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बाली उमर की प्यास पार्ट--11
गतांक से आगे.......................
एग्ज़ॅमिनेशन रूम से बाहर निकलते ही पिंकी ने मुझे पकड़ लिया," तेरा पेपर तो हो ही नही पाया होगा यार.. तुझे इतनी देर बाद क्यूँ छ्चोड़ा उन्होने?"
मैने उसकी आँखों में देख एक पल सोचा कि संदीप के किए अहसान के बारे में बताउ या नही," ववो.. वो तो मेरा केस बनाने पर आड़े हुए थे.. बहुत रिक्वेस्ट करने के बाद ही माने.. बस इसीलिए देर हो गयी..."
तभी सर ऑफीस से बाहर निकल आए.. उन्होने इधर उधर देखा.. सभी जा चुके थे.. हमारे अलावा सिर्फ़ पीयान ही ऑफीस के बाहर बैठा था....
सर अंदर गये और थोड़ी देर बाद मेडम बाहर निकली," कृशन! बाकी कमरों को ताला लगाकर तुम चले जाओ.. हमें अभी टाइम लगेगा..."
"ठीक है मेडम!" पीयान ने कहा और चाबी उठा कर कमरे बंद करने लगा....
"हुम्म.. पर पेपर तो मेरा भी अच्च्छा नही हुआ... चल चलते हैं घर.. रास्ते में बात करेंगे...." पिंकी ने मायूस होकर कहा...
"ववो.. ऐसा कर.. तू जा.. मैं थोड़ी बाद में आऊँगी..." मैं लगे हाथों बाकी बचे पेपर को भी निपटा देना चाहती थी...
"पर क्यूँ? यहाँ क्या करेगी तू?" उसने आँखें सिकोड कर पूचछा....
"ववो.. मेरा टाइम खराब हो गया था ना.. इसीलिए सर मुझे अब थोड़ा सा टाइम देंगे.." मैने उसको आधा सच बता दिया," पर तू किसी को बोलना मत.. सर के उपर बात आ जाएगी नही तो...."
"अच्च्छा!" पिंकी खुश होकर बोली," ये तो अच्छि बात है.. कोई बात नही.. मैं तेरा इंतजार कर लेती हूँ यहीं.. तेरे साथ ही चालूंगी...!"
मैं उसको भेजने के लिए बहाना सोच ही रही थी कि सर एक बार फिर बाहर आ गये.. बाहर आकर मेरी ओर मुस्कुरा कर देखा और इशारे से अपनी और बुलाया..
"... तू जा यार.. मैं आ जाउन्गि!... एक मिनिट.... सर बुला रहे हैं..." मैने पिंकी से कहा और बिना उसका जवाब लिए सर के पास चली गयी.... पिंकी वहीं खड़ी रही...
सर ने अपने होंटो पर जीभ फिराई और पिंकी की ओर देख कर धीरे से बोले," इसको तो भेज दिया होता.. अपने साथ क्यूँ चिपका रखा है...!"
"मैने कहा है सर.. पर वो कह रही है कि मेरे साथ ही जाएगी.. अब बाकी बच्चे भी जा चुके हैं... मैं उसको फिर से बोल के देखती हूँ..." मैने नज़रें झुका कर जवाब दिया...
"हुम्म.. कौन है वो? तेरी क्या लगती है?" सर की आवाज़ में बड़ी मिठास थी अब...
"जी.. मेरी सहेली है.. बहुत अच्छि.." मैने उसकी नज़रों में देखा.. वह पिंकी को ही घूर रहा था...
"किसी को कुच्छ बता तो नही देगी ना..." सर ने मेरी चूचियो को घूरते हुए पूचछा....
यहाँ मेरी ग़लती रह गयी.. मैने समझा कि सर का ये सवाल एग्ज़ॅम टाइम के बाद मुझे पेपर करने देने के बारे में है... वैसे भी मैं यही समझ रही थी कि उनको जो कुच्छ करना था.. वो कर चुके हैं," नही सर! वो तो मेरी बेस्ट फ्रेंड है.. किसी को कुच्छ नही बताएगी..."
मैं कहने के बाद सर की प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगी... वो चुपचाप खड़े पिंकी की और देखते हुए कुच्छ सोचते रहे..
"सर...!" मैने उन्हे टोक दिया....
"हूंम्म?" वो अब भी मेरे पास खड़े लगातार पिंकी की ओर ही देख रहे थे...
"ववो.. मैं.. कह रही थी कि उसका भी पेपर खराब हुआ है... अगर आप...!" मैं बीच में ही रुक गयी.. ये सोच कर कि समझ तो गये ही होंगे...
"चल ठीक है.. बुला लो... पर देख लो.. तुम्हारे भरोसे पर कर रहा हूँ.. कहीं बाद में..." सर की बात को मैने खुश होकर बीच में ही काट दिया...
"जी.. वो किसी को कुच्छ नही बताएगी.. बुला लाउ उसको?" मैं खुश होकर बोली....
"हां.. ऑफीस में लेकर आ जाओ....!" सर ने कहा और अंदर चले गये....
मैं खुश होकर दौड़ी दौड़ी पिंकी के पास गयी," चल आजा... मैने तेरे लिए भी बात कर ली है... तुझे भी सर पेपर दे देंगे..."
"अच्च्छा.. सच! मज़ा आ जाएगा फिर तो" वा भी सुनकर खुशी से उच्छल पड़ी...
अगले ही पल हम दोनो मेडम और सर के सामने खड़े थे...
"मेडम.. प्लीज़.. आप ऑफीस का ताला लगाकर थोड़ी देर बाहर बैठ जाओ.. मेरा फोन भी लेते जाओ.. अगर कोई फोन आए तो कहना कि वो पेपर्स का बंड्ल लेकर निकल चुके हैं और फोन यहीं भूल गये...!" सर ने मेडम की तरफ अपना मोबाइल बढ़ाते हुए कहा....
"मैं तो बैठ जाउन्गि सर... पर देख लो.. ज़िंदगी भर अब आप मुझे और इस सेंटर को भूल मत जाना... अब मेरे स्कूल के किसी बच्चे का पेपर खराब नही होना चाहिए... सबको खुली छ्छूट मिलेगी ना अब तो....?" मेडम ने शिकायती लहजे में सर को कहा....
सर ने हंसते हुए अपना पूरा जबड़ा ही खोल दिया," हा हा हा.. आप भी कमाल करती हैं मेडम.. ये सेंटर और आपको कभी भूल सकता हूँ क्या? यहाँ तो मुझे तोहफे पर तोहफे मिल रहे हैं....आप बेफिकर रहें... कल से सब बच्चों को 15 मिनिट पहले पेपर मिल जाया करेगा.. और नकल की भी मौज करवा दूँगा..."
"थॅंक्स सर.. मुझे बस यही चाहिए.." मेडम ने मुस्कुरा कर कहा और बाहर निकल कर ऑफीस को ताला लगा दिया.....
"सोफे पर बैठ जाओ आराम से.. डरने की कोई ज़रूरत नही है.. अपना अपना रोल. नंबर. बता दो जल्दी... तुम्हे नही पता मैं कितना बड़ा रिस्क लेकर तुम्हारे लिए ये सब कर रहा हूँ..." सर ने हमारे रूम का बंड्ल खोलते हुए कहा....
पिंकी ने मेरी और देखा और मुस्कुरा दी और फिर सर को क्रितग्य नज़रों से देखते हुए बोली," थॅंक्स सर.."
हम दोनो ने अपने अपने रोल नंबर. सर को बताए और उन्होने हमारी शीट निकाल कर हम दोनो को पकड़ा दी...," किसी इंटेलिजेंट बच्चे का भी रोल नंबर. बता दो.. मैं निकाल कर दे देता हूँ.. जल्दी जल्दी उतार लेना उसमें से..."
"दीपाली" पिंकी के मुँह से निकला.. जबकि मेरे मुँह से संदीप का नाम निकलते निकलते रह गया.. पिंकी ने दीपाली का रोल नंबर. सर को बता दिया...
"हूंम्म.. मिल गया!" सर ने कहा और पेपर लेकर हमारे पास आए और हमारे बीच फंसकर बैठ गये..," ये लो.. जल्दी जल्दी करो!"
पिंकी ने शायद सर की मंशा पर ध्यान नही दिया था... हम दोनो ने सिर के सामने दीपाली का पेपर खोल कर रख लिया और जो क्वेस्चन हम दोनो के रहते थे...उतारने लगे...
करीब पाँच मिनिट ही हुए होंगे.. सर ने अपनी बाहें फैलाकर हम दोनो के कंधों पर रख दी," शाबाश.. जल्दी जल्दी करो..."
"तुम्हारा क्या नाम है बेटी?" सिर ने पिंकी की ओर देख कर पूचछा....
"जी..? पिंकी!" पिंकी जल्दी जल्दी लिखते हुए बोली....
"बहुत प्यारा नाम है.. अंजलि को तो सब पता ही है.. तुम भी अब किसी पेपर की चिंता मत करना.. सब ऐसे ही करवा दूँगा.. खुश हो ना?" सर पिंकी की कमर पर हाथ फेरने लगे...
मेरा ध्यान रह रह कर पिंकी पर जा रहा था.. मुझे तरुण की ठुकाई याद आ रही थी... ये सोचकर मैं डरी हुई थी.. कहीं सर पिंकी पर हाथ सॉफ करने के बारे में ना सोचने लगे हों... 'ऐसा होगा तो आज बहुत बुरा होगा..' मैं मंन ही मंन सोच रही थी.. पर कहती भी तो मैं किसको क्या कहती... मेरी एक आँख अपना पेपर करने पर.. और दूसरी पिंकी के चेहरे पर बनी रही....
"तुम अब जवान हो गयी हो बेटी.. चुननी डाला करो ना.. ऐसा अच्च्छा नही लगता ना.. देखो.. बाहर से ही सॉफ दिख रहे हैं...!" सर की इस बात पर पिंकी सहम सी गयी.. पर शायद अपना पेपर पूरा करने का लालच उसके मंन में भी था..
"ववो.. मैने आज अंजलि को दे दी सर..." पिंकी ने हड़बड़ा कर कहा....
"ओह.. हां.. इसकी तो और भी बड़ी बड़ी और मस्त हैं.. पर इसको अपनी लानी चाहिए.. देखो ना.. तुम्हारी भी तो कैसे चौंछ उठाए खड़ी हैं.. तुम ब्रा भी नही पहनती हो.. है ना?"
सर की बात सुनकर पिंकी का चेहरा सच में ही गुलाबी सा हो गया.. अब शायद उसके मंन में भी सर की बातें सुन कर घंटियाँ सी बजने लगी थी... मुझे डर था की ये घंटियाँ घंताल बनकर सर के सिर पर ना बजने लग जायें... अभी तो 5 पेपर बाकी थे....
पिंकी बोली तो कुच्छ नही पर सरक कर 'सर' से थोड़ा दूर हो गयी..
"नही पहनती हो ना ब्रा?" सर ने उस'से फिर पूचछा...," अंजलि भी नही पहनती.. तुम भी नही.. क्या बात है यार!"
अंजलि इस बार थोड़ा सा खिज कर बोली," वो.. मम्मी लाकर ही नही देती.. कहती हैं अभी तुम बच्ची हो...!" और अपना पेपर करती रही...
"मम्मी के लिए तो तुम शादी के बाद भी बच्ची ही रहोगी बेटी.. हे हे हे.." सर अपनी जांघों के बीच तनाव को कम करने के लिए 'वहाँ' खुजाते हुए बोले," पर तुम बताया करो ना.. तुम तो अब पूरी जवान हो गयी हो.. लड़कों का दिल मचल जाता होगा इन्हे यूँ फड़कते देख कर.. पर तुम्हारा भी क्या कुसूर है.. ये उमर ही मज़े लेने और देने की होती है.." सर ने कहने के बाद अचानक अपना हाथ पिंकी की जांघों पर रख दिया..
पिंकी कसमसा उठी," सर.. प्लीज़!"
"करो ना.. तुम आराम से पेपर करो.. मैं तुम्हारे लिए ही तो बैठा हूँ यहाँ.. चिंता की कोई बात नही.." सर ने उसको याद दिलाने की कोशिश की कि वो हम पर कितना 'बड़ा' अहसान कर रहे हैं... उन्होने अपना हाथ पिंकी की जाँघ से नही हटाया...
पिंकी के चेहरे से मुझे सॉफ लग रहा था कि वो पूरी तरह विचलित हो चुकी है.. पर शायद पेपर करने का लालच; या फिर उनकी उमर; या फिर दोनो ही कारण थे कि वह चुप बैठी अब भी लिख रही थी...
सर ने अचानक मेरे हाथ के नीचे से अपना हाथ निकाला और मेरा दायां स्तन अपनी हथेली में ले लिया.. मैने घबराकर पिंकी की ओर देखा.. कि कहीं उसके साथ भी ऐसा ही तो नही कर दिया.. पर अब तक गनीमत था कि उन्होने ऐसा नही किया था... वह हड़बड़ाई हुई जल्दी जल्दी लिखती चली जा रही थी....
सर ने अचानक अपने हाथ से उसकी जांघों के बीच जाने क्या 'छेड़' दिया.. पिंकी उच्छल कर खड़ी हो गयी.. मैने घबराकर उनका हाथ अपनी छाती से हटाने की कोशिश की.. पर उन्होने 'उसको' नही छ्चोड़ा...
"क्या हो गया बेटी? इतनी घबरा क्यूँ रही हो? आराम से पेपर करती रहो ना.. ये देखो.. अंजलि कितने आराम से कर रही है.." सर निसचिंत बैठे हुए थे.. ये सोच कर की मेरी 'सहेली' है.. मेरे ही जैसी होगी...
पिंकी ने मेरी और देखा और शर्म से अपनी आँखें झुका ली.. उसने मेरी छाती को 'सर' के हाथों में देख लिया था.. मैं चाहकर भी उनका हाथ 'वहाँ' से हटा नही पाई...
पिंकी का चेहरा तमतमाया हुआ था..," मुझे नही करना पेपर.. दरवाजा खुलवा दो.. मुझे जाना है...!"
तब तक मेरा भी पेपर पूरा ही हो गया था.. मैने भी अपनी आन्सर शीट बंद करके टेबल पर रख दी...," हो गया सर.. जाने दो हमें...!"
सर गुर्राते हुए बोले," अच्च्छा.. पेपर हो गया तो जाने दो.. हमें नही करना पेपर.. वा! मैं क्या चूतिया हूँ जो इतना बड़ा रिस्क ले रहा हूँ..!"
जैसे ही मैं खड़ी हुई.. सर ने मेरी कमर को पकड़ कर मुझे अपनी गोद में बैठा लिया...
मैने पिंकी के कारण गुस्सा सा होने का दिखावा किया...," ये सब क्या है सर.. छ्चोड़ दो मुझे!" मैं उनकी पकड़ से आज़ाद होने को च्चटपताई...
"अच्च्छा! साली.. दिन में तो तुझे ये भी पता था कि रस कैसे पीते हैं लौदे का.. अब तेरा काम निकल गया तो पूच्छ रही है.. ये सब क्या है...! तुम क्या सोच रही हो? मैं तुम्हे यूँही थोड़े जाने दूँगा.. बाकी के दिन तुम्हारी मर्ज़ी.. पर आज तो अपनी फीस लेकर ही रहूँगा...." मुझे ज़बरदस्ती गोद में ही पकड़े सर मेरी चूचियो को शर्ट के उपर से ही मसल्ने लगे.....
पिंकी बहुत डरी हुई थी.. शायद वो भी घर में ही शेर थी.. सर के सामने वो खड़ी खड़ी काँपने लगी थी...
मैं कुच्छ बोल नही पा रही थी... पर सच में मुझे बिल्कुल भी अच्च्छा नही लग रहा था उस समय.. पिंकी के कारण!
"अभी तो एक ही पेपर हुआ है.. 5 तो बाकी हैं ना.. सेंटर में इतनी सख्तयि कर दूँगा कि एक दूसरे से भी कुच्छ पूच्छ नही सकोगी.. देखता हूँ तुम जैसी लड़कियाँ कैसे पास होती हैं फिर...." सर ने गुर्राते हुए धमकी दी और मेरी कमीज़ के अंदर हाथ डाल कर मेरी चूचियो को मसल्ने लगे...
उनकी इस धमकी का पिंकी पर क्या असर हुआ.. ये तो मैं समझ नही पाई.. पर खुद मैं एकदम ढीली हो गयी.. और उनका विरोध करना छ्चोड़ दिया.. मैं मजबूर होकर पिंकी को देखने लगी... वो खड़ी खड़ी रो रही थी....
"हमें जाने दो सर.. प्लीज़.. मैं आपके आगे हाथ जोड़ती हूँ... आप कुच्छ भी कर लेना.. पर हमें अभी जाने दो.." पिंकी सुबक्ती हुई बोली....
"चुप चाप खड़ी रह वहाँ.. मैने नही बुलाया था तुम्हे अंदर.. तुम्हारी ये 'छमियिया' लेकर आई थी.. और मैं तुम्हे कुच्छ कह भी नही रहा.. अब ज़्यादा बकवास मत करो और चुपचाप तमाशा देखो..." सर ने कहा और मुझे खड़ा कर दिया... पिंकी की सूरत देख मेरी भी आँखों में आँसू आ गये..
सर आगे हाथ लाकर मेरी स्कर्ट का हुक खोलने लगे.. मैने पिंकी को दिखाने के लिए उनका हाथ पकड़ लिया..," छ्चोड़ दो ना सर! प्लीज़"
"बहुत प्ल्ज़ सुन ली तेरी.. अब चुपचाप मेरी प्लीज़ सुन ले.. ज़्यादा बोली तो पता है ना.." उन्होने कहा और झटके के साथ हुक खोल कर स्कर्ट को नीचे सरका दिया... पिंकी जैसी लड़की के सामने इस तरह खुद को नंगी होते देख मेरी आँखें एक बार फिर डॅब्डबॉ गयी... मैं अब नीचे सिर्फ़ कछी में खड़ी थी... और अगले ही पल कछी भी नीचे सरक गयी.. मेरे नंगे नितंब अब 'सर' की आँखों के सामने थे.. और योनि 'पिंकी' के सामने.. पर पिंकी ने इस हालत में मुझे देखते ही अपनी आँखें झुका ली और सुबक्ती रही.....
"अया.. क्या माल है तू भी लौंडिया!.. चूतड़ तो देखो! कितने मस्त और टाइट हैं.. एक दम गोल गोल... पके हुए खरबूजे की तरह..." सर ने मेरे नितंबों पर थपकी सी मारने के बाद उनको अलग अलग करने की कोशिश करते हुए कहा..," हाए.. बिल्कुल एक नंबर. का माल है...कितनी चिकनी चूत है तेरी... मैने तो सपने में भी नही सोचा था कि इंडिया में भी ऐसी चूते मिल जाएँगी... क्या इंपोर्टेड पीस है यार..."
पिंकी का रो रो कर बुरा हाल हो रहा था.. पर उसकी सुन'ने वाला वहाँ था कौन.. उसने अपना चेहरा दूसरी और घुमा लिया...
"चल.. टेबल पर झुक जा.. पहले तेरा रस पी लूँ..." सिर ने कहते हुए मेरी कमर पर हाथ रख कर आगे को दबा दिया... ना चाहते हुए भी मुझे झुकना पड़ा... मैने अपनी कोहनियाँ टेबल पर टीका ली....
"हां.. ऐसे.. शाबाश.. अब टाँग चौड़ी करके अपने चूतड़ पिछे निकल ले..!" सर ने उत्तेजित स्वर में कहा....
उसकी बात समझने में मुझे ज़्यादा परेशानी नही हुई.. अब पिंकी के सामने मेरी जो मिट्टी पलीत होनी थी.. वह तो हो ही चुकी थी.... मैं अब जल्द से जल्द उसको निपटाने की सोच रही थी.. मैने अपनी कमर को झुकाया और अपनी जांघें खोलते हुए अपने नितंबों को पिछे धकेल सा दिया... मेरी योनि अब लगभग बाहर की ओर निकल चुकी होगी....
"ओये होये.. मा कसम.. क्या चूत है तेरी.. दिल करता है इसको तो मैं काट कर अपने साथ ही ले जाउ!" कहकर उसने सिसकते हुए मेरे नितंबों को अपने दोनो हाथों में पकड़ा और अपनी जीभ निकाल कर एक ही बार में योनि को नीचे से उपर तक चाट गया.. मेरी सिसकी निकल गयी....
"देखा.. कितना मज़ा आया ना? इसको भी समझा.. ये भी थोड़े मज़े लेना सीख ले मुझसे.. जवानी चार दिन की होती है.. फिर पछ्तायेगि नही तो... " सर ने कहने के बाद एक बार और जीभ लपलपते हुए मेरी योनि की फांकों में खलबली मचाई और फिर बोले," कह दे ना इसको.. दो मैं तो अलग ही मज़ा आएगा.. बोल दे इसको.. मौज कर दूँगा ससूरी की.. मेरिट ना आए तो कहना..."
मैं कुच्छ ना बोली... मैं क्या बोलती..? मेरा बुरा हाल हो चुका था.. अब लगातार नागिन की तरह मेरी योनि में लहरा रही उसकी जीभ से मैं बेकाबू हो चुकी थी.. अपने आपको सिसकियाँ भरने से भी नही रोक पा रही थी...,"अया... सर्ररर... आआआः..."
"पगली.. सर की हालत भी तेरी ही तरह हो चुकी है.. कुच्छ मत बोल अब... अब तो मुझे घुसने दे जल्दी से!" बोल कर वह खड़ा हो गया...
मैं आँखें बंद किए सिसकियाँ लेती हुई मस्ती में खड़ी थी.. अचानक मुझे अपनी योनि की फांकों के बीच कुच्छ गड़ता हुआ महसूस हुआ.. समझ में आते ही मैं हड़बड़ा गयी और इसी हड़बड़ाहट में टेबल पर गिर गयी...
"अया.. ऐसे मत तडपा अब... बिल्कुल आराम से अंदर करूँगा.. मा कसम.. पता भी नही लगने दूँगा तुझे... तेरी तो वैसे भी इतनी चिकनी है कि सर्ररर से जाएगा.. आजा अंजू आजाआअ!" पगलाए हुए से सर ने मुझे कमर से पकड़ कर ज़बरदस्ती फिर से वैसे ही करने की कोशिश की... पर इस बार मैं अड़ गयी...
"नही सर.. ये नही!" मैने एक दम से सीधी खड़ी होकर कहा....
"ये क्यूँ नही मेरी जान... ये ही तो लेना है.. एक बार थोड़ा सा दर्द होगा और फिर देखना... चल आजा.. जल्दी से आजा... टाइम वेस्ट मत कर अब!" सर ने अपने लिंग को हाथ में लेकर हिलाते हुए कहा....
"नही सर.. अब बहुत हो गया.. जाने दो हमें.." मैं अकड़ सी गयी...
"ज़्यादा बकबक की तो साली की गांद में घुसेड दूँगा ये.. नौ सौ चूहे खाकर अब बिल्ली हज को जाएगी... चुपचाप मान जा वरना अपनी सहेली को बोल के चूस देगी थोड़ा सा... फिर मैं मान जाउन्गा..." सर ने कहा...
अजीब उलझन में आ फाँसी थी मैं... अगर घुस्वा लेती तो फिर मा बन'ने का डर.. पिंकी को बोलती तो बोलती कैसे? वो पहले ही मुझे कोस रही होगी... अचानक सर मेरी तरफ लपके तो मेरे मुँह से घबराहट में निकल ही गया," पिंकी.. प्लीज़..."
पिंकी ने मेरी तरफ घूर कर घृणा से देखा.. और फिर अपना चेहरा दीवार की तरफ कर लिया...
सर अब ज़्यादा मौके देने के मूड में नही थे.. उन्होने ज़बरदस्ती मुझे पकड़ कर सोफे पर गिरा लिया और मेरी टाँगें पकड़ कर दूर दूर फैला दी.. इसके साथ ही मेरी योनि की फाँकें अलग अलग होकर सर को आक्रमण के लिए आमंत्रित करने लगी...
सर ने जैसे ही घुटने सोफे पर रखे.. मैं दर्दनाक ढंग से बिलख पड़ी," पिनकयययी.. प्लीज़.. बचा ले मुझे...!"
सर ने मेरे आह्वान पर मुड़कर पिंकी को देखा तो मेरी भी नज़र उसी पर चली गयी.. पर वह चुपचाप खड़ी रही....
"ऐसी सहेलियाँ बनाती ही क्यूँ है जो तेरे सामने खड़ी होकर भी तेरी सील टूट'ते देखती रहें... ये किसी काम की नही है.. तुझे चुदना ही पड़ेगा आज..." सर ने कहा और मेरी जांघों को फैलाकर फिर से मुझ पर झुकने लगे.. मैं बिलख रही थी.. पर वो 'कहाँ' सुनते? उन्होने वापस अपना लिंग मेरी योनि पर टीकाया ही था कि अचानक खड़े हो कर पलट गये...
"क्या करना है सर?" पिंकी आँखें बंद किए उनके पास खड़ी थी.. और उसकी आँखों से आँसुओं की झड़ी लगी हुई थी......
क्रमशः ..................
गतांक से आगे.......................
एग्ज़ॅमिनेशन रूम से बाहर निकलते ही पिंकी ने मुझे पकड़ लिया," तेरा पेपर तो हो ही नही पाया होगा यार.. तुझे इतनी देर बाद क्यूँ छ्चोड़ा उन्होने?"
मैने उसकी आँखों में देख एक पल सोचा कि संदीप के किए अहसान के बारे में बताउ या नही," ववो.. वो तो मेरा केस बनाने पर आड़े हुए थे.. बहुत रिक्वेस्ट करने के बाद ही माने.. बस इसीलिए देर हो गयी..."
तभी सर ऑफीस से बाहर निकल आए.. उन्होने इधर उधर देखा.. सभी जा चुके थे.. हमारे अलावा सिर्फ़ पीयान ही ऑफीस के बाहर बैठा था....
सर अंदर गये और थोड़ी देर बाद मेडम बाहर निकली," कृशन! बाकी कमरों को ताला लगाकर तुम चले जाओ.. हमें अभी टाइम लगेगा..."
"ठीक है मेडम!" पीयान ने कहा और चाबी उठा कर कमरे बंद करने लगा....
"हुम्म.. पर पेपर तो मेरा भी अच्च्छा नही हुआ... चल चलते हैं घर.. रास्ते में बात करेंगे...." पिंकी ने मायूस होकर कहा...
"ववो.. ऐसा कर.. तू जा.. मैं थोड़ी बाद में आऊँगी..." मैं लगे हाथों बाकी बचे पेपर को भी निपटा देना चाहती थी...
"पर क्यूँ? यहाँ क्या करेगी तू?" उसने आँखें सिकोड कर पूचछा....
"ववो.. मेरा टाइम खराब हो गया था ना.. इसीलिए सर मुझे अब थोड़ा सा टाइम देंगे.." मैने उसको आधा सच बता दिया," पर तू किसी को बोलना मत.. सर के उपर बात आ जाएगी नही तो...."
"अच्च्छा!" पिंकी खुश होकर बोली," ये तो अच्छि बात है.. कोई बात नही.. मैं तेरा इंतजार कर लेती हूँ यहीं.. तेरे साथ ही चालूंगी...!"
मैं उसको भेजने के लिए बहाना सोच ही रही थी कि सर एक बार फिर बाहर आ गये.. बाहर आकर मेरी ओर मुस्कुरा कर देखा और इशारे से अपनी और बुलाया..
"... तू जा यार.. मैं आ जाउन्गि!... एक मिनिट.... सर बुला रहे हैं..." मैने पिंकी से कहा और बिना उसका जवाब लिए सर के पास चली गयी.... पिंकी वहीं खड़ी रही...
सर ने अपने होंटो पर जीभ फिराई और पिंकी की ओर देख कर धीरे से बोले," इसको तो भेज दिया होता.. अपने साथ क्यूँ चिपका रखा है...!"
"मैने कहा है सर.. पर वो कह रही है कि मेरे साथ ही जाएगी.. अब बाकी बच्चे भी जा चुके हैं... मैं उसको फिर से बोल के देखती हूँ..." मैने नज़रें झुका कर जवाब दिया...
"हुम्म.. कौन है वो? तेरी क्या लगती है?" सर की आवाज़ में बड़ी मिठास थी अब...
"जी.. मेरी सहेली है.. बहुत अच्छि.." मैने उसकी नज़रों में देखा.. वह पिंकी को ही घूर रहा था...
"किसी को कुच्छ बता तो नही देगी ना..." सर ने मेरी चूचियो को घूरते हुए पूचछा....
यहाँ मेरी ग़लती रह गयी.. मैने समझा कि सर का ये सवाल एग्ज़ॅम टाइम के बाद मुझे पेपर करने देने के बारे में है... वैसे भी मैं यही समझ रही थी कि उनको जो कुच्छ करना था.. वो कर चुके हैं," नही सर! वो तो मेरी बेस्ट फ्रेंड है.. किसी को कुच्छ नही बताएगी..."
मैं कहने के बाद सर की प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगी... वो चुपचाप खड़े पिंकी की और देखते हुए कुच्छ सोचते रहे..
"सर...!" मैने उन्हे टोक दिया....
"हूंम्म?" वो अब भी मेरे पास खड़े लगातार पिंकी की ओर ही देख रहे थे...
"ववो.. मैं.. कह रही थी कि उसका भी पेपर खराब हुआ है... अगर आप...!" मैं बीच में ही रुक गयी.. ये सोच कर कि समझ तो गये ही होंगे...
"चल ठीक है.. बुला लो... पर देख लो.. तुम्हारे भरोसे पर कर रहा हूँ.. कहीं बाद में..." सर की बात को मैने खुश होकर बीच में ही काट दिया...
"जी.. वो किसी को कुच्छ नही बताएगी.. बुला लाउ उसको?" मैं खुश होकर बोली....
"हां.. ऑफीस में लेकर आ जाओ....!" सर ने कहा और अंदर चले गये....
मैं खुश होकर दौड़ी दौड़ी पिंकी के पास गयी," चल आजा... मैने तेरे लिए भी बात कर ली है... तुझे भी सर पेपर दे देंगे..."
"अच्च्छा.. सच! मज़ा आ जाएगा फिर तो" वा भी सुनकर खुशी से उच्छल पड़ी...
अगले ही पल हम दोनो मेडम और सर के सामने खड़े थे...
"मेडम.. प्लीज़.. आप ऑफीस का ताला लगाकर थोड़ी देर बाहर बैठ जाओ.. मेरा फोन भी लेते जाओ.. अगर कोई फोन आए तो कहना कि वो पेपर्स का बंड्ल लेकर निकल चुके हैं और फोन यहीं भूल गये...!" सर ने मेडम की तरफ अपना मोबाइल बढ़ाते हुए कहा....
"मैं तो बैठ जाउन्गि सर... पर देख लो.. ज़िंदगी भर अब आप मुझे और इस सेंटर को भूल मत जाना... अब मेरे स्कूल के किसी बच्चे का पेपर खराब नही होना चाहिए... सबको खुली छ्छूट मिलेगी ना अब तो....?" मेडम ने शिकायती लहजे में सर को कहा....
सर ने हंसते हुए अपना पूरा जबड़ा ही खोल दिया," हा हा हा.. आप भी कमाल करती हैं मेडम.. ये सेंटर और आपको कभी भूल सकता हूँ क्या? यहाँ तो मुझे तोहफे पर तोहफे मिल रहे हैं....आप बेफिकर रहें... कल से सब बच्चों को 15 मिनिट पहले पेपर मिल जाया करेगा.. और नकल की भी मौज करवा दूँगा..."
"थॅंक्स सर.. मुझे बस यही चाहिए.." मेडम ने मुस्कुरा कर कहा और बाहर निकल कर ऑफीस को ताला लगा दिया.....
"सोफे पर बैठ जाओ आराम से.. डरने की कोई ज़रूरत नही है.. अपना अपना रोल. नंबर. बता दो जल्दी... तुम्हे नही पता मैं कितना बड़ा रिस्क लेकर तुम्हारे लिए ये सब कर रहा हूँ..." सर ने हमारे रूम का बंड्ल खोलते हुए कहा....
पिंकी ने मेरी और देखा और मुस्कुरा दी और फिर सर को क्रितग्य नज़रों से देखते हुए बोली," थॅंक्स सर.."
हम दोनो ने अपने अपने रोल नंबर. सर को बताए और उन्होने हमारी शीट निकाल कर हम दोनो को पकड़ा दी...," किसी इंटेलिजेंट बच्चे का भी रोल नंबर. बता दो.. मैं निकाल कर दे देता हूँ.. जल्दी जल्दी उतार लेना उसमें से..."
"दीपाली" पिंकी के मुँह से निकला.. जबकि मेरे मुँह से संदीप का नाम निकलते निकलते रह गया.. पिंकी ने दीपाली का रोल नंबर. सर को बता दिया...
"हूंम्म.. मिल गया!" सर ने कहा और पेपर लेकर हमारे पास आए और हमारे बीच फंसकर बैठ गये..," ये लो.. जल्दी जल्दी करो!"
पिंकी ने शायद सर की मंशा पर ध्यान नही दिया था... हम दोनो ने सिर के सामने दीपाली का पेपर खोल कर रख लिया और जो क्वेस्चन हम दोनो के रहते थे...उतारने लगे...
करीब पाँच मिनिट ही हुए होंगे.. सर ने अपनी बाहें फैलाकर हम दोनो के कंधों पर रख दी," शाबाश.. जल्दी जल्दी करो..."
"तुम्हारा क्या नाम है बेटी?" सिर ने पिंकी की ओर देख कर पूचछा....
"जी..? पिंकी!" पिंकी जल्दी जल्दी लिखते हुए बोली....
"बहुत प्यारा नाम है.. अंजलि को तो सब पता ही है.. तुम भी अब किसी पेपर की चिंता मत करना.. सब ऐसे ही करवा दूँगा.. खुश हो ना?" सर पिंकी की कमर पर हाथ फेरने लगे...
मेरा ध्यान रह रह कर पिंकी पर जा रहा था.. मुझे तरुण की ठुकाई याद आ रही थी... ये सोचकर मैं डरी हुई थी.. कहीं सर पिंकी पर हाथ सॉफ करने के बारे में ना सोचने लगे हों... 'ऐसा होगा तो आज बहुत बुरा होगा..' मैं मंन ही मंन सोच रही थी.. पर कहती भी तो मैं किसको क्या कहती... मेरी एक आँख अपना पेपर करने पर.. और दूसरी पिंकी के चेहरे पर बनी रही....
"तुम अब जवान हो गयी हो बेटी.. चुननी डाला करो ना.. ऐसा अच्च्छा नही लगता ना.. देखो.. बाहर से ही सॉफ दिख रहे हैं...!" सर की इस बात पर पिंकी सहम सी गयी.. पर शायद अपना पेपर पूरा करने का लालच उसके मंन में भी था..
"ववो.. मैने आज अंजलि को दे दी सर..." पिंकी ने हड़बड़ा कर कहा....
"ओह.. हां.. इसकी तो और भी बड़ी बड़ी और मस्त हैं.. पर इसको अपनी लानी चाहिए.. देखो ना.. तुम्हारी भी तो कैसे चौंछ उठाए खड़ी हैं.. तुम ब्रा भी नही पहनती हो.. है ना?"
सर की बात सुनकर पिंकी का चेहरा सच में ही गुलाबी सा हो गया.. अब शायद उसके मंन में भी सर की बातें सुन कर घंटियाँ सी बजने लगी थी... मुझे डर था की ये घंटियाँ घंताल बनकर सर के सिर पर ना बजने लग जायें... अभी तो 5 पेपर बाकी थे....
पिंकी बोली तो कुच्छ नही पर सरक कर 'सर' से थोड़ा दूर हो गयी..
"नही पहनती हो ना ब्रा?" सर ने उस'से फिर पूचछा...," अंजलि भी नही पहनती.. तुम भी नही.. क्या बात है यार!"
अंजलि इस बार थोड़ा सा खिज कर बोली," वो.. मम्मी लाकर ही नही देती.. कहती हैं अभी तुम बच्ची हो...!" और अपना पेपर करती रही...
"मम्मी के लिए तो तुम शादी के बाद भी बच्ची ही रहोगी बेटी.. हे हे हे.." सर अपनी जांघों के बीच तनाव को कम करने के लिए 'वहाँ' खुजाते हुए बोले," पर तुम बताया करो ना.. तुम तो अब पूरी जवान हो गयी हो.. लड़कों का दिल मचल जाता होगा इन्हे यूँ फड़कते देख कर.. पर तुम्हारा भी क्या कुसूर है.. ये उमर ही मज़े लेने और देने की होती है.." सर ने कहने के बाद अचानक अपना हाथ पिंकी की जांघों पर रख दिया..
पिंकी कसमसा उठी," सर.. प्लीज़!"
"करो ना.. तुम आराम से पेपर करो.. मैं तुम्हारे लिए ही तो बैठा हूँ यहाँ.. चिंता की कोई बात नही.." सर ने उसको याद दिलाने की कोशिश की कि वो हम पर कितना 'बड़ा' अहसान कर रहे हैं... उन्होने अपना हाथ पिंकी की जाँघ से नही हटाया...
पिंकी के चेहरे से मुझे सॉफ लग रहा था कि वो पूरी तरह विचलित हो चुकी है.. पर शायद पेपर करने का लालच; या फिर उनकी उमर; या फिर दोनो ही कारण थे कि वह चुप बैठी अब भी लिख रही थी...
सर ने अचानक मेरे हाथ के नीचे से अपना हाथ निकाला और मेरा दायां स्तन अपनी हथेली में ले लिया.. मैने घबराकर पिंकी की ओर देखा.. कि कहीं उसके साथ भी ऐसा ही तो नही कर दिया.. पर अब तक गनीमत था कि उन्होने ऐसा नही किया था... वह हड़बड़ाई हुई जल्दी जल्दी लिखती चली जा रही थी....
सर ने अचानक अपने हाथ से उसकी जांघों के बीच जाने क्या 'छेड़' दिया.. पिंकी उच्छल कर खड़ी हो गयी.. मैने घबराकर उनका हाथ अपनी छाती से हटाने की कोशिश की.. पर उन्होने 'उसको' नही छ्चोड़ा...
"क्या हो गया बेटी? इतनी घबरा क्यूँ रही हो? आराम से पेपर करती रहो ना.. ये देखो.. अंजलि कितने आराम से कर रही है.." सर निसचिंत बैठे हुए थे.. ये सोच कर की मेरी 'सहेली' है.. मेरे ही जैसी होगी...
पिंकी ने मेरी और देखा और शर्म से अपनी आँखें झुका ली.. उसने मेरी छाती को 'सर' के हाथों में देख लिया था.. मैं चाहकर भी उनका हाथ 'वहाँ' से हटा नही पाई...
पिंकी का चेहरा तमतमाया हुआ था..," मुझे नही करना पेपर.. दरवाजा खुलवा दो.. मुझे जाना है...!"
तब तक मेरा भी पेपर पूरा ही हो गया था.. मैने भी अपनी आन्सर शीट बंद करके टेबल पर रख दी...," हो गया सर.. जाने दो हमें...!"
सर गुर्राते हुए बोले," अच्च्छा.. पेपर हो गया तो जाने दो.. हमें नही करना पेपर.. वा! मैं क्या चूतिया हूँ जो इतना बड़ा रिस्क ले रहा हूँ..!"
जैसे ही मैं खड़ी हुई.. सर ने मेरी कमर को पकड़ कर मुझे अपनी गोद में बैठा लिया...
मैने पिंकी के कारण गुस्सा सा होने का दिखावा किया...," ये सब क्या है सर.. छ्चोड़ दो मुझे!" मैं उनकी पकड़ से आज़ाद होने को च्चटपताई...
"अच्च्छा! साली.. दिन में तो तुझे ये भी पता था कि रस कैसे पीते हैं लौदे का.. अब तेरा काम निकल गया तो पूच्छ रही है.. ये सब क्या है...! तुम क्या सोच रही हो? मैं तुम्हे यूँही थोड़े जाने दूँगा.. बाकी के दिन तुम्हारी मर्ज़ी.. पर आज तो अपनी फीस लेकर ही रहूँगा...." मुझे ज़बरदस्ती गोद में ही पकड़े सर मेरी चूचियो को शर्ट के उपर से ही मसल्ने लगे.....
पिंकी बहुत डरी हुई थी.. शायद वो भी घर में ही शेर थी.. सर के सामने वो खड़ी खड़ी काँपने लगी थी...
मैं कुच्छ बोल नही पा रही थी... पर सच में मुझे बिल्कुल भी अच्च्छा नही लग रहा था उस समय.. पिंकी के कारण!
"अभी तो एक ही पेपर हुआ है.. 5 तो बाकी हैं ना.. सेंटर में इतनी सख्तयि कर दूँगा कि एक दूसरे से भी कुच्छ पूच्छ नही सकोगी.. देखता हूँ तुम जैसी लड़कियाँ कैसे पास होती हैं फिर...." सर ने गुर्राते हुए धमकी दी और मेरी कमीज़ के अंदर हाथ डाल कर मेरी चूचियो को मसल्ने लगे...
उनकी इस धमकी का पिंकी पर क्या असर हुआ.. ये तो मैं समझ नही पाई.. पर खुद मैं एकदम ढीली हो गयी.. और उनका विरोध करना छ्चोड़ दिया.. मैं मजबूर होकर पिंकी को देखने लगी... वो खड़ी खड़ी रो रही थी....
"हमें जाने दो सर.. प्लीज़.. मैं आपके आगे हाथ जोड़ती हूँ... आप कुच्छ भी कर लेना.. पर हमें अभी जाने दो.." पिंकी सुबक्ती हुई बोली....
"चुप चाप खड़ी रह वहाँ.. मैने नही बुलाया था तुम्हे अंदर.. तुम्हारी ये 'छमियिया' लेकर आई थी.. और मैं तुम्हे कुच्छ कह भी नही रहा.. अब ज़्यादा बकवास मत करो और चुपचाप तमाशा देखो..." सर ने कहा और मुझे खड़ा कर दिया... पिंकी की सूरत देख मेरी भी आँखों में आँसू आ गये..
सर आगे हाथ लाकर मेरी स्कर्ट का हुक खोलने लगे.. मैने पिंकी को दिखाने के लिए उनका हाथ पकड़ लिया..," छ्चोड़ दो ना सर! प्लीज़"
"बहुत प्ल्ज़ सुन ली तेरी.. अब चुपचाप मेरी प्लीज़ सुन ले.. ज़्यादा बोली तो पता है ना.." उन्होने कहा और झटके के साथ हुक खोल कर स्कर्ट को नीचे सरका दिया... पिंकी जैसी लड़की के सामने इस तरह खुद को नंगी होते देख मेरी आँखें एक बार फिर डॅब्डबॉ गयी... मैं अब नीचे सिर्फ़ कछी में खड़ी थी... और अगले ही पल कछी भी नीचे सरक गयी.. मेरे नंगे नितंब अब 'सर' की आँखों के सामने थे.. और योनि 'पिंकी' के सामने.. पर पिंकी ने इस हालत में मुझे देखते ही अपनी आँखें झुका ली और सुबक्ती रही.....
"अया.. क्या माल है तू भी लौंडिया!.. चूतड़ तो देखो! कितने मस्त और टाइट हैं.. एक दम गोल गोल... पके हुए खरबूजे की तरह..." सर ने मेरे नितंबों पर थपकी सी मारने के बाद उनको अलग अलग करने की कोशिश करते हुए कहा..," हाए.. बिल्कुल एक नंबर. का माल है...कितनी चिकनी चूत है तेरी... मैने तो सपने में भी नही सोचा था कि इंडिया में भी ऐसी चूते मिल जाएँगी... क्या इंपोर्टेड पीस है यार..."
पिंकी का रो रो कर बुरा हाल हो रहा था.. पर उसकी सुन'ने वाला वहाँ था कौन.. उसने अपना चेहरा दूसरी और घुमा लिया...
"चल.. टेबल पर झुक जा.. पहले तेरा रस पी लूँ..." सिर ने कहते हुए मेरी कमर पर हाथ रख कर आगे को दबा दिया... ना चाहते हुए भी मुझे झुकना पड़ा... मैने अपनी कोहनियाँ टेबल पर टीका ली....
"हां.. ऐसे.. शाबाश.. अब टाँग चौड़ी करके अपने चूतड़ पिछे निकल ले..!" सर ने उत्तेजित स्वर में कहा....
उसकी बात समझने में मुझे ज़्यादा परेशानी नही हुई.. अब पिंकी के सामने मेरी जो मिट्टी पलीत होनी थी.. वह तो हो ही चुकी थी.... मैं अब जल्द से जल्द उसको निपटाने की सोच रही थी.. मैने अपनी कमर को झुकाया और अपनी जांघें खोलते हुए अपने नितंबों को पिछे धकेल सा दिया... मेरी योनि अब लगभग बाहर की ओर निकल चुकी होगी....
"ओये होये.. मा कसम.. क्या चूत है तेरी.. दिल करता है इसको तो मैं काट कर अपने साथ ही ले जाउ!" कहकर उसने सिसकते हुए मेरे नितंबों को अपने दोनो हाथों में पकड़ा और अपनी जीभ निकाल कर एक ही बार में योनि को नीचे से उपर तक चाट गया.. मेरी सिसकी निकल गयी....
"देखा.. कितना मज़ा आया ना? इसको भी समझा.. ये भी थोड़े मज़े लेना सीख ले मुझसे.. जवानी चार दिन की होती है.. फिर पछ्तायेगि नही तो... " सर ने कहने के बाद एक बार और जीभ लपलपते हुए मेरी योनि की फांकों में खलबली मचाई और फिर बोले," कह दे ना इसको.. दो मैं तो अलग ही मज़ा आएगा.. बोल दे इसको.. मौज कर दूँगा ससूरी की.. मेरिट ना आए तो कहना..."
मैं कुच्छ ना बोली... मैं क्या बोलती..? मेरा बुरा हाल हो चुका था.. अब लगातार नागिन की तरह मेरी योनि में लहरा रही उसकी जीभ से मैं बेकाबू हो चुकी थी.. अपने आपको सिसकियाँ भरने से भी नही रोक पा रही थी...,"अया... सर्ररर... आआआः..."
"पगली.. सर की हालत भी तेरी ही तरह हो चुकी है.. कुच्छ मत बोल अब... अब तो मुझे घुसने दे जल्दी से!" बोल कर वह खड़ा हो गया...
मैं आँखें बंद किए सिसकियाँ लेती हुई मस्ती में खड़ी थी.. अचानक मुझे अपनी योनि की फांकों के बीच कुच्छ गड़ता हुआ महसूस हुआ.. समझ में आते ही मैं हड़बड़ा गयी और इसी हड़बड़ाहट में टेबल पर गिर गयी...
"अया.. ऐसे मत तडपा अब... बिल्कुल आराम से अंदर करूँगा.. मा कसम.. पता भी नही लगने दूँगा तुझे... तेरी तो वैसे भी इतनी चिकनी है कि सर्ररर से जाएगा.. आजा अंजू आजाआअ!" पगलाए हुए से सर ने मुझे कमर से पकड़ कर ज़बरदस्ती फिर से वैसे ही करने की कोशिश की... पर इस बार मैं अड़ गयी...
"नही सर.. ये नही!" मैने एक दम से सीधी खड़ी होकर कहा....
"ये क्यूँ नही मेरी जान... ये ही तो लेना है.. एक बार थोड़ा सा दर्द होगा और फिर देखना... चल आजा.. जल्दी से आजा... टाइम वेस्ट मत कर अब!" सर ने अपने लिंग को हाथ में लेकर हिलाते हुए कहा....
"नही सर.. अब बहुत हो गया.. जाने दो हमें.." मैं अकड़ सी गयी...
"ज़्यादा बकबक की तो साली की गांद में घुसेड दूँगा ये.. नौ सौ चूहे खाकर अब बिल्ली हज को जाएगी... चुपचाप मान जा वरना अपनी सहेली को बोल के चूस देगी थोड़ा सा... फिर मैं मान जाउन्गा..." सर ने कहा...
अजीब उलझन में आ फाँसी थी मैं... अगर घुस्वा लेती तो फिर मा बन'ने का डर.. पिंकी को बोलती तो बोलती कैसे? वो पहले ही मुझे कोस रही होगी... अचानक सर मेरी तरफ लपके तो मेरे मुँह से घबराहट में निकल ही गया," पिंकी.. प्लीज़..."
पिंकी ने मेरी तरफ घूर कर घृणा से देखा.. और फिर अपना चेहरा दीवार की तरफ कर लिया...
सर अब ज़्यादा मौके देने के मूड में नही थे.. उन्होने ज़बरदस्ती मुझे पकड़ कर सोफे पर गिरा लिया और मेरी टाँगें पकड़ कर दूर दूर फैला दी.. इसके साथ ही मेरी योनि की फाँकें अलग अलग होकर सर को आक्रमण के लिए आमंत्रित करने लगी...
सर ने जैसे ही घुटने सोफे पर रखे.. मैं दर्दनाक ढंग से बिलख पड़ी," पिनकयययी.. प्लीज़.. बचा ले मुझे...!"
सर ने मेरे आह्वान पर मुड़कर पिंकी को देखा तो मेरी भी नज़र उसी पर चली गयी.. पर वह चुपचाप खड़ी रही....
"ऐसी सहेलियाँ बनाती ही क्यूँ है जो तेरे सामने खड़ी होकर भी तेरी सील टूट'ते देखती रहें... ये किसी काम की नही है.. तुझे चुदना ही पड़ेगा आज..." सर ने कहा और मेरी जांघों को फैलाकर फिर से मुझ पर झुकने लगे.. मैं बिलख रही थी.. पर वो 'कहाँ' सुनते? उन्होने वापस अपना लिंग मेरी योनि पर टीकाया ही था कि अचानक खड़े हो कर पलट गये...
"क्या करना है सर?" पिंकी आँखें बंद किए उनके पास खड़ी थी.. और उसकी आँखों से आँसुओं की झड़ी लगी हुई थी......
क्रमशः ..................