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दिल दोस्ती और दारू complete

इसकी भनक मुझे तब लगी जब छत्रपाल सर डेली हमसे अब्राहम लिंकन की जीवनी हमे स्टेज मे बुलाकर पढ़वाते थे .क्यूंकी ना तो लिंकन जी के उपर हमे कोई एसे लिखना था और ना ही गोल्डन जुबिली के मौके पर लिंकन जी का कोई टॉपिक था....आक्च्युयली छत्रपाल इन 7 दिनो मे ये अब्ज़र्व कर रहा था कि किस स्टूडेंट्स का इंटेरेस्ट कितना है और यदि मेरी सोच सही है तो वो उन्ही स्टूडेंट्स को सेलेक्ट करेगा जिन्होने पूरे हफ्ते फुल इंटेरेस्ट के साथ अपनी स्पीच दी हो....

मैं छत्रपाल के इस ट्रिक को भाँप गया था या फिर दूसरे शब्दो मे कहूँ तो ऐसी ही सेम टू सेम ट्रिक मेरे स्कूल मे भी मेरे टीचर अप्लाइ करते थे और यदि तीसरे शब्दो मे कहूँ तो ' आंकरिंग करने का ये महा फेमस तरीका है' जो हर उस बंदे को मालूम होगा ,जिसने गूगल मे थोड़ी सी मेहनत की होगी.....

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आराधना को काउंट करके अब टोटल 12 स्टूडेंट्स हो गये थे,जिनमे से 6 को सेलेक्ट करना था और 6 को ऑडिटोरियम से बाहर का रास्ता दिखाना था...कुच्छ लड़के जो खुद को ओवरस्मार्ट दिखाते थे वो पिछले एक-दो दिनो से लिंकन जी के बारे मे बोलते वक़्त जमहाई ले लेते थे तो कभी-कभी अपना हाथ-पैर खुजलाने लगते थे. उन ओवर-स्मार्ट लड़को मे कुच्छ लड़के ऐसे भी थे,जो एक-दो दिनों से छत्रपाल सर से ये पुछने लगे थे कि ,वो उन्हे 2-2 के ग्रूप मे डिवाइड क्यूँ नही करते....मतलब सॉफ था कि इन सबको छत्रपाल बट्किक करने वाला था.

जिस दिन मैने एश से सवाल पुछा उस दिन भी तक़रीबन 4-5 स्टूडेंट्स ने लिंकन जी के बारे मे वही पुरानी स्पीच देने मे आना कानी की...कुच्छ ने तो बोरिंग तक का दर्जा दे डाला...लेकिन उनमे कुच्छ ऐसे भी स्टूडेंट्स थे जो छत्रपाल के दिए-हार्ड फॅन थे और उन्होने ऑडिटोरियम मे कभी अपना मुँह नही खोला और उनमे मैं भी शामिल था....

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उस दिन लास्ट पीरियड मे मेरे मोबाइल मे एश ने एक मेस्सेज टपकाया कि वो छुट्टी के बाद पार्किंग मे मेरा इंतज़ार करेगी...एश के इस मेस्सेज के तुरंत बाद मैं ये समझ गया कि मुझे पिछले कयि दिन की तरह आज भी अरुण को चोदु बनाकर ,सौरभ के साथ भेजना है....

"अरुण, तेरे मोबाइल मे मेस्सेज पॅक है क्या..."

"ये मेस्सेज तुम जैसे गीदड़ करते है, भाई शेर है इसलिए डाइरेक्ट कॉल करता है...."

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अरुण से ना मे जवाब मिलने के बाद मैने अपने ही मोबाइल से एश को मेस्सेज सेंड करने का सोचा और लिखा कि 'दिव्या को अपने साथ मत रखना,वरना मैं वापस लौट जाउन्गा...'

कॉलेज ख़त्म होने बाद मैं पार्किंग की तरफ बढ़ा ,जहाँ एश अपनी कार के बाहर खड़े होकर मुझे इधर-उधर ढूँढ रही थी और दिव्या जा चुकी थी....

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"हेलो..."एक प्यारी सी स्माइल मारते हुए मैने कहा"तो बिना समय गँवाए सीधे पॉइंट पर आ जाओ..."

"एक मिनिट....मुझे सोचने दो....हां, याद आ गया. यू नो अरमान ,यू आर आ हॉट टॉपिक ऑफ डिस्कशन इन और कॉलेज ऐज वेल ऐज इन और होम....."

"मेरी इंग्लीश उतनी बुरी भी नही है लेकिन कसम से कुच्छ भी समझ नही आया...."

"तुम मेरे घर मे और गौतम के घर मे डिसकस करने का एक हॉट टॉपिक हो...और जिस दिन देविका ने तुम्हे कॉल किया उसके एक दिन पहले ही मैं तुम्हारे बारे मे उससे बात कर रही थी...इस तरह से वो तुम्हारे बारे मे जान गयी..."

"सच...."मैं बस इतना कह पाया क्यूंकी जो बात एश ने मुझे बताई थी ,वो मेरे लिए बिल्कुल नयी थी.इसलिए उसपर यकीन करना मुश्किल हो रहा था.

ए ~लंगर~ फुटबॉल मॅच

मुझे इतना तो मालूम था कि मैं अपने बुरे करमो के चलते कॉलेज मे बहुत फेमस हूँ लेकिन मैं इतना फेमस हूँ कि इस शहर के सबसे रहीस घरो मे मेरे बारे मे बात होती है ,ये मैं नही जानता था.....एश के उस जवाब पर मैने यकीन तो नही किया था,लेकिन अंदर ही अंदर खुद पर गर्व भी कर रहा था....

एश की बात सुनकर मेरा सीना तुरंत दो इंच चौड़ा हो गया और दिल किया की गॉगल लगाकर कोई डाइलॉग मारू लेकिन फिर कुच्छ सोचकर मैने अपना ये गॉगल लाकर डाइलॉग मारने का विचार छोड़ दिया और एसा से आगे पुछा....

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"मैं इतना ज़्यादा पॉपुलर हूँ ,जानकार खुशी हुई....वैसे मेरे बारे मे क्या डिसकस करते हो तुम लोग...."

"मेरे और गौतम के घर मे ऐसा कोई दिन नही होता,जब तुम्हे बुरा-भला ना कहा गया हो...तुम यकीन नही करोगे पर सब लोग तुमसे बे-इंतेहा नफ़रत करते है..."

"मुझे भी कुच्छ ऐसी ही उम्मीद थी... "

उस दिन पार्किंग प्लेस मे एश को अपने शब्दो के जाल मे फँसा कर मैने बहुत कुच्छ जान लिया.जैसे कि बीच-बीच मे एश की मॉम एश से पूछती है कि 'वो लफंगा सुधरा या अब भी वैसी मार-पीट करता है....'

मुझे लेकर एश और गौतम के घर मे सेम सिचुयेशन रहती है ,बोले तो मेरा नाम जेहन मे आते ही उनके मुँह से मेरे लिए गालियाँ बरसती है....खैर ये सब दिल पे लेनी की बात नही है और ना ही बुरा मानने की बात है क्यूंकी ये सब तो हमान नेचर की प्रॉपर्टीस है....

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"वो सब तो ठीक है एश, लेकिन क्या तुम्हे नही लगता कि ऐसे ही किसी के भी सामने अपने घर की प्राइवेट बातें शेयर करना ग़लत है...."

जब मैं अपनी बुराई सुनकर पक गया तो मैने एश को रोकने के लिए कहा,क्यूंकी वो नोन-स्टॉप मेरे दिल पर डंडे पे डंडे मारे जा रही थी.मेरे टोकने के बाद एश को जैसे अपनी ग़लती का अहसास हुआ और उसने अपना हाथ अपने होंठो पर रख लिया.....

"तुम्हारे घरवालो के मेरे प्रति उच्च विचारो की जानकारी तो मुझे हो गयी, लेकिन अब ये बताओ कि मेरे बारे मे तुम्हारा क्या सोचना है...मतलब कि क्या तुम भी अपना दिल खोलकर मुझे बुरा-भला कहती हो..."

"मैं नही बताउन्गी...अब मैं एक लफ्ज़ भी आगे नही बोलूँगी..."

"बता दे बिल्ली, वरना मैं.....मैं...."

"वरना क्या...तुम मुझे फिर से धमकी दे रहे हो..."

"चल ठीक है जा..."

"मैं क्यूँ जाउ, तुम जाओ..."

"अरे जा ना..."

"पहले तुम जाओ..."

"ऐसा क्या, ले फिर मैं नही जाता,बोल क्या करेगी बिल्ली..."

"फिर मैं भी नही जाउन्गी, बिल्लू,बिलाव,बिल्ला...."

"खिसक ले इधर से ,ये मैं लास्ट वॉर्निंग दे रहा हूँ....वरना "

"वरना क्या...हाआन्ं ,बोलो वरना क्या...क्या कर लोगे तुम..."मुझे चॅलेंज करते हुए एश एक कदम आगे बढ़ी.....

"कमाल है यार,इसे तो मुझसे डर ही नही लगता..."एश के एक कदम आगे बढ़ने के बाद मैने खुद से कहा और एश की'वरना क्या...' का जवाब सोचने लगा....

"एश ,देख अब तो चुप-चाप यहाँ से जाती है या मैं अपनी सूपर पवर दिखाऊ..."

"जब तक तुम नही जाओगे, तब तक मैं भी नही जाउन्गी..."

"तू जा यहाँ से नही तो मैं तुझे किस कर लूँगा...फिर मत बोलना कि मैने ऐसा क्यूँ किया...."

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मेरे किस करने वाले जवाब का एश के अंदर जबरदस्त रिक्षन हुआ और वो तुरंत अपनी कार मे बैठकर वहाँ से चली गयी.....

"मुझसे आर्ग्युमेंट करती है,अब आ गयी ना लाइन पे... "

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गोलडेन जुबिली के फंक्षन के लिए अब तैयारिया जोरो से चल रही थी.सिंगगिंग,डॅन्सिंग एट्सेटरा. जैसे प्रोग्राम की प्रॅक्टीस तो कॉलेज के समय ही हो जाती थी ,लेकिन स्पोर्ट्स वगेरह की प्रॅक्टीस कॉलेज के बाद शुरू होती थी...हर ब्रांच की एक-एक टीम बना दी गयी थी, जो कि एक तय किए हुए दिन मे दूसरे ब्रांच से भिड़ने वाली थी...इन शॉर्ट कहे तो कॉलेज मे इस समय कॉंपिटेटिव महॉल था, जिसमे कॉलेज के लगभग आधे से अधिक स्टूडेंट्स झुलस रहे थे....कॉलेज के उस कॉंपिटेटिव महॉल से मेरे खास दोस्त अरुण,सौरभ की तरह सिर्फ़ वो ही लोग बचे थे,जो गोल्डन जुबिली के इस गोल्डन मौके पर किसी भी फील्ड मे आक्टिव नही थे....

8त सेमिस्टर. मे आते तक मुझे और हॉस्टिल मे रहने वाले मेरे कुच्छ दोस्तो को शाम के वक़्त कोई सा गेम खेलने की आदत लग चुकी थी,जिससे हमारे शरीर मे एक नयी एनर्जी घुस जाती थी और फिर रात को हम लोग पेल के दारू पीते थे....लेकिन आजकल हम जिस भी ग्राउंड मे शाम के वक़्त एनर्जी लेने जाते वहाँ ब्रांच वाइज़ लौन्डे प्रॅक्टीस करते हुए मिलते थे,इसलिए अब हमारा ग्राउंड हमारे हॉस्टिल का कॉरिडर बना....जहाँ हम लोग क्रिकेट,फुटबॉल बड़े आराम से खेलते थे......

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"मैं,अरमान भाई की टीम मे रहूँगा..."पांडे जी को जब अरुण ने अपनी टीम मे लिया तो राजश्री पांडे एक दम से चिल्ला उठा....

