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आशना को कुछ गड़बड़ लग रही थी पर वो डॉक्टर. तो थी नहीं जो इस बीमारी का कारण जान सकती. उसने खाना खाने के बाद प्लेट्स संभाली और काका को आवाज़ लगा कर कहा कि बर्तन उठा कर सॉफ कर दें. फिर वीरेंदर अपने कमरे की तरफ चल पड़ा और आशना अपने कमरे में चली गई.
काफ़ी दिनो से थकि होने के कारण आशना को बेड पर लेटते ही गहरी नींद ने अपने आगोश में ले लिया. आशना की नींद खराब की उसके मोबाइल की रिंगटोन ने " ज़रा-ज़रा टच मी टच मी टच मी ओ ज़रा- ज़रा किस मी किस मी किस मी". आशना ने अलसाए हुए रज़ाई(क्विल्ट) से अपने चेहरे को कस के ढक लिया ताकि रिंगटोन की आवाज़ उसके कानों तक ना पड़े मगर मोबाइल लगातार बजे जा रहा था. कुछ देर बाद झल्ला कर उसने फोन उठाया और स्क्रीन पर नंबर. देखने लगी. जैसे ही उसकी नज़र स्क्रीन पर पड़ी कॉल डिसकनेक्ट हो गई. आशना का मन आनंदित हो गया. आशना ने मोबाइल तकिये के पास रखा और सोने के लिए आँखें बंद ही की थी कि एक बार फिर से मोबाइल बजने लगा. अब तक आशना की नींद टूट चुकी थी, उसने स्क्रीन पर नंबर. देखा, डॉक्टर. बीना का फोन था. फिर आशना ने घड़ी की तरफ देखा, 7:00 बज चुके थे. आशना ने कॉल रिसीव की और बीना ने उसका और वीरेंदर का हाल जानने के बाद फोन काट दिया. हालाँकि उनकी बातचीत कुछ ज़्यादा देर नहीं चली पर बीना ने उसे एक हिदायत देते हुए कहा कि जो भी करना है जल्द से जल्द और सोच समझ कर करना. उसने इस बात पर खास ज़ोर दिया कि वीरेंदर को ना पता चले कि वो उसकी बेहन है क्यूंकी हो सकता है वीरेंदर ज़्यादा गुस्से में आ जाए और उसकी सेहत पर इसका उल्टा असर पड़े.
फोन अपनी पॅंट की पॉकेट मे रखने के बाद आशना ने अपनी न्यू जॅकेट जो कि लाइट ब्राउन कलर की थी उसे पहन लिया. शाम को काफ़ी ठंड हो गई थी. आशना अपने कमरे से बाहर नहीं निकली, वो अपने रूम मे ही बैठ कर टीवी देखने लगी और आगे क्या करना है वो सोचने लगी. करीब 2 घंटे तक काफ़ी सोचने के बाद उसके सिर में दर्दे होने लगा. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वो अब क्या करे. कैसे वीरेंदर भैया से उनकी शादी की बात करे और सबसे बड़ा सवाल कि शादी करने के लिए लड़की कहाँ से लाई जाए. अंत में आशना ने वीरेंदर को ही कुरेदना ठीक समझा और उसके कमरे में जाने की सोची.
आशना टीवी ऑफ करके अपने कमरे से बाहर निकली ही थी के उसे बिहारी काका वीरेंदर के रूम से खाने की ट्रे लिए निकलते हुए दिखे.
आशना: काका वीरेंदर ने खाना खा लिया क्या?
काका: हां बिटिया, तुम्हारे लिए भी उपर ही ले आउ. आज बहुत ठंड है, अपने कमरे में ही खा लो.
आशना कुछ देर सोचती रही फिर बोली ठीक है काका, आप खाने मेरे रूम में लगा दें, मैं थोड़ी देर वीरेंदर के रूम से होके आती हूँ, उन्हे दवाई खिला दूं.
काका: ठीक है.
आशना आगे बढ़ी ही थी कि उसके पैर एक दम रुक गये,
उसके रुके कदमों को देख कर काका ने उसे सवालिया नज़रो से देखते हुए इशारे से पूछा कि क्या हुआ.
आशना: वो काका वीरेंदर जी पूरे कपड़े तो पहने हैं ना?
काका: हां तुम सुरक्षित हो जाओ. काका के इस जवाब से आशना शरम के मारे ज़मीन मे गढ़ी जा रही थी. उसके बाप समान एक आदमी उसे यह समझा रहा था कि जिस आदमी के पास वो जा रही है वो उसे कुछ भी नहीं करेगा.
काका: बिटिया, जब वीरेंदर बाबू का हो जाए तो हमारा भी एक काम करना.
आशना एक दम चौंकी काका की बात सुनकर. बिहारी ने बहुत जल्दी बात संभालते हुए कहा कि बिटिया मेरा मतलब है कि जब वीरेंदर बाबू दवाइयाँ खा लें तो तुम मेरे कमरे में नीचे आना, तुमसे कुछ ज़रूरी बातें करनी हैं. आशना जल्द से जल्द यहाँ से निकलना चाहती थी उसने अपनी गर्दन हां में हिलाई और वीरेंदर के रूम की तरफ चल दी.
बिहारी नीचे आ गया और अपने मोबाइल को ऑन करके एक नंबर. डाइयल किया. कुछ देर बाद वहाँ से किसी ने फोन उठाया. बिहारी धीमी आवाज़ में "चिड़िया के मन में आग डाल रहा हूँ, अब आगे बोलो जब वो मेरे कमरे में आए तो क्या करना है. कुछ देर बिहारी चुप चाप उसकी बात सुनता रहा और फिर बोला ऐसा ही होगा. फिर बिहारी बोला: बहुत दिन हो गये हैं, अब तो दिन में मिलना भी मुस्किल है जब तक इस चिड़िया के पर ना कट जाएँ, अगर मूड है तो आज रात को आ जाओ नहीं तो मुझे आज फिर से हिलाकर ही सोना पड़ेगा. थोड़ी देर सामने वाले की बात सुनकर बिहारी बोला: तो मैं क्या यहाँ ऐश कर रहा हूँ. पिछले 10 दिन तो खूब ऐश की हम दोनो ने. कभी तुम यहाँ तो कभी मैं वहाँ. पर अब मेरा घर से निकलना ख़तरे से खाली नहीं होगा. चिड़िया चालाक लगती है, थोड़ा सा भी इधर उधर हुआ तो ख़तरा होगा, इसी लिए अब कुछ दिन तो तुमको ही यहाँ पर आना होगा. बिहारी ने कुछ देर सुनने के बाद सामने वाले को बोला: मैं दरवाज़ा खोल दूँगा तुम सेधे मेरे कमरे में आ जाना. वीरेंदर को तो नींद की गोलियाँ दे चुका हूँ दूध में. चिड़िया को भी दूध पिलाकर सुला दूँगा फिर जशन होगा. तुम ठीक 12:00 बजे पहुँच जाना. इतना कह कर उसने फोन काटा, उसे स्विचऑफ किया और आशना के लिए खाना लेने किचन में चला गया.
बिहारी काका पिछले 25 साल से शर्मा परिवार के घर पर नौकर था, काफ़ी ईमानदार और काम मे लगन होने के कारण उसके साथ शर्मा परिवार में एक फॅमिली मेंबर की तरह बिहेव किया जाता. वो कभी किसी को कोई शिकायत का मोका नहीं देता. दिखने मे कोई 45 का एक तगड़े शरीर का मालिक था. बचपन मे गाँव मे पला बढ़ा होने के कारण मेहनत उसके खून मे थी और वो थोड़ी मेहनत अपने शरीर पर भी किया करता. इस उम्र मे भी वो सुबह जल्दी उठ कर घर मे बने पीछे जिम मे कुछ देर शरीर के लिए मेहनत करता और काफ़ी हेल्ती भी ख़ाता. बस उसकी यही आदत के कारण वो आज भी किसी भी औरत या लड़की पे भारी पड़ता. उसने शादी नहीं की क्यूंकी उसे शादी की ज़रूरत ही नहीं पड़ी, क्यूंकी जब तक शर्मा परिवार मे सब ठीक था, वो घर की नौकरानियों को खूब रगड़ता. फिर उस आक्सिडेंट के बाद वीरेंदर ने घर के सभी नौकर नोकारानियों को घर से दूर एक बस्ती मे बसा दिया जिससे बिहारी वीरेंदर से नफ़रत करने लगा था. उसने वीरेंदर को बहुत समझाया कि कम से कम एक नौकरानी को यहीं रहने दे ताकि वो घर के काम मे उसकी मदद करे पर कोई भी नौकरानी रुकने को तैयार नहीं हुई. उन्हे रहने के लिए बस्ती मे मकान, वीरेंदर से पगार और बिहारी से छुटकारा जो मिल रहा था.