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निदा के कारनामे complete

फिर मैंने बारी-बारी उनके दोनों टट्टों को मुँह में लेकर चूसा। राणा साहिब मेरे चोप्पे से बहाल हो गये थे और वो भी बुरी तरह से सिसकारियां ले रहे थे। फिर मैंने उनका पूरा लण्ड मुँह में ले लिया और लण्ड को कुलफी की। तरह मजे से चूसने लगी। मेरे चूसने से राणा साहिब को बहुत मजा आ रहा था और उन्होंने अपने लण्ड को मेरे मुँह में आगे पीछे करना शुरू कर दिया। जब राणा साहिब अपना पूरा लण्ड मेरे मुँह में घुसा देते तो उनका लण्ड मेरे हलाक से भी नीचे चला जाता।

काफी देर तक अपना लण्ड मेरे मुँह में आगे पीछे करने के बाद उनकी रफ़्तार एकदम से तेज हो गई और वो जोर-जोर से अपना लण्ड मेरे मुँह में अंदर बाहर करने लगे। 5 मिनट बाद बाद उनके लण्ड ने एक जोरदार झटका खाया और उनके लण्ड से निकलने वाली मनी का फौवारा जोरदार झटके से मेरे हलाक से टकराया और मेरा पूरा मुँह राणा साहिब के लण्ड से निकलने वाली मनी से भर गया।

राणा साहिब कहने लगे- “सारी मनी पी जाओ एक कतरा भी नीचे गिरने नहीं देना...”

राणा साहिब के कहने के मुताबिक मैंने उनके लण्ड की सारी मनी पी ली। सारी मनी पी लेने के बाद मैंने उनका लण्ड निकाला तो वो मनी से बुरी तरह लिथड़ा हुवा था। मैंने चाट-चाटकर उनका लण्ड अच्छी तरह साफ किया और फिर दोबारा उसे मुँह में लेकर चूसने लगी। थोड़ी देर बाद ही राणा साहिब का लण्ड लोहे की तरह सख़्त हो गया तो मैंने उनका लण्ड मुँह से निकल लिया।

अब राणा साहिब का लण्ड मेरी चूत को फाड़ने के लिए बिल्कुल तैयार थे। राणा साहिब ने मुझे सोफे पर ही लिटा दिया। उन्होंने मेरी एक टांग सोफे के नीचे लटका दी और दूसरी टांग उठाकर सोफे के बैक साइड वाली। हत्थे पर रख दी। इस पोजिशन में मेरी चूत के लब खुल गये और चूत का सुराख अंदर तक साफ दिखाई देने लगा। फिर राणा साहिब ने मेरे ऊपर झुक कर अपने लण्ड की टोपी मेरी चूत के सुराख पर फिट करी और बोलेसंभलना... मैं एक ही झटके में अपना पूरा लण्ड तुम्हारी चूत में डाल दूंगा...”

मैं मुश्कुराई और बोली- “आप बेफिकर रहें राणा साहिब मैं तैयार हूँ...”

फिर राणा साहिब ने अपनी पूरी ताकत लगाकर एक बहुत ही जोरदार झटका मारा। राणा साहिब का झटका इतना जोरदार था की पूरा सोफा हिल गया। तकलीफ में मारे मेरे हलाक से एक जोरदार चीख निकल गई आह्ह्ह... मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।

राणा साहिब का लण्ड जड़ तक मेरी चूत में घुस चुका था। राणा साहिब मुश्कुराये और बोले- “क्यों मजा आया डार्लिंग। अब एक और लो..” ये कहकर उन्होंने पहले से भी ज्यादा जोरदार झटका मारा।

और मेरे हलाक से पहले से भी ज्यादा तेज चीख निकली- “आहह्ह.. हहाआ... आआह्ह...” मेरी आँखों से आँसू निकल आये।

 
मेरे आँसू देखकर राणा साहिब हँसे और बोले- “अभी से चे बोल गई अभी तो मैं शुरू हुवा हूँ..” ये कहकर उन्होंने जोर-जोर से झटके मारने शुरू कर दिए।

राणा साहिब का हर झटका पहले से जोरदार आ रहा था और मेरे हलाक से तेज से तेज चीख निकल रही थी। मैंने पहले भी 9 इंच लंबे लण्ड वाले आदमियों से चुदवाया था मगर राणा साहिब का लण्ड बहुत मजबूत और ठोस था जैसे उनका लण्ड पत्थर का बना हुवा हो, और आज तक मैंने जिस जिससे भी चुदवाया था किसी का

भी लण्ड इतना मजबूत और ठोस नहीं था जितना राणा साहिब का था। और यही वजह थी की राणा साहिब का लण्ड मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था। मुझे बहुत तकलीफ हो रही थी और मेरी चूत फटी जा रही थी।

आंटी ऊपर वाले पोरशन में थी और फहद का कमरा यहां से काफी दूर था इसलिए मेरी चीखों की आवाज उन दोनों तक नहीं जा सकती थी।

राणा साहिब को भी अंदाजा था की मेरी चीखें उन दोनों तक नहीं जा सकती इसलिए वो बगैर किसी आसरे के कुत्तों की तरह मेरी चुदाई कर रहे थे। राणा साहिब कुत्तों की तरह धपा-धप, धपा-धप झटकों पर झटके मारते ही चले जा रहे थे और मैं तकलीफ की वजह से चीखे जा रही थी। राणा साहिब के 5 झटकों बाद ही मैं झड़ गई

और मेरी चूत से पानी निकल गया। किसी से भी चुदवाते हुये मैं इतनी जल्दी कभी नहीं झड़ी थी।

राणा साहिब मेरे झड़ने पर हँसने लगे, और बोले- “बस... बर्दाश्त नहीं कर सकी तुम्हारी चूत मेरा लण्ड और छूट गई..” वो बुरी तरह हँसने लगे, जबकी मैं शर्मिंदा हो गई।

वो फिर झटके मारने लगे। उनके 7 झटकों बाद मैं फिर झड़ने वाली थी। मैंने बहुत कोशिश करी की मैं ना झडू मगर राणा साहिब ने आठवां झटका इतना जोरदार मारा की मैं ना चाहते हुये भी झड़ गई। राणा साहिब फिर हँसे और हँसते हुये बोले- “तुम तो बहुत कम हिम्मत वाली हो, तुम्हारी चूत तो मेरे 10 झटके भी बर्दाश्त नहीं कर सकी...” ये कहने के बाद उन्होंने अपना लण्ड मेरी चूत से निकालकर मुझे नीचे कार्पेट पर चारों हाथ पैरों पर दोगी स्टाइल में खड़ा कर दिया। फिर वो मेरे पीछे आये और मेरे पीछे बैठकर उन्होंने अपना लण्ड मेरी चूत में। घुसाया और मेरे ऊपर झुक कर उन्होंने मेरे दोनों मम्मों को पकड़ लिया और उन्होंने फिर तूफानी रफ़्तार से ।

झटके मारकर मुझे चोदना शुरू कर दिया।

जबकी मैं बुरी तरह से चीखने लगी- “आह्ह्ह... उफफ्फ़... ऊऊईई... आह्ह्ह... उफफ्फ़... आआआऐयईग... आआआ... उफफ्फ़.. म्म्म्म ममा... आआआ... ऊऊऊईई...” मैं बुरी तरह से चीख रही थी।

 
राणा साहिब इतनी रफ़्तार से झटके मारकर मुझे चोद रहे थे की आज तक मुझे किसी ने इतनी रफ़्तार से नहीं चोदा था। उनके अंदर ऐसा वहशीपन था, जो वहशीपन जानवरों में भी नहीं होता है और इसीलिए मुझसे उनका लण्ड बर्दाश्त नहीं हो रहा था। अब तक राणा साहिब को झटके मारते हुये 25 मिनट हो चुके थे और मैं इन 25 मिनटों में 4 मर्तबा झड़ चुकी थी। मेरी चूत झड़-झड़ कर बिल्कुल सूख चुकी थी और अब मेरी चूत में बेतहाशा दर्द हो रहा था। मैं बुरी तरह से रो रही थी।

और मैं रोते रोते कहने लगी- “आह्ह्ह.. ऊऊऊईई.. मैं मार जाऊँगीईई उफफ्फ़.. राणा साहीब... अब मेरे हाल पर रहम्म करें... उफफ्फ़... आह्ह्ह... मुझसे आपका लण्ड बर्दाश्त नहीं हो रहा है... आह्ह्ह... प्लीज़ मुझे माफ्फ़ कर दें.. अहह.. आहहह... उफफ्फ़... उफफ्फ़... अहह... प्लीज मेरे हाल पर रहम करेंनन्...”

राणा साहिब मेरी फरियाद सुनकर हँसे और बोले- “क्यों तुमसे बर्दाश्त नहीं हो रहा डार्लिंग, साली रंडी की औलाद तू ही तो कह रही थी की ये खेल तेरे लिए नया नहीं है। अब तुझे मेरा लण्ड बर्दाश्त करना ही है। मैं लड़कियों को ऐसे ही चोदता हूँ कोई रहम नहीं करता। चुपचाप पड़ी रह और चुदवाती रह वरना सारी रात बगैर रुके तुझे ऐसे ही चोदूंगा...” ये कहकर वो और जोर से झटके मारने लगे।

जबकी मैं फिर से चीखने लगी- “आह्ह्ह... अहह... आह्ह्ह... उफफ्फ़... उफफ्फ़... उफफ्फ़...”

राणा साहेब ने पूरे दस मिनट और मुझे ऐसे ही चोदा और फिर मेरी चूत में ही अपना पानी छोड़ दिया। मैं ऐसी चुदाई से निणड़ाल हो गई थी पर आज इसमें अपना ही मजा आया था। मैंने अपना हाल ठीक किया और अपने रूम में चली गई।

मैंने राणा साहिब से कहा- “राणा साहिब आप तो मुझे छोड़ने नहीं जायेंगे तो मेरी ट्रेन में बुकिंग किसी ऐसे कम्पार्टमेंट में करवाइएगा जिसमें सिर्फ़ आदमी हों..."

राणा साहिब हँसे और बोले- “क्यों किया इरादे हैं?”

मैं हँसी और बोली- “मैं अपना सफर यादगार बनाना चाहती हूँ...”

राणा साहिब ने मेरी ख्वाहिश के मुताबिक एक वी.आई.पी. कम्पार्टमेंट में बुकिंग करवाई जिसमें 4 मर्दो की । बुकिंग पहले से ही हुई हुई थी। फिर राणा साहिब मुझे छोड़ने स्टेशन आये। मेरी बुकिंग जिस कम्पार्टमेंट में थी अभी वहां कोई नहीं था। राणा साहिब ने तन्हाई देखी तो उन्होंने मुझे लिपटा लिया और मेरे मम्मे दबाते हुये मुझे किस करने लगे, साथ साथ वो मेरी चूत को भी मसल रहे थे। मैं तो हूँ ही सेक्स की दीवानी, मैं एकदम से बहुत गरम हो गई। अभी राणा साहिब मुझे किस कर ही रहे थे की एक आदमी कम्पार्टमेंट में आ गया। राणा । साहिब घबरा कर मुझसे अलग हो गये। वो आदमी भी शर्मिंदा हुवा। राणा साहिब जल्दी से मुझे बाइ कहकर कम्पार्टमेंट से उतर गये।

 
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मैं अपनी सीट पर बैठ गई जबकी वो आदमी मुझे घूर-चूर कर देखने लगा। मैंने देखा की वो एक 40 साल का सेहतमंद आदमी था। मैंने सोचा की अगर ये रास्ते भर मुझे चोदे तो सफर अच्छा कट जायेगा।

अभी ट्रेन चली नहीं थी। उस आदमी ने मुझसे पूछा- “क्या आप अकेली हैं?”

मैं मुश्कुराई और बोली- “जी मैं तन्हा हूँ..”

मेरे अकेले होने का सुनकर वो आदमी खुश हुवा और बोला- “मेरा नाम कादिर है, मैं एक बिजनेसमैन हूँ, एक काम के सिलसले में लाहोर आया हुवा था और अब मैं अपने बिजनेस के सिलसले में ही मुल्तान जा रहा हूँ। क्या आप भी मुल्तान जा रही हैं..."

जवाब में मैं भी मुश्कुराई और बोली- “बहुत खुशी हुई आपसे मिलकर और मैं भी मुल्तान ही जा रही हूँ..”

वो आदमी जिसका नाम कादिर था थोड़ा झिझका और बोला- “गज़ल आप बुरा ना मानें तो आपसे एक बात पूछू...”

मैं मुश्कुराई और बोली- “जी पूछिये...”

वो बोला- “अभी जो एक साहिब यहां मोजूद थे वो कौन थे?”

मैं हँसी और बोली- “वो मेरे अब्बू के दोस्त थे और मुझे छोड़ने आए थे.."

अब वो भी मुश्कुराया और बोला- “मगर छोड़कर काफी जल्दी चले गये...”

मैं फिर मुश्कुराई और बोली- “अगर आप ना आते तो वो अभी और मेरे साथ रुकते...”

मुझे अब बेचेनी हो रही थी क्योंकी राणा साहिब ने मेरे मम्मे दबाकर और मेरी चूत सहलाकर मेरे बदन में आग लगा दी थी। मैं कहने लगी- “इस कम्पार्टमेंट में काफी गर्मी है। मुझसे तो बर्दाश्त ही नहीं हो रही है आपका क्या खयाल है...”

वो मुश्कुराया और कहने लगा- “कह तो आप ठीक रही हैं...”

मैं बोली- “आप मर्द लोगों को बड़ी आसानी है जब गर्मी लगी तो कमीज उतार दी और कोई मसला ही नहीं। हमारे साथ तो बड़े मसले होते हैं...”

वो मुश्कुराया और बोला- "आपके साथ क्या मसला है, अगर आपको गर्मी लग रही है तो कमीज उतार दें। यहां कोई नहीं है और मैं तो वैसे भी आपको बहुत अच्छी हालत में पहले ही देख चुका हूँ, तो मुझसे क्या शर्माना?”

 
मैं हँसी और कहने लगी- “हाँ अब आपसे क्या परदा.." और ये कहकर मैंने अपनी शर्ट उतार दी। मैं ट्राउजर और शर्ट पहनी हुई थी और अब शर्ट उतारने के बाद मैं सिर्फ़ ट्राउजर और ब्रा में रह गई थी। मेरे चिकने जिश्म पर पशीना चमक रहा था। वो गौर से मेरे जिस्म को देख रहा था।

वो बोला- “वैसे मौसम इतना गर्म नहीं है, बाहर तो अच्छी खासी सर्दी है और आपके जिश्म पर पशीना है."

मैं मुश्कुराई और बोली- “वो मुझे ज्यादा कपड़े पहनने की आदत नहीं है, अफ मेरी तो ब्रा भी भीग गई है जरा आप मेरी ब्रा का हुक खोल देंगे ताकी मैं इसे सुखा सकू...” ये कहकर मैं उनके सामने पीठ मोड़कर खड़ी हो गई।

कादिर साहिब ने मेरी ब्रा का हुक खोल दिया। मैं ब्रा उतारकर मुड़ी तो उसने मुझे खींचकर अपने आपसे लिपटा लिया और अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए। मैं तो चाहती ही यही थी इसलिए मैंने उनको भींच लिया। वो पागलों की तरह मेरे बोसे ले रहे थे। उन्होंने बोसे लेने के दोरान ही मेरे ट्राउजर का बटन खोला और उसे खींचकर नीचे कर दिया। नीचे मैंने अपनी पैंटी नहीं पहनी थी, मैंने खुद ही अपना ट्राउजर अपनी टाँगों से निकाल दिया, अब मैं कादिर साहिब के हाथों में बिलकुल नंगी थी। अब वो मेरी चूत में उंगलियां कर रहे थे। फिर उन्होंने मुझे सीट पर पटका और अपने कपड़े उतारने लगे। जब उन्होंने अपनी अंडरवेर उतारी तो उनका 8 इंच का लण्ड झटका खाकर खड़ा हो गया।

