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बगिया के माली ने सारी भोग डाली

आयशा भाभी अपने कमरे मे भाग गयी. उनके जाने के बाद कुच्छ देर मैं और हबीबा भाभी ने इधर उधर की बाते की. उसके बाद मैं अपने कमरे मे चली गाही. इसी तरह आज का दिन गुजर गया और शाम हो गयी. शाम को हम तीनो ननद भाभियों ने मिलकर खाना बनाया और अब्बू को खाने के लिए आवाज़ दी.

मैं- अब्बू आकर खाना खा लीजिए. आपको भूख लगी होगी ना.

अब्बू- हाँ बस आ रहा हूँ, बहुत भूख लगी है.

अब्बू की बात सुनकर हबीबा भाभी आयशा भाभी के कान मे मजाकिया लहजे मे धीरे से बोली.

हबीबा भाभी- इस बुड्ढे को बहुत भूख लगती है. इन्हे कुच्छ ऐसा खिलाना पड़ेगा की इनकी जन्मों की भूक और प्यास मिट जाए.

आयशा भाभी- तू चुप कर छोटी . हमेशा अब्बू को ऐसे बोलती रहती हो. अगर किसी दिन अब्बू ने सुन लिया तो उस दिन तुम्हे ही खा डालेंगे. फिर देखती हूँ क्या करती हो तुम.

मैं- आप दोनो हर समय अब्बू की तान ही क्यों छेड़े रहती हैं. कोई और नही मिलता क्या.

हबीबा भाभी- तुम्हे क्यों जलन हो रही है अगर हम दोनो अब्बू के बारे मे बात करते हैं. तुम ही बताओ किसके बारे मे बात करें. एक तुम्हारे भाई जान हैं जो पता नही कब घर आएँगे. तो घर मे बचा कौन तुम और अब्बू. तुम्हारे बारे मे क्या बात करू. तुम भी कम नही हो. पता नही क्या क्या गुल खिलाती रहती हो. वैसे भी अब्बू की बात करने मे मज़ा बहुत आता है.

मैं- क्या कहा. मैने क्या गुल खिलाए हैं. मैं तो हमेशा आप लोगो के साथ ही रहती हूँ.

आयशा भाभी- अच्च्छा. तूने कोई गुल नही खिलाया है. बिना गुल खिलाए ही ये पहाड़ जैसी चुचिया और ये गुब्बारे जैसी गांड हो गई है. तुम्हारे बाय्फ्रेंड ने बहुत अच्छे से इस्तेमाल किया है तुम्हारे शरीर के हर एक अंग का. तुम्हारा हर एक अंग फूला दिया है उसने. बस ये ध्यान रहे की कही किसी दिन तुम्हारा पेट ना फूला दे.

आयशा भाभी ने ये बात हंसते हुए कही. उनकी बात सुनकर मैं बुरी तरह झेंप गई. भाभी की बात सही थी. मेरा बाय्फ्रेंड बहुत बुरी तरह चुदाई करता था मेरे साथ. एक एक अंग मसल देता था. रगड़ रगड़ कर चोदता था मुझे. उसी का नतीज़ा था की मेरा फिगर शादी के पहले ही 36 30 38 हो गया था. जिसे भाभी की अनुभवी आँखो ने पहचान लिया था, लेकिन मैं भाभी से इस बारे मे एक परदा रखना चाहती थी, इसलिए मैने भाभी की बात का जवाब देते हुए कहा.

मैं- ये कैसी बात कर रही हो भाभी, ऐसा कुच्छ नही है जैसा आप सोच रही हैं, ये सब तो नॅचुरल है. जैसे किसी किसी का उमर के हिसाब से ज़्यादा बड़ा हो जाता है उसी तरह मेरा भी कुच्छ बड़ा हो गया है, लेकिन इसका मतलब ये नही है की मैं बाहर किसी के साथ ये काम करती हूँ.

आयशा भाभी- अब ज़्यादा बहाने बनाने की कोशिश मत करो. मुझे मालूम है की ये नॅचुरल है या आर्टिफिशियल. तुम्हे ना बताना हो तो मत बताओ, लेकिन जो भी तुम्हे देखेगा वो तुरंत जान जाएगा की ये लड़की दिल खोल कर ठुकवाती है. आख़िर अनुभव नाम की भी कोई चीज़ होती है.

मैं- क्या भाभी आप भी ना कुच्छ भी बोलती रहती हैं. ऐसा कुच्छ नही है जैसा आपने कहा. और आप जैसे बात कर रही हैं. उस हिसाब से तो मुझे लगता है की आपने भी कुच्छ कम नही हैं भाभी.

अभी हम बात कर ही रहे थे की अब्बू ने हमे आवाज़ लगाई.

अब्बू- अरे बहू खाना तो खिलाओ, बहुत जोरो की भूख लगी है.

हबीबा भाभी - हाँ अब्बू लाई.

अब्बू के आने के बाद हमने चार थाली मे खाना लगाया और मैने अब्बू की थाली उठाकर अब्बू के सामने रखा, थाली रखने के लिए मुझे झुकना पड़ा, मैं घर मे अक्सर सलवार कमीज़ ही पहन ती हूँ, और दुपट्टा नही लेती हूँ, लेकिन मैने हमेशा एहतियात बरतती हूँ की अब्बू के सामने अच्छे से जाऊं. और आज मैने जो कमीज़ पहनी थी उसका गला हल्का सा डीप था, तो जैसे ही मैं झुकी, मेरी चुचियो के बीच की दरार अब्बू के सामने आ गयी.

अब्बू की नज़र जैसे ही मेरी चुचियो की घाटी पर पड़ी. तो कुच्छ सेकेंड तक उनकी नज़र वही पर ज़ाम हो गयी. लेकिन अब्बू जल्दी से होश मे आ गये और अपनी नज़र झट से परे फेर ली. ये सब बस कुच्छ ही सेकेंड मे हो गया था. जिसके बारे मे मुझे कुच्छ भी पता नही था. लेकिन आयशा भाभी ने ये नज़ारा देख लिया था. मैं अब्बू को खाना देकर वापस किचन मे आई तो आयशा भाभी ने फुसफुसाते हुए मुझसे कहा.

आयशा भाभी- क्यो शाजिया. दिखा आई अपने फूटबाल अपने अब्बू को.

मैं- (भाभी की बात ना समझते हुए ) कौन सा फूटबाल दिखाया मैने अब्बू को. मैने तो खाना दिया अभी.

मेरी बात सुनकर आयशा भाभी ने अपने हाथ मेरी चुचियो पर रखकर सहलाते हुए कहा.

आयशा भाभी- मैं इस फुटबॉल की बात कर रही हूँ. जो अभी अभी तू अब्बू को दिखा कर आ रही है.

भाभी की बात सुनकर मैने अपनी चुचियों की तरफ देखा तो मुझे एहसास हुआ की झुकने की वजह से मेरी चुचिया इस समीज़ से ज़रूर अब्बू को दिख गयी होंगी. मैने अपनी उंगली अपने मुँह मे दबाते हुए कहा.

मैं- ऑश दैयाअ. ये कैसी ग़लती हो गयी मुझसे. अब पता नही अब्बू क्या सोच रहे होंगे मेरे बारे मे.

हबीबा भाभी- क्या सोच रहे होंगे. यही सोच रहे होंगे की उनकी बेटी अब भरपूर जवान हो गयी है और कुच्छ लेने और कुच्छ देने के लायक हो गयी है.

मैं- चिईिइ. आप कितनी बेशरम हो भाभी. वो अब्बू हैं हमारे. उनके बारे मे तो इतना गंदा सोचते हुए शर्म आनी चाहिए आपको.

आयशा भाभी- शाजिया सही कह रही है. अब्बू के बारे मे ऐसा मत कहो, वैसे भी शाजिया का लेन देनका प्रोग्राम तो कब से चल रहा है अपने बाय्फ्रेंड के साथ. क्यो शाजिया सही कह रही हूँ ना मैं.

भाभी ने ये बात मुस्कुराते हुए कही थी. जिसे सुनकर हबीबा भाभी और मैं भी मुस्कुराने लगी. माने भाभी को कोहनी मारते हुए कहा.

मैं- आप ना भाभी. कभी नही सुधर सकती. हमेशा मुझे छेड़ ती रहती हो. मैने आपसे पहले भी कहा है की ऐसा कुच्छ भी नही है. जैसा आप सोच रही हैं लेकिन आप मेरी बात मानती ही नही.

लेकिन मेरी कोहनी शायद भाभी को थोड़ा ज़ोर से लग गयी, जिससे भाभी के मुँह से आआहह निकल गयी. जिसे शायद अब्बू ने सुन लिया. तभी अब्बू की आवाज़ आई.

अब्बू- तुम तीनो किचन मे क्या ख़ुसर फुसर कर रही हो. और ये आवाज़ कैसी है. तुम लोगो को खाना नही खाना है क्या जो अभी तक किचन मे ही हो. कम से कम मेरा साथ तो दे दिया करो खाने में. तुम्हारी सास तो रहती नही घर मे. और तुम सब अपने मे ही मस्त रहती हो. अब मुझे रोका है घर मे तो कम से कम मेरे साथ खाना तो खा ही सकती हो तुम लोग.
 
अब्बू की बात सुनकर मैं तुरंत अपनी थाली लेकर अब्बू के बगल मे जाकर बैठ गयी. हबीबा भाभी और आयशा भाभी भी अपनी थाली लेकेर आई और हमारे सामने बैठ गयी. फिर हम सब ने मिलकर खाना खाया और खाना खाने के बाद अब्बू उठकर सोफे पर बैठ गये और टीवी ओंन करके देखने लगे. हम सबने खाना ख़तम किया और बर्तन समेट कर किचन मे चले गये. हम तीनो मिलकर किचन की सफाई करने लगे. थोड़ी देर बाद अब्बू की आवाज़ आई.

अब्बू- मैं सोने जा रहा हूँ अपने कमरे मे. मेरा दूध और पानी मेरे कमरे मे पहुचा देना.

हबीबा भाभी- जी अब्बू . मैं कुच्छ देर मे लेकर आती हूँ.

अब्बू उठकर अपने कमरे मे चले गये. मैं भी बर्तन साफ करके जाकर टीवी देखने लगी. थोड़ी देर बाद हबीबा भाभी किचन से निकली और एक बड़ा गिलास दूध लेकर अब्बू के कमरे की तरफ चली गयी. भाभी ने अब्बू को दूध देकर वापस आकर एक जग पानी अब्बू के कमरे मे रख आई और आकर मेरे पास बैठ गयी. थोड़ी देर बाद आयशा भाभी भी मेरे पास आकर बैठ गयी. हम तीनो आपस मे बाते करने लगे.

मैं- मैं सोच रही थी भाभी की क्यों ना कुच्छ स्पेशल होना चाहिए.

आयशा भाभी- कैसा स्पेशल और किस खुशी मे. मुझे कुच्छ समझ नही आ रहा है ननद रानी को

मैं- आपने फिर मुझे ननद कहा. जाओ मैं आपसे बात नही करती.

आयशा भाभी- अच्छा अच्छा माफ़ कर दो अब नही बोलती मैं. क्या स्पेशल करना है तुमको.

मैं- हा अब ठीक है. मैं सोच रही थी कल बाहर खाने और घूमने के लिए चलते हैं. बहुत दिन हो गये हैं बाहर घूमने गये हुए और खाना खाए हुए .

आयशा भाभी- हाँ ये बात तो सही है तुम्हारी शाजिया. कल अब्बू से बात करते हैं इसके बारे मे. अब्बू को भी साथ मे ले चलते हैं. ज़्यादा अच्छा लगेगा.

मैं- हाँ भाभी सही कह रही हैं आप. कल शाम को चलते हैं बाहर घूमने के साथ साथ कुच्छ शॉपिंग भी कर लेंगे हम सब अपने लिए.

आयशा भाभी- ठीक है फिर कल सुबह बात करते हैं अब्बू से.

अभी हम बात कर ही रहे थे की तभी मेरा मोबाइल बजने लगा. मैने फोन देखा तो राज शर्मा (मेरे बॉयफ्रणड) का फोन था. मैने फोन उठाया और उससे बात शुरू कर दी.

मैं- हेलो राज .

राज - हे शाजिया कैसी हो तुम.

राज - मैं भी ठीक ही हूँ. तुमसे कुच्छ बात करनी थी मुझे.

मैं- हाँ बोलो ना. क्या बात करनी है तुमको. मैं सुन रही हूँ.

राज - मुझे तुमसे कल मिलना है. मिलकर तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी है.

मैं- कल मैं नही आ सकती. किसी और दिन मिलते हैं ना.

राज - इट्स वेरी अर्जेंट. तुमको मिलना ही होगा. बहुत ज़रूरी बात करनी है तुमसे मुझे.

उसकी बात सुनकर मैं सोच मे पड़ गयी. क्योंकि कल दिन मे मेरा कहीं जाने का मूड नही था. मैने सोचा था की शाम को घूमने निकलुगी बाकी समय घर पर ही रहूंगी. मुझे कोई जवाब ना देते देख राज ने कहा.

राज - क्या हुआ शाजिया. तुमने कोई जवाब नही दिया. नही मिलना चाहती क्या मुझसे तुम. अगर अर्जेंट ना होता तो मैं तुम्हे इतना फोर्स ना करता. बाकी तुम्हारी मर्ज़ी.

मैं- नही राज ऐसी कोई बात नही है. ठीक है मैं कल आती हूँ तुम्हारे रूम पर.

राज - रूम पर नही शाजिया. तुम मुझे कल …………………… जगह पर मिलो.

मैं- ठीक है फिर कल सुबह निकलने से पहले तुम्हे फोन कर दूँगी. बाइ.

इतना कहकर मैने फोन रख दिया. ये सब बाते मैने भाभी के सामने ही की थी. फोन रखने के बाद भाभी ने मुझसे पूछा.

आयशा भाभी- क्या हुआ शाजिया. क्या कह रहा था राज तुमसे.

मैं- बात ये है भाभी की राज को मुझसे कुच्छ ज़रूरी बात करनी है. जिसके लिए वो मुझसे मिलना चाहता है. इसलिए कल मुझे उससे मिलने के लिए जाना पड़ेगा.

आयशा भाभी- क्या बात है शाजिया. इतनी बेकरारी की अर्जेंट बुलाया तुम्हे. लगता है की कल कुच्छ स्पेशल होने वाला है तुम दोनो के बीच.

मैं- क्या भाभी आप फिर से शुरू हो गयी. मैने आपसे कितनी बात कहा है की ऐसा कुच्छ भी नही है. लेकिन आप मानती ही नही हैं. और वैसे भी उसने मुझे कल ………………………. पर मिलने के लिए बुलाया है.
 
आयशा भाभी- तुम नाराज़ क्यों होती हो शाजिया. देखो शाजिया. मैं और हबीबा भले ही तुमसे खुलकर हँसी मज़ाक, छेड़ छाड़ करते हैं. एक दो गंदी भाषा भी बोल देते हैं. लेकिन हम दोनो तुमसे बहुत प्यार करते हैं. हम दोनो के मन मे तुम्हारे लिए कोई ग़लत ख़याल नही हैं. तुम हम दोनो की छोटी बहन जैसी हो. जैसी क्या बल्कि छोटी बहन हो. तुमसे हँसी मज़ाक ज़्यादा कर लेते हैं, लेकिन तुम्हारे लिए हम दोनो के दिल मे बहुत प्यार और अपनापन है शाजिया.

मैं- मुझे पता है भाभी. आप मुझे अपनी ननद नही बहन मानती हैं. मुझे ये भी पता है की आप दोनो मुझसे बहुत प्यार करती हैं, लेकिन जब आप मुझसे ऐसे पर्सनल चीज़े पूछती हैं तो पता नही मुझे क्या हो जाता है. सॉरी भाभी.

आयशा भाभी- चल अब ज़्यादा ड्रामा मत कर. और आगे का क्या सोचा है वो बता.

मैं- सोचना क्या है. जाना हैं उससे मिलने. आख़िर पता तो चले की किसलिए बुलाया है. इसमे मुझे आपकी मदद चाहिए.

आयशा भाभी- (हंसते हुए ) अब ये मत कहना की मैं भी तुम्हारे उस राज से मिलने के लिए चलू.

मैं- अरे भाभी. पहले मेरी पूरी बात तो सुन लो. मैं चाहती हूँ की ये बात अब्बू को नही पता चलनी चाहिए की मैं अपने बाय्फ्रेंड से मिलने के लिए गयी हुई हूँ.

आयशा भाभी- (मजाकिया अंदाज़ मे) इसका मतलब मेरा अंदाज़ा सही था. तुम दोनो कुच्छ कांड ज़रूर करोगे कल इसीलिए तुम उससे छुप छुप कर मिलने जा रही हो. मुझे ऐसा लग रहा है की कल तुम दोनो वो सब तो नही करने के लिए मिल रहे हो.

मैं- अरे यार भाभी. आप फिर से शुरू हो गयी. कभी तो सीरीयस हो जाया करिए भाभी. पहले मेरी पूरी बात सुन लो. कुच्छ भी बोलती रहती हो. मैं ये कह रही थी की पहले तो अब्बू दिन भर अपने अखाड़े मे रहते थे. तो मुझे जाने मे परेशानी नही होती थी, लेकिन उस दिन के बाद अब्बू घर मे रुकने भी लगे हैं और हो सकता है की अब अब्बू घर मे ही रहें. तो मुझे दिक्कत होगी जाने मे. क्योंकि मैं अब्बू से झूठ बोलकर नही जाना चाहती राज से मिलने. इसलिए मुझे आपकी मदद चाहिए.

आयशा भाभी- तो ये बात है. लेकिन तुम्हारे जाने के बाद अब्बू ने मुझसे पूछ लिया तो मैं क्या कहूँगी अब्बू से की शाजिया कहाँ गयी है.

मैं- अरे भाभी कुच्छ भी बोल दीजिएगा, लेकिन संभाल लीजिएगा आप.

आयशा भाभी- ठीक है फिर. अगर अब्बू मुझसे पूछेंगे तो मैं बोल दूँगी की अपने बाय्फ्रेंड के साथ कुच्छ करने गयी है आपकी लाडली बेटी.

मैं- क्या भाभी आप कभी सीरीयस नही हो सकती क्या. आप से तो बात करना ही बेकार है.

आयशा भाभी- (मज़ाक में) लो जी तुम तो नाराज़ हो गयी. तुम ही तो बोल रही हो की कुच्छ भी बोल कर मैं अब्बू को संभाल लूँ.

मैं- अरे यार आप रहने दीजिए मैं खुद ही मॅनेज कर लूँगी.

आयशा भाभी- लो जी कर लो बात. तुम फिर से नाराज़ हो गयी. अरे यार मैं मज़ाक कर रही थी. तुम मेरे मज़ाक को भी सीरियस्ली ले लेती हो शाजिया.

मैं- तो और क्या करू भाभी. आप ग़लत वक्त पर मज़ाक करती हैं. यहा मैं सीरीयस हूँ और आपको मज़ाक की पड़ी हुई है.

आयशा भाभी- देखो शाजिया. जिंदगी चार दिन की है. हर इंसान की बहुत सारी विश होती है की उसको ये करना है उसको वो करना है, लेकिन वो अपनी सारी विश पूरी नही कर पाता और दुखी रहने लगता है. तो ऐसे ही छोटे छोटे खुशी के पल, हँसी मज़ाक के पल उसके जीवन मे खुशिया लाते हैं. लेकिन ये उस इंसान के उपर है की वो इन खुशी के मौके को किस तरह से यूज करता है. मेरी भी कुच्छ ख्वाहिशे हैं. की मैं तुम्हारे भाई जान के साथ रहु. उनके साथ घूमू फिरू. लेकिन ये सब नही हो पा रहा है फिलहाल . और साल भर तो इसका कोई चान्स ही नही है. तो क्या मैं तुम्हारे भाई जान के गम मे डूब जाऊं. नही मैं ऐसा नही कर सकती. मुझे पता है की ये मेरे साथ ग़लत हुआ . लेकिन ये उनकी भी मज़बूरी है. आख़िर वो ये सब कर किसके लिए रहे हैं. मेरे लिए, हम सब के लिए. हमारे आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए. इसलिए मुझे उनसे शिकायत भी नही है. मैं उस कमी को तुमसे, हबीबासे और अब्बू से हँसी मज़ाक करके पूरा करती रहती हूँ. और सच मानो मुझे बहुत खुशी महसूस होती है ये सोचकर की मुझे टुमरे और हबीबा जैसी बहन और दोस्त मिले हैं और ससुर जी जैसे इतना केर करने वाले अब्बू मिले हैं. इसलिए मैं हमेशा हँसी मज़ाक, छेड़ छाड़ करती रहती हूँ. लेकिन तुम हो की नाराज़ हो जाती हो.

हबीबा भाभी- भाभी सही कह रही है. भाभी तो मज़ाक कर रही थी. इस घर मे तुम्ही तो हो जिससे हम दोनो हँसी मज़ाक कर सकते हैं, अगर तुम कहोगी तो आज से मज़ाक करना भी बंद कर देंगे हम.

दोनो भाभी की बात सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा खुस के लिए की मैं भाभियो से नाहक नाराज़ हो जाती हूँ और ये जानकार अच्छा भी लगा की दोनो मुझे कितना प्यार करती हैं. तो मैने भाभी से कहा

मैं- मुझे माफ़ कर दीजिए भाभी. मैं अब आपसे नाराज़ नही होंगी.

हबीबा भाभी- ठीक है फिर. जा मिल आ अपने बाय्फ्रेंड से.

मैं- ठीक है भाभी. मैं चाहती हूँ की अगर अब्बू पुच्छे मेरे बारे मे तो आप उन्हे बता दीजिएगा की मैं अपनी सहेली के घर गई हूँ.

हबीबा भाभी- ठीक है मेरी बुलबुल. तेरे लिए इतना झूठ तो अब्बू से बोल ही सकते हैं. जा शाजिया जा. जी ले अपनी ज़िंदगी. तुम भी क्या याद रखोगी की कितनी दिलदार भाभियो से पाला पड़ा था तुम्हारा.

मैं भाभी की बात सुनकर हँसने लगी. और उठकर कमरे की तरफ जाने लगी. कमरे मे जाते हुए मैने हबीबा भाभी की गांड पर एक हल्की सी थपकी लगा दी और मुस्कुराते हुए अपने कमरे मे भाग गयी.

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मैं भाभी की बात सुनकर हँसने लगी. और उठकर कमरे की तरफ जाने लगी. कमरे मे जाते हुए मैने हबीबा भाभी की गांड पर एक थप्पड़ लगा दिया और अपने कमरे मे भाग गयी. भाभी मेरे पीछे पीछे मुझे पकड़ने के लिए भागी, लेकिन तब तक मैं अपने कमरे मे जाकर अंदर से लॉक कर लिया. भाभी ने दरवाज़े के पास खड़े होकर मुझसे कहा.

हबीबा भाभी- ये तुमने अच्छा नही किया शाजिया. इसका बदला मैं ज़रूर लूँगी तुमसे.

इतना कहकर हबीबा भाभी अपने कमरे मे चली गयी. आयशा भाभी ने कुच्छ देर टीवी देखा फिर वो भी अपने कमरे मे चली गयी.

मैं अपने कमरे में आकर सो गयी. रात के लगभग 12 बजे मेरी नींद खुली क्योंकि मुझे बहुत ज़ोर की पेशाब आई थी. मैं हल्की नींद मे ही उठकर अपने कमरे से बाहर आई और बाथरूम मे जाकर पेशाब किया. और अपने कमरे मे जाने लगी. तभी मेरी नज़र अब्बू के कमरे की तरफ गयी तो मुझे दरवाज़े के नीचे से रोशनी आती हुई दिखी. मैने सोचा की शायद अब्बू ग़लती से लाइट बंद करना भूल गये हैं तो मैं जाकर लाइट बंद कर देती हूँ.

इसलिए मैं अब्बू के कमरे की तरफ चल पड़ी. मैने दरवाज़े के पास आकर दरवाज़े पर हाथ रखकर ज़ोर लगाया तो वो अंदर से बंद था. तो मैं अपने कमरे की तरफ जाने के लिए मूडी. अभी मैने वापसी का पहला कदम भी नही रखा था की एक सिसकी ने मेरे कदम रोक लिए. मैं वही पर रुक गई और सोचने लगी की ये सिसकी कहाँ से आ रही है. कुच्छ देर तक मुझे कोई आवाज़ सुनाई नही पड़ी तो मैने अपना वहम समझकर जैसे ही जाने को हुई, मुझे फिर से एक सिसकी सुनाई पड़ी. इस बार आवाज़ पहले की अपेक्षा ज़्यादा तेज़ थी. ये आवाज़ अब्बू के कमरे से आई थी.

मैं सोचने लगी की या आवाज़ अब्बू के कमरे से इतनी रात को आ रही है. मैं चुदवा चुदवा कर इतनी सेक्स के मामले मे इतनी समझदार तो हो ही गयी थी की मैं इस सिसकी का मतलब थोड़ा बहुत समझ रही थी, लेकिन तभी मेरे दिमाग़ मे आया की इतनी रात को अब्बू के कमरे मे औरत कहाँ से आ सकती है, क्योंकि अम्मी तो घर पर हैं ही नही. तो मैने सोचा की कहीं अब्बू की तबीयत तो खराब नही है. इसलिए मैने दरवाज़ा खटखटाना चाहा, लेकिन अब्बू तो सोते वक्त भले चंगे थे. इतनी जल्दी तबीयत कैसे खराब हो सकती है. ये सोचकर मैं रुक गयी और वैसे भी इतनी रात को अब्बू का कमरा खटखटाना मैने सही नही समझा. तो मैने अपने कमरे मे जाना सही समझा और मैने कमरे की तरफ जाने के लिए मूड गयी.

तभी मुझे अब्बू के कमरे की खिड़की हल्की सी खुली नज़र आई. तो मैं ये देखने के लिए खिड़की पर चली गयी की देखु तो सही ये सिसकी आ कहाँ से रही है. और यही शायद मेरी अपने जीवन की सबसे बड़ी ग़लती थी. या यूँ कहिए की इन्सेस्ट की तरफ जाने का ये एक रास्ता था. जिसने बाद मे मुझे और मेरी दोनो भाभियों को इन्सेस्ट की दुनिया की सैर करवाई. तो मैं खिड़की के पास पहुच गयी और जैसे ही मैने खिड़की से झाँक कर अंदर देखा. मेरी आँखे फटी की फटी रह गयी, क्योंकि अंदर का नज़ारा ही कुच्छ ऐसा था.

अंदर अब्बू एकदम नंगे अपने बिस्तर पर लेटे थे. उनके एक हाथ मे मोबाइल था. जिसमे वो कुच्छ देख रहे थे, शायद पॉर्न वीडियो. और एक हाथ अपने लंड पर था. जैसे ही मेरी नज़र अब्बू के लंड पर पड़ी. मेरी आँखे एकदम से बड़ी हो गयी. मेरी साँसे तेज़ी से चलने लगी, मेरा गला सुंखने लगा. कारण था अब्बू का लगभग 9 इंच लंबा और 3 इंच मोटा उनका विकराल लंड. अब्बू मोबाइल मे कुच्छ देखते हुए अपने लंड को सहला रहे थे. कभी कभी ज़्यादा एकसाइटमेंटट मे अब्बू अपना हाथ ज़ोर से अपने लंड पर रगड़ते थे, जिससे उनके मुँह से सिसकी निकल जाती थी. मैं तो बस आँखे फाडे अब्बू का लंड देख रही थी. ये मेरी जिंदगी का दूसरा लंड था जिसे मैं देख रही थी. इसके पहले मैने सिर्फ़ अपने बाय्फ्रेंड का ही लंड देखा था.

लेकिन मेरे बाय्फ्रेंड के लंड और अब्बू के लंड मे एक बहुत अंतर था, जहा मेरे बाय्फ्रेंड का लंड लगभर 6.5 ये 7 इंच लंबा और 2 इंच मोटा था. वही मेरे अब्बू का लंड 9 इंच लंबा और 3 इंच मोटा था. जहा मेरे बाय्फ्रेंड का लंड गोरा था, वही अब्बू का लंड काला था. ऐसे नही था की मेरे अब्बू काले थे. मेरे अब्बू गहुआ रंग के थे, लेकिन अब्बू का लंड काला था, किसी कोबरा नाग की तरह. अब्बू का लंड देखते के बाद मैं वही पर जड़वत हो गयी. मुझे तो भरोसा ही नही हो रहा था की लंड इतना बड़ा भी हो सकता है. कुच्छ देर बाद मुझे ख्याल आया की मैं कहा हूँ और क्या कर रही हूँ. मैं तुरंत वहां से भागकर रसोई मे गयी और गिलास मे पानी लेकर पीने लगी.

मेरा गला इतना ज़्यादा सुख गया था की मैने कब 3 गिलास पानी पी डाला मुझे पता ही नही चला.मैं अभी भी हाँफ रही थी और अपनी बेतरतीब साँसों को दुरुस्त करने की कोशिश कर रही थी. तभी मुझे अब्बू की आवाज़ सुनाई पड़ी जिसे सुनकर मैं चौक गई और अब्बू की तरफ देखने लगी. शायद वो किचन मे हुई खट -पट सुनकर उठकर आए थे.

अब्बू- शाजिया तुम. इतनी रात को यहा क्या कर रही हो. सब ख़ैरियत तो है ना.

मैं- (अपने आपको सयमित कर) हाँ अब्बू. वो बहुत ज़ोर की प्यास लगी थी. आज पानी रखना भूल गयी थी तो सोचा किचन मे ही जाकर पानी पी लूँ, लेकिन अभी तक आप सोए नही. नींद नही आ रही है क्या अब्बू.

अब्बू- नही बेटी. मैं तो सो गया था. कुच्छ खट -पट की आवाज़ सुनाई पड़ी तो मैने सोचा देखु तो सही. ये आवाज़ कहाँ से आ रही है इसलिए चला आया.

मैं- ठीक है अब्बू अब मैं चलती हूँ नींद लग रही है.

अब्बू के सफेद झूठ से मैं मंद मंद मुस्कुराने लगी. मैं अपने कमरे की तरफ जाने लगी. जाते जाते मैने एक नज़र अब्बू लोवर पर भी डाली जिसमे से अभी भी लंड का उठान दिखाई पड़ रहा था. अब इतना बड़ा लंड है अब्बू का तो उसे बैठने मे भी समय तो लगेगा. मैं यही सब मन मे सोचते हुए अपने कमरे मे चली गयी. कमरे मे आकर मैने अपने दिमाग़ को झटका दिया की मैं क्या ये फालतू की बाते सोचने लगी. मैं अपने बिस्तर पर लेट गयी और सोने की कोशिश करने लगी. लेकिन मुझे नींद बिल्कुल भी नही आ रही थी.

कहना ग़लत ना होगा की अब्बू के मस्त लंड ने मेरी नींद ही चुरा ली थी. ऐसा नही था की मेरे मन मे उसी समय अब्बू को लेकर कोई ग़लत भावना ने जन्म ले लिया था. अभी मेरे मन मे अब्बू को लेकर इस तरह का कोई ख़याल नही आया था. ये एक जनरल ख़याल था मेरे मन को जो उस चीज़ को देखकर आता है जिसे आपने पहली बार देखी हो. मैने लंड पहली बार नही देखा था, लेकिन इतना बड़ा लंड पहली बार देखा था. मैं जब भी आँख बंद करती मेरी दिमाग़ मे या यूँ कहिए मेरी बंद आँखों के सामने अब्बू का विकराल लंड घूमने लगता था.

मैं सोचने लगी की अब्बू मूठ क्यों मार रहे थे. शायद उन्हे अम्मी की याद आ रही हो, लेकिन इस उमर मे भी क्या अब्बू को अम्मी की ज़रूरत पड़ती होगी. फिर मेरे मन मे ख़याल आया की मैं क्या सोच रही हूँ. तो मैने अपने सिर पर चपत लगाते हुए खुद से कहा

मैं- छिह्ह. ये मैं क्या सोचने लगी. वो मेरे अब्बू और अम्मी हैं. मुझे उनके बारे मे ऐसी गंदी बाते नही सोचनी चाहिए. हाँ अब मैं इस बारे मे नही सोचूँगी. ये सब मेरी ही ग़लती है. मुझे अब्बू के कमरे मे देखना ही नही चाहिए था. शाजिया ये ग़लत है तू जो सोच रही है वो ग़लत है. ग़लत है. ग़लत है.

इतना कहकर मैने अपने दिमाग़ को झटका दिया और सोने की कोशिश करने लगी, थोड़ी देर बाद कोशिश करते करते मुझे नींद आ गयी और मैं नींद की वादियों में गोते लगाने लगी.
 
सुबह हो जाने के बाद भी मेरी आँख आज नही खुली. लगभग 8 बजे हबीबा भाभी मेरे कमरे मे आई और मुझे उठाने लगी. परंतु मैं घोड़े बेच कर सो रही थी. भाभी के बार बार बुलाने पर भी मैं नही उठी तो हबीबा भाभी मेरे कमरे से बाहर निकल गयी. उन्होने जाकर किचन मे चाय बनाई और दो कप मे चाय लेकर बाहर आई. एक कप उन्होने खुद के लिए और एक कप आयशा भाभी के लिए उन्होने बनाया. दोनो भाभी ने चाय पीते हुए बात चीत करना शुरू कर दिया.

आयशा भाभी- आज शाजिया नही उठी क्या अभी तक.

हबीबा भाभी- नही भाभी. अभी तक सो रही है. मैने कितने बार उसे आवाज़ दी, लेकिन लगता है वो घोड़े बेच कर सो रही है. पता नही क्या हो गया है इसको, 8.30 हो गये हैं और महारानी की आँख ही नही खुल रही है.

आयशा भाभी- अरे रात भर सपने देखे होंगे इसने अपने बाय्फ्रेंड के साथ मस्ती के, इसलिए अभी तक उसी मस्ती मे खोई हुई होगी. थोड़ी देर और सोने दो. फिर दोनो चलते हैं उसे जगाने अपनी स्टाइल से.

इसके बाद दोनो भाभी घर की साफ सफाई करने लगे. अब्बू सुबह ही अपने अखाड़े पर चले गये थे. साफ सफाई करने के बाद दोनो भाभी मेरे कमरे मे आई और मुझे उठाने लगी.

आयशा भाभी- ओ ननद रानी महारानी. अब उठ भी जाओ. किसके हसीन ख्वाबो मे खोई हुई हो.

लेकिन मैं थी की उठने का नाम ही नही ले रही थी. तो आयशा भाभी मेरी लेफ्ट साइड बैठ गयी और हबीबा भाभी मेरी राइट साइड बैठ गयी और दोनो ने झुककर मेरे गालो को दोनो तरफ से अपने मुँह मे भर लिया और अपना एक एक हाथ मेरी चुचियो पर रख दिया. फिर दोनो भाभी ने आँखो ही आँखो मे इशारा करते हुए मेरे गालो पर अपने दाँत गढ़ा दिया और मेरी दोनो चुचियो को ज़ोर से दबा दिया. मैं उस समय नींद मे ही थी, लेकिन दर्द के कारण मेरे मुँह से चीख निकल गयी और मैं चिल्लाते हुए उठकर बैठ गयी.

मैं- आआआआआआआहह उूुुुुुुुुउऊहह अम्मी. मर गाऐयइ मैंन्न्न्.

मैं बिस्तर पर उठकर बैठ गयी और एक हाथ से अपनी चुचियो को और एक हाथ से अपने गालो को सहलाने लगी. अब तक मेरी आँख एकदम खुल चुकी थी. मैने जब अपनी दोनो तरफ देखा तो मेरी दोनो भाभी मंद मंद मुस्कुरा रही थी. मैने उन दोनो से गुस्से मे कहा.

मैं- ये कौन सा तरीका है उठाने का. ओह मम्मय्यी. बहुत दर्द हो रहा है. निशान बन गये हैं मेरे गालो पर. अब मैं कैसे जाउन्गी राज से मिलने. अगर उसने मेरे गाल पर निशान देख कर पूछ लिया तो मैं क्या जवाब दूँगी उसे, और अगर मैने उसे बता दिया की ये मेरी भाभी के दाँतों के निशान हैं तो वो मुझे लेज़्बीयन समझेगा. अब मैं क्या करूँ.

हबीबा भाभी- अरे बस बस बस. ब्रेक लगा अपनी रफ़्तार को, अभी बिस्तर से उठी भी नही और बाय्फ्रेंड की बाते शुरू हो गयी. हम कब से तुम्हे आवाज़ दे रहे हैं, लेकिन तुम हो की घोड़े बेच कर सो रही हो. पता नहीं किसके ख़यालो मे खोई हुई हो. जब तुम नही उठी तो हमने अपने तरीके से उठाया तुमको.

आयशा भाभी- अरे किसके ख़यालो मे क्या. अपने राज के ख़यालो मे खोई होगी. उसी के सपने देख रही होगी. और सपने मे पता नही उसके साथ क्या क्या किया होगा.

आयशा भाभी ने क्या क्या पर बहुत ज़ोर दिया. मैं उनकी बातो का मतलब समझकर उनसे कहा.

मैं- आप सुबह सुबह फिर से शुरू हो गयी. आपको समझ नही आता की अभी मैं सो कर उठी हूँ. आप हमेशा मेरे और राज के पीछे क्यों पड़ी रहती हैं.

आयशा भाभी- मैं कहा तुम्हारे और राज के पीछे पड़ी हुई हूँ. राज तुम्हारे पीछे पड़ा हुआ है और उसका नतीज़ा हमारे सामने है.

इतना कहकर भाभी ने मेरी गांड पर अपना हाथ रखकर सहलाने लगी और हंसते हुए कहा.

आयशा भाभी- अरे ननद रानी, तुम्हारी इस सॉफ्ट सॉफ्ट और गद्देदार पिच्छवाड़े का राज क्या है. कही जो मैं सोच रही हूँ वो सही तो नही है.

मैं- (भाभी का हाथ अपनी गांड से हटाकर) आप ना सच मे बहुत गंदी होती जा रही हैं. आपके दिमाग़ मे हमेशा गंदे ख़याल ही रहते हैं और ये ख़याल भी गंदा ही होगा. और वैसे भी जो आप सोच रही हैं वो बिल्कुल भी नही है.

आयशा भाभी- अच्छा ठीक है मैं गंदी ही सही. चलो अब उठो और फ्रेश हो जाओ . बहुत देर हो गई है. खाना भी बनाना है अभी. मैं जा रही हूँ तुम दोबारा से मत सो जाना. समझी.

इतना कहकर आयशा भाभी मेरे कमरे से बाहर चली गयी. उनके पीछे पीछे हबीबा भाभी भी चली गयी.

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आयशा भाभी- अच्छा ठीक है मैं गंदी ही सही. चलो अब उठो और फ्रेश हो जाओ. बहुत देर हो गई है. खाना भी बनाना है अभी. मैं जा रही हूँ तुम दोबारा से मत सो जाना. समझी.

इतना कहकर आयशा भाभी मेरे कमरे से बाहर चली गयी. उनके पीछे पीछे हबीबा भाभी भी चली गयी. मैं भी जल्दी से उठी और बाथरूम मे घुस गयी. थोड़ी देर मे मैं नाहकार बाहर निकली और अपने कमरे मे जाकर कपड़े बदल कर किचन मे आ गयी. मैने अपने लिए चाय गरम की और कप मे डालकर हाल मे जाकर सोफे पर बैठकर पीने लगी. थोड़ी देर बाद आयशा भाभी आकर मेरे पास बैठ गयी और बोली.

आयशा भाभी- तो कितने बजे जाना है तुमके राज से मिलने के लिए.

मैं- बस खाना खाकर निकलती हूँ मैं.

आयशा भाभी- चलो फिर जल्दी से चाय ख़त्म करो और मेरी किचन मे मदद करो थोड़ा .

इतना कहकर आयशा भाभी किचन मे चली गयी. मैने जल्दी से चाय ख़तम की और आयशा भाभी के पास किचन मे चली गयी. मैने और भाभी ने मिलकर खाना बनाया और मैने जल्दी से के थाली खाना निकाला और हाल मे आकर बैठ गई और खाना खाने लगी. तभी हबीबा भाभी बाथरूम से निकली उन्होने स्नान कर लिया था और अपने शरीर पर तौलिया लपेटा हुआ था. जो उनकी जाँघों के थोड़ा नीचे तक था. उपर से भाभी की चुचिया आधी दिख रही थी. मैने भाभी को देखते हुए कहा.

मैं- वाह भाभी . क्या लग रही हो एकदम टंच माल . आपको देखकर तो मेरे मुँह मे पानी आ रहा है.

हबीबा भाभी- तुझे इससे क्या करना है. ये टंच माल जीशानके लिए है. तू अपनी लार टपकाना बंद कर और चुपचाप खाना खा. बड़ी आई माल बोलने वाली.

मैं- सच कह रही हूँ भाभी. आप सच मे एक जीती जागती कयामत हो. ऐसे ही नही भाई जान पागल हो गये थे आपको देखते ही और तुरंत हाँ कर दी थी शादी के लिए.

हबीबा भाभी- (मस्ती के मूड मे) तो तू कहना चाहती है की मैं उन्होने मुझे अर्धनग्न देखकर शादी के लिए हाँ किया था.

मैं- अब मुझे क्या पता. जब आप दोनो अकेले मे कुच्छ देर के लिए मिले थे तो हो सकता है अपने भाई जान को अपना ऐसा जलवा दिखा दिया हो. जिससे मेरे भाई जान बावरे हो गये थे.

हबीबा भाभी- चुप कर हर समय मस्ती सूझती रहती है तुझे. चुपचाप अपना खाना खा.

इतना कहकर भाभी शरमाते हुए मेरे पास से गुजर कर अपने रूम मे जाने लगी. तभी खाना खाते हुए मुझे एक शरारत सूझी. जैसे ही भाभी मेरे पास से गुज़री. मैने उनके जिस्म पर लपेटी हुई टवल को पकड़कर खीच दिया. जिससे उनकी टवल ज़मीन पर गिर पड़ी. मेरी ऐसा करने से भाभी चौंक गयी और जल्दी से अपनी तौलिया उठाकर अपने जिस्म पर लपेटा और मुझे घूरती हुई बोली.

हबीबा भाभी- शाजिया ये क्या बदतमीज़ी है. अगर किसी ने देख लिया मुझे ऐसे तो क्या होगा.

मैं- (हंसते हुए ) तो क्या होगा. उसका भी दिन बन जाएगा. वो अपने आप पर गर्व महसूस करेगा की उसने इतनी सुंदर हसीना को बिना कपड़ों के देखा है.

हबीबा भाभी- तू ना किसी दिन मुझसे पिटेगी. हमेशा उल्टी सीधी हरकते करती रहती है.

इतना कहकर हबीबा भाभी अपने कमरे मे चली गयी. मैने भी जल्दी जल्दी अपना खाना फिनिश किया और तैयार होने अपने कमरे मे चली गयी. थोड़ी देर बाद मैं तैयार होकर बाहर आई तो हाल मे दोनो भाभी बैठी हुई कुच्छ बाते कर रही थी. मुझे देखते ही आयशा भाभी ने कहा.

आयशा भाभी- दंम हॉट. क्या लग रही हो शाजिया. आज कितनो की जान निकालने वाली है तुम्हारे इस कयामति हुश्न को देखकर. लगता है आज रास्ते मे मार काट ज़रूर होगी.

मैने एक जींस और टॉप पहना हुआ था. टॉप मेरे जिस्म पर एकदम कसा हुआ था. जिससे मेरे जिस्म का इतिहास और भूगोल सभी साफ साफ नज़र आ रहा था. मेरी हाहकारी चुचिया टी-शर्ट को फाड़ कर बाहर आने को आतुर थी. मेरी जींस मे मेरी बड़ी गांड ऐसे फंसी थी जैसे उसे वहां पर ज़बरदस्ती फँसाया गया हो. मैं अपने रूप को देखकर एक बार खुद ही शर्मा गयी.

हबीबा भाभी- ओये होये. देखो तो भाभी कैसे शर्मा रही है. अभी कुच्छ देर बाद बाय्फ्रेंड के साथ रोमॅन्स करेगी तो तनिक भी शरम नही आएगी इसको.

मैं-क्या भाभी आप भी ना पता नही क्या क्या बोलती रहती हैं. अच्छा अब मैं चलती हूँ. अगर अब्बू पूछे तो आप दोनो संभाल लीजिएगा.

आयशा भाभी- ठीक है जाओ, लेकिन आते समय लंगड़ा ते हुए मत आना नही तो अब्बू को जवाब तुम ही देना.

इतना कहकर दोनो भाभी हँसने लगी. उनकी बात सुनकर मैं भी मुस्कुराने लगी और भाभी से बोली.

मैं- आप दोनो कुत्ते की दुम हो भाभी. कभी नही सुधर सकती आप दोनो.

इतना कहकर मैं घर से बाहर चली गयी. मैने अपनी स्कूटी निकाली और उसे स्टार्ट करके अपने बाय्फ्रेंड से मिलने के लिए चल पड़ी, कुच्छ देर बाद मैं राज की बताई हुई जगह के सामने थी. राज मुझे वही खड़ा मिला. मैने जाकर राज को गले लगाया. उसके बाद राज मुझे लिवाकर कही जाने लगा. तो मैने उससे पुच्छा.

मैं- राज हम लोग कहाँ जा रहे हैं अभी.

राज - मैने अपना कमरा छोड़ दिया है. इसलिए मैं अपने दोस्त के कमरे पर जा रहा हूँ.

मैं- लेकिन तुमने अपना कमरा क्यों छोड़ा और तुमने इसके बारे मे मुझे बताया क्यों नही.

राज - तुमसे बहुत सी बाते बतानी है, इसीलिए तो मैने तुमको बुलाया है, कमरे पर पहूचकर बताता हूँ.

उसके बाद राज मुझे लिवाकर अपने दोस्त के कमरे पर चला गया. कमरे पर पहूचकर उसने दरवाज़ा अंदर से बंद किया और मुझे बिस्तर पर बैठाया . मैं भी बिस्तर पर बैठ गयी
 
इतना कहकर मैं घर से बाहर चली गयी. मैने अपनी स्कूटी निकाली और उसे स्टार्ट करके अपने बाय्फ्रेंड से मिलने के लिए चल पड़ी, कुच्छ देर बाद मैं राज की बताई हुई जगह के सामने थी. राज मुझे वही खड़ा मिला. मैने जाकर राज को गले लगाया. उसके बाद राज मुझे लिवाकर कही जाने लगा. तो मैने उससे पुच्छा.

मैं- राज हम लोग कहाँ जा रहे हैं अभी.

राज - मैने अपना कमरा छोड़ दिया है. इसलिए मैं अपने दोस्त के कमरे पर जा रहा हूँ.

मैं- लेकिन तुमने अपना कमरा क्यों छोड़ा और तुमने इसके बारे मे मुझे बताया क्यों नही.

राज - तुमसे बहुत सी बाते बतानी है, इसीलिए तो मैने तुमको बुलाया है, कमरे पर पहूचकर बताता हूँ.

उसके बाद राज मुझे लिवाकर अपने दोस्त के कमरे पर चला गया. कमरे पर पहूचकर उसने दरवाज़ा अंदर से बंद किया और मुझे बिस्तर पर बैठाया . मैं भी बिस्तर पर बैठ गयी और उससे पूछा.

मैं- हाँ तो अब बताओ की माजरा क्या है. ऐसी क्या बात हो गयी जो तुम्हे कमरा छोड़ने की ज़रूरत पड़ गयी.

राज - तुम्हे तो पता है की मैं पिच्छली कई सालो से नौकरी की तैयारी कर रहा हूँ. 3-4 बार एग्ज़ॅम भी क्रॅक किया, लेकिन उसके बाद भी सेलेक्षन नही हुआ . और तुम्हे मेरी फाइनान्षियल कंडीशन के बारे मे भी पता ही है. तो इस संबंध मे पापा को कल सुबह फोन आया था कमरा खाली करने के लिए.

मैं- तो क्या तुम अब अपने दोस्त के साथ यहाँ रहोगे.

राज - पहले मेरी पूरी बात तो सुन लो. पापा का कल सुबह फोन आया था. मेरे जीजा जी जो सूरत मे रहते हैं. उन्होने अपनी फॅक्टरी मे मेरे लिए कोई काम ढूँढा है. और मुझे वहाँ बुलाया है. और पापा ने मुझे जीजा जी के पास सूरत भेजने का फ़ैसला कर लिया है. इसलिए मैं 3 दिन बाद सूरत जा रहा हूँ.

मैं- अरे ऐसे कैसे तुम मेरे साथ ऐसा कर सकते हो. तुम्हारे पापा ने तुम्हे सूरत भेजने के लिए कहा और तुमने हाँ भी कर दी. एक बार भी मुझसे नही पूछा और ना ही मुझे बताया. नही तुम मुझे छोड़कर सूरत नही जाओगे. तुम यहीं रहो. तुम्हारे रूम का भाड़ा मैं दे दिया करूँगी.

राज - ये तुम क्या कह रही हू यार. मैं तुमसे पैसे लूँ इतना स्वार्थी नही हूँ मैं. तुमने इतना कह दिया वही मेरे लिए बहुत है, लेकिन तुम मेरे पापा के बारे मे सोचो, जिसका बेटा पढ़ाई के बाद से दर दर की ठोकरे खा रहा है लेकिन अभी तक उसे नौकरी नही मिली तो क्या करते मेरे पापा. और वैसे भी. मैं पढ़ाई मे बहुत ज़्यादा होशियार नही हूँ. मुझे भी लगता है की पापा का फ़ैसला बिल्कुल सही है. आख़िर कब तक मैं उनके उपर बोझ बनकर रहूँगा. उनका नही तो कम से कम मैं अपना खर्चा तो उठाऊ. इसलिए मैने भी सूरत जाने का फ़ैसला कर लिया है. मैं वहां भी काम के साथ जो समय बचेगा. पढ़ाई करूँगा. आगे भगवान की मर्ज़ी.

मुझे भी राज की बात सही लगी, आख़िर एक बाप कब तक अपने बेरोज़गार बेटे का बोझ अपने कंधे पर ढोता रहेगा, लेकिन राज के जाने के बाद मेरी सेक्स की ज़रूरत को कौन शांत करेगा. अब मेरे दिमाग़ मे या बात चलने लगी. मैं अपनी ही सोच मे डूब गयी. तभी राज की आवाज़ मुझे सुनाई पड़ी.

राज - क्या हुआ शाजिया, तुम नाराज़ हो मुझसे. जो मैं तुम्हे छोड़कर जा रहा हूँ.

मैं- नही राज , सूरत जाना तुम्हारी मजबूरी है. मैं तुमसे बिल्कुल भी नाराज़ नही हूँ, लेकिन अगर तुम चले गये तो मेरा क्या होगा. तुम्हे पता है की मुझे हफ्ते भर मे कम से कम एक बार चुदाई करवाने की आदत पड़ चुकी है. तुम्हारे जाने के बाद मेरा क्या होगा फिर.

राज - जाना तो मैं भी नही चाहता, लेकिन मेरी मजबूरी है. इसलिए जाना पड़ेगा, जाने से पहले एक सलाह दूँगा तुमको. तुम अपने आप पर कंट्रोल करना सीखो, मैने तुमसे पहले भी कई बार इसके बारे मे कहा है. आज फिर कह रहा हूँ. तुम अपने उपर कंट्रोल करके रखो, और जितनी जल्दी हो सके शादी कर लो. यही तुम्हारे लिए ठीक रहेगा.

मैं- चलो ठीक है बाबा तुम्हारी बात को ध्यान मे रखूँगी, लेकिन अभी मैं इतनी दूर से आई हूँ और तुम जा भी रहे हो. तो जाने से पहले एक बार मेरी प्यास बुझा कर जाओ.

ये भी कोई कहने की बात है, इतना कहकर राज ने मुझे अपनी बाहों मे भर लिया. मैने भी उसे अपनी बाहों मे कसकर लप्पेट लिया. थोड़ी देर तक उसकी बाहों मे रहने का बाद राज ने अपनी पकड़ ढीली की और मुझे आज़ाद किया और अपने दोनो हाथों मे मेरा चेहरा पकड़कर अपना होंठ मेरे होंठो पर झुकाते हुए बोला.

मैं- सच मे शाजिया तुम बहुत खूबसूरत हो. मैं तुम्हे कभी भूल नही पाउँगा .

इतना कहकर उसने अपना होंठ मेरे होंठो पर रख दिया और किस करने लगा. मैने भी अपनी बाहें उसकी गर्दन मे लप्पेट दी और किस करने मे राज का साथ देने लगी.

किस करते हुए राज अपनी जीभ निकालकर मेरे होंठो को भी चाट रहा था. मैने भी अपने होंठ खोल दिया तो राज ने अपनी जीभ मेरे मुँह मे घुसेड दी और मेरे मुँह मे अपनी जीभ चलाने लगा. मैं भी उसकी जीभ से अपनी जीभ लड़ाने लगी. राज ने एक हाथ मेरे चेहरे से हटाया और मेरी एक चुचि पर रख दिया और हल्के हल्के दबाने लगा.

कुच्छ देर ऐसा करने के बाद राज ने अपने दूसरे हाथ से मेरे बालो को मुट्ही मे भर लिया और फोर्स्फुली मेरे होंठो को चूमने लगा चूसने लगा. मैं भी पूरी तल्लीनता से राज का साथ दे रही थी. नीचे वो मेरी चुचियों का मर्दन करने लगा. लगभग 5 मिनट बाद हमारी सांस उखड़ने लगी तो हम दोनो ने एक दूसरे के होंठ छोड़े. होंठ छोड़ने के बाद राज ने मेरी टी-शर्ट उतारने की कोशिश की तो मैने टी-शर्ट उतारकर साइड मे रख दी. अब मेरी चुचिया ब्रा मे राज के सामने थी. राज ने मेरी चुचियो को देखते हुए कहा.

राज - क्या बात है यार. तुम्हारी चुचिया तो दिन-बा-दिन बड़ी होती जा रही हैं. क्या राज़ है इसके बड़े होने का.

मैं- ये सब तुम्हारा ही किया धरा है. कल भाभी भी बोल रही थी की तुम्हारा बाय्फ्रेंड बहुत अच्छे से, रगड़ रगड़ कर तुम्हारी चुदाई करता होगा तभी तो तुम्हारी चुचिया और गांड इतनी बड़ी हो गयी हैं.

राज - क्या बात है यार. मेरे इतने चर्चे की तुम्हारी भाभी भी मेरी दीवानी हो गयी हैं.

मैं(आँख दिखाते हुए )- अब ज़्यादा बकवास मत करो और जल्दी से मेरी प्यास बुझाओ.

फिर राज ने मुझे खड़ा किया और मेरी जींस भी उतार कर बिस्तर पर रख दी. और मेरे पैरे से चूमना शुरू कर दिया. राज मेरे पैरो को चूमते हुए उपर की तरफ आने लगा. मैं अपने हाथ उसके सिर पर रखकर सहलाने लगी. राज चूमते हुए मेरी चूत तक आया और अपना होंठ मेरी चूत पर रख दिया. मेरे पैर जुड़े हुए थे उसके बावजूद भी उसकी सांसो की गर्मी मुझे अपनी चूत पर साफ महसूस हुई. मेरा बदन थरथरा गया

फिर राज मेरे पेट को चूमते हुए दोनो हाथों से मेरी चुचि को दबाने लगा. पेट को चूमते हुए वो मेरी चुचियो तक आ गया और मेरी पहाड़ जैसी चुचियो की गहरी घाटी मे अपना मुँह डालकर चूमने लगा.
 
थोड़ी देर चूमने के बाद उसने अपने हाथ पीछे ले जाकर मेरी चुचियो को ब्रा की क़ैद से आज़ाद कर दिया. वो मेरी चुचियो मे बारी बारी से मुँह मे भर कर चूसने लगा. मेरा शरीर गरम हो गया था. अब मुझे चुदाई की ज़रूरत थी. मैने राज का सिर सहलाते हुए कहा.

मैं- बस राज अब और नही. अब चूमना चाटना बाद मे पहले एक बार मुझे चोदकर मेरी प्यास बुझाओ उसके बाद जी भर कर मेरी बदन के साथ खेलना.

राज . तो चलो पहले मेरे लंड को चुस्कर गीला करो. उसके बाद तुम्हारी चूत चोदता हूँ.

मैने राज को बिस्तर पर धक्का देकर लिटा दिया और उसकी जींस को खोलकर उतार दिया. उसका लंड अंडरवेयर मे खड़ा हो गया था. मैने झटके से उसका अंडरवेयर भी उतार दिया. जिसे ही मेरी नज़र उसके लंड पर पड़ी. पता नही कहाँ से कल रात वाला दृश्य मेरी आँखों के सामने नाचने लगा. मैं कल अब्बू के नंगे लंड और आज राज के नंगे लंड की तुलना करने लगी. कहाँ अब्बू का 9 इंच के लगभग बड़ा लंड और कहाँ राज का 6 इंच लंबा लंड. दोनों मे ज़मीन आसमान का अंतर था. मैं अपनी ही सोच मे गुम थी. तभी राज ने मुझे आवाज़ दी.

राज - क्या हुआ शाजिया. किस सोच मे डूबी हुई हो.

मैं- कुच्छ नही. बस ऐसे ही.

उसके बाद मैने झुककर अपनी जीभ निकाली और उसके लंड पर फिराने लगी. तभी मेरा फोन बजने लगा. मैं चुदासी थी उस समय तो मैने उसे इग्नोर कर दिया और अपना मुँह खोलकर राज का लंड अपने मुँह मे भर लिया. फोन बजना बंद होने के बाद फिर से फोन बजने लगा.

तो मैने राज का लंड मुँह से निकाला और अपने हॅंड बॅग मे से फोन निकालकर देखा तो फोन हबीबा भाभी का था. मुझे उनपर बहुत गुस्सा आया. मुझे लगा की उन्होने मुझे परेशान करने के लिए फोन किया है तो मैने फोन उठाते ही भाभी को खरी खोटी सुनानी शुरू कर दी.

मैं- क्या भाभी. क्यो डिस्टर्ब कर रही हो मुझे. मैं शाम तक घर आ जाउन्गी.

उसके बाद भाभी ने उधर से जो कहा तो मेरे हाथ फोन छूट कर नीचे गिरते गिरते बचा.

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मैने हॅंडबॅग से फोन निकालकर देखा तो फोन हबीबा भाभी का था. मुझे उनपर बहुत गुस्सा आया. मुझे लगा की उन्होने मुझे परेशान करने के लिए फोन किया है तो मैने फोन उठाते ही भाभी को खरी खोटी सुनानी शुरू कर दी.

मैं- क्या भाभी. क्यो डिस्टर्ब कर रही हो मुझे. मैं शाम तक घर आ जाउन्गी.

हबीबा भाभी- शाजिया, जितनी जल्दी हो सके तू घर आ जा. अब्बू सीढ़ियो से गिर पड़े हैं उन्हे बहुत चोट आई है.

मैं- क्या. कब. कैसे. कहाँ. हाँ मैं तुरंत घर पहुच रही हूँ.

मैने तुरंत फोन काटकर कपड़े उठाकर पहन ने लगी. मेरा सारा नशा और हवस इस खबर से मिट चुकी थी. राज ने मुझसे पूछा.

राज - क्या हुआ शाजिया. किसका फोन था और तुम कहाँ जा रही हो. अभी तो हमने शुरू किया है. और तुम बीच मे ही छोड़कर जा रही हो.

मैं- राज अब्बू सीढ़ियों से गिर गये हैं उन्हे बहुत चोट आई है. मुझे घर जाना होगा.

मेरी बात सुनकर राज भी उठाकर बैठ गया और अपने कपड़े पहन -ने लगा. उसने जल्दी से अपनी अंडरवेयर और जीन्स पहनी. तब तक मैं भी अपने कपड़े पहन चुकी थी. मैं और राज तुरंत कमरे से बाहर आए.

राज ने मुझे मेरी स्कूटी स्टार्ट कर के दी. मैं स्कूटी पर बैठकर चलने को हुई तो राज ने मुझे गले लगाते हुए कहा.

राज - मैं तुमको बहुत मिस करूँगा शाजिया. तुम संभाल कर जाना और अंकल जी की तबीयत के बारे मे मुझे भी बताती रहना. चलो जाओ अब. वहां तुम्हारी ज़रूरत है.

राज से मैं विदा लेकर अपने घर की तरफ निकल गयी. कुच्छ ही देर मे मैं घर पहुँच गयी. मैने अपनी स्कूटी खड़ी की और दौड़कर घर के अंदर चली गयी. घर मे जाकर देखा तो अब्बू अपने कमरे मे बिस्तर पर लेटे हुए थे. उनके पास दोनो भाभी बैठी हुई थी. मैं दौड़कर अब्बू के गले लग गयी. मेरी आँखों मे हल्के आँसू आ गये. अब्बू ने मुझे अपने से अलग किया और मेरी आँखो मे आँसू देखकर कहने लगे.

अब्बू- अरे शाजिया बेटी. तुम रो रही हो.

मैं- आप कैसे हैं अब्बू, ये सब कैसे हो गया. आप अपना ख्याल बिल्कुल भी नही रखते. मेरे ना रहने पर दोनो भाभी ने भी आपका ख्याल नही रखा. कैसे हुआ ये सब अब्बू.

अब्बू- अरे कुच्छ नही हुआ मुझे बस थोड़ी सी चोट लगी है पैर मे. कुच्छ दिन मे ठीक हो जाएगा.

मैं- इसे आप थोड़ी सी चोट बोल रहे हैं. कितना छिल गया है आपके घुटने पर और आप कह रहे हैं की कुच्छ नही हुआ . आपको क्या ज़रूरत थी सीढ़िया चढ़ने की. कोई काम था तो भाभी को बोल देते.

अब्बू- अरे यार अब तुम शांत हो जाओ. मैं कौन सा पहली बार सीढ़िया चढ़ रहा था. हमेशा छत पर आता जाता था, पता नही कैसे आज पैर फिसल गया. हादसे तो होते रहते हैं बेटा.

मैं- आप अभी मेरे साथ हॉस्पिटल चलिए और डॉक्टर को दिखाइए.

अब्बू- अरे मेरी अम्मी. इतनी मामूली चोट के लिए डॉक्टर को दिखाने की क्या ज़रूरत है. बस हल्की सी खरॉच आई है. मलम लगा लूँगा तो ठीक हो जाएगा कुच्छ दिन मे. तू नाहक ही इतना परेशान होती है.

मैं- मैं नाहक ही परेशान हो रही हूँ. आपको चोट लगी है और मैं नाहक परेशान हो रही हूँ.

अब्बू- आयशा बेटा. तुम्ही समझाओ इसे अब. मेरी तो सुन ही नही रही है.

आयशा भाभी- मैं भी अब्बू को कितनी बार कह चुकी हूँ हॉस्पिटल चलने के लिए लेकिन अब्बू मान ही नही रहे हैं, चोट ज़्यादा गहरी नही है. ये मलम लगाने से भी ठीक हो जाएगी. जब अब्बू हॉस्पिटल नही जाना चाहते तो ज़िद मत करो शाजिया. हम अब्बू का घर मे ही अच्छे से ख्याल रखेंगे. देख लेना अब्बू जल्द ही ठीक हो जाएँगे.

हबीबा भाभी- भाभी ठीक कह रही हैं शाजिया. हम लोग अब्बू की अच्छी तरह से सेवा करेंगे तो अब्बू जल्दी ठीक हो जाएँगे. फिर हॉस्पिटल जाने की ज़रूरत ही नही पड़ेगी. अब तुम भी मान जाओ ना.

दोनो भाभी की बात सुनकर मैने भी हाँ कर दी. फिर कुच्छ देर वही पर बैठे रहे. कुच्छ देर बाद मुझे कुच्छ याद आया तो मैने दोनो भाभी से कहा.

मैं- आप दोनो ने भाई जान को इनफॉर्म किया इस बारे में.

हबीबा भाभी- मैं तो बोल रही थी इनफॉर्म करने को और फोन भी लगाया था भाई जान और जीशानको, लेकिन अब्बू ने बात करके उन्हे आने से मना कर दिया की उन्हे परेशान होने की ज़रूरत नही है. हल्की सी चोट हैं.

मैं- क्या अब्बू. कम से कम भाई जान को तो आने देते.

अब्बू- उन्हे किसलिए परेशान करना. इतनी दूर रहते हैं दोनो. बिना किसी मतलब के सफ़र करना अच्छी बात थोड़े ही होती है. समय और पैसे के नुकसान के साथ साथ मानसिक तनाव का भी सामना करना पड़ता है. इसलिए मैने उन्हे आने से मना कर दिया. कुच्छ वर्षो बाद जब मैं चलने फिरने से लाचार हो जाउन्गा तो उन्हे बार बार आना ही पड़ेगा. कम से कम अभी तो वो दोनो चैन से रहे वहां पर. जब उनका मन करे तब घर आए.

अब्बू की बात सुनकर मैं चुप हो गयी. कुच्छ देर अब्बू के पास बैठने के बाद मैं अपने कमरे मे चली गयी कपड़ा बदलने के लिए. थोड़ी देर मे मैं कपड़ा चेंज करके वापस अब्बू के कमरे मे आ गयी.

मेरे अब्बू के कमरे मे आने के बाद अब्बू ने दोनो भाभी से कहा.

अब्बू- जाओ बहू. अपने लिए और मेरे लिए खाना निकालो. भूख लग रही है.

मैं- क्या. आप लोगो ने अभी तक खाना नही खाया है.

आयशा भाभी- अभी कहाँ. हम खाना खाने की तैयारी कर रहे थे. तभी हादसा हो गया.

मैं- अच्छा आप सब बैठिए. मैं आप लोगो के लिए खाना परोस्कर लाती हूँ.

उसके बाद मैं रसोई मे चली गयी और तीन थाली खाना निकल कर पहले एक थाली लेजकर अब्बू को दिया. उसके बाद दो थाली खाना लेजकर दोनो भाभी को दिया. दोनो भाभी भी अब्बू के कमरे मे ही ज़मीन पर चटाई बिछा कर खाना खाने लगी. तभी मेरे फोन की घंटी बजी. देखा तो अम्मी का फोन था. मैने फोन उठाया.

मैं- नमस्ते अम्मी.

अम्मी- नमस्ते शाजिया बेटा. तुम कैसी हो. और घर मे सब कैसे हैं.

मैं- घर मे कुच्छ भी ठीक नही है अम्मी. आप जल्दी से घर आ जाओ.

अम्मी- क्या हुआ बेटा. मुझे बताओ तो.

मैं- अब्बू सीढ़ी से नीचे गिर गये हैं उन्हे चोट लगी है.

अम्मी- क्या. अब कैसे हैं वो. मैं अभी रवाना होती हूँ यहा से. जल्दी ही घर पहुच रही हूँ मैं.

इसके बाद मैने बाइ बोलकर फोन रख दिया तो अब्बू ने मुझसे कहा.

अब्बू- क्यों परेशान कर रही हो अपनी अम्मी को. मैं एकदम ठीक हूँ. बस मामूली सी खरॉच है. अब वो अपना कम धाम छोड़कर भागी चली आएगी.

आयशा भाभी- तो क्या हुआ अब्बू. वो आपकी पत्नी हैं और उनका आपके साथ होना बहुत ज़रूरी है. आपकी तबीयत अभी ठीक भी नही है. मामूली जख्म है तो क्या हुआ . अम्मी को आपके पास रहना तो चाहिए ही.

उसके बाद सभी ने खाना खाया. हबीबा भाभी ने जाकर बर्तन की साफ सफाई की. मैं और आयशा भाभी अब्बू के कमरे मे ही रुके रहे. इसी तरह धीरे धीरे समय बीतता गया और शाम हो गयी.
 
8 बजे के लगभग दरवाज़े की घंटी बजी. मैने जाकर दरवाज़ा खोला तो बाहर अम्मी खड़ी थी. मैने उन्हे रास्ता दिया और वो अंदर आ गयी. अम्मी मेरा हलचल पूछकर सीधा अपने कमरे मे चली गयी. अम्मी जाकर अब्बू के पास बैठ गयी और बोली.

अम्मी- अब कैसी तबीयत है आपकी. घुटने के अलावा और कही चोट तो नही लगी आपको.

अब्बू- नही मैं बिल्कुल ठीक हूँ. बच्चो ने नाहक ही तुमको परेशान किया. एक पहलवान आदमी का ऐसी छोटी मोटी चोटे कुच्छ नही बिगाड़ पाएँगी.

हबीबा भाभी- वो समय बीत गया अब्बू जब आप पहलवान हुआ करते थे. और छोटी मोटी चोटे आपका कुच्छ नही बिगाड़ पाती थी. अब ऐसी चोटे ही ज़्यादा ख़तरनाक होती हैं. अगर इन्हे इग्नोर कर दिया गया तो.

ये बात हबीबा भाभी अब्बू के कमरे मे जाते हुए कही थी. जो अम्मी के लिए पानी लेकर गयी थी. भाभी ने अम्मी को सलाम किया. और अम्मी ने उन्हे आशीर्वाद दिया. भाभी की बात सुनकर अब्बू ने कहा.

अब्बू- मुझे ललकार्ने की ग़लती मत करना बहू. नही तो मेरे अंदर का पहलवान जाग गया तो तुम्हारे लिए अच्छा नही होगा.

तब तक आयशा भाभी और मैं भी कमरे मे पहुच गयी. अब्बू की बात सुनकर आयशा भाभी ने कहा.

आयशा भाभी- क्या कर लेंगे आप हमारा. आप पहले से ही बेड पर पड़े हुए हैं और हमे धमकी दे रहे हैं. हम भी किसी से कम नही है अब्बू. आख़िर हम भी पहलवान की बहू हैं. कही ऐसा ना हो अब्बू की हमसे भिड़ने के चक्कर मे आपको ही ज़्यादा नुकसान उठना पड़ जाए. फिर मत कहिएगा की बताया नही.

आयशा भाभी की बात सुनकर अम्मी और मैं मुस्कुराने लगे. आयशा भाभी ने जाकर अम्मी को सलाम किए और आशीर्वाद लिया. तभी अम्मी ने कहा.

अम्मी- क्या है ये सब तुम सब छोटे बच्चो की तरह लग रहे हो. और आप. आप तो समझदार हैं. लेकिन आप भी इनके साथ बच्चे बन गये हैं. अपने पहलवानी खून का उबाल कम कीजिए थोड़ा . पहले अच्छे से ठीक हो जाइए उसके बाद अपनी पहलवानी दिखाईएगा.

अम्मी की बात सुनकर सब चुप हो गये. उसके बाद मैं, हबीबा भाभी और आयशा भाभी किचन मे खाना बनाना चले गये. अम्मी अब्बू के पास ही बैठी रही. खाना बनाते हुए आयशा भाभी ने कहा.

आयशाभाभी- तो सब ठीक तक से हो गया ना शाजिया.

मैं- (उनकी बात का मतलब ना समझते हुए ) क्या ठीक से हो गया.

आयशा भाभी- अरे तुम आज राज से मिलने गयी थी तो वही पूछ रही हूँ की जिसके लिए तुम उससे मिलने गयी थी वो काम ठीक से हो गया या कोई कमी रह गयी.

मैं- क्या भाभी. आप फिर से शुरू हो गयी. आपके दिमाग़ मे यही सब बाते दिन रात घूमती रहती हैं क्या.

आयशा भाभी- तुम तो बात बात पर नाराज़ हो जाती हो यार. मैं बस पूछ ही तो रही हूँ.

मैं- मैं नाराज़ नही हो रही हूँ भाभी, लेकिन मुझे आपके साथ ऐसी बाते करने मे थोड़ा ओकवर्ड फील होता है. आख़िर आप मेरी भाभी हैं और मुझसे बड़ी हैं.

आयशा भाभी- लेकिन हम सब तो अच्छे दोस्त भी तो हैं. हम तीनो बहने भी हैं. तो हम हर बात कर सकते हैं.

मैं- ठीक है मेरी अम्मी. आपसे बातो मे कोई नही जीत सकता. तो मेरी क्या बिसात. लेकिन एक बात बताइए. आप इतनी उत्सुक क्यों हैं मेरी बात जान-ने के लिए. आपने कभी तो अपनी प्राइवेट बाते नही बताती मुझे.

आयशा भाभी- तुमने कभी पूछा ही नही हमसे तो कैसे बताते तुझे. कभी तुम पूछ कर देखना. फिर अगर ना बताऊं तो कहना. और मुझे ऐसी बाते जान-ने की उत्सुकता जो है उसका भी एक कारण है.

मैं- अच्छा. और वो क्या कारण है की आपको ऐसी बाते करना अच्छा लगता है.

आयशा भाभी- अच्छा. तुझे तो बहुत जल्दी है हर बात जान-ने की. पहले तुम अपनी बात बताॉगी उसके बाद ही मैं तुझे अपनी बातें बताऊंगी.

मैं- मुझे कोई शौक नही है आपकी बात सुन-ने का और अपनी बात बताने का. आप अपने पास ही रखिए.

अभी हम बात कर ही रहे थे की अम्मी किचन मे आ गयी. जिसके कारण हमे शांत होना पड़ा.

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