"मर म्सी, जा चूस ले अरमान का..."पांडे जी का कॉलर पकड़ कर उसे अरुण ने मेरी तरफ धकेला और बोला"भाग लवडे मेरी टीम से...."

"सौरभ डार्लिंग मेरी तरफ..."मैने अपनी टीम के अगले खिलाड़ी को सेलेक्ट किया...

"तो फिर ये कल्लू कन्घिचोर मेरी तरफ..."कल्लू को हाथ दिखाते हुए अरुण ने कहा"आ जा बे कालिए..."

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मैने और अरुण ने 4-4 लौन्डो की टीम बनाई और कॉरिडर मे फुटबॉल खेलने के लिए आ पहुँचे....इस बीच एक और लौंडा वहाँ आया और उसने भी खेलने की इच्छा प्रकट की....

"जा पहले अपने लिए कोई जोड़ीदार लेकर आ...ऐसे मे तो एक तरफ 5 और एक तरफ 4 लौन्डे रहेंगे..."उस लड़के से अरुण ने कहा...

"सुन बे अरुण...तू रख ले इसे, तुम जैसे गान्डुल 5 क्या 50 भी हो जाए तब भी मुझे कोई फ़र्क नही पड़ता..."

"मैं क्यूँ रखू, तू ही रख ले और बेटा गान्डुल कौन है ये तो मॅच के बाद ही पता चलेगा,जब मैं तेरे हाथ-पैर तोड़ दूँगा..."

"ठीक है फिर...आजा बे,इधर खड़ा हो जा..."उस नये लौन्डे को अपनी तरफ आने का इशारा करते हुए मैने खुद से कहा"एक बार फिर से अरुण को चोदु बना दिया , आइ'म सो स्मार्ट...अब तो 100 मैं जीत के ही रहूँगा...."

जब कॉरिडर मे दोनो टीम तैनात हो गयी तो मैं सबसे पहले राजश्री के पास गया और बोला.."तू जा के गोलकीपिंग कर बे लोडू और बेटा यदि एक बार भी फुटबॉल इस पार से उस पार गयी तो सोच लेना..."

"अरमान भाई..आप फिक्र मत करो...एक बार मैं राजश्री खा लूँ,उसके बाद तो कोई माई का लाल मुझे हरा नही सकता..."

पांडे जी को गोलकीपर बनाने के बाद मैं सौरभ के पास गया और बोला"सुन बे, तू डिफेन्स करना और जो कोई भी फुटबॉल लेकर तेरे पास आए, साले का हाथ-पैर तोड़ देना....मैं फॉर्वर्ड खेलूँगा..."

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वैसे तो मुझे फुटबॉल खेलना नही आता था लेकिन जैसे हमलोग लंगर डॅन्स करते थे,वैसे ही हम लोग लंगर फुटबॉल खेल रहे थे,जहाँ कोई रूल्स नही...बस फुटबॉल गोल होनी चाहिए ,उसके लिए चाहे कोई सा भी तरीका अपनाया जाए....जब मैं अपनी टीम की तरफ से फॉर्वर्ड खेलने आया तो मुझे देखकर अरुण भी फॉर्वर्ड खेलने के लिए आगे आ गया....कल्लू कंघीचोर मुझे कवर करने के लिए मेरे पास ही खड़ा था और अरुण मेरे ठीक सामने मुझे गालियाँ दे रहा था.....

"थ्री....टू....वन...स्टार्ट"

तीन तक की गिनती समाप्त होने के बाद मैने फुटबॉल को अपनी पहली ही किक मे अरुण के थोब्डे को निशाना बनाना चाहा, लेकिन फुटबॉल से मेरा पैर ही टच नही हुआ बोले तो अरुण के थोबडे को बिगाड़ने का मैने एक सुनहरा अवसर मिस कर दिया और कल्लू फुटबॉल लेकर आगे बढ़ा...

"सौराअभ....आगे मत जाने देना, मुँह मे लात मारना इस कालिए के..." अपना पूरा दम लगाकर मैं चीखा...जिसके बाद कल्लू डर के मारे जहाँ था ,उसने फुटबॉल को वही छोड़ा और वापस लौट आया....

"ऐसे तुमलोग मार-पीट करोगे तो मैं नही खेलूँगा... "कल्लू अरुण के पास जाकर मुझसे बोला...

"अबे अरमान, 100 के लिए तू इतना नीचे गिर जाएगा...मैने कभी सोचा नही था, थू है तुझपर..."

"अभी कल के मॅच मे जब तू मेरी तरफ था ,तब तो बहुत बोल रहा था कि मार उस कालिए को....इसलिए अब अपनी ये नौटंकी बंद कर और गेम शुरू कर...."मैने कहा और पलट कर सौरभ को आवाज़ दिया "थाम ले बे फुटबॉल और यदि अब कल्लू इस एरिया मे आया तो उचकर उसके मुँह मे जूता घुसा देना...."

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Iski bhanak mujhe tab lagi jab Chatrapaal sir daily hamse Abraham Lincoln ki jeewani hame stage me bulakar padhwate the .kyunki na to Lincoln ji ke upar hame koyi essay likhna tha aur na hee golden jubilee ke mauke par Lincoln ji ka koyi topic tha....actually Chatrapaal in 7 dino me ye observe kar raha tha ki kis students ka interest kitna hai aur yadi meri soch sahi hai to wo unhi students ko select karega jinhone pure haanfate full interest ke sath apni speech di ho....

Main Chatrapaal ke is trick ko bhaanp gaya tha ya phir dusare shabdo me kahu to aisi hee same to same trick mere school me bhi mere teacher apply karte the aur yadi teesare shabdo me kahu to ' Anchoring karne ka ye mahafamous tareeka hai' jo har us bande ko maloom hoga ,jisne google me thodi si mehnat ki hogi.....

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Aradhna ko count karke ab total 12 students ho gaye the,jinme se 6 ko select karna tha aur 6 ko Auditorium se bahar ka rasta dikhana tha...kuchh ladke jo khud ko oversmart dikhate the wo pichale ek-do dino se Lincoln ji ke baare me bolte waqt jamhayi le lete the to kabhi-kabhi apna hath-pair khujlane lagte the. Un Over-smart ladko me kuchh ladke aise bhi the,jo ek-do teen se Chatrapaal sir se ye puchhane lage the ki ,wo unhe 2-2 ke group me divide kyun nahi karte....matlab saaf tha ki in sabko Chatrapaal buttkick karne wala tha.

Jis din maine Esha se sawal puchha us din bhi taqriban 4-5 students ne Lincoln ji ke baare me wahi purani speech dene me aana kani ki...kuchh ne to boring tak ka darja de dala...lekin unme kuchh aise bhi students the jo Chatrapaal ke die-hard fan the aur unhone Auditorium me kabhi apna munh nahi khola aur unme main bhi shamil tha....

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Us din last period me mere mobile me Esha ne ek messege tapkaya ki wo chutti ke baad parking me mera intzaar karegi...Esha ke is messege ke turant baad main ye samajh gaya ki mujhe pichale kayi din ki tarah aaj bhi Arun ko chodu banakar ,Saurabh ke sath bhejna hai....

"Arun, tere mobile me messege pack hai kya..."

"ye messege tum jaise geedad karte hai, bhai sher hai isliye direct call karta hai...."

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Arun se naa me jawab milne ke baad maine apne hee mobile se Esha ko messege send karne ka socha aur likha ki 'Divya ko apne sath mat rakhna,warna main wapas laut jaunga...'

College khatm hone baad main parking ki taraf badha ,jahan Esha apni car ke bahar khade hokar mujhe idhar-udhar dhoondh rahi thi aur Divya ja chuki thi....

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"hello..."ek pyari si smile marte hue maine kaha"to bina samay ganwaye seedhe point par aa jao..."

"ek minute....mujhe sochne do....haan, yaad aa gaya. You Know Arman ,you are a hot topic of discussion in our college as well as in our home....."

"meri english utni buri bhi nahi hai lekin kasam se kuchh bhi samajh nahi aaya...."

"tum mere ghar me aur Gautam ke ghar me discuss karne ka ek hot topic ho...aur jis din devika ne tumhe call kiya uske ek din pahle hee main tumhare baare me usase baat kar rahi thi...is tarah se wo tumhare baare me jaan gayi..."

"sach...."main bas itna kah paya kyunki jo baat Esha ne mujhe batayi thi ,wo mere liye bilkul nayi thi.isliye uspar yakin karna mushkil ho raha tha.

A ~langar~ Football Match

Mujhe itna to maloom tha ki main apne bure karmo ke chalte college me bahut famous hoon lekin main itna famous hoon ki is shahar ke sabse rahis gharo me mere baare me baat hoti hai ,ye main nahi janta tha.....Esha ke us jawab par maine yakin to nahi kiya tha,lekin andar hee andar khud par garv bhi kar raha tha....

Esha ki baat sunkar mera seena turant do inch chauda ho gaya aur dil kiya ki goggle lagakar koyi dialogue maru lekin phir kuchh sochkar maine apna ye goggle laakar dialogue marne ka vichar chod diya aur Esha se aage puchha....

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"main itna jyada popular hoon ,jaankar khushi hui....waise mere baare me kya discuss karte ho tum log...."

"mere aur Gautam ke ghar me aisa koyi din nahi hota,jab tumhe bura-bhala na kaha gaya ho...tum yakin nahi karoge par sab log tumse be-inteha nafrat karte hai..."

"mujhe bhi kuchh aisi hee ummid thi... "

Us din Parking place me Esha ko apne shabdo ke jaal me phansa kar maine bahut kuchh jaan liya.jaise ki beech-beech me Esha ki mom Esha se puchaatee hai ki 'wo lafanga sudhra ya ab bhi waisi maar-peet karta hai....'

Mujhe lekar Esha aur Gautam ke ghar me same situation rahti hai ,bole to mera name jehan me aate hee unke munh se mere liye galiya barasati hai....khair ye sab dil pe leni ki baat nahi hai aur na hee bura manne ki baat hai kyunki ye sab to haman nature ki properties hai....

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"wo sab to thik hai Esha, lekin kya tumhe nahi lagta ki aise hee kisi ke bhi samne apne ghar ki private baaten share karna galat hai...."

Jab main apni burayi sunkar pak gaya to maine Esha ko rokne ke liye kaha,kyunki wo non-stop mere dil par dande pe dande mare ja rahi thi.Mere tokne ke baad Esha ko jaise apni galti ka ahsaas hua aur usne apna hath apne hontho par rakh liya.....

"tumhare gharwalo ke mere prati uchch vicharo ki jaankari to mujhe ho gayi, lekin ab ye batao ki mere baare me tumhara kya sochna hai...matlab ki kya tum bhi apna dil kholkar meujhe bura-bhala kahti ho..."

"main nahi bataungi...ab main ek lafz bhi aage nahi bolungi..."

"bata de billi, warna main.....main...."

"warna kya...tum mujhe phir se dhamki de rahe ho..."

"chal thik hai jaa..."

"main kyun jaun, tum jao..."

"are ja na..."

"pahle tum jao..."

"aisa kya, le phir main nahi jata,bol kya karegi billi..."

"phir main bhi nahi jaungi, billu,bilav,billa...."

"khisak le idhar se ,ye main last warning de raha hoon....warna "

"warna kya...haaaann ,bolo warna kya...kya kar loge tum..."mujhe challenge karte hue Esha ek kadam aage badhi.....

"kamal hai yar,ise to mujhse dar hee nahi lagta..."Esha ke ek kadam aage badhne ke baad maine khud se kaha aur Esha ki'warna kya...' ka jawab sochane laga....

"Esha ,dekh ab to chup-chap yahan se jati hai ya main apni super power dikhau..."

"jab tak tum nahi jaoge, tab tak main bhi nahi jaungi..."

"tu jaa yahan se nahi to main tujhe kiss kar lunga...phir mat bolna ki maine aisa kyun kiya...."

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Mere kiss karne wale jawab ka Esha ke andar jabardast reaction hua aur wo turant apni car me baithkar wahan se chali gayi.....

"mujhse argument karti hai,ab aa gayi na line pe... "

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Golden Jubilee ke function ke liye ab taiyariya joro se chal rahi thi.Singging,dancing etc. Jaise programme ki practice to college ke samay hee ho jati thi ,lekin sports wagerah ki practice college ke baad shuru hoti thi...har branch ki ek-ek team bana di gayi thi, jo ki ek tay kiye hue din me dusare branch se bhidne wali thi...in short kahe to college me is samay competitive mahol tha, jisme College ke lagbhag aadhe se adhik students jhulas rahe the....College ke us competitive mahol se mere khas dost Arun,Saurabh ki tarah sirf wo hee log bache the,jo Golden jubilee ke is golden mauke par kisi bhi field me active nahi the....

8th Sem. me aate tak mujhe aur hostel me rahne wale mere kuchh dosto ko shaam ke waqt koyi sa game khelne ki aadat lag chuki thi,jisase hamari sharir me ek nayi energy ghus jati thi aur phir raat ko ham log pel ke daru peete the....lekin aajkal ham jis bhi ground me shaam ke waqt energy lene jaate wahan branch wise launde practice karte hue milte the,isliye ab hamara ground hamaare hostel ka corridor bana....jahan ham log Cricket,football bade aaram se khelte the......

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"main,Arman bhai ki team me rahunga..."Pandey ji ko jab Arun ne apni team me liya to Rajshri Pandey ek dam se chilla utha....

"mar MC, jaa chus le Arman ka..."Pandey ji ka collar pakad kar use Arun ne meri taraf dhakela aur bola"bhag lawaDe meri team se...."

"Saurabh darling meri taraf..."maine apni team ke agle khiladi ko select kiya...

"to phir ye kallu kanghichor meri taraf..."Kallu ko hath dikhate hue Arun ne kaha"aa ja be kaliye..."

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Maine aur Arun ne 4-4 laundo ki team banayi aur corridor me football khelne ke liye aa pahunche....is beech ek aur launda wahan aaya aur usne bhi khelne ki ichchha prakat ki....

"jaa pahle apne liye koyi jodidar lekar aa...aise me to ek taraf 5 aur ek taraf 4 launde rahenge..."us ladke se Arun ne kaha...

"sun be Arun...tu rakh le ise, tum jaise gaanDul 5 kya 50 bhi ho jaye tab bhi mujhe koyi fark nahi padta..."

"main kyun rakhu, tu hee rakh le aur beta gaanDul kaun hai ye to match ke baad hee pata chalega,jab main tera hath-pair tod dunga..."

"thik hai phir...aaja be,idhar khada ho ja..."us naye launde ko apni taraf aane ka ishara karte hue maine khud se kaha"ek baar phir se Arun ko chodu bana diya , i'm so smart...ab to 100 main jeet ke hee rahunga...."

Jab corridor me dono team tainat ho gayi to main sabse pahle Rajshri ke paas gaya aur bola.."tu jaa ke goalkeeping kar be lodu aur beta yadi ek baar bhi football is paar se us paar gayi to soch lena..."

"Arman bhai..aap fikra mat karo...ek baar main Rajshree kha loon,uske baad to Koyi mayi ka laal mujhe hara nahi sakta..."

Pandey ji ko goalkeeper banane ke baad main Saurabh ke paas gaya aur bola"sun be, tu defence karna aur jo koyi bhi football lekar tere paas aaye, sale ka hath-pair tod dena....main forward khelunga..."

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Waise to mujhe football khelna nahi aata tha lekin jaise hamlog langar dance karte the,waise hee ham log langar football khel rahe the,jahan koyi rules nahi...bas football goal honi chahiye ,uske liye chahe koyi sa bhi tareeka apnaya jaye....jab main apni team ki taraf se forward khelne aaya to mujhe dekhkar Arun bhi forward khelne ke liye aage aa gaya....Kallu Kanghichor mujhe cover karne ke liye mere paas hee khada tha aur Arun mere thik samne mujhe galiya de raha tha.....

"three....two....one...start"

teen tak ki ginti samapt hone ke baad maine football ko apni pahli hee kick me Arun ke thobde ko nishana banana chaha, lekin football se mera pair hee touch nahi hua bole to Arun ke thobde ko bigadne ka maine ek sunahara avasar miss kar diya aur kallu football lekar aage bada...

"Sauraaabh....aage mat jane dena, munh me laat marna is kaliye ke..." apna pura dam lagakar main cheekha...jiske baad kallu dar ke mare jahan tha ,usne football ko wahi choda aur wapas laut aaya....

"aise tumlog maar-peet karoge to main nahi khelunga... "kallu Arun ke paas jakar mujhse bola...

"abey Arman, 100 ke liye tu itna neeche gir jayega...maine kabhi socha nahi tha, thoo hai tujhpar..."

"abhi kal ke match me jab tu mere taraf tha ,tab to bahut bol raha tha ki maar us kaliye ko....isliye ab apni ye nautanki band kar aur game shuru kar...."maine kaha aur palat kar Saurabh ko aawaz diya "thaam le be football aur yadi ab kallu is area me aaya to uchakar uske munh me juta ghusa dena...."

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असलियत मे मैं और मेरी टीम ऐसा कुच्छ भी नही करने वाली थी ,ये तो सिर्फ़ हमारा मॅच जीतने का प्लान था,जो मैने अभी-अभी बनाया था...जिससे सामने वाली टीम के लौन्डे हमारी तरफ डर के मारे ना आ सके....लेकिन मॅच के शुरुआती हालत देखकर मुझे अंदाज़ा हो चला था कि आज तो यहाँ वर्ल्ड वॉर ३र्ड होने वाला है.

कल्लू को डरा हुआ पाकर अरुण ने उससे अपनी पोज़िशन चेंज की और खेल फिर से शुरू हुआ....

मैं फुटबॉल लेकर आगे बढ़ा तो डिफेन्स करने के लिए कल्लू मेरे सामने आ गया और मैने फुटबॉल को मारने के बहाने उसके पैर मे एक किक जड़ दी जिसके बाद वो लन्गडाते हुए सामने से हट गया....अरुण मेरे पीछे था ,इसलिए मैं तूफान की तरह सामने वाली टीम की धज्जिया उड़ाते हुए आगे बढ़ता गया लेकिन मेरे आख़िरी शॉट को उनके गोलकीपर ने रोक लिया....

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"तुझे बोला था ना बे कालिए कि बीच मे मत आना, लेकिन तू माना नही...अब चूस..."पीछे अपनी टीम की तरफ जाते हुए मैने कल्लू से कहा,जो अपने पैर सहला रहा था....

अरुण की टीम से अरुण ही फुटबॉल को इधर-उधर नचाते हुए हमारी तरफ ला रहा था . अरुण को पेलने का मेरा कोई प्लान नही था लेकिन दिक्कत ये भी थी कि मुझे ढंग से फुटबॉल खेलना भी नही आता था कि मैं उसे बिना चोट पहुचाए उससे फुटबॉल छीन लूँ, इसलिए अरुण को पेलने के बहाने से मैं आगे बढ़ा और सीधे जाकर उसे अपने दोनो हाथो से पकड़ लिया...

"सौराअभ ,फुटबॉल छीन कर आगे बढ़ और यदि कल्लू बीच मे आया तो जूता उतारकर सीधे मुँह मे मारना लवडे के..."चीखते हुए मैने सौरभ को आवाज़ दी....

"ये तो गद्दारी है बे, छोड़ मुझे...ये तो नियम के खिलाफ है"आँखे दिखाते हुए अरुण बोला...

"अच्छा बेटा, आज ये नियम के खिलाफ हो गया...कल तू जब मेरी टीम मे था,तब तो तू ही ऐसे फ़ॉर्मूला यूज़ कर रहा था...."

"कल की बात कुच्छ और थी...आज ये सब नही चलेगा..."

"ऐसे-कैसे नही चलेगा...पापा जी का राज़ है क्या...चल खिसक इधर से..."जब सौरभ ने गोल कर दिया तो अरुण को छोड़ते हुए मैने कहा...

"अब देख बेटा,अरमान अपुन क्या कहर ढाता है..."

कहर ढाने की धमकी देकर अरुण अपनी टीम के पास गया और उनसे कुच्छ बाते करने लगा.हम लोग 1-0 से लीड कर रहे थे,जिसे देखकर अरुण की गान्ड फटने लगी और उसने कल्लू से जाकर कहा कि यदि तुझे कोई मारे तो तू भी उसे मारना....

अरुण की टीम ने लगभग 5 मिनिट तक अपनी प्लॅनिंग बनाई ,जिसके बाद कल्लू एक बार फिर मेरे पास आकर खड़ा हो गया और तो और उनका गोलकीपर भी किक मारने के बाद हमारी तरफ बढ़ा....अरुण की टीम का ये कदम एक तरह से हैरतअंगेज़ कारनामा था और जब तक मैं कुच्छ समझता उसके पहले ही कल्लू ने मुझे ज़ोर से पकड़ कर दीवार से सटा दिया और उधर अरुण ने पीछे से सौरभ की गर्दन पकड़ ली ,जिससे सौरभ अपनी जगह से हिल तक नही पाया....हमारे बाकी दो प्लेयर्स को भी ऐसे ही पकड़ कर गिरा दिया गया और अरुण के टीम के गोलकीपर ने अपने गोल पोस्ट से फुटबॉल लाकर हमारे गोल पोस्ट मे डाल दी

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"इसकी माँ का...ये तो फुटबॉल के नियम की धज्जिया उड़ा दी बे तुमने...तुम्हारा गोलकीपर कैसे इतना अंदर आ सकता है..."हैरान-परेशन सा कुच्छ सेकेंड्स के लिए मैं जैसे कोमा मे चला गया था...

"अब बोल लवडे अरमान,क्या बोलता है...तुझे लगता है कि सिर्फ़ तू ही एकलौता ऐसा है...जो प्लान बना सकता है...अब तो तू गया काम से..."

अरुण के इन भयंकर वाक़्यो को सुनकर मेरा खून खौल उठा और मैने अपनी टीम के चारो मेंबर को अपने पास बुलाया और उन्हे समझाया कि हमे क्या करना है...हमारे 5 मिनिट के ब्रेक के बाद हमारे प्लान के मुताबिक़ पांडे जी ने फुटबॉल को पैर से किक करने की बजाय हाथ मे पकड़ा और तेज़ी से सामने वाले पाले की तरफ भागा...अब हमारा ये फुटबॉल मॅच फुटबॉल मॅच ना होकर रग्बी मॅच बन गया था, जिसमे बॉल को हाथ मे लेकर भागना होता है...पांडे जी की इस हरक़त से अरुण और उसकी पूरी टीम के होश उड़ गये और वो पांडे जी को रोकने के लिए तुरंत दौड़ पड़े...लेकिन तभिच पांडे जी ने बॉल मेरी तरफ फेका,जिसे मैने बिना देर किया लपक लिया और अरुण की टीम के गोलकेपर को हाथो से घसीट कर फुटबॉल के साथ गोल कर दिया.....

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"अरुण लंड, अब बोल...कैसा लगा मेरा प्लान...अब तू गया बेटा..."

"अब देख मैं क्या करता हूँ..."बोलकर अरुण ने फिर से अपनी टीम को अपने पास बुलाया और 5 मिनिट तक उनसे डिसकस करता रहा....

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डिस्कशन के बाद जब गेम शुरू हुआ तो अब फुटबॉल का गेम हॅंडबॉल का गेम बन गया. अरुण और उसके टीम वाले पांडे जी के रग्बी गेम की तरह फुटबॉल को लेकर दौड़े नही बल्कि उन्होने दूर-दूर मे खड़े अपने टीम के लौन्डो को फुटबॉल फेक कर फुटबॉल पास किया और हमारे निकम्मे गोलकीपर सर राजश्री पांडे जी की बदौलत हमने भी दूसरा गोल खा लिया.....जिसके बाद अरुण ने फिर मुझे हेकड़ी दिखाई....

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मेरे और अरुण की टीम के बीच खेला गया वो फुटबॉल मॅच ,एक फुटबॉल मॅच ना होकर यूनिवर्सल मॅच हो गया था, जिसमे कभी कोई फुटबॉल खेलता ,तो कोई रग्बी खेलता और जिसका दिल करता वो हमारे उस फुटबॉल मॅच को हॅंडबॉल का गेम भी बना देता था. बोले तो ~लंगर~ फुटबॉल मॅच...जिसमे कोई रूल्स नही ,बस फुटबॉल गोल होनी चाहिए ,जिसके लिए चाहे कोई सा भी साम दाम दंड भेद अपनाना पड़े...

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"अबकी बार गोल होने के बाद जिसके अधिक पॉइंट रहेंगे,वो मॅच जीतेगा...क्या बोलता है..."हान्फते हुए अरुण ने मुझसे कहा...

"ठीक है...ये लास्ट गोल..अब तक का स्कोर बराबर है, इसलिए जो इस बार गोल दागेगा मॅच और 100 उसके..."मैने भी हान्फते हुए कहा..."लेकिन उसके पहले 5 मिनिट का ब्रेक लेते है...क्या बोलता है "

"मैं भी यही सोच रहा था..."

हमारा वो लंगर फुटबॉल मॅच तक़रीबन एक घंटे तक चला ,जिसमे दोनो टीम ने हाथ-पैर से 10-10 गोल दागे थे....इसलिए 5 मिनिट के ब्रेक के बाद जो भी टीम गोल करती वो एक पॉइंट की लीड लेकर विन्नर रहती.

अपने रूम मे आकर मैने पानी का बॉटल खोला और पूरा बॉटल खाली कर दिया....लेकिन तब भी आधी प्यास बाकी थी...मेरे जैसा हाल वहाँ बैठे अरुण, सौरभ ,पांडे जी और उन सभी का था जो मॅच खेल रहे थे....पांडे जी इतने थक गये कि ज़ोर-ज़ोर से हान्फते हुए ज़मीन पर औधे लेट गये और बोले की 'अरमान भाई...अब मेरे मे हिम्मत नही बची है...आप संभाल लो...'

'एक तो गया काम से...सौरभ तेरे मे कुच्छ दम बाकी है या तू भी तेल लेने जाएगा..."

"मैं खेलूँगा...."

"चल फिर बाहर आ, प्लान बनाते है..."

पांडे जी को वही ज़मीन मे छोड़ कर मैं, सौरभ और बाकी दो के साथ बाहर आया और प्लान बनाने लगा....

आख़िरी गोल हमारी तरफ हुआ था, इसलिए फुटबॉल लेकर हमलोग मॅच स्टार्ट करने वाले थे...जब अरुण की टीम सामने तैनात हो गयी तो मैने सौरभ को उनके बीच भेजा और अपने टीम के एक लौन्डे के हाथ मे फुटबॉल देकर रग्बी वाले गेम की तरह भागने के लिए कहा....उस लौन्डे ने ठीक वैसा ही किया लेकिन हाफ पिच पर अरुण ने मेरी टीम के उस लौन्डे को पकड़ लिया जिसके तुरंत बाद प्लान के मुताबिक़ सौरभ, जो पीछे खड़ा था...उसने अरुण की गर्दन को ठीक वैसे ही दबोच लिया ,जैसे की अरुण ने पहले सौरभ की गर्दन को दबोचा था....

अरुण की टीम का गोलकीपर अबकी बार अपनी ही जगह पर खड़ा रहा लेकिन अरुण को सौरभ के चंगुल से छुड़ाने के लिए कालिया आगे आया और तभिच मैने अपना बदला पूरा करने के उद्देश्य से घुमा कर एक लात कालिए को दे मारी और कालिया सीधे दीवार से जा भिड़ा ,जिसके बाद दीवार ने सर आइज़ॅक न्यूटन के थर्ड लॉ का पालन करते हुए कालिए को नीचे ज़मीन पर गिरा दिया....

"मुझसे भिड़ता है बोसे ड्के..अब जा के इलाज़ करवा लेना..."कालिए के शरीर को जगह-जगह से तोड़ने के बाद मैने उससे कहा....

अरुण को सौरभ ने फँसा रखा था और कालिया नीचे ज़मीन पर लेटा कराह रहा था. अब अरुण की टीम मे सिर्फ़ दो लोग बचे थे और वो दोनो गोल पोस्ट मे जाकर अपना हाथ फैला कर खड़े हो गये....

"तुम दोनो को मालूम नही क्या कि मैं बॅस्केटबॉल मे माहिर हूँ...बेटा जब मैं उस छोटे से छेद मे(रिंग) बॅस्केटबॉल घुसा देता हूँ तो फिर यहाँ मुझे गोल करने से कैसे रोकोगे बे..."

मेरा इतना कॉन्फिडेन्स देखकर उन लड़को का डर और भी बढ़ गया और वो दोनो अपने दोनो हाथ फैला कर एक-दूसरे के बगल मे खड़े हो गये....

Asliyat me main aur meri team aisa kuchh bhi nahi karne wali thi ,ye to sirf hamara match jeetne ka plan tha,jo maine abhi-abhi banaya tha...jisase samne wali team ke launde hamari taraf dar ke maare na aa sake....lekin match ke shuruati halat dekhkar mujhe andaza ho chala tha ki aaj to yahan world war III hone wala hai.

Kallu ko dara hua pakar Arun ne usase apni position change ki aur khel phir se shuru hua....

main football lekar aage badha to defence karne ke liye kallu mere samne aa gaya aur maine football ko marne ke bahane uske pair me ek kick jad di jiske baad wo langdate hue saamne se hat gaya....Arun mere peeche tha ,isliye main toofan ki tarah samne wali team ki dhajjiya udate hue aage badhta gaya lekin mere aakhiri shot ko unke goalkeeper ne rok liya....

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"tujhe bola tha na be kaliye ki beech me mat aana, lekin tu mana nahi...ab chus..."peeche apni team ki taraf jate hue maine kallu se kaha,jo apne pair sahla raha tha....

Arun ki team se Arun hee football ko idhar-udhar nachate hue hamari taraf la raha tha . Arun ko pelne ka mera koyi plan nahi tha lekin dikkat ye bhi thi ki mujhe dhang se football khelna bhi nahi aata tha ki main use bina chot pahuchaye usase football chheen loon, isliye Arun ko pelne ke bahane se main aage badha aur seedhe jakar use apne dono hatho se pakad liya...

"Sauraaabh ,football chheen kar aage badh aur yadi kallu beech me aaya to juta utarkar seedhe munh me marna lawaDe ke..."cheekhte hue maine Saurabh ko aawaz di....

"ye to gaddari hai be, chod mujhe...ye to niyam ke khilaf hai"Aankhe dikhate hue Arun bola...

"achha beta, aaj ye niyam ke khilaf ho gaya...kal tu jab meri team me tha,tab to tu hee aise formula use kar raha tha...."

"kal ki baat kuchh aur thi...aaj ye sab nahi chalega..."

"aise-kaise nahi chalega...papa ji ka raaz hai kya...chal khisak idhar se..."jab Saurabh ne goal kar diya to Arun ko chodte hue maine kaha...

"ab dekh beta,Arman apun kya kahar dhata hai..."

Kahar dhane ki dhamki dekar Arun apni team ke paas gaya aur unse kuchh baate karne laga.ham log 1-0 se lead kar rahe the,jise dekhkar Arun ki gaanD fatne lagi aur usne kallu se jakar kaha ki yadi tujhe koyi mare to tu bhi use marna....

Arun ki team ne lagbhag 5 minute tak apni planning banayi ,jiske baad kallu ek baar phir mere paas aakar khada ho gaya aur to aur unka goalkeeper bhi kick marne ke baad hamari taraf badha....Arun ki team ka ye kadam ek tarah se hairatangez karnama tha aur jab tak main kuchh samajhta uske pahle hee kallu ne mujhe jor se pakad kar deewar se sata diya aur udhar Arun ne peeche se Saurabh ki garden pakad li ,jisase Saurabh apni jagah se hil tak nahi paya....hamaare baki do players ko bhi aise hee pakad kar gira diya gaya aur Arun ke team ke goalkeeper ne apne goal post se football lakar hamaare goal post me daal di

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"iski maa ka...ye to football ke niyam ki dhajjiya uda di be tumne...tumhara goalkeeper kaise itna andar aa sakta hai..."hairan-pareshan sa kuchh seconds ke liye main jaise coma me chala gaya tha...

"ab bol lawaDe Arman,kya bolta hai...tujhe lagta hai ki sirf tu hee eklauta aisa hai...jo plan bana sakta hai...ab to tu gaya kaam se..."

Arun ke in bhayankar vakyo ko sunkar mera khoon khaul utha aur maine apni team ke charo member ko apne paas bulaya aur unhe samjhaya ki hame kya karna hai...hamaare 5 minute ke break ke baad hamaare plan ke mutabiq pandey ji ne football ko pair se kick karne ke bajay hath me pakda aur tezi se samne wale pale ki taraf bhaga...ab hamara ye football match football match na hokar RUGBY match ban gaya tha, jisme ball ko hath me lekar bhagna hota hai...Pandey ji ki is harqat se Arun aur uski puri team ke hosh udd gaye aur wo pandey ji ko rokne ke liye turant daud pade...lekin tabhich pandey ji ne ball meri taraf feka,jise maine bina der kiya lapak liya aur Arun ki team ke goalkepper ko hatho se ghaseet kar football ke sath goal kar diya.....

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"Arun lund, ab bol...kaisa laga mera plan...ab tu gaya beta..."

"ab dekh main kya karta hoon..."bolkar Arun ne phir se apni team ko apne paas bulaya aur 5 minute tak unse discuss karta raha....

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Discussion ke baad jab game shuru hua to ab football ka game Handball ka game ban gaya. Arun aur uske team wale pandey ji ke Rugby game ki tarah football ko lekar daude nahi balki unhone door-door me khade apne team ke laundo ko football fek kar football pass kiya aur hamaare nikamme goalkeeper Sir Rajshree Pandey ji ki badaulat hamne bhi dusara goal kha liya.....jiske baad Arun ne phir mujhe hekadi dikhayi....

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Mere aur Arun ki team ke beech khela gaya wo football match ,ek football match na hokar universal match ho gaya tha, jisme kabhi koyi football khelta ,to koyi Rugby khelta aur jiska dil karta wo hamaare us football match ko handball ka game bhi bana deta tha. Bole to ~langar~ football match...jisme koyi rules nahi ,bas football goal honi chahiye ,jiske liye chahe koyi sa bhi saam daam dand bhed apnana pade...

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"abki baar goal hone ke baad jiske adhik point rahenge,wo match jeetega...kya bolta hai..."haanfate hue Arun ne mujhse kaha...

"thik hai...ye last goal..ab tak ka score barabar hai, isliye jo is baar goal dagega Match aur 100 uske..."maine bhi haanfate hue kaha..."lekin uske pahle 5 minute ka break lete hai...kya bolta hai "

"main bhi yahi soch raha tha..."

hamara wo langar football match taqriban ek ghante tak chala ,jisme dono team ne hath-pair se 10-10 goal dage the....isliye 5 minute ke break ke baad jo bhi team goal karti wo ek point ki lead lekar winner rahti.

apne room me aakar maine pani ka bottle khola aur pura bottle khali kar diya....lekin tab bhi aadhi pyas baki thi...mere jaisa haal wahan baithe Arun, Saurabh ,Pandey ji aur un sabhi ka tha jo match khel rahe the....Pandey ji itne thak gaye ki jor-jor se haanfate hue zameen par audhe let gaye aur bole ki 'Arman bhai...ab mere me himmat nahi bachi hai...aap sambhal lo...'

'ek to gaya kaam se...Saurabh tere me kuchh dam baki hai ya tu bhi tel lene jayega..."

"main khelunga...."

"chal phir bahar aa, plan banate hai..."

Pandey ji ko wahi zameen me chod kar main, Saurabh aur baki do ke sath bahar aaya aur plan banane laga....

aakhiri goal hamari taraf hua tha, isliye football lekar hamlog match start karne wale the...jab Arun ki team samne tainat ho gayi to maine Saurabh ko unke beech bheja aur apne team ke ek launde ke hath me football dekar Rugby wale game ki tarah bhagne ke liye kaha....us launde ne thik waisa hee kiya lekin half pitch par Arun ne meri team ke us launde ko pakad liya jiske turant baad plan ke mutabiq Saurabh, jo peeche khada tha...usne Arun ki gardan ko thik waise hee daboch liya ,jaise ki Arun ne pahle Saurabh ki gardan ko dabocha tha....

Arun ki team ka goalkeeper abki baar apni hee jagah par khada raha lekin Arun ko Saurabh ke changul se chhudane ke liye kaliya aage aaya aur tabhich maine apna badla pura karne ke uddeshya se ghama kar ek laat kaliye ko de mari aur kaliya seedhe deewar se ja bhida ,jiske baad deewar ne Sir Isaac Newton ke third law ka palan karte hue kaliye ko neeche zameen par gira diya....

"mujhse bhidta hai bose dk..ab ja ke ilaaz karwa lena..."kaliye ke sharir ko jagah-jagah se todne ke baad maine usase kaha....

Arun ko Saurabh ne phansa rakha tha aur kaliya neeche zameen par leta karah raha tha. Ab Arun ke team me sirf do log bache the aur wo dono goal post me jakar apna hath faila kar khade ho gaye....

"tum dono ko maloom nahi kya ki main basketball me mahir hoon...beta jab main us Chote se chhed me(ring) basketball ghusa deta hoon to phir yahan mujhe goal karne se kaise rokoge be..."

Mera itna confidence dekhkar un ladko ka darr aur bhi badh gaya aur wo dono apne dono hath faila kar ek-dusare ke bagal me khade ho gaye....
 


हमारे हॉस्टिल का कॉरिडर ज़्यादा चौड़ा नही था ,इसलिए जब वो दोनो अपने हाथ फैला कर खड़े हो गये तो पूरा का पूरा गोल पोस्ट उन दोनो के बॉडी से ढक गया....इसलिए गोल करने मे मुझे अब बड़ी दिक्कत हो रही थी...लेकिन ज़्यादा देर तक नही...मैने फुटबॉल को अपने हाथ मे लिया और घुमाकर उन दोनो मे से एक के पेट मे दे मारा.....

"आआययययीीई.....गान्ड फट गयी बे..."बोलते हुए वो लड़का,जिसके पेट मे मैने अभी-अभी फुटबॉल तना था,वो वही अपना पेट पकड़ कर बैठ गया...

अब जब एक घायल हो चुका था तो मेरे लिए गोल करने का काम बेहद आसान हो गया था और फिर मैने बिना समय गँवाए आख़िरी गोल दाग दिया....

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"ला दे 100 "आख़िरी गोल करने के बाद मैं अरुण के पास गया और उससे बेट के पैसे माँगे....

"ले लेना ना बाद मे...कही भागे जा रहा हूँ क्या...."

"चल बाद मे दे देना..."अपने रूम की तरफ आते हुए मैने विन्नर वाली स्माइल अरुण को दी...लेकिन मेरे रूम मे घुसने से पहले ही कालिया मुझे कुच्छ बोलने लगा...

"क्या हुआ बे, मैने तो तुझे पहले ही वॉर्न किया था कि मेरे रास्ते मे मत आना...लेकिन नही,...तेरी ही गान्ड मे बड़ी खुजली थी..."

"लवडे, मुझे कल अपनी बहन को लेकर हॉस्पिटल जाना था...लेकिन अब नही जा पाउन्गा...आआअहह"

"अबे तो दर्द से कराह रहा है या चुदाई कर रहा है...दर्द मे भी कोई ऐसे कराहता है क्या..आआअहह "

"बात मत पलट अरमान...तूने ये सही नही किया...."

"अब ज़्यादा नौटंकी मत कर बे कल्लू..."कालिए को सहारा देकर उठाते हुए मैने कहा "वैसे तेरी बहन कॉलेज मे पढ़ती है,ये मुझे आज ही पता चला...कौन है वो..."

"फर्स्ट एअर मे है...नाम है आराधना शर्मा..."

"आराधना शर्मा... खा माँ कसम "जबरदस्त तरीके से चौुक्ते हुए मैने कल्लू से पुछा....

मुझे इस तरह से शॉक्ड होता देख कल्लू भी बुरी तरह चौका और डरने लगा कि कही मैं उसे फिर ना पेल दूं . मैं इसलिए इतनी बुरी तरह चौका था क्यूंकी आराधना और कल्लू के फेस मे कोई मेल-जोल नही था.

आराधना उतनी गोरी भी नही थी, लेकिन कल्लू जैसे निहायत काली भी नही थी...आराधना एवन माल भले ना हो लेकिन ऐसी तो थी ही कि यदि वो चोदने का प्रपोज़ल दे तो मैं मना ना करूँ वही कल्लू एक दम बदसूरत मेंढक के जैसे मुँह वाला था और तो और साला कंघी भी चुराता था....

"ऐसे क्या देख रहा है बे, फिर से मारेगा क्या..."

"आराधना तेरी सग़ी बहन है या फिर तेरे चाचा,मामा,काका,फूफा,तौजी....एट्सेटरा. एट्सेटरा. की बेटी है..."

मेरे द्वारा ऐसा सवाल करने पर पहले तू कल्लू मुझे खा जाने वाली नज़रों से देखने लगा लेकिन जब उसे ऐसा लगा कि वो मेरा कुच्छ नही उखाड़ सकता तो वो थोड़ा मायूस और थोड़े गुस्से के साथ बोला...

"आराधना मेरी दूर की बहन है...तुझे उससे क्या..."

"तभी मैं सोचु कि तुझ जैसे कालिया की बहन आराधना कैसे हो सकती है..." आराधना ,कल्लू की दूर के रिश्ते की बहन है ये जानकार मैं बड़बड़ाया और वहाँ से अपने रूम मे आया....

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मेरे रूम मे इस वक़्त सौरभ, अरुण के साथ पांडे जी भी मौज़ूद थे,जो फुटबॉल मॅच के दौरान लगी चोट को सहला रहे थे...अरुण के हाथ और गर्दन के पास की थोड़ी सी चमड़ी घिस गयी थी,वही सौरभ सही-सलामत था......

"देख लिया बे,मुझे चॅलेंज करने का नतीजा, अब अगली बार से औकात मे रहना..वरना इस बार गर्दन के पास की थोड़ी सी चमड़ी उखड़ी है,अगली बार पूरा गर्दन उखाड़ दूँगा...."शहन्शाहो वाली स्टाइल मे मैं अपने बेड पर बैठते हुए बोला"मुझे देख ,मैं कैसे मॅच के बाद भी रिलॅक्स फील कर रहा हूँ..."

"ज़्यादा बोलेगा तो 100 के बदले मे मैं लंड के 100 बाल थमाउन्गा..."आईने मे देखकर अपनी गर्दन को सहलाते हुए अरुण ने कहा"और बेटा, आईने मे देख ,तेरा माथा फोड़ दिया है मैने..."

अरुण के इतना बोलने के साथ ही मेरा हाथ खुद ब खुद मेरे सर पर गया और जैसे ही मैने अपना हाथ अपने माथे पर फिराया तो थोड़ी सी जलन हुई....

"खून निकल रहा है क्या बे सौरभ..."

"थोड़ी सी खरॉच है बे...बस और कुच्छ नही...और ये बता तू उस कन्घिचोर से किस लौंडिया के बारे मे बात कर रहा था..."

"ऐसिच है एक आइटम...उसी के बारे मे बात कर रहा था..."बात को टालते हुए मैने कहा...क्यूंकी यदि मैं उन्हे आराधना के बारे मे बताता तो फिर उन्हे पूरी कहानी बतानी पड़ती कि मैं कैसे कॅंटीन मे आराधना से मिला और वो आंकरिंग की प्रॅक्टीस करने भी आती है...ब्लाह..ब्लाह.

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अगले दिन जब मैं कॉलेज के लिए हॉस्टिल से निकल रहा था तो जो बात मेरे दिमाग़ मे थी ,वो ये कि एश का मुझे देखकर क्या रियेक्शन होगा, वो मुझसे बिहेव कैसे करेगी...मुझसे बात भी करेगी या नही...क्यूंकी कल शाम के वक़्त पार्किंग मे मैने उसे कहा था कि 'यदि वो मुझसे पहले नही जाएगी तो मैं उसकी पप्पी ले लूँगा' . उस वक़्त तो मैने ये कह दिया था लेकिन बाद मे जब मैने इसपर गौर किया और इतमीनान से सोचा तो मुझे ऐसा लगा कि मुझे एश को वो नही बोलना चाहिए था....इसलिए मैं ऑडिटोरियम की तरफ जाते वक़्त थोड़ा घबरा भी रहा था .

"एक काम करता हूँ, ऑडिटोरियम मे जाते ही एश को बोल दूँगा कि वो कल वाली बात का बुरा ना माने...वो तो मैने ऐसे ही मज़ाक मे कह दिया था....एसस्स..यह्िच बोलूँगा,तब वो मान जाएगी..."

ऑडिटोरियम की तरफ जाते वक़्त मैने बाक़ायदा वो लाइन्स भी बना डाली, जो मुझे एश से बोलना था.उस दिन एश मुझे ऑडिटोरियम के बाहर अकेली खड़ी मिली और मैने दिल ही दिल मे उपरवाले का शुक्रिया अदा किया क्यूंकी यदि इस वक़्त एश मुझे कुच्छ उल्टा सीधा भी कह देती तो कोई और नही सुनता....वरना यदि एश किसी तीसरे के सामने मुझपर चिल्लाती तो मेरा अहंकार जो मुझमे कूट-कूट कर भरा हुआ है...वो अपनी इन्सल्ट होते हुए देख तुरंत बाहर आता और जिसका नतीज़ा एश की सबके सामने घोर बेज़्जती के रूप मे निकलता....

"गुड मॉर्निंग, यहाँ खड़ी मेरा इंतज़ार कर रही थी क्या "हमेशा की तरह हँसते-मुस्कुराते हुए मैने कहा....इस उम्मीद मे कि एश भी हँसते-मुस्कुराते हुए जवाब देगी...

"तुमसे कोई मतलब कि मैं यहाँ खड़ी होकर क्या कर रही हूँ...अपने काम से मतलब रखो..."चिड़चिड़ेपन के साथ एश ने मेरा स्वागत किया....

कसम से यदि उस वक़्त वहाँ एश की जगह कोई और लड़की होती ,यहाँ तक की आंजेलीना सिल्वा की जगह आंजेलीना जोली भी होती और वो मेरे गुड मॉर्निंग का ऐसा चिड़चिड़ा जवाब देती तो मैं सीधे घुमा के एक लाफा मारता ,लेकिन वो लड़की एश थी इसलिए मैं शांत ही रहा....ये सोचकर की शायद उसका मूड खराब होगा.

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"पक्का ,आज अंकल जी ने किराए के पैसे नही दिए होंगे...इसीलिए इतना भड़क रही है. लेकिन टेन्षन मत ले ,मैं बहुत रहीस हूँ....बोल कितना रोक्डा दूँ...तू कहे तो ब्लॅंक चेक साइन करके दे दूं..."एसा का मूड ठीक करने के इरादे से मैने ऐसा कहा....लेकिन एश पर इसका उल्टा ही असर हुआ.

एश और भी ज़्यादा मुझपर भड़क गयी और उसने कुच्छ ऐसे बाते बोल दी ,जो सीधे तीर के माफ़िक़ मेरे दिल मे चुभि, वो बोली...

"तुम्हे लगता है कि मैं तुमसे बात भी करना पसंद करती हूँ...हाआंन्न , तुम जैसे लड़को को मैं अच्छी तरह से जानती हूँ, जहाँ कोई रहीस लड़की दिखी नही कि उसके पीछे पड़ गये....गौतम के साथ तुमने जो किया ,उसके बाद तो मुझे तुम्हारी नाम से भी घिन आती है...और जितना रुपये तुम्हारे ग़रीब माँ-बाप तुम्हे एक महीने मे भिजवते है ना उतना तो मैं हर दिन बार,पब वगेरह मे टिप दे देती हूँ...ब्लडी नॉनसेन्स...पता नही कहा-कहा से चले आते है,भिखारी..."

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एश के मुँह से ऐसे-ऐसे लफ्ज़ सुनकर मुझे पहली बार मे तो यकीन ही नही हुआ कि एश ने मुझसे ही वो सब कहा है...मेरा कान ऐसे सन्न हुआ जैसे किसी ने ज़ोर से मेरे कान मे झापड़ दे मारा हो....एकपल के लिए मुझे समझ ही नही आया कि मैं क्या करूँ, लेकिन एश ने ऐसे-ऐसे शब्द बोल दिए थे कि मेरे अहंकार ने मेरे प्यार को तुरंत मात दे दी और मैं बोला...

"देखो, मेरे मोबाइल मे कॉल तेरी तरफ से आया था ना कि मैने तुझे कॉल किया था...इसलिए ऐसा सोचना भी मत कि मुझे तुझ जैसी लड़की से बात करने मे रत्ती भर की भी दिलचस्पी है...वो तो ऑडिटोरियम मे देखा कि तुझसे बाकी लड़कियाँ बात नही करती इसलिए तरस खाकर तेरे पास दो दिन क्या बैठ गया, दो चार बाते क्या कर ली...तूने तो उसका उल्टा-सीधा ही मतलब निकल लिया...फूल कही की...और तूने मेरे माँ-बाप को ग़रीब कहाँ ? तेरी तो...अबे जितने पैसा तेरी पूरी ग़रीब फॅमिली एक महीने मे उड़ाती है है ना उतना तो मेरा सिर्फ़ दारू का बिल रहता है....और तू खुद को बहुत रिच समझती है..."जेब से गॉगल निकाल कर पहनते हुए मैने कहा"जितनी कि तू नही होगी,उतने का तो सिर्फ़ मेरा गॉगल है..अब चल साइड दे, अंदर वो छत्रु मुझसे आंकरिंग की टिप्स लेने के लिए मेरा इंतज़ार कर रहा होगा..."

मैने तुरंत एश को पकड़ कर एकतरफ खिसकाया . मेरे द्वारा अपनी इन्सल्ट होते देख एश की आग और भी भड़क गयी और जब मैने उसे छुआ तो वो चीखते हुए बोली"डॉन'ट टच मीईई...."

"सॉरी कि मैने तुझ जैसी को छुकर अपना हाथ गंदा कर लिया और सुन ,अगली बार मुझसे ज़ुबान संभाल कर बात करना वरना ऐसी बेज़्जती करूँगा कि 24 अवर्स मेरे लफ्ज़ झापड़ की तरह कान मे बज़ेंगे...अब मुझे घूर्ना बंद कर,वरना मेरा मूड खराब हुआ तो एक-दो झापड़ यही लगा दूँगा....साली आटिट्यूड दिखाती है..."

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एश के साथ घमासान लड़ाई करके मैं ऑडिटोरियम मे घुसा और पहली बार मुझे एश के साथ मिस्बेहेव करने का कोई मलाल नही था, बल्कि मेरा दिल कर रहा था,अभिच बाहर जाकर उसपर म्सी,बीसी,बीकेएल,एमकेएल...की भी वर्षा कर दूं...लेकिन मैने जैसे-तैसे खुद को कंट्रोल किया और ऑडिटोरियम मे एक कोने मे चुप-चाप बैठकर खुद को ठंडा करने लगा....

"साली खुद को समझती क्या है, अभी मूड खराब हुआ तो दाई चोद दूँगा, लवडा समझ के क्या रखी है मुझे..."

मैं बहुत देर तक एक कोने मे अकेले बैठ कर एश को बुरा-भला कहता रहा लेकिन मेरा गुस्सा था कि ठंडा होने का नाम ही नही ले रहा था...ऑडिटोरियम मे बाकी स्टूडेंट्स भी आ गये थे बस छत्रपाल किसी कोने मरवा रहा था....

"आज उस बीसी छत्रपाल ने ज़्यादा होशियारी छोड़ी तो मारूँगा म्सी को...फिर लवडे की सारी आंकरिंग गान्ड मे घुस जाएगी दयिचोद साला..."मेरा गुस्सा एसा से डाइवर्ट होकर छत्रपाल पर आ गया .

"गुड मॉर्निंग...सर, इतने अकेले क्यूँ बैठे हो..."

आवाज़ सुनकर मैने आवाज़ की तरफ अपना चेहरा किया तो देखा कि आराधना खड़ी थी और मंद-मंद मुस्कान के साथ अपने हाथ मे एक पेपर लिए खड़ी थी....

"क्या है..."मैने चहक कर कहा, जिससे वो थोड़ा पीछे हो गयी...

"गुस्सा क्यूँ होते हो सर, बस इतना ही तो पुछा कि आप अकेले क्यूँ बैठे हो..."

"तुझसे कोई मतलब कि मैं यहाँ कोने मे बैठू या सामने स्टेज पर लेटा रहूं...मेरा मन मैं चाहे तो ऑडिटोरियम के छत पर जाकर बैठू, तुझे क्या...और यदि तूने अगली बार मुझे सर कहा तो तेरा गला दबा दूँगा...अब भाग यहाँ से..."

जो गुस्सा एश या फिर छत्रपाल पर उतारना चाहिए था, वो उस बेचारी आराधना पर उतर गया...किसी महान आदमी ने सही ही कहा है कि हर वक़्त उंगली नही करनी चाहिए...और आराधना ने वही उंगली करने वाला काम कर दिया था. मेरा ऐसा रौद्र रूप देखकर आराधना वहाँ से तुरंत भाग खड़ी हुई और मैं वही तब तक बैठा रहा जब तक छत्रपाल ने मेरा नाम लेकर मुझे स्टेज पर नही बुला लिया.....

आज छत्रपाल ने अपने उन 6 स्टूडेंट्स को सेलेक्ट कर लिया था, जो गोल्डन जुबिली के फंक्षन मे आंकरिंग करने वाले थे और उन 6 स्टूडेंट्स मे से मैं और एश भी थे...आराधना को छत्रपाल ने अडीशनल के तौर पर सेलेक्ट किया था,ताकि बाइ चान्स यदि कोई किसी कारणवश फंक्षन मे ना आ पाए तो आराधना उसकी भरपाई कर दे.....

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जिन 6 स्टूडेंट्स को छत्रपाल ने सेलेक्ट किया था, उनमे से 3 लड़के और 3 लड़किया थी और अब 2-2 के ग्रूप बनने वाले थे.

अकॉरडिंग तो छत्रु, हर ग्रूप मे एक लड़का और एक लड़की रहने वाले थे ,इसलिए मैं इस समय स्टेज पर खड़ा होकर यही दुआ कर रहा था कि एश मेरे साथ ना फँसे वरना मेरे हाथो उसका खून हो जाएगा....लेकिन उस म्सी छत्रपाल ने वही किया, जो मैं नही चाहता था...साले ने मुझे एश के साथ जोड़ दिया और हाथ मे दो पेज पकड़ा कर माइक के पास जाने के लिए कहा....

मेरी किस्मत भी एक दम झंड है. जो मैं चाहता था, छत्रपाल ने सेम टू सेम वैसा ही किया था...मतलब कि मैं सेलेक्ट भी हो गया था और मेरी जोड़ीदार एश बनी थी...लेकिन मुझे अब ये पसंद नही आ रहा था....जब छत्रपाल ने 7 को सेलेक्ट करके बाकियो को ऑडिटोरियम से बाहर का रास्ता दिखाया तो मैने सोचा कि छत्रु के पास जाकर ये कहा जाए कि 'सर, मुझे एश के आलवा किसी और के साथ रख दीजिए' लेकिन फिर मैने ऐसा नही किया...

मैने ऐसा इसलिए नही किया क्यूंकी मेरा प्यार एश के लिए उमड़ आया था बल्कि इसलिए क्यूंकी मुझे पूरा यकीन था कि एश ,छत्रपाल सर के इस सेलेक्षन पर ऑब्जेक्षन ज़रूर उठाएगी...और जब एश ये काम करने ही वाली थी तो फिर मैं क्यूँ अपना नाम खराब करू क्यूंकी वैसे भी मेरा नाम बहुत ज़्यादा खराब है.

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मैं छत्रपाल के पास ही स्टेज पर खड़ा था और जब एश को स्टेज पर अपनी तरफ आते देखा तो मेरा पारा फिर चढ़ने लगा....जहाँ एक ओर मैं इतना गरम हो रहा था,वही दूसरी तरफ एश ऐसे शांत थी...जैसे हमारी लड़ाई कुच्छ देर पहले ना होकर एक साल पहले हुई हो....एश के शांत बर्ताव के बाद भी मुझे उम्मीद थी कि वो च्छत्रु के पास जाएगी और मेरे साथ आंकरिंग करने को मना कर देगी, लेकिन वो चुप-चाप स्टेज पर आई और मेरे बगल मे आकर खड़ी हो गयी.....

"जाना...जाती क्यूँ नही छत्रु के पास और जाकर बोल दे कि तुझे मेरे साथ रहना पसंद नही..."एश जब मेरे बगल मे खड़ी हुई तो मैने चीखे मार-मार कर खुद से कहा....

छत्रपाल ने हम दोनो की तरफ हाथ किया और स्टेज पर थोड़ा आगे आने के लिए कहा...फिर वो हम दोनो से बोला...

"स्टार्टिंग के थर्टी मिनिट्स तुम दोनो आंकरिंग करोगे , ओके...उसके बाद 20-20 मिनिट्स तक बाकी के दो ग्रूप आएँगे जिसके बाद तुम दोनो फिर से आंकरिंग करोगे...."एश के हाथ मे एक पेज पकड़ाते हुए छत्रपाल ने कहा"ये मेरा इनिशियल प्लान है ,बाकी का बाद मे बताउन्गा....अब तुम दोनो, अरमान और एश..शुरू हो जाओ..."

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छत्रपाल ने 'शुरू हो जाओ' ऐसे बड़े आराम से कह दिया ,जैसे उसके बाप का राज़ हो. एश का तो पता नही लेकिन मैं इस वक़्त बिल्कुल भी मूड मे नही था और सबसे अधिक हैरानी मुझे इस बात से थी कि एश हम दोनो के सेलेक्षन पर कोई ऑब्जेक्षन क्यूँ नही उठा रही, क्यूंकी जितना मैने एश को समझा है उसके अनुसार वो एक नकचड़ी लड़की है....लेकिन इस वक़्त वो एक दम शांत थी और मेरे साथ ऐसे खड़ी थी,जैसे कि हम दोनो के बीच कुच्छ हुआ ही ना हो...साला सच मे लौन्डियोन को समझने की कोशिश करना मतलब खुद के गले मे फाँसी लगाने के बराबर है....

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मुझे नही पता कि एश उस समय स्टेज पर क्या सोचकर छत्रपाल के सेलेक्षन का विरोध करने के बजाय चुप-चाप खड़ी थी लेकिन मेरे लिए अब समय के साथ बीत रहा हर पल, हर सेकेंड मुझे जैसे धिक्कार रहा था और जब ये असहनिय हो गया तो मैं खुद छत्रपाल के पास गया....

"सर, मेरी उस लड़की से थोड़ी सी भी नही बनती...क्या आप मुझे किसी और के साथ फिट कर सकते है ? "धीमे स्वर मे मैने छत्रपाल से कहा...

"बकवास बंद करो और जाकर उसके साथ खड़े रहो...मैं यहाँ तुम्हारी पसंद की लड़की के साथ तुम्हारी जोड़ी बनाने का काम नही कर रहा हूँ...समझे,.."दाँत चबाते हुए छत्रपाल ने मुझसे कहा...

"लेकिन सर, वो लड़की मुझे ज़रा भी पसंद नही है... मतलब कि वो गौतम की करीबी है और आपको तो पता ही होगा कि हमारे बीच क्या हुआ था..."पुरानी कब्र खोदते हुए मैने अपना पक्ष मज़बूत करना चाहा...ताकि छत्रपाल मान जाए.

"मुझे कोई फ़र्क नही पड़ता कि तुम कौन हो और वो कौन है...यदि गोल्डन जुबिली के फन्शन मे आंकरिंग करनी है तो उसी के साथ करो...नही तो गेट उधर है,वहाँ से बाहर जाओ और फिर दोबारा कभी मत आना..."

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मैने आज तक कॉलेज मे सिर्फ़ ऐसे ही काम किए थे, जिससे मेरा नाम सिर्फ़ खराब हुआ था लेकिन गोल्डन जुबिली के फंक्षन मे आंकरिंग करके मैं थोड़ा नाम कामना चाहता था ताकि मेरे यहाँ से जाने के बाद लोग मुझे सिर्फ़ मेरी बुराइयो के कारण याद ना रखे....वो जब भी गोल्डन जुबिली के फंक्षन का वीडियो देखेंगे तब-तब वो मुझे याद करेंगे और मेरे कॉलेज की लड़किया जो यदि 10 साल बाद भी मेरे कॉलेज मे आएँगी वो गोल्डन जुबिली के उस सुनहरी शाम के वीडियो मे मुझे आंकरिंग करता देख ,आपस मे ज़रूर पुछेन्गि कि' यार ये हॅंडसम बॉय कौन है ' . ये सब, जैसे मेरा दिमाग़ मे बैठ चुका था और मुझे यकीन था कि फ्यूचर मे ऐसा ही होगा....इसलिए मैने उस दिन ऑडिटोरियम मे छत्रपाल की बात मान ली और उसके कहे अनुसार चुप-चाप एश के पास जाकर खड़ा हो गया.....लेकिन मैं तब भी हैरान हुआ था और आज भी हैरान हूँ कि आख़िर एश ने उस दिन कोई ऑब्जेक्षन क्यूँ नही उठाया ?

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"वेट...वेट...वेट..."वरुण ने मेरा मुँह दबाकर मुझे रोकते हुए बोला"बस एक मिनिट रुक, मैं मूत कर आता हूँ..."

"ये ले...सालाअ...चूतिया.."

"बहुत देर से कंट्रोल करके बैठा था,लेकिन अब और कंट्रोल नही होता...बस एक मिनिट मे आया..."बोलते हुए वरुण अपना लंड दबाते हुए बाथरूम की तरफ भागा....

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"मतलब कि तू ये कहना चाहता है कि एश तेरे ही ग्रूप मे रही...हाऐईिईन्न्न..."

"अब तू ए.सी.पी. प्रद्दूमन जैसे फालतू सवाल करेगा तो मैं तेरी जान ले लूँगा, समझा..."सिगरेट को होंठो के बीच फसाते हुए मैने आगे की कहानी बयान करनी शुरू की...

hamaare hostel ka corridor jyada chauda nahi tha ,isliye jab wo dono apne hath faila kar khade ho gaye to pura ka pura goal post un dono ke body se thak gaya....isliye goal karne me mujhe ab badi dikkat ho rahi thi...lekin jyada der tak nahi...maine football ko apne hath me liya aur ghamakar un dono me se ek ke pet me de mara.....

"aaayyyyiiiii.....gaanD fat gayi be..."bolte hue wo ladka,jiske pet me maine abhi-abhi football tana tha,wo wahi apna pet pakad kar baith gaya...

ab jab ek ghayal ho chuka tha to mere liye goal karne ka kaam behad aasan ho gaya tha aur phir maine bina samay ganwaye aakhiri goal daag diya....

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"la de 100 "aakhiri goal karne ke baad main Arun ke paas gaya aur usase bet ke paise mange....

"le lena na baad me...kahi bhage ja raha hoon kya...."

"chal baad me de dena..."apne room ki taraf aate hue maine winner wali smile Arun ko di...lekin mere room me ghusne se pahle hee kaliya mujhe kuchh bolne laga...

"kya hua be, maine to tujhe pahle hee warn kiya tha ki mere raste me mat aana...lekin nahi,...teri hee gaanD me badi khujali thi..."

"lawaDe, mujhe kal apni bahan ko lekar hospital jaana tha...lekin ab nahi ja paunga...aaaaahhhhh"

"abey to dard se karah raha hai ya chudayi kar raha hai...dard me bhi koyi aise karahta hai kya..aaaaahhhhh "

"baat mat palat Arman...tune ye sahi nahi kiya...."

"ab jyada nautanki mat kar be kallu..."Kaliye ko sahara dekar uthate hue maine kaha "waise teri bahan college me padhti hai,ye mujhe aaj hee pata chala...kaun hai wo..."

"first year me hai...name hai Aradhna Sharma..."

"Aradhna Sharma... kha maa kasam "jabardast tarike se chaukte hue maine Kallu se puchha....

mujhe is tarah se shocked hota dekh kallu bhi buri tarah chauka aur darne laga ki kahi main use phir na pel doon . Main isliye itni buri tarah chauka tha kyunki Aradhna aur kallu ke face me koyi mel-jol nahi tha.

Aradhna utni gori bhi nahi thi, lekin kallu jaise nihayat kali bhi nahi thi...Aradhna avon maal bhale na ho lekin aisi to thi hee ki yadi wo chodne ka proposal de to main mana na karu wahi kallu ek dam badsurat mendhak ke jaise munh wala tha aur to aur sala kanghi bhi churata tha....

"aise kya dekh raha hai be, phir se marega kya..."

"Aradhna teri sagi bahan hai ya phir tere chacha,mama,kaka,fufa,tauji....etc. etc. Ki beti hai..."

Mere dwara aisa sawal karne par pahle tu kallu mujhe kha jaane wali nazaro se dekhne laga lekin jab use aisa laga ki wo mera kuchh nahi ukhad sakta to wo thoda mayoos aur thode gusse ke sath bola...

"Aradhna meri door ki bahan hai...tujhe usase kya..."

"tabhi main sochu ki tujh jaise kaliya ki bahan Aradhna kaise ho sakti hai..." Aradhna ,kallu ki door ke rishte ki bahan hai ye jaankar main badbadaya aur wahan se apne room me aaya....

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Mere room me is waqt Saurabh, Arun ke sath Pandey ji bhi mauzood the,jo football Match ke dauran lagi chot ko sahla rahe the...Arun ke hath aur gardan ke paas ki thodi si chamdi ghis gayi thi,wahi Saurabh sahi-salamat tha......

"dekh liya be,mujhe challenge karne ka nateeja, ab agli baar se aaukat me rahna..warna is baar gardan ke paas ki thodi si chamdi ukhdi hai,agli baar pura gardan ukhad dunga...."shanshaho wali style me main apne bed par baithate hue bola"mujhe dekh ,main kaise match ke baad bhi relax feel kar raha hoon..."

"jyada bolega to 100 ke badle me main lund ke 100 baal thamaunga..."aaine me dekhkar apni gardan ko sahlate hue Arun ne kaha"aur beta, aaine me dekh ,tera matha fod diya hai maine..."

Arun ke itna bolne ke sath hee mera hath khud ba khud mere sar par gaya aur jaise hee maine apna hath apne mathe par phiraya to thodi si jalan hui....

"khoon nikal raha hai kya be Saurabh..."

"thodi si kharoch hai be...bas aur kuchh nahi...aur ye bata tu us kanghichor se kis laundiya ke baare me baat kar raha tha..."

"aisich hai ek item...usi ke baare me baat kar raha tha..."baat ko talte hue maine kaha...kyunki yadi main unhe Aradhna ke baare me batata to phir unhe puri kahani batani padti ki main kaise canteen me Aradhna se mila aur wo anchoring ki practice karne bhi aati hai...blah..blah.

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Agle din jab main college ke liye hostel se nikal raha tha to jo baat mere dimag me thi ,wo ye ki Esha ka mujhe dekhkar kya reaction hoga, wo mujhse behave kaise karegi...mujhse baat bhi karegi ya nahi...kyunki kal shaam ke waqt parking me maine use kaha tha ki 'yadi wo mujhse pahle nahi jayegi to main uski pappi le lunga' . Us waqt to maine ye kah diya tha lekin baad me jab maine ispar gaur kiya aur itminan se socha to mujhe aisa laga ki mujhe Esha ko wo nahi bolna chahiye tha....isliye main Auditorium ki taraf jaate waqt thoda ghabra bhi raha tha .

"ek kaam karta hoon, auditorium me jaate hee Esha ko bol dunga ki wo kal wali baat ka bura na mane...wo to maine aise hee mazak me kah diya tha....yesss..yahich bolunga,tab wo maan jayegi..."

Auditorium ki taraf jaate waqt maine bakayada wo lines bhi bana dali, jo mujhe Esha se bolna tha.us din Esha mujhe auditorium ke baahar akeli khadi mili aur maine dil hee dil me uparwale ka shukriya ada kiya kyunki yadi is waqt Esha mujhe kuchh ulta seedha bhi kah deti to koyi aur nahi sunta....warna yadi Esha kisi teesare ke samne mujhpar chillati to mera ahankar jo mujhme koot-koot kar bhara hua hai...wo apni insult hote hue dekh turant bahar aata aur jiska natiza Esha ki sabke saamne ghor bejjati ke roop me nikalta....

"good morning, yahan khadi mera intzaar kar rahi thi kya "hamesha ki tarah haste-muskurate hue maine kaha....is ummid me ki Esha bhi haste-muskurate hue jawab degi...

"tumse koyi matlab ki main yahan khadi hokar kya kar rahi hoon...apne kaam se matlab rakho..."chidchidepan ke sath Esha ne mera swagat kiya....

Kasam se yadi us waqt wahan Esha ki jagah koyi aur ladki hoti ,yahan tak ki Angelina Silva ki jagah Angelina jolie bhi hoti aur wo mere good morning ka aisa chidchida jawab deti to main seedhe ghama ke ek lafa marta ,lekin wo ladki Esha thi isliye main shant hee raha....ye sochkar ki shayad uska mood kharab hoga.

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"pakka ,aaj uncle ji ne kiraye ke paise nahi diye honge...isiliye itna bhadak rahi hai. lekin tension mat le ,main bahut rahis hoon....bol kitna rokda doon...tu kahe to blank check sign karke de du..."Esha ka mood thik karne ke irade se maine aisa kaha....lekin Esha par iska ulta hee asar hua.

Esha aur bhi jyada mujhpar bhadak gayi aur usne kuchh aise baate bol di ,jo seedhe teer ke mafiq mere dil me chubhi, wo boli...

"tumhe lagta hai ki main tumse baat bhi karna pasand karti hoon...haaannn , tum jaise ladko ko main achhi tarah se janti hoon, jahan koyi rahis ladki dikhi nahi ki uske peeche pad gaye....Gautam ke sath tumne jo kiya ,uske baad to mujhe tumhari name se bhi ghin aati hai...aur jitna rupaye tumhare garib maa-baap tumhe ek mahine me bhijawate hai na utna to main har din bar,pub wagerah me tip de deti hoon...bloody nonsense...pata nahi kaha-kaha se chale aate hai,bhikhari..."

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Esha ke munh se aise-aise lafz sunkar mujhe pahli baar me to yakin hee nahi hua ki Esha ne mujhse hee wo sab kaha hai...mera kaan aise sann hua jaise kisi ne jor se mere kaan me jhapad de mara hoon....ekpal ke liye mujhe samajh hee nahi aaya ki main kya karu, lekin Esha ne aise-aise shabd bol diye the ki mere ahankar ne mere pyar ko turant maat de di aur main bola...

"dekho, mere mobile me call teri taraf se aaya tha na ki maine tujhe call kiya tha...isliye aisa sochna bhi mat ki mujhe tujh jaisi ladki se baat karne me ratti bhar ki bhi dilchaspi hai...wo to Auditorium me dekha ki tujhse baki ladkiya baat nahi karti isliye taras khakar tere paas do din kya baith gaya, do chaar baate kya kar li...tune to uska ulta-seedha hee matlab nikal...fool kahi ki...aur tune mere maa-baap ko garib kaha ? teri to...abey jitne paisa teri puri garib family ek mahine me udati hai hai na utna to mera sirf daru ka bill rahta hai....aur tu khud ko bahut rich samajhti hai..."jeb se goggle nikal kar pahante hue maine kaha"jitni ki tu nahi hogi,utne ka to sirf mera goggle hai..ab chal side de, andar wo chhatru mujhse anchoring ki tips lene ke liye mera intzaar kar raha hoga..."

Maine turant Esha ko pakad kar ektaraf khiskaya . Mere dwara apni insult hote dekh Esha ki aag aur bhi bhadak gayi aur jab maine use chhua to wo cheekhte hue boli"don't touch meeeeee...."

"sorry ki maine tujh jaisi ko chhukar apna hath gaanDa kar liya aur sun ,agli baar mujhse jubaan sambhal kar baat karna warna aisi bejjati karunga ki 24 hours mere lafz jhapad ki tarah kaan me bajenge...ab mujhe ghoorna band kar,warna mera mood kharab hua to ek-do jhapad yahi laga dunga....sali attitude dikhati hai..."

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Esha ke sath ghamasan ladayi karke main auditorium me ghusa aur pahli baar mujhe Esha ke sath misbehave karne ka koyi malaal nahi tha, balki mera dil kar raha tha,abhich bahar jaakar uspar MC,BC,BKL,MKL...ki bhi varsha kar doon...lekin maine jaise-taise khud ko control kiya aur Auditorium me ek kone me chup-chap baithkar khud ko thanda karne laga....

"sali khud ko samajhti kya hai, abhi mood kharab hua to dayi chod dunga, lawaDaa samajh ke kya rakhi hai mujhe..."

Main bahut der tak ek kone me akele baith kar Esha ko bura-bhala kahta raha lekin mera gussa tha ki thanda hone ka naam hee nahi le raha tha...Auditorium me baki students bhi aa gaye the bas Chatrapaal kisi kone marwa raha tha....

"aaj us BC Chatrapaal ne jyada hoshiyari chodi to marunga MC ko...phir lawaDe ki sari anchoring gaanD me ghus jayegi dayichod sala..."mera gussa Esha se divert hokar Chatrapaal par aa gaya .

"good morning...sir, itne akele kyun baithe ho..."

aawaz sunkar maine aawaz ki taraf apna chehra kiya to dekha ki Aradhna khadi thi aur mand-mand muskan ke sath apne hath me ek paper liye khadi thi....

"kya hai..."maine chahak kar kaha, jisase wo thoda peeche ho gayi...

"gussa kyun hote ho sir, bas itna hee to puchha ki aap akele kyun baithe ho..."

"tujhse koyi matlab ki main yahan kone me baithu ya samne stage par leta rahu...mera man main chahe to auditorium ke chhat par jakar baithu, tujhe kya...aur yadi tune agli baar mujhe sir kaha to tera gala daba dunga...ab bhag yahan se..."

Jo gussa Esha ya phir Chatrapaal par utarna chahiye tha, wo us bechari Aradhna par utar gaya...kisi mahan aadmi ne sahi hee kaha hai ki har waqt ungali nahi karni chahiye...aur Aradhna ne wahi ungali karne wala kaam kar diya tha. Mera aisa raudra roop dekhkar Aradhna wahan se turant bhag khadi hui aur main wahi tab tak baitha raha jab tak Chatrapaal ne mera name lekar mujhe stage par nahi bula liya.....

Aaj Chatrapaal ne apne un 6 students ko select kar liya tha, jo golden jubilee ke function me anchoring karne wale the aur un 6 students me se main aur Esha bhi the...Aradhna ko Chatrapaal ne additional ke taur par select kiya tha,taki by chance yadi koyi kisi karanvash function me na paye to Aradhna uski bharpayi kar de.....

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jin 6 students ko Chatrapaal ne select kiya tha, unme se 3 ladke aur 3 ladkiya thi aur ab 2-2 ke group banne wale the.

According to Chhatru, har group me ek ladka aur ek ladki rahne wale the ,isliye main is samay stage par khada hokar yahi dua kar raha tha ki Esha mere sath na phanse warna mere hatho uska khoon ho jayega....lekin us MC Chatrapaal ne wahi kiya, jo main nahi chahta tha...sale ne mujhe Esha ke sath jod diya aur hath me do page pakda kar mic ke paas jaane ke liye kaha....

Meri kismat bhi ek dam jhand hai. Jo main chahta tha, Chatrapaal ne same to same waisa hee kiya tha...matlab ki main select bhi ho gaya tha aur meri jodidar Esha bani thi...lekin mujhe ab ye pasand nahi aa raha tha....jab Chatrapaal ne 7 ko select karke bakiyo ko auditorium se bahar ka rasta dikhaya to maine socha ki Chhatru ke paas jakar ye kaha jaye ki 'Sir, mujhe Esha ke aalawa kisi aur ke sath rakh dijiye' lekin phir maine aisa nahi kiya...

maine aisa isliye nahi kiya kyunki mera pyar Esha ke liye umad aaya tha balki isliye kyunki mujhe pura yakin tha ki Esha ,Chatrapaal sir ke is selection par objection jaroor uthayegi...Aur jab Esha ye kaam karne hee wali thi to phir main kyun apna naam kharab karu kyunki waise bhi mera naam bahut jyada kharab hai.

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Main Chatrapaal ke paas hee stage par khada tha aur jab Esha ko stage par apni taraf aate dekha to mera para phir chadhne laga....jahan ek ore main itna garam ho raha tha,wahi dusari taraf Esha aise shant thi...jaise hamari ladayi kuchh der pahle na hokar ek saal pahle hui ho....Esha ke shant bartaav ke baad bhi mujhe ummid thi ki wo Chhatru ke paas jayegi aur mere sath anchoring karne ko mana kar degi, lekin wo chup-chap stage par aayi aur mere bagal me aakar khadi ho gayi.....

"jana...jati kyun nahi chhatru ke paas aur jakar bol de ki tujhe mere sath rahna pasand nahi..."Esha jab mere bagal me khadi hui to maine cheekhe mar-mar kar khud se kaha....

Chatrapaal ne ham dono ki taraf hath kiya aur stage par thoda aage aane ke liye kaha...phir wo ham dono se bola...

"starting ke thirty minutes tum dono anchoring karoge , ok...uske baad 20-20 minutes tak baki ke do group aayenge jiske baad tum dono phir se anchoring karoge...."Esha ke hath me ek page pakdate hue Chatrapaal ne kaha"ye mera initial plan hai ,baki ka baad me bataunga....ab tum dono, Arman aur Esha..shuru ho jao..."

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Chatrapaal ne 'shuru ho jao' aise bade aaram se kah diya ,jaise uske baap ka raaz ho. Esha ka to pata nahi lekin main is waqt bilkul bhi mood me nahi tha aur sabse adhik hairani mujhe is baat se thi ki Esha ham dono ke selection par koyi objection kyun nahi utha rahi, kyunki jitna maine Esha ko samjha hai uske anusar wo ek nakchadi ladki hai....lekin is waqt wo ek dam shant thi aur mere sath aise khadi thi,jaise ki ham dono ke beech kuchh hua hee na ho...sala sach me laundiyo ko samajhne ki koshish karna matlab khud ke gale me fansi lagane ke barabar hai....

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mujhe nahi pata ki Esha us samay stage par kya sochkar Chatrapaal ke selection ka virodh karne ke bajay chup-chap khadi thi lekin mere liye ab samay ke sath beet raha har pal, har second mujhe jaise dhikkar raha tha aur jab ye asahaniya ho gaya to main khud Chatrapaal ke paas gaya....

"sir, meri us ladki se thodi si bhi nahi banti...kya aap mujhe kisi aur ke sath fit kar sakte hai ? "dheeme swar me maine Chatrapaal se kaha...

"bakwas band karo aur jakar uske sath khade raho...main yahan tumhari pasand ki ladki ke sath tumhari jodi banane ka kaam nahi kar raha hoon...samjhe,.."daant chabate hue Chatrapaal ne mujhse kaha...

"lekin sir, wo ladki mujhe zara bhi pasand nahi hai... matlab ki wo Gautam ki karibi hai aur aapko to pata hee hoga ki hamaare beech kya hua tha..."purani kabra khodte hue maine apna paksha mazboot karna chaha...taki Chatrapaal maan jaye.

"mujhe koyi fark nahi padta ki tum kaun ho aur wo kaun hai...yadi golden jubilee ke funtion me anchoring karni hai to usi ke sath karo...nahi to gate udhar hai,wahan se bahar jao aur phir dobara kabhi mat aana..."

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Maine aaj tak college me sirf aise hee kaam kiye the, jisase mera naam sirf kharab hua tha lekin golden jubilee ke function me anchoring karke main thoda naam kamana chahta tha taki mere yahan se jaane ke baad log mujhe sirf meri burayiyo ke karan yaad na rakhe....wo jab bhi golden jubilee ke function ka video dekhenge tab-tab wo mujhe yaad karenge aur mere college ki ladkiya jo yadi 10 saal baad bhi mere college me aayengi wo golden jubilee ke us sunahari shaam ke video me mujhe anchoring karta dekh ,aapas me zaroor puchhengi ki' yar ye handsome boy kaun hai ' . Ye sab, jaise mera dimag me baith chuka tha aur mujhe yakin tha ki future me aisa hee hoga....isliye maine us din Auditorium me Chatrapaal ki baat maan li aur uske kahe anusar chup-chap Esha ke paas jakar khada ho gaya.....lekin main tab bhi hairan hua tha aur aaj bhi hairan hoon ki aakhir Esha ne us din koyi objection kyun nahi uthaya ?

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"wait...wait...wait..."Varun ne mera munh dabakar mujhe rokte hue bola"bas ek minute ruk, main moot kar aata hoon..."

"ye le...salaaa...chutiya.."

"bahut der se control karke baitha tha,lekin ab aur control nahi hota...bas ek minute me aaya..."bolte hue Varun apna lund dabate hue bathroom ki taraf bhaga....

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"matlab ki tu ye kahna chahta hai ki Esha tere hee group me rahi...haaaiiinnn..."

"ab tu A.C.P. Pradduman jaise faltu sawal karega to main teri jaan le lunga, samjha..."cigarette ko hontho ke beech phasate hue maine aage ki kahani bayaan karni shuru ki...

 
उस दिन साला मैने छत्रपाल और एश को ऑडिटोरियम मे कैसे झेला, ये मैं ही जानता हूँ.यदि नाम कमाने का लालच ना होता तो मैं सीधे ऑडिटोरियