैसा कह रही हूँ वैसा कर... डाल दे दो उंगली"

दासी ने दूसरी उंगली को तेल से लिप्त किया और एक साथ दोनों उंगली अंदर डाल दी...

"ऊईई माँ... मर गई... " महारानी के कंठ से हल्की चीख निकल गई...

घबराकर दासी ने दोनों उंगली बाहर निकाल ली

"क्या कर रही है तू? बाहर क्यों निकाल ली तूने... " महारानी ने बेचैन होते हुए पूछा

"जी वो आपको दर्द हुआ इसलिए " दासी ने डरते डरते उत्तर दिया

"डाल दे वापिस... पर जरा धीरे धीरे... तूने झटके से अंदर डाल दी इसलिए दर्द हुआ"

दासी ने तुरंत अमल किया... थोड़ा सा और तेल लेकर उसने पहले तो महारानी के गांड के छेद में डाल और फिर उंगलियों को तेल से द्रवित कर धीरे धीरे दोनों उंगलियों को उनके बादामी रंग के छेद में डाल दिया।

"कुछ देर ऐसे ही डाले रख... जब में कहूँ तब आगे पीछे करना" महारानी दो उंगलियों की चौड़ाई से गांड के छेद को अभ्यस्त करवाना चाहती थी। कुछ समय तक यूँही पड़े रहने के बाद उनका छेद अब उंगलियों के आसपास सहज हो गया।

"अब धीरे धीरे आगे पीछे कर... और हाँ... तेरे अंगूठे से नीचे घिसती रहना" वह अपनी प्यासी चुत को भी अनदेखा करना नही चाहती थी

दासी की उँगलियाँ अब किसी यंत्र की तरह महारानी की गांड के छेद में अंदर बाहर हो रहा था और साथ थी साथ उसका अंगूठा चुत के होंठों को सहला रहा था। दोनों होंठ चुत के द्रवित होते रस से चिपचिपे बन गए थे। दासी की उँगलियाँ ऐसे चल रही थी जैसे मक्खन के अंदर गरम छुरी।

इस अंगुली-चोदन को देखते हुए राजमाता काफी उत्तेजित हो रही थी... उनका अनुभवी भोंसड़ा अब भांप छोड़ रहा था... एक हाथ से अपना घाघरा ऊपर कर उन्होंने दूसरे हाथ की उंगली से अपने अंगूर जैसे दाने को रगड़ा... उंगली की रगड़ खाते ही उनकी क्लिटोरिस सिहर उठी... पूरा शरीर झुंजहाने लगा.. दाने को रगड़कर उन्होंने उंगली को चुत के होंठों के बीच घुसा दिया...

यहाँ दासी ने महारानी की गांड में उंगली करते करते अपना अंगूठा उनकी चुत में अंदर बाहर करना शुरू कर दिया। दोनों छिद्रों में एक साथ हुए हमले से महारानी उछलने लग गई। उनकी चुत का शहद अब बहकर बिस्तर को गीला कर रहा था। महारानी को इस अवस्था में देखकर दासी की चुत में भी चुनचुनी होने लगी थी। उसने अपना दूसरा हाथ चोली में डालकर अपने स्तनों को मसलना शुरू कर दिया।
 
"हाय दैया... मार देगी तू मुझे... कैसा रगड़ रही है री तू... आह...!!" महारानी निरंतर बकवास किए जा रही थी। उनकी निप्पल मरोड़ने के कारण लाल लाल हो गई थी... अब तो उन्हे छूने पर भी दर्द हो रहा था।

इस तरफ राजमाता की उंगली भी जोर-शोर से उनके भोंसड़े के अंदर बाहर हो रही थी... उनके घुटने इतने अशक्त महसूस होने लगे की लगता था की वह किसी भी वक्त संतुलन खो कर गिर जाएगा। जैसे तैसे कर उन्होंने अपना आपा बनाए रखा था। उंगली से जैसे उनका मन नही भर रहा था... अब उन्होंने स्तंभ के कोण पर अपना दाना घिसना शुरू कर दिया... पूरे कक्ष में, तीन उत्तेजित चूतों की गंध फैल गई थी।

"ऊईईई... जोर से घिस जरा... हाय कमीनी... जरा हाथ चला जल्दी जल्दी... में निढाल होने ही वाली हूँ... आईईई माँ... " महारानी कराहती हुई अपनी मंजिल की तरफ कूच कर रही थी... कुछ ही पलों में महारानी ऐसे तड़पने लगी जैसे जल बिन मछली..!! एक जोरदार चीख मारकर महारानी लाश की तरह ढेर हो गई... दासी ने उनकी गांड और चुत से उंगली निकालकर उन्हे सूंघा... शाही गुप्तांगों की अनोखी खुशबू ने उसे सराबोर कर दिया। होश खोकर लुढ़की हुई महारानी के बिस्तर के दूसरे छोर पर दासी अपनी टाँगे फैलाकर लेट गई और अपना घाघरा उठाकर चुत में उंगली करने लगी।

कुछ ही पलों में उसकी चुत ने भी जवाब दे दिया। वह धीरे से उठी, अपने वस्त्र ठीक किए और महारानी के ऊपर मखमली चद्दर ओढाकर वहाँ से चलने लगी। दासी को बाहर आता देख राजमाता ने भी अपनी उंगली बाहर निकाली, घाघरा गिराया और अंधेरे का सहारा लेकर कक्ष से बाहर निकल गई।

अपने खंड तक लौटते हुए राजमाता ने शक्तिसिंह को द्वार पर अकेले चौकीदारी करते हुए देखा और मुस्कुरा दी... बिना कुछ कहें वह शक्तिसिंह के करीब से गुजरकर अंदर चली गई।

मध्य रात्री का समय था। पूरा नगर नींद की गिरफ्त में सो रहा था। रानी महल में सन्नाटा छाया हुआ था... केवल सिपाहियों और चौकीदारों की प्रासंगिक चहल पहल सुनाई दे रही थी। रानी महल के अंतिम छोर पर कोने में राजमाता के कक्ष के बाहर शक्तिसिंह पहरा दे रहा था। तभी कक्ष का बंद दरवाजा खुला और पीछे से राजमाता प्रकट हुए। उन्होंने आँखों से ही इशारा कर शक्तिसिंह को अंदर बुलाया। बिना कुछ कहे या पूछे शक्तिसिंह नीची मुंडी कर अंदर चला गया। उसके अंदर आते ही राजमाता ने द्वार बंद कर दिया और कुंडी लगा दी।

राजमाता का कक्ष काफी विशाल था... छत पर रंगबिरंगी कांच के झूमर लटक रहे थे... दीवारों पर कीमती रत्न जड़े हुए थे... बड़े बड़े तैल-चित्रों से दीवारें सुशोभित थी... बीच में पड़े मेज और कुर्सी पर सुवर्ण का आवरण था। थोड़ा सा और अंदर जाते ही बड़ा सा बिस्तर था... पलंग के चार स्तंभ पर शेर की छवि मुद्रित थी... चारों और दिए और सुगंधित बत्तियाँ जल रही थी.. छत से लेकर बिस्तर तक एक पारदर्शक कपड़ा, पलंग को चारों ओर से ढँक रहा था।

राजमाता के पीछे पीछे चलते हुए शक्तिसिंह भी बिस्तर तक आ गया। बिस्तर पर पहुंचकर राजमाता शक्तिसिंह की ओर मुड़ी और उसे अपनी बाहों में भर लिया। शक्तिसिंह ने भी सहयोग देते हुए अपने खुरदरे हाथों से राजमाता की मांसल पीठ और कमर की गोरी कोमल त्वचा को सहलाना शुरू कर दिया। शक्तिसिंह को चूमते हुए राजमाता आहें भर रही थी। कुछ देर तक उसकी बलिष्ठ भुजाओं का आनंद लेकर राजमाता ने उसे अपने बाहुपाश से मुक्त किया और बिस्तर पर फैल कर बैठ गई।

"बड़ा तड़पाया है तूने मुझे... यात्रा से लेकर अब तक... मेरा शरीर तेरी मजबूत पकड़ को तरस गया है... पर तुझे तो मेरी याद ही नही आती"

"ऐसा नही है राजमाता, में तो आपके आदेश का पालन कर राज्य को लौट गया था और फिर तालिम में व्यस्त था.. मुझे तो आज ही पता चला की आप यात्रा से लौट आए है"

"हम्म... तुझे वहाँ से वापिस लौटने का आदेश देना जरूरी था... वरना वह चुदैल महारानी अपने मोहपाश से तुझे मुक्त ही नही करती"

शक्तिसिंह मौन ही रहा.. यात्रा के वक्त उत्तेजनावश उसने राजमाता के निर्देश की अवहेलना कर महारानी को अतिरिक्त दो बार चोद दिया था और राजमाता को इसका ज्ञान भी हो गया था। वासना का रंग उड़ते ही उसे एहसास हुआ की इस उपेक्षा का बड़ा भयानक नतीजा हो सकता था। गनीमत थी की राजमाता भी उसके लंड की दीवानी हो चली थी वरना उसका वहाँ से जिंदा लौट पाना नामुमकिन था।

"चुप क्यों खड़ा है? आजा यहाँ मेरे पास बैठ..." राजमाता ने उसे आमंत्रित किया

थोड़े से संकोच के साथ शक्तिसिंह राजमाता के बगल में जा बैठा।

राजमाता ने उसकी मजबूत बाहों को सहलाना शुरू कर दिया... उसकी बलिष्ठ मांसपेशियाँ सैनिक-वस्त्रों के बाहर झलक रही थी और शक्तिसिंह की ताकत का प्रमाण भी दे रही थी। हालांकि राजमाता ने शक्तिसिंह की शक्ति को भलीभाँति परख लिया था।

राजमाता ने अपने घने गुलाबी होंठों से शक्तिसिंह के कंधों को चूमा... और उसकी छाती पर अपना हाथ घुमाने लगी। उनकी रगों में रक्त तेजी से दौड़ने लगा था। कुछ देर पहले महारानी के खंड में संदीप्त हुई चुत फिर से हरकत करने लगी। उनके गाल उत्तेजनावश लाल लाल हो गए। उन्होंने एक धक्का देकर शक्तिसिंह को बिस्तर पर लिटा दिया और उसके जिस्म के दोनों तरफ पैर रखकर शक्तिसिंह के शरीर पर सवार हो गई।

शक्तिसिंह के खड़े लँड के बिल्कुल ऊपर राजमाता के चूतड़ बिराजमान थे। हालांकि बीच में दोनों के वस्त्रों का आवरण जरूर था।
 
राजमाता अब शक्तिसिंह पर ऐसे झपटी जैसे भूखी शेरनी मेमने पर झपटती है। उन्होंने बेतहाशा होकर शक्तिसिंह के गर्दन, होंठ, कपाल और छाती पर चूमना शुरू कर दिया। शक्तिसिंह भी निढाल होकर पड़े पड़े राजमाता के इस खेल का आनंद ले रहा था। उसका लंड राजमाता के शरीर के वज़न तले दबा हुआ था पर फिर भी अपना पूरा जोर लगाकर खड़ा होने की भरसक कोशिश कर रहा था।

शक्तिसिंह की छाती को चूमते हुए राजमाता नीचे की ओर गई... और अपने पसंदीदा हथियार को धोती के आवरण के ऊपर से ही महसूस करने लगी। राजमाता का वज़न हटते ही शक्तिसिंह का औज़ार धोती को उठाते हुए खड़ा हो गया। धोती के उस उभार को राजमाता सम्मोहित होकर देखती ही रह गई। उन्होंने उस उभार को अपनी मुठ्ठी में पकड़ा... उस मजबूत लिंग की परिधि का एहसास होते ही उनकी चुत ने तुरंत पानी का अभिषेक कर दिया। उस योनिजल का गीलापन शक्तिसिंह को अपने घुटनों पर महसूस हुआ।

धोती को टटोलते हुए राजमाता ने आखिर शक्तिसिंह के लंड को मुक्त कर ही दिया..!! कुछ प्रहरों पहले महारानी के मुख-मैथुन से रिसाव कर चुके इस लंड ने अब नया चेहरा देखा!! तन्ना के ऐसे सख्त खड़ा था जैसे राजमाता को सलामी दे रहा हो!! उस प्यारे टमाटर जैसे सुपाड़े को राजमाता बड़े ही वात्सल्य से देखती रही... उन्हे इतना प्यार उमड़ आया की बिना एक क्षण का व्यय किए, उन्होंने उस गुलाबी सुपाड़े को मुंह में भर लिया और बड़े ही चाव से चूसने लगी। लंड के ऊपर से लेकर नीचे तक वह अपनी जीभ फेरते हुए उसे अपनी लार से सराबोर करती जा रही थी। शक्तिसिंह आँखें बंद कर इस स्वर्गीय सुख का आनंद ले रहा था।

अपनी मुठ्ठी में कैद कर राजमाता ने लंड को ऊपर से नीचे तक हिलाया। उसके लंड की त्वचा को ऊपर नीचे करते हुए वह सुपाड़े को चूसने लगी। वीर्य की कुछ बूंदें सुपाड़े के छेद पर प्रकट हुई जिसे राजमाता ने अपनी जीभ के छोर से समेटकर चाट लिया। उस मजबूत सैनिक के पुष्ट वीर्य में अनोखा स्वाद था।

उधर राजमाता की चुत आंदोलित हो रही थी... अवहेलना उससे बर्दाश्त न हुई और वह टपक टपक कर राजमाता को उसे मुक्त करने का आहवाहन दे रही थी। चुत की इस स्थिति से वाकिफ होने के बावजूद, राजमाता फिलहाल शक्तिसिंह के लंड को छोड़ना नही चाहती थी। वह पागलों की तरह शक्तिसिंह के लंड को चूसे जा रही थी। उसका पूरा लंड राजमाता की लार से द्रवित हो चुका था।

राजमाता द्वारा की जा रही लंड चुसाई का आनंद लेते हुए शक्तिसिंह ने अपना कवच और उपरार्ध का वस्त्र, लेटे लेटे ही उतार दिया। उसकी मांसल मजबूत विशाल छाती पर राजमाता अपना हाथ पसारने लगी। शक्तिसिंह के लंड को मुक्त कर राजमाता खड़ी हुई और अपनी चोली की गांठ खोलने लगी। गांठ खुलते ही उनके दोनों लचीले भारी गोरे गोरे स्तन बाहर निकल आए। दोनों विशाल स्तन और उसपर लगी लाल चेरी जैसी उनकी निप्पल देखकर ही शक्तिसिंह के मुंह में पानी आ गया।

राजमाता अपने स्तन खोलकर खड़ी हो गई और उन्होंने अपना घाघरा उठाया। दोनों मांसल जांघों के बीच बालों के झुरमुट में छिपी हुई उनकी लाल चुत की लकीर द्रश्यमान हो गई। उनका दाना उत्तेजना से सख्त हो गया था और चुत के होंठों से रस टपक रहा था। उसी अवस्था में राजमाता एक कदम आगे आई और बिल्कुल शक्तिसिंह के चेहरे के दोनों तरफ टाँगे जमाकर खड़ी हो गई। शक्तिसिंह को अपने ऊपर फैली जांघों के बीच राजमाता का शाही भोंसड़ा नजर आ रहा था और योनिरस उसके मुंह पर टपक रहा था। वह असमंजस में था की राजमाता आखिर क्या करना चाहती थी। राजमाता ने हौले से अपने घुटनों को मोड़ा और अपनी चुत को बिल्कुल शक्तिसिंह के मुंह के करीब ले गई।

"देख ले बेटा... यह वही शाही चुत है जिसमे से तुम्हारे महाराज प्रकट हुए थे... आज इसमे ऐसा घमासान हुआ पड़ा है जिसे बस तू ही शांत कर सकता है... ले... इसका रस पीकर तृप्त हो जा... " कहते ही राजमाता ने अपनी चुत को शक्तिसिंह के मुंह पर रख दिया।

शुरुआत में उसने अपनी जीभ चुत पर फेर दी... स्पर्श होते ही दोनों होंठ खुल गए और चुत के अंदर का लाल गुलाबी हिस्सा दिखने लगा। राजमाता की चुत को इतने करीब से देखकर वह अभिभूत हो गया। राजमाता ने उंगलियों से अपनी चुत के दोनों होंठों को चौड़ा किया और अपना पूरा वज़न शक्तिसिंह के मुंह पर डाल दिया। शक्तिसिंह ने दोनों हाथों से राजमाता के भारी चूतड़ों को पकड़े रखा ताकि संतुलन बना रहे और चाटने की क्रिया को ठीक से नियंत्रित भी किया जा सके।

राजमाता की चुत के गाढ़े चिपचिपे शहद को वह ऐसे चाटने लगा जैसे बिल्ली दूध चाटती है... उस दौरान राजमाता अपना दाना घिसे जा रही थी... चुत की अनोखी गंध शक्तिसिंह के नथुनों मे जाते ही वह मस्त हो गया। राजमाता अपने चूतड़ों को आगे पीछे हिलाते हुए चुत को शक्तिसिंह की जीभ पर रगड़ रही थी। उनका पूरा योनिमार्ग रस से लसलसित हो चुका था और शक्तिसिंह के मजबूत औज़ार को अपने में समाने के लिए आतुर हो उठा था।

अपनी चुत शक्तिसिंह के मुंह पर रगड़ते हुए राजमाता थोड़ी सी पीछे की और झुकी और एक हाथ से उसके लंड को पकड़ लिया... अपने आप को झड़ने से रोकने के लिए शक्तिसिंह को काफी यत्न करना पड़ा। राजमाता की चुत उसके मुख पर योनिरस का अभिषेक कर रही थी... और वह उसे चूसे जा रहा था। उनकी चुत का दाना उत्तेजना से सूजकर जामुन के आकार सा हो गया था।

शक्तिसिंह के मुंह की सवारी करते हुए वह उसका लंड हिलाते जा रही थी... राजमाता का घाघरा दोनों जांघों पर ऊपर तक चढ़ गया था। उनकी हलचल से राजमाता के दोनों भारी लचीले स्तन यहाँ वहाँ झूल रहे थे। शक्तिसिंह की दाढ़ी वाली ठुड्डी का स्पर्श अपनी गांड के छेद पर होते ही राजमाता सिहर उठती। वह अब पगलाई घोड़ी की तरह शक्तिसिंह के मुंह पर आगे पीछे होते हुए अपनी चुत घिसे जा रही थी।

शक्तिसिंह की हालत खराब थी... उसका लंड अब केवल हिलाने भर से खुश नहीं था... उसे चाहिए थी गुनगुनी चुत की गर्माहट... पर फिलहाल इस खेल का सारा नियंत्रण राजमाता के पास था... और वह तो झड़ने के यत्न में इतनी मशरूफ़ थी की शक्तिसिंह की अवस्था का उसे कोई अंदाजा न था... वह बस झड़ना चाहती थी...

शक्तिसिंह ने अपनी जीभ को राजमाता के फैले हुए भोंसड़े में अंदर तक डाल दी... पसीज चुके योनिमार्ग से अनोखी गंध वाला गरम गरम रस उसके मुंह में गिरता जा रहा था। भोंसड़े के अचानक सिकुड़ने का अनुभव होते ही शक्तिसिंह ने अनुमान लगा लिया की वह झड़ने के करीब थी। चुत से कामरस की बौछार की अपेक्षा से शक्तिसिंह ने अपना मुंह थोड़ा और खोल दिया।

"हाय... माँ... मर जाऊँगी में... क्या चाटता है तू बेटा... आईईईई... " राजमाता ने किलकारियाँ मारते हुए अपना जिस्म एकदम सख्त कर दिया और फिर झटके मारते हुए झड़ने लगी... उनका पूरा शरीर कांप रहा था... दोनों जांघें फैलाकर वह शक्तिसिंह के मुंह पर ही निढाल हो गिरी...

राजमाता के शरीर के भारी वज़न के तले शक्तिसिंह का दम घुटने लगा... उसने पूरा जोर लगाते हुए राजमाता के शरीर को उठाया और अपने बगल में लिटा दिया... कमर तक उठे घाघरे, और खुली चुत और स्तनों के साथ, राजमाता ऐसे टांगें फैलाकर लेटी थी जैसे उनके प्राण निकल गए हो!!

अब बारी शक्तिसिंह की थी... वह राजमाता की दोनों जांघों के बीच सटकर बैठ गया... उनके दोनों पैरों को अपने मजबूत कंधों पर ले लिए... लंड का सुपाड़ा राजमाता के गरम आद्र भोंसड़े के मुख पर रखा... और एक जोर का धक्का दिया... एक पल में ही राजमाता के भोंसड़े ने पूरा लंड निगल लिया और शक्तिसिंह के टट्टे उनकी गांड के दरवाजे पर दस्तक देने लगे।

गरमाए हुए घोड़े की तरह शक्तिसिंह ने आव देखा न ताव... वह जबरदस्त धक्के लगाते हुए राजमाता के खुले हुए खरबूजे जैसे स्तनों पर टूट पड़ा। दोनों मम्मों को चारों ओर चूमने के बाद उनके दो अंगूर जैसे निप्पल को बारी बारी से मुंह में भरकर चूसने लगा...

राजमाता अभी एक स्खलन से उभरी भी नहीं थी पर शक्तिसिंह के इन जानदार धक्कों के कारण वह पुनर्जीवित हो उठी... उन्होंने अपने दोनों हाथों से शक्तिसिंह के सर को अपने स्तनों के बीच दबा दिया और अपनी टाँगे और फैला दी... शक्तिसिंह का सुपाड़ा अब गेंद की आकार का होकर राजमाता के भोंसड़े को और फैलाते हुए उनकी बच्चेदानी पर नगाड़े बजा रहा था। शक्तिसिंह के घुँघराले झांट का खुरदरापन, राजमाता के भगोष्ठ को रगड़ते जा रहा था...

अथाग परिश्रम के कारण दोनों के शरीर पसीने से तरबतर हो गए थे। राजमाता की चुत का झरना बहते ही जा रहा था... उनके दोनों स्तनों पर जगह जगह पर शक्तिसिंह के काटने से लाल निशान बन गए थे। उनकी निप्पलों को चटकारे लेकर चूसते हुए जब शक्तिसिंह दांतों से काटता तब राजमाता जोर से कराह उठती...
 
शक्तिसिंह ने अपनी गति और बढ़ाई... राजमाता भी नीचे से धक्के लगाए जा रही थी... शक्तिसिंह ने अपना एक हाथ दोनों के जिस्मों के बीच सरकाया और राजमाता के दाने को रगड़ने लगा... वह अब अपनी उत्तेजना की चरमसीमा पर था... आखिरी चंद धक्के लगाकर दहाड़ते हुए उसने अपने वीर्य की पिचकारी राजमाता के आनंदित भोंसड़े में दे मारी... गरम गरम घी जैसी बौछारों ने पूरा शाही भोंसड़ा सींच दिया... कुछ क्षणों तक पिचकारियों का वह दौर चलता रहा... अपने गर्भाशय के मुख तक इस गुनगुने द्रव्य को महसूस करते हुए राजमाता ने भी हार मान ली और थरथराते हुए झड़ गई।

पुचुक की आवाज के साथ शक्तिसिंह ने अपना गीला हथियार राजमाता की म्यान से बाहर निकाला। युद्ध से विजयी होकर लौटे सैनिक जैसी उसकी शान थी... शक्तिसिंह राजमाता के बगल में ढेर हो गया... राजमाता वात्सल्य से शक्तिसिंह के सर पर हाथ पसारने लगी।

सुबह के चार बजे शक्तिसिंह की आँख खुली। उसने देखा की राजमाता बगल में खर्राटे ले रही थी... उनके एक हाथ की उंगली अपनी चुत में थी और दूसरे हाथ से शक्तिसिंह का मुरझाया लंड पकड़ा हुआ था... राजमाता के हाथ से अपना लंड छुड़ाकर वह धीरे से उठ खड़ा हुआ। अपने वस्त्र पहने और बिना आवाज किए दरवाजा खोलकर कक्ष के बाहर निकला और पहरा देने लगा।

......................

इस तरफ अपने बिस्तर पर करवटें लेटे हुए पूरी रात महारानी पद्मिनी शक्तिसिंह का इंतज़ार करती रही... उसे यह आश्चर्य हुआ की उनके बुलाने के बावजूद वह आया क्यों नहीं...!! उन्हे कई बार इच्छा हुई की सैनिकों से शक्तिसिंह के बारे में पूछे... पर ऐसा करने पर उन्हे शंका होने का डर था। वह रात भर अपनी जांघों को भींचकर चुत को समझाती रही... पर अब उनकी चुत ने विद्रोह कर दिया था... शाम को दासी की उंगली से झड़ने का खुमार कब का उतर चुका था... और प्यासी चुत अब लंड का भोग मांग रही थी। सुबह होते ही शक्तिसिंह को ढूंढ निकालने का मन बनाकर वह आँखें बंद कर सोने का प्रयास करने लगी।

सूरजगढ़ में सुबह की रोशनी फैलते ही सारे नगर में चहलपहल होने लगी। पूरे दिन के परिश्रम के पश्चात अपनी पत्नियों की घमासान चुदाई कर तरोताजा होकर उठे नगरजन खेतों की ओर प्रस्थान कर रहे थे। बच्चे किलकारियाँ मारते हुए गलियों में खेल रहे थे। औरतें अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गई थी।

राजमहल भी दासियों और सेवकों की आवाजाही से गतिमान हो गया था। महारानी पद्मिनी तैयार होकर अपने कक्ष से बाहर शक्तिसिंह को ढूँढने के आशय से ढूंढ रही थी। चलते चलते वह दूसरी रानी के कक्ष के पास आई। वहाँ बाहर महाराज कमलसिंह के सैनिकों को पहरा देते देख वह समझ गई की महाराज उस रानी के साथ थे। उसने इशारे से दरवाजा खोने का निर्देश दिया और सैनिक ने सिर झुकाकर उसका पालन किया। महरानी ने कक्ष में प्रवेश किया और पीछे दरवाजा बंद हो गया।

महाराज कमलसिंह अपनी रानी को घोड़ी बनाकर सुबह सुबह पेल रहा था... पेल क्या रहा था बस कोशिश कर रहा था उसे अपने मध्यम कद के लंड से कुरेदने की... महारानी बेझिझक बिस्तर तक पहुँच गई... महारानी को किसी भी निम्न रानी के कक्ष में प्रवेश का अधिकार था...

"अरे पद्मिनी... तुम..!!" कमलसिंह की नजर महारानी पर पड़ते ही उन्होंने चुदाई बीच में रोक दी और वह रानी के चूतड़ों के बीच से लंड बाहर निकालकर तकिये पर गिरकर हांफने लगे... चुदाई में हुए इस विक्षेप के कारण वह रानी ने मुंह बिगाड़ा और अपने वस्त्र उठाकर पास बने शाही गुसलखाने की ओर चल दी...

महारानी पद्मिनी ने पास पड़े आसन को ग्रहण किया। सांसें पूर्ववत होते ही महाराज कमलसिंह ने पूछा

"कहिए कैसे आना हुआ.... "

"यात्रा से लौटने के बाद आप तो जैसे हमें भूल ही गए... क्या इन दुमछली रानियों की नादान योनियों में आपको इतना आनंद प्राप्त होता है की आप हमे याद ही नहीं करते??" महारानी ने थोड़े क्रोधित होकर कहा

"नहीं नहीं पद्मिनी... तुम्हारी गुलाबी गुफा में जो आनंद है वह बाकियों में कहाँ? पर तुम्हें तो मालूम है की फिलहाल तुम्हारी गर्भधारण की अवस्था चल रही है... ऐसी स्थिति में तुम्हारे करीब न जाने की राजमाता और वैद्यजी ने हमे सलाह दी है... अब ऐसी स्थिति में तुम्हें परेशान कैसे करूँ? इसी कारण दिल बहलाने के लिए इनके पास चला आता हूँ" महाराज ने सफाई देते हुए कहा

"फिर मेरे शरीर की इच्छाओं का क्या महाराज? आप तो मेरी भूख से अवगत है... बिना संभोग मुझसे एक दिन नहीं कटता..." मुंह फुलाते हुए महारानी ने कहा

"में आपकी स्थिति को भलीभाँति जानता हूँ... पर राजगद्दी के वारिस के लिए आपको यह बलिदान तो देना ही होगा..."

"ज्यादा कुछ नहीं तो बस मेरी चुत को चाटकर ही ठंडा कर दीजिए महाराज" महारानी ने विनती के सुर में कहा

"नहीं महारानी, में यह जोखिम कदापि नहीं उठा सकता... आपको खुद पर संयम रखना ही होगा.."

यह सुनकर गुस्से से महारानी उठ खड़ी हुई और पैर पटकते वहाँ से चली गई।

महारानी की चुत में खलबली मची हुई थी... दासी की अंगुली-चोदन से उसकी भूख शांत होने की बजाय और भड़क गई थी। महराज ने भी अपने हाथ खड़े कर लिए थे। और शक्तिसिंह कहीं नजर नहीं आ रहा था।

वह चलते चलते आगे के कक्ष की ओर आई और वहाँ उसने शक्तिसिंह को कोने में बैठकर सोते हुए देखा...

"शक्तिसिंह... !!!" महारानी थोड़ी सी ऊंची आवाज में कहा

अपनी आँखों को ऐंठते हुए शक्तिसिंह उठ खड़ा हुआ। महारानी को देखकर वह झेंप गया और सिर झुकाकर उसने सलाम की।

"राजपरिवार की सुरक्षा की जिम्मेदारी छोड़कर तुम यहाँ सो रहे हो? क्या इसलिए तुम्हें यहाँ नियुक्त किया गया है?"

"क्षमा कीजिए महारानी... कल से यहाँ अकेला पहरा देते हुए थोड़ा सा थक गया था इसलिए विश्राम करने बैठा था...!!" राजमाता के बिस्तर पर हुए परिश्रम के कारण हुई थकान के बारे में तो वह महारानी को नहीं बता सकता था...

"और उस दौरान कोई चोर या हमलावर आ जाता तो...!! जानते हो, इस बेपरवाह असावधानी के बारे में अगर में महाराज को सूचित करूंगी तो तुम्हारा क्या हाल होगा?" महारानी क्रोध से शक्तिसिंह पर नियंत्रण पाना चाहती थी। राजपरिवार की सुरक्षा की उसे रत्तीभर चिंता न थी... वह तो इस बात से क्रोधित थी की आखिर पिछली रात शक्तिसिंह उसके पास गया क्यों नहीं

"माफ कीजिए महारानी साहिब... ऐसा दोबारा नहीं होगा.. आप कृपया महाराज को इस बारे में मत बताना" शक्तिसिंह ने हाथ जोड़कर कहा

"हम्म... इस बारे में मुझे सोचना होगा। थोड़ी देर बाद मुझे अपने कक्ष में मिलो.. फिर विस्तार में बात करेंगे.. " शक्तिसिंह को शरण में पाकर महारानी मन ही मन खुश हो गई

"जी महारानी... " शक्तिसिंह के पास यह बात मानने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था

महारानी ने चारों ओर देखा की कोई देख तो नहीं रहा!! फिर वह धीरे से शक्तिसिंह के करीब आई और उसके कानों में फुसफुसाई

"मुख्य द्वार बंद होगा... तुम बागीचे की घनी झाड़ियों में पड़ती खिड़की से कूद कर अंदर चले आना... ध्यान रहे... किसी को खबर नहीं होनी चाहिए इस बारे में.." महारानी दबे पाँव वहाँ से निकल गई।

सब की नजर बचाते हुए शक्तिसिंह बागीचे में गया... वहाँ घने पेड़ और झाड़ियों के पीछे महारानी के कक्ष की खिड़की पड़ती थी। वह चुपके से उन झाड़ियों में ओजल हो गया और खिड़की फांदकर अंदर आ गया और फिर खिड़की बंद कर ली।

महारानी बिस्तर पर लेटे हुए शक्तिसिंह का इंतज़ार कर रही थी। उसे देखती ही उनकी आँखें चमक उठी। उन्होंने हाथ से खींचकर शक्तिसिंह को अपने करीब लिटा दिया और उसकी छाती पर हाथ फेरने लगी।

"कहाँ थे तुम कल रात... ?"

"जी.. वो मुझे राजमाता ने अपने कक्ष के बाहर सुरक्षा के लिए नियुक्त किया था इसलिए में आ न पाया"

"सुरक्षा के लिए या फिर किसी और कारणवश?" आँखें छोटी कर उन्होंने शक्तिसिंह को पूछा

"जी, और क्या कारण हो सकता है!!" शक्तिसिंह की आँखें बोलते वक्त झुक गई।

"भोले मत बनो... मुझे सब पता है... वहाँ आश्रम में उस कुटिया में हमारे जाने के बाद तुम और राजमाता क्या गुल खिला रहे थे!!" महारानी ने अपना तीर छोड़ दिया

सुनकर शक्तिसिंह एक पल के लिए स्तब्ध रह गया

"अब बोलों... बोलते क्यों नहीं... में सब जानती हूँ... "

"महारानी जी, में तो सेवक हूँ... मुझे जो हुकूम मिलता है उसका पालन करना मेरा धर्म है..."

"तो फिर कल मेरे हुक्म की अवहेलना क्यों की तुमने? उस बुढ़िया को न जाने इस उम्र में कौन सी जवानी चढ़ रही है।"

शक्तिसिंह निरुत्तर रहा

बात करते करते महरानी का हाथ शक्तिसिंह के लंड पर पहुँच गई। एक और संभोग की संभावना देखते हुए शक्तिसिंह थोड़ा सा डर गया। कल रात के संभोग की थकान से वह अभी तक उभरा नहीं था...

"महारानी जी, अगर आपको एतराज ना हो तो इस कार्य के लिए हम रात को मिले?"

"क्यों, रात को उस बुढ़िया ने पूरा निचोड़ लिया क्या? में तो मानती थी की तुम काफी बलवान और मजबूत हो.. पर तुम तो निठल्ले निकले... अब कैसे करूँ भरोसा तुम्हारी मर्दानगी का!!" महारानी ने शक्तिसिंह को उकसाने के हेतु से कहा

अपनी मर्दानगी पर प्रश्न उठाते ही शक्तिसिंह ताव में आ गया... उसने अपने आप को महारानी की गिरफ्त से छुड़ाया और उठकर उनके ऊपर चढ़ गया। दोनों हाथों से महारानी की टांगों को चौड़ा किया और एक पल में उनका घाघरा उठाकर चुत खोल दी। शक्तिसिंह के इस अचानक हमले से महारानी भी सकते में आ गई... पर फिर अपनी योजना सफल होती देख उनके चेहरे पर मुस्कान छा गई।

शक्तिसिंह ने अपना नाक उनकी चुत की लकीर के करीब ले जाकर उसकी मादक गंध को अपने नथुनों में भरा। गुर्राए सांड की तरह छींकते हुए उसने अपनी जीभ लपलपाई और चुत के होंठ फैलाकर अंदर गहराई तक घोंप दी... जीभ का स्पर्श होते ही महारानी की सिसकी निकल गई। वह अपने दोनों स्तनों को दबाते हुए आँखें बंद कर चहकने लगी। कई दिनों से प्यासी उसकी चुत को आज मर्दाना स्पर्श मिला था।

थोड़ी देर तक अपनी खुरदरी जीभ को चुत के अंदर बाहर रगड़ने के बाद शक्तिसिंह उठ गया और अपने शरीर को महारानी के शरीर पर डाल दिया। एक पल के लिए महारानी की सांसें अटक गई। शक्तिसिंह ने दोनों हाथों से खींचकर उनकी चोली फाड़कर स्तनों को मुक्त कर दिया... खुले स्तनों को वह दोनों हाथों से दबोचते हुए भींचने लगा... अपनी उंगलियों से उसने महारानी की निप्पल को जोर से खींच कर छोड़ दिया... महारानी के कंठ से हल्की चीख निकल गई। शक्तिसिंह के इस हिंसक हमले के लिए वह तैयार न थी। उन्हे लगा की शक्तिसिंह की मर्दानगी को ललकार कर शायद गलती कर दी थी... पर अब तीर कमान से छूट चुका था...

शेर जैसे अपने शिकार को नोचता है वैसे ही शक्तिसिंह ने दोनों स्तनों को अपना शिकार बनाया था। स्तनों पर जगह जगह उसने दांतों से काटकर निशान बना दिए थे और निप्पलों को खींच कर लाल कर दिया था। अपने नाखूनों से उसने दोनों मम्मों को जबरदस्त खरोंच दिया... महारानी को अब दर्द भी हो रहा था... वह उसे रोकने जा रही थी तभी शक्तिसिंह ने स्तनों को छोड़ दिया और वापिस उनके जिस्म की नीचे की और जाकर उनकी चुत के सामने आकार बैठ गया।

उसने महारानी के चुत को फिर से चाटना शुरू कर दिया था। केवल अपनी जीभ का उपयोग करते हुए, धीरे-धीरे और लयबद्ध तरीके से, वह उन्हे उबाल की हद पर ला रहा था। शक्तिसिंह ने चुत चाटते हुए अपने बाएँ हाथ से महारानी का बायाँ स्तन पकड़ लिया। महारानी ने भी अपना दायाँ स्तन हाथ से दबोच लिया। वह जोर से कराह उठी और अपने दोनों हाथों से उसके सिर को पकड़कर, उसके चेहरे को अपने कूल्हों को उछालकर दबाने लगी।

बीच-बीच में वह चकित होकर महारानी के इस मदमस्त हुस्न का सर्वेक्षण करने के लिए विवश हो जाता था। गठीली सुडौल जांघें और उनके बीच घने झांटों की झाड़ी, जो बड़ी मुश्किल से चुत के नरम, गुलाबी होंठों को छुपा रही थी। चुत की फांक उत्तेजना के कारण तरल पदार्थ से चमक रही थी।

सपाट पेट और सुडौल कमर और उनके ऊपर थे वह दिव्य स्तन, जिनके गुलाबी निपल्स उत्तेजना से खड़े थे, और फिर वह दमकता चेहरा जिसने बलवान पुरुषों के घुटने कमजोर बना दिए थे और कमजोर पुरुषों को लार टपकाने पर मजबूर कर दिया था।

राजमाता का मुँह खुला था, उनकी साँसें गहरी और असमान थीं, और आँखें बंद थीं क्योंकि उनका मस्तिष्क अविश्वसनीय संवेदनाओं का स्वाद ले रहा था। अचानक उन्हे उत्तेजना की कमी और झुंझलाहट महसूस हुई और उन्हों ने अपनी आँखें खोलीं और पाया कि शक्तिसिंह उन्हे आश्चर्य से देख रहा था। दोनों की नजरें मिलते ही उसने तुरंत चुत के होंठ, अंदरूनी हिस्से और भगनासा पर वापिस मौखिक हमला तेज कर दिया और उनके स्तनों को दबाना शुरू कर दिया और तब तक जारी रखा जब तक कि वह एक बार फिर अद्भुत अनुभूति में नहीं पड़ गई और इसे पूरी तरह से स्वाद लेने के लिए अपनी आँखें बंद नहीं कर लीं।
 
शक्तिसिंह अपना जादू चलाता रहा और इस बार वह तब तक नहीं रुका जब तक कि वह चरमसीमा तक नहीं पहुंच गई। धीमी-धीमी कराहों की एक तेज आवाज ने महारानी के स्खलन सुख की घोषणा कर दी। हांफते हुए महारानी ने सरसराकर अपनी चुत से फव्वारा दे मारा और शक्तिसिंह के पूरे चेहरे को रसरंजित कर दिया। यह स्खलन महारानी को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वह अनंत काल तक वह इंद्रधनुष की सवारी करती रही और फिर धीरे-धीरे जमीन पर उतर आई हो!! यह स्खलन महारानी केयौन जीवन के सबसे गहरे और सबसे संतुष्टिदायक चरमोत्कर्षों में से एक था। उन्हे अपनी सांसें और अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में लाने में थोड़ा समय लगा। चरमसीमा की तीव्रता के कारण उनके घुटने अभी भी कमज़ोर थे इसलिए वह काफी देर तक क्षुब्ध अवस्था में लेटी रही।

जब महारानी ने अपनी आँखें खोलीं, तो पाया की शक्तिसिंह अभी भी उसी स्थिति में था, उनकी जांघों के बीच में, लसलसित चुत को ऐसे देख रहा था जैसे वफादार कुत्ता अपनी जीभ लपलपाता मालिक को देख रहा हो।

"आपको आनंद आया महारानी जी?" पता नहीं ये पुरुष हमेशा ऐसे मूर्खतापूर्ण प्रश्न क्यों पूछते हैं? स्त्री के चेहरे के भावों को देखकर ही उन्हे यह पता चल जाना चाहिए...!! संभोगसुख की परम सुखद संवेदना को सँजोये हुए वह मुस्कुराने लगी।

"बेहद शानदार.... मेरे पास इस आनंद को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं है.." महारानी की खुशी का ठिकाना न था

अब शक्तिसिंह ने अपनी धोती उतार दी और अपनी पीठ के पीछे हाथ रखकर, अपना तना हुआ लंड निकालकर खड़ा हो गया।

महारानी ने उसकी ओर देखा और मन ही मन मुस्कुरायी। खड़े लंड को देखकर वह हमेशा उत्तेजित हो जाती थी। वह उलटी हो गई और उसके मूसल की नोक को गीले होंठों में भर लिया और अपनी जीभ उसके लिंग के निचले हिस्से पर फिराने लगी। अब बेचैन होकर हाँफने की बारी शक्तिसिंह की थी। उसने नीचे देखा और महारानी को अपने लंड को चूसते हुए देखकर अपने होश में न रहा। अपने पूरे आत्मविश्वास के बावजूद उसने वास्तव में कभी नहीं सोचा था कि वह इस मुकाम तक पहुँच पाएगा की जहां वह राज घराने की दो औरतों को भोग पाएगा।

धीरे से, उसने महारानी का सिर अपने लंड से हटाया और उसे उनको पीठ पर लिटा दिया। अब वह उनकी जांघों के बीच बैठ गया और अपना पूरा लंड हाथ में लेकर महारानी की चुत को खिला दिया। हौले से वह योनि-शहद लगे होंठ अलग हुए और बड़ी आसानी से उसकी गीली और चिपचिपी हुई नाली में लंड समा गया। जब वह उस स्वर्गीय योनि मार्ग के अंदर और बाहर जोर लगा रहा था तब उसने दोनों हाथों से महारानी के स्तनों को मींजना शुरू कर दिया। शक्तिसिंह के हर झटके के साथ महारानी सिहर उठती।

महारानी ने शक्तिसिंह को कंधे से पकड़कर अपनी ओर खींचा और उसके होंठ से होंठ मिला लिए। दोनों की जीभ, संभोग करते हुए सर्पों की तरह एक दूसरे से उलझ गई। शक्तिसिंह से ओर बर्दाश्त न हुआ... लगातार ८-१० मजबूत झटके लगाकर उसने अपना सारा माल महारानी की चुत में उंडेल दिया...!!!

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आज बड़ी देर तक राजमाता सोती रही... आँख खुलने के बाद भी, कल रात की चुदाई की थकान उन्हे उठने नहीं दे रही थी... पूरे जिस्म में ऐसा मीठा दर्द हो रहा था की हल्की सी हलचल करने पर भी उनकी आह निकल जाती। वह और कुछ देर तक इस एहसास को महसूस करते हुए अपनी जांघें रगड़ती रही... उनकी निप्पल इतनी संवेदनशील हो गई थी की हल्का सा छूने पर भी सहम जाती। दशकों बाद ऐसी दमदार चुदाई प्राप्त कर राजमाता धन्य हो गई। वह सोच रही थी की आज रात भी ऐसी शानदार चुदाई होगी और इस विचार से उनकी चुत पानी पानी हो रही थी।

वह उठकर अपने कक्ष के बाहर निकली... और बाहर किसी को भी ना देखकर चोंक गई!! उन्होंने अपने वक्ष को चूनर से ढंका और बाहर निकल आई... काफी चलने के बाद उन्हे तीन सिपाही मिले जिसने यह जानने को मिला की उन्होंने आज शक्तिसिंह को कहीं नहीं देखा!! वह क्रोध से आग बबूला हो उठी...!! उन्होंने तुरंत एक सिपाही को शक्तिसिंह को बुलाने के लिए उसके घर भेजा... जो थोड़ी ही देर में यह समाचार के साथ लौटा की कल रात से शक्तिसिंह अपने घर गया ही नहीं था... !!

राजमाता के आश्चर्य का ठिकाना न रहा... कहाँ गायब हो गया शक्तिसिंह? दिखने पर तुरंत उनके पास भेजने का आदेश देकर वह अपने कक्ष लौट गई।

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दरवाजे पर दस्तक पड़ते ही, महारानी की बाहों में खर्राटे मारकर सो रहे शक्तिसिंह की सहसा आँख खुल गई!! वह डरकर खड़ा हो गया... महारानी अधनंगी अवस्था में, अपने दोनों स्तनों को खुले रख... घोड़े बेचकर सो रही थी। उनकी चुत और जांघों पर सूखे हुए वीर्य के धब्बे थे.. स्तनों पर शक्तिसिंह के काटने के लाल निशान भी थे... बाहर से अभी भी कोई लगातार दरवाजा खटखटाए जा रहा था। शक्तिसिंह ने घबराकर महारानी को जगाया... और बाहर किसीके आगमन के समाचार दिए। महारानी ने तुरंत उठकर अपनी चोली और घाघरा पहनना शुरू किया और शक्तिसिंह को इशारे से खिड़की से चले जाने को कहा। एक ही पल में शक्तिसिंह खिड़की फांदकर झाड़ियों से गुजरते हुए बागीचे के रास्ते बाहर चला गया।

बागीचे के पास बने बरामदे से वह गुजर ही रहा था तब शक्तिसिंह के साथी सैनिक ने उसे राजमाता के बुलावे के बारे में बताया। शक्तिसिंह हड़बड़ाते हुए राजमाता के कक्ष की तरफ गया। वह तो सोच रहा था की रात की घनघोर चुदाई के बाद राजमाता उसे दूसरी रात तक याद नहीं करेगी... उसकी अनुपस्थिति के बारे में पूछेगी तब क्या जवाब देना है यही असमंजस में उसने दस्तक देकर राजमाता के कक्ष में प्रवेश किया।

राजमाता एक बड़ी सी सुशोभित राजसी कुर्सी पर फैल कर बैठी हुई थी.. सरोते से सुपारी काटकर खाते हुए उसने शक्तिसिंह की ओर देखा

"कहाँ थे तुम? मैंने हर जगह तुम्हारी तलाश करवाई.. यहाँ तक की तुम्हारे घर पर भी सैनिक को भेजा.. तुम वहाँ भी नहीं थे... "थोड़े क्रोध के साथ राजमाता ने कहा

"जी वो... रात की थकान दूर करने में तालाब पर स्नान करने गया था... स्नान के पश्चात इतनी अच्छी हवा चल रही थी की में वहीं पेड़ के नीचे सो गया" शक्तिसिंह ने सफाई देते हुए कहा

"सच बोल रहा है ना तू? कहीं वापिस उस पद्मिनी के घाघरे में तो नहीं घुसा था न??" राजमाता ने अपनी शंका व्यक्त करते हुए बड़े तीखे सुर में कहा

"जी... न.. नहीं नहीं.. " शक्तिसिंह की धड़कने एकदम तेज हो गई..

"तब ठीक है... पर यह जान ले... अगर वापिस कभी महारानी की टांगों के बीच गया तो तेरा लिंग काटकर चौराहे पर लटका दूँगी में... समझा!!" धमकी देते हुए राजमाता ने कहा

शक्तिसिंह कांप उठा... वह मन ही मन सोच रहा था की इस दोहरे खेल को जल्द ही बंद करना होगा वरना वह अपनी जान से हाथ धो बैठेगा...

"चल जा अभी... और रात को जब में बुलाऊँ तब अंदर आ जाना" राजमाता वापिस सरोते से सुपारी को कुतरने में व्यस्त हो गई।

राहत की सांस भरते हुए शक्तिसिंह कक्ष के बाहर निकल गया...

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महारानी के दरवाजा खोलते ही उनकी दासी नजर आई.।

"महारानी साहिब... में काफी देर से दरवाजा खटखटा रही थी... लगता है आप बड़ी गहरी नींद सो रही थी"

"हाँ... आजकल तबीयत जरा नरम रहती है तो आँख लग गई थी... " आँखने मलने का नाटक करते हुए महारानी ने कहा

"बता, क्या बात थी?" उभासी लेटे हुए महारानी बोली

"जी, वो आपकी शारीरिक जाँच के लिए राजमाता के आदेश से राजवैद्य पधारे है... आप कहों तो उन्हे अंदर भेज दूँ... " दासी ने पूछा

"थोड़ी देर बाद भेज दे अंदर... " कहते हुए राजमाता ने दरवाजा अटका दिया..

वह वापिस बिस्तर पर लेट गई... शक्तिसिंह के मजबूत मूसल का स्पर्श उसकी चुत अबतक भूल नहीं पाई थी... उस मजेदार चुदाई की याद आते ही वह नए सिरे सी गरम होने लगी... उनकी चुत का दाना अवधान की अपेक्षा करने लगा... जिस तरह से आज शक्तिसिंह ने धक्के लगा लगाकर चोदा था, उनका मन प्रफुल्लित हो गया था.. वह अपनी चोली खोलकर अपने स्तनों को मसलने लगी... घाघरे का नाड़ा खोलकर वह नग्न हो गई और बिस्तर पर लैटकर एक हाथ से अपना स्तन मसलने लगी और दूसरे से अपनी चुत के दाने को रगड़ने लगी।

थोड़ी ही देर में उनकी चुत पनियाने लगी... स्तनों की निप्पल भी कड़ी और सख्त हो गई... अब तो उनके गांड के छेद में भी चुनचुनी होने लगी थी। वह सोच रही थी की शाम को दासी को बुलाकर फिरसे अपने छेद की तेल मालिश करवाएगी। महारानी बिस्तर पर पैर फैलाकर पागलों की तरह अपने जिस्म से खेल रही थी तभी दरवाजे पर दस्तक पड़ी और वह खुलता हुआ नजर आया...!!

घबराकर हड़बड़ाहट में राजमाता ने पास पड़ी चद्दर से अपने जिस्म को गले तक ढँक लिया और बिस्तर पर लेट गई।

दरवाजे से बूढ़े राजवैद्य ने प्रवेश किया। वह धीमी चाल से चलते चलते महारानी के बिस्तर के पास पहुंचे। बिस्तर पर चद्दर ओढ़े लेटी महारानी के बगल में पड़ी चोली और नीचे पड़े घाघरे को देखकर राजवैद्य चोंक गए पर चुपचाप पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गए।

"जी राजवैद्य जी, कहिए कैसे आना हुआ..." महारानी ने पूछा

"प्रणाम महारानी साहिबा... मुझे सेवक ने सूचित किया था की राजमाता ने आपकी शारीरिक जांच करने का आदेश दिया है तो में चला आया... बताइए महारानी जी, आपको क्या कष्ट है?"

महारानी एक पल के लिए सोच में पड़ गई की किस कारण से राजमाता ने इस राजवैद्य को जांच के लिए भेजा होगा... फिर उसके दिमाग में विचार आया की शायद यह जानने के लिए भेजा होगा की वह गर्भवती हुई भी या नहीं!! महारानी के शरारती मन में एक खयाल आया

"जी राजवैद्य जी, कुछ दिनों से बड़ी बेचैनी सी हो रही है... अंग अंग में दर्द हो रहा है... न कुछ खाने को मन करता है न ही सोने को... पूरा दिन परेशान सी रहती हूँ... बिना कारण गबरहट सी होती रहती है... " महारानी ने नाटक शुरू कर दिया

"पिछले कुछ दिनों में आपकी दिनचर्या में कोई खास बदलाव तो नहीं आया ना?"

"जी वैसे तो कुछ नहीं है... पर हाँ यात्रा से लौटने के बाद से यह सब शुरू हो गया है.. "

"हो सकता है सफर की थकान के कारण ऐसा हुआ हो... में आपकी दासी के हाथों कुछ चूर्ण और काढ़ा भिजवाता हूँ... आप उनका सेवन कीजिए और हो सके उतना आराम कीजिए... कुछ ही दिनों में आप स्वस्थ हो जाएगी... "

"वो सब तो ठीक है राजवैद्य जी... पर मुझे कुछ कुछ जगह बहुत तकलीफ हो रही है... कृपया वहाँ जरा जांच कीजिए ना... " नटखट महारानी वैसे भी काफी गरम हो चुकी थी... अब वह इस बूढ़े के पूरे मजे लेने वाली थी

"जी बताइए... "

"जी मुझे यहाँ दोनों छातियों के बीच में काफी घबराहट हो रही है... जरा देखिए ना" नखरीले अंदाज में महारानी ने कहा

राजवैद्य के पसीने छूट गए... महारानी की चद्दर से दिख रही उकसी हुई निप्पलों को देखकर उन्हे पता चल गया की उस कपड़े के नीचे उनके स्तन खुले थे... वह घबराकर महारानी की तरफ देखते ही रहे...

"वैद्यजी, जरा जांच कर देखिए ना... मेरी धड़कने भी बहुत तेज चल रही है... " बचकाना मुंह बनाकर महारानी ने कहा... जब राजवैद्य की कुछ भी करने की हिम्मत ना हुई... तब महारानी ने उनका हाथ पकड़ा और चद्दर के नीचे सरकाते हुए अपने दोनों स्तन के बीच रख दिया...

राजवैद्य जहां थे वहीं पुतला बनकर बैठे रहे... उनका सारा शरीर सुन्न पड़ गया था... वैसे तो वह शारीरिक रूप से काफी सक्रिय थे... आए दिन इलाज करवाने आती दासियों को पकड़कर चोदते भी थे... पर यहाँ हालात काफी अलग थे... महारानी के संग किसी भी तरह की गुस्ताखी करने की उन में हिम्मत नहीं थी.... राजमाता के क्रोध से वह भलीभाँति परिचित थे... महारानी के एक शब्द कहने पर उनका लंड काटकर राजमहल के पालतू कुत्तों को खिला देने का आदेश निकलने में देर न लगती... वह समझ नहीं पा रहे थे की महारानी आखिर क्या चाहती थी... फिर उन्हों ने सोचा की हो सकता है की वाकई उन्हे तकलीफ हो...

"यहाँ इर्दगिर्द हाथ घुमाकर देखिए... मुझे बेचैनी और घबराहट होती है... धड़कने भी बहुत तेज चलनी लगती है... जी मचलता है मेरा" हल्की हल्की कराह मारते महारानी ने बड़ी ही नशीली आवाज में राजवैद्य से कहा

हिम्मत जुटाकर राजवैद्य ने थोड़ा सा हाथ हिलाया... महारानी के दोनों माँसपिंडों का स्पर्श होते ही वह कांप उठे... मक्खन जैसे जिस्म वाली गोरी चीट्टी महारानी के स्तनों का स्पर्श करने के विचार मात्र से ही वह बेहद उत्तेजित हो गए।

महारानी आँखें बंद कर उन बूढ़े खुरदरे हाथों की रगड़ अपनी छाती पर मजे से महसूस कर रही थी। उत्तेजना से ज्यादा महारानी को इस शरारत में मज़ा आ रहा था। राजवैद्य के हाथों के कंपन से ही उन्हे पता चल रहा था की वह कितने घबराए हुए थे।

"बताइए ना राजवैद्य जी, मुझे क्या तकलीफ है?"

"ज.. ज.. जी... धड़कनें तो थोड़ी तेज चल रही है" राजवैद्य ने डरते डरते कहा

"और यहाँ भी जांच कीजिए... " कहते हुए महारानी ने चद्दर के नीचे से ही राजवैद्य की हथेली को अपने स्तन पर रख दिया!!

सख्त कड़ी निप्पल का नुकीला स्पर्श होते ही राजवैद्य की सिट्टी पीट्टी गुम हो गई!! उन्हें पता नहीं चल रहा था की महारानी आखिर ऐसा व्यवहार क्यों कर रही थी... और वह इसकी कैसे प्रतिक्रिया दे... !! धोती के अंदर से उनका बूढ़ा लंड झटके से ताव में आ गया... उन्होंने अपने हथियार को दो जांघों के बीच ऐसे दबा रखा था की कहीं वो धोती में तंबू बनाकर उन्हे शर्मसार ना कर दे..!!
 
महारानी ने राजवैद्य की हथेली को अपने स्तन पर दबाए रखा और उनके हाथों अपना स्तन मसलवाती रही... राजवैद्य की आँखें ऊपर चढ़ गई... डर और उत्तेजना के मिश्रण ने उनकी धड़कने इतनी तेज कर दी की उन्हे लगा उनका दिल बैठ जाएगा। उनका पूरा जिस्म पसीने से तरबतर हो गया।

"और कभी कभी यहाँ भी दर्द होता है.. " महारानी ने उनकी हथेली को दूसरे स्तन पर रख दिया

राजवैद्य का हाल देखकर महारानी को इतना मज़ा आने लगा की वह अब इस खेल को दूसरे पड़ाव पर ले जाना चाहती थी...

"आप कुछ बोल क्यों नहीं रहे? बताइए ना... क्या तकलीफ़ है मुझे?"

"में... वो... जी... महारानी जी... में आपको तुरंत दवाई भ..भ..भेजता हूँ... वह लेते ही आपको राहत मिलेगी" कांपते कांपते राजवैद्य ने कहा...

"वो तो ठीक है पर... मुझे सब से ज्यादा तकलीफ तो यहाँ हो रही है... !!" कहते ही महारानी ने राजवैद्य का हाथ खींचकर अपनी चुत की लकीर पर लगा दिया... गीली पनियाई चुत का स्पर्श होते ही राजवैद्य बेहोशी की कगार पर पहुँच गए...

"अंदर उंगली डालकर देखिए... बहुत गरम गरम सा लगता है पूरा दिन वहाँ... ठीक से जाँचिए आप" महारानी ने चद्दर के नीचे राजवैद्य की उंगली को अपनी चुत में घुसेड़ दिया...

राजवैद्य अपना आपा खो रहे थे... उन्होंने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था की शाही जिस्म के निजी अंगों को छूने का कभी उन्हे मौका मिलेगा!! उनका लंड अब बगावत पर उतर आया था.. और कभी भी धोती फाड़कर बाहर आने की धमकी दे रहा था

"जरा उसे अंदर बाहर कीजिए तो मुझे थोड़ा आराम मिलेगा" महारानी ने राजवैद्य की पूरी फिरकी ले ली

जब कहने पर भी राजवैद्य ने उंगली को अंदर बाहर नहीं किया तब महारानी खुद ही अपने चूतड़ों को ऊपर नीचे करते हुए उंगली के मजे लेना शुरू कर दिया...

राजवैद्य की आँखें ऊपर चढ़ गई... वह हांफने लगे... ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे महारानी ने केवल उंगली से ही उनके पूरे शरीर का चेतन खींच लिया था... उस मखमली गरम चुत की लकीर के अंदर चिपचिपे एहसास से राजवैद्य के शरीर में बिजली सी कौंध गई। महारानी अब तेजी से ऊपर नीचे करती हुई उनकी उंगली से बखूबी चुदवा रही थी...

अचानक राजवैद्य का शरीर झटके खाने लगा और उन्होंने महारानी की चुत से अपनी उंगली जबरदस्ती खींच ली... महारानी को पता नहीं चला की उन्हे क्या हो गया!! पर जब उन्होंने धोती के ऊपर से अपने लंड को दोनों हाथों से पकड़ लिया तब पता चला की राजवैद्य के लंड ने अंदर ही पिचकारी दे मारी थी... !! उनकी धोती वीर्य से सन गई थी... शरमाकर वह उठ खड़े हुए और तेजी से दरवाजे की ओर भागे... पीछे से उन्हे महारानी की खिलखिलाकर हंसने की आवाज सुनाई दी...

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