फिर कादिर साहिब मुझ पर टूट पड़े। पहले उन्होंने मेरे मम्मों को दबा-दबाकर चाटा फिर मेरी चूत चाटी उसके बाद उन्होंने उठकर अपना लण्ड मेरे मुँह में डाल दिया और मैं मजे से उनका लण्ड चूसने लगी। थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझे सीट पर हाथ रखकर खड़ा हो जाने को बोला तो मैं सीट पर अपने दोनों हाथ रखकर झुक गई।

कादिर साहिब ने मेरे पीछे आकर अपना लण्ड मेरी चूत में डाला और जोरदार झटका मारा। पहले ही झटके में उनका लण्ड जड़ तक मेरी चूत में घुस गया। और पूरा कम्पार्टमेंट मेरी लज़्ज़त भरी सिसकारी से गूंज गया। मैं सिसक कर बोली- “उफफ्फ़... कादिर साहिब बहुत अच्छा शाट मारा है अब ऐसे ही शाट्स मारिए...”

और कादिर साहिब जोरदार झटकों के साथ मुझे चोदने लगे और मेरी लज़्ज़त भरी सिसकारियां कम्पार्टमेंट में गूंजने लगी। अभी कादिर साहिब को मुझे चोदते हुये 10 मिनट ही हुये थे की कम्पार्टमेंट का दरवाजा खुला और दो आदमी अंदर आ गये। दोनों आदमी अंदर का मंजर देखकर चौंक गये। पहले तो कादिर साहिब उन दोनों को देखकर घबराये फिर उन्होंने संभलकर उन दोनों को भी मुझे चोदने की दावत दी। मुफ़्त में लड़की चोदने को मिले तो कौन इनकार करता है...

कादिर साहिब की दावत पर वो दोनों आदमी भी अपने अपने कपड़े उतारकर कादिर साहिब के साथ शामिल हो। गये। अब कादिर साहिब को झटके मारने में लगे हुये थे, बाकी दोनों आदमियों में से एक ने तो अपना लण्ड मेरे मुँह में घुसा दिया जबकी दूसरा मेरे चूचियां को चूसने लगा।

फिर जिस आदमी का लण्ड मेरे मुँह में था उसने अपना लण्ड मेरे मुँह से निकाला तो कादिर साहिब ने उस आदमी को जगह दी और उस आदमी ने अपना लण्ड मेरी गाण्ड में घुसा दिया जबकी तीसरे आदमी ने अपना लण्ड मेरे मुँह में घुसा दिया। फिर वो तीनों अपने-अपने लण्ड को झटके देने लगे और मुझे एक साथ तीनों सुराखों से मजा आने लगा। अभी ट्रेन चलनी शुरू नहीं हुई थी मगर मेरी चुदाई पूरा स्पीड में चल रही थी। थोड़ी देर बाद कम्पार्टमेंट में जिस आखिरी आदमी की बुकिंग थी वो भी कम्पार्टमेंट में आ गया। एक लड़की पर तीन आदमियों के चढ़ने का मंजर ही किसी को गरम कर देने के लिए काफी था तो वो आने वाला शाख्स कैसे इससे बच पाता।

 
ना मैं कुछ बोली, ना मुझे चोदने वाले तीनों आदमी कुछ बोले और ना ही आने वाले आदमी ने कुछ पूछा, ये । मंजर ही इतना सेक्सी था की वो बिना किसी से कुछ पूछे अपने कपड़े उतारकर बाकी तीनों के साथ शामिल हो गया। बाकी तीनों ने भी कोई ऐतराज नहीं किया। क्योंकी वो लोग भी क्यों मना करते वो भी तो मुझे मुफ़्त का माल समझकर लूट रहे थे।

मुझे जो 4 आदमी चोद रहे थे मैं उनको जानती तक नहीं थी। कादिर साहिब का भी सिर्फ नाम ही पता था मुझे और बाकी तीनों के तो मैं नाम भी नहीं जानती थी की ये लोग कौन हैं... क्या करते हैं... कहां से आये हैं... और कहां जायेंगे... मुझे कोई परेशानी नहीं थी के ये सब कौन हैं... और ना ही मैं जानना चाहती थी। मेरा काम था। चुदवाना तो मैं खुशी-खुशी चुदवा रही थी। वो चारों भी क्या करते जब लड़की खुद ही नंगी खड़ी हो तो कोई और क्या करेगा सिवाय चोदने के। तो वो भी अपना फर्ज पूरे दिल-ओ-जान से पूरा कर रहे थे। हम सब चुदाई में पूरी तरह से मगन थे।

होश तब आया जब टिकेट चेकर टिकेट चेक करने हमारे कम्पार्टमेंट में आया, अंदर का सेक्स से भरपूर मंजर देखकर वो भी गरम हो गया और टिकेट चेकर भी मुझे चोदकर गया। टिकेट चेकर के जाने के बाद हम सब फिर सेक्स में डूब गये।

फिर मेरा पूरा सफर उन चारों से चुदवाते हुये गुजर गया। मुल्तान कब आया मुझे पता ही नहीं चला। जब ट्रेन रुकी तो हमें होश आया। कादिर साहिब के अलावा बाकी तीनों जिस तरह आये थे, मुझसे कुछ पूछे बगैर, या कुछ कहे बगैर अपने कपड़े पहनकर और अपना सामान उठाकर चले गये।

मैं जान ही नहीं सकी की वो लोग कौन थे... और उनके नाम क्या क्या थे। अलबत्ता कादिर साहिब ने अपना कान्टेक्ट नंबर मुझे दिया और अपना अड्रेस भी दिया की जब भी मुझे उनकी जरूरत महसूस हो तो मैं उनसे कान्टेक्ट कर लूं।

स्टेशन पर मुझे अब्बू लेने आये थे इसलिए मैं किसी शरीफ लड़की की तरह अब्बू के साथ घर आ गई।

******* समाप्त *****

 
06 बाबाजी मेरी बेटी को अपनी पनाह में ले लें

मेरी कुछ हफ्ते से तबीयत ठीक नहीं थी, मेरी अम्मी कुछ ज्यादा ही मजहबी हैं इसलिए वो मुझसे बोली की निदा मुझे लगता है की तुझे नजर वगैरा लग गई है, तुम किसी आमिल से अपनी नजर उतरवा लो। यहां करीब ही एक बाबाजी का श्थान है, वो बड़े पहुँचे हुये बाबा हैं, तू उनसे अपनी नजर उतरवा ले...”

अम्मी की बात सुनकर मुझे कोफ़्त हुई और मैंने अम्मी को मना कर दिया। अम्मी भी अपनी जिद की पक्की थी इसलिए मैं राजी हो गई।

अम्मी ने बुरका पहना, मुझे पर्दे वगैरा से वैसे ही चिढ़ थी इसलिए मैंने सिर्फ दुपट्टा ओढ़ लिया। मैं फिटिंग के कपड़े पहनती थी इसलिए की जब-जब मैं बाहर जाती थी तो लोग मुझे खूब ताड़ते थे और मुझे उनका ताड़ना अच्छा लगता था इसलिए मैं टाइट से टाइट फिटिंग के कपड़े पहनती थी। इस वक़्त भी मैंने टाइट फिटिंग का कमीज शलवार पहना हुवा था और मेरा दुपट्टा मेरे फिगर को छुपाने के लिए नाकाफी था। थोड़ी दूर ही बाबाजी का स्थान था और अम्मी मुझे लेकर वहां चली गई। ये दोपहर का वक़्त था इसलिए स्थान में सिर्फ तीन औरतें थीं।

बाबाजी का हुजरा अलग था और बाहर दो आदमी बैठे थे जो शायद बाबाजी के खिदमतगार थे। अम्मी ने एक आदमी को अपने आने की वजह बताई तो उन्होंने हमें बैठने को बोला। मैं और अम्मी एक तरफ बैठ गये। थोड़ी देर बाद बाबाजी के हुजरे का दरवाजा खुला और वहां से एक औरत निकलकर स्थान से बाहर निकल गई। दूसरे आदमी ने एक औरत को अंदर जाने को बोला तो एक औरत उठकर हुजरे में चली गई। मैं नोट कर रही थी की वो दोनों आदमी मुझे ही देख रहे थे।

बैठने से मेरी कमीज पेट से बिल्कुल चिपकी हुई थी जिससे मेरा उभरा हुवा सीना और उभर आया था। मैंने नोट किया की दोनों मेरे सीने को ही देख रहे हैं। मैंने अपने सीने पर नजर डाली तो मेरे आधे सीने पर से दुपट्टा ढलका हुवा था जिसकी वजह से मेरा एक मम्मा बिल्कुल साफ नुमाया हो रहा था। वो दोनों आदमी बार बार। मुझे प्यासी नजरों से घूर रहे थे, और उनके ऐसे देखने से मेरे अंदर की आग जाग उठी।

और चूत ने कहा- “होश मैं आ...”

मुझे शरारत सूझी और मैंने कुछ सोचा और फिर अम्मी को देखा तो अम्मी आँखें बंद किए कुछ पढ़ रही थी। अम्मी के बाद मैंने उन दोनों आदमियों को देखा और अपने सीने से दुपट्टा हटा दिया और अपना सीना कुछ और निकालकर बैठ गई। मेरी हरकत पर दोनों आदमी चौंक गये। फिर वो मुझे देखकर मुश्कुराने लगे तो मैं भी मुश्कुरा दी। मैं और अम्मी पीछे बैठे थे इसलिए वहां बैठी दोनों औरतें मुझे सही से देख नहीं सकती थी। मैं मुतमइन थी और उन दोनों को अपने बड़े-बड़े मम्मों का दीदार करा रही थी। मैंने काफी दिनों से चूत नहीं मरवाई थी। आज लगा की यहाँ अपना काम बन गया।
 
मैं देख रही थी की दोनों आदमी बेचैन हैं, अगर शायद वहां और औरतें नहीं होती तो शायद वो दोनों मुझे दबोच लेते। फिर थोड़ी देर बाद वहां मोजूद तीनों औरतें फारिग होकर चली गई और वहां सिर्फ़ मैं और अम्मी ही रह । गये थे।

फिर एक आदमी हमें अंदर जाने का बोलने के बजाय खुद हुजरे में चला गया। थोड़ी देर बाद वो आदमी बाहर आया और हम दोनों को अंदर जाने को बोला। अम्मी मुझे लेकर हुजरे में चली गई, हुजरे में एक काफी बड़ी उमर का आदमी पीले कलर के कपड़े पहने बैठा था, उसकी दाढ़ी काफी लंबी थी जिसकी वजह से मैं उसकी उमर का सही से अंदाजा नहीं लगा पाई। वो एक चौकी पर बैठा हुवा था बीके थोड़ा नींद में था, मुझे देखकर वो सीधा हो गया। मैं और अम्मी जाकर उसके सामने बैठ गये। अम्मी ने बड़े अदब से सलाम किया तो उस आदमी ने जवाब में सिर्फ अपना सिर हिलाया। अम्मी उस आदमी यानी बाबाजी को बताने लगी की ये मेरी बेटी है ये काफी हफ्तों से बीमार है और इसकी तबीयत ठीक नहीं हो रही है।

मुझे लगा की इसको किसी की नजर लग गई है इसलिए मैं इसको आपके पास ले आई, आपको बहुत पहुँचे हुये आलिम हैं बरा-ए-मेहरबानी आप मेरी बेटी पर दम कर दें। वो बाबाजी मुसलसल मुझे घूर रहे थे।

उन्होंने अम्मी को कहा- “तू फिकर ना कर, अच्छा हुवा जो तू इसे यहां ले आई है...”

उन बाबाजी की आवाज काफी भारी और रोबदार थी, उन्होंने मुझे अपने पास बैठने को बोला तो मैं उठकर उनके पास बैठ गई। उन्होंने मुझे अपना हाथ बढ़ने को बोला तो मैंने अपना हाथ बढ़ा दिया। बाबाजी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और अपनी आँखें बंद कर ली और कुछ पढ़ने लगे। पढ़ते-पढ़ते बाबाजी मेरे हाथ को सहलाने लगे, जबकी मैं मुश्कुराने लगी। फिर जब बाबाजी ने आँखें खोलकर मुझे देखा तो मुझे मुश्कुराता देखकर वो भी एक लम्हे के लिए मुश्कुराये। मुझे लगा की अब ये कोई प्लान करेगा मुझे चोदने के लिये और फिर से उन्होंने अपना चेहरा बारोब बना लिया।

फिर उन्होंने अम्मी से कहा- “तेरी बेटी पर किसी ने जादू करवा दिया है...”

 
अम्मी जादू का सुनकर बहुत परेशान हो गई और बाबाजी की मिन्नतें करने लगी की वो कुछ करें। बाबाजी ने हाथ उठाकर अम्मी को रोका और बोले- “तुम ज्यादा परेशान ना हो, अब तुम्हारी बेटी हमारी पनाह में आ चुकी है इसलिए अब इसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा पर इसके लिए मुझे एक अमल करना होगा। जादू खतरनाक है इसलिए अमल भी फौरन ही करना होगा वरना तेरी बेटी उस जादू से बच नहीं पाएगी।

अम्मी परेशान होकर फौरन बोली- “तो कीजिए ना बाबाजी वो अमल..”

बाबाजी बोले- “वो काफी लंबा अमल है और मुझे वो अमल तेरी बेटी को अपने सामने बिठाकरके करना होगा इसलिए तुझे अपनी बेटी को कुछ घंटों के लिए यही छोड़ना होगा...”

बाबाजी की बात सुनकर मैं मुश्कुरा दी क्योंकी मैं जान चुकी थी की ये बाबा मेरे साथ कौन सा अमल करना चाहता है, वैसे मैं भी काफी दिनों की प्यासी थी इसलिए कोई नहीं तो ये बाबाजी ही सही के फार्मूले पर मुझे कोई ऐतराज नहीं था।

अम्मी कहने लगी- “हाँ हा बाबाजी क्यों नहीं आप अपना अमल करें बस मेरी बेटी को जादू से बचा लें..."

बाबाजी बोले- “जैसे ये तेरी बेटी है इस तरह ये मेरी भी बेटी है इसलिए तु बेफिकर होकर अपने घर जा और 4 घंटे बाद आकर अपनी बेटी को ले जाना ऊपर वाले का करम हुवा तो तेरी बेटी जादू से बच जायेगी...”

अम्मी बाबाजी की बात सुनकर उठ खड़ी हुई और फिर वो मुझसे बोली- “बेटी बाबाजी के हर हुकुम को मानना क्योंकी ये तेरे भले के लिए ही होगा..."

अम्मी की बात सुनकर मैंने अपनी हँसी मुश्किल से रोकी और बोली- “अम्मी आप बेफिकर रहें, मैं बाबाजी का हर हुकुम मानूंगी...”

अम्मी ने मेरी बलायें ली और बाबाजी का शुक्रिया अदा करती हुई कमरे से निकल गई।

अम्मी के जाने के बाद बाबाजी ने एक बटन दबाया तो बाहर हल्की से बेल बाजी और उनका एक खिदमतगार वहां आ गया। बाबाजी ने उससे कहा- “रफीक मैं इसके साथ एक अमल कर रहा हूँ तुम मेरे हुजरे का दरवाजा बंद कर दो और स्थान का दरवाजा भी बंद कर दो और इस दौरान कोई आये तो बोल देना की मैं कहीं गया हुवा हूँ तीन से 4 घंटे बाद आऊँगा...”

बाबाजी की बात सुनकर वो खिदमतगार मुश्कुराया और बोला- “जो हुकुम बाबाजी...” ये कहकर वो पलटा और उसने बाहर से बाबाजी के हुजरे का दरवाजा बंद कर दिया। दरवाजा बंद होते ही बाबाजी मुझे देखकर मुश्कुराने लगे। मेरा हाथ अभी तक बाबाजी के हाथ में था।

मैं मुश्कुराकर बोली- “बाबाजी आप मेरा जादू उतारने के लिए कौन सा अमल करने वाले हैं...”

बाबाजी मुश्कुराये और बोले- “ये बहुत ही खास अमल है जो तेरे सारे कपड़े उतारकर होगा। अगर तू खुशी से ये अमल करवायेगी तो इस अमल में तुझे भी मजा आयगा और अगर शोर मचायेगी तो इसमें तेरा ही नुकसान होगा। क्योंकी वो अमल किए बगैर मैं तुझे यहां से जाने नहीं दूंगा...”

 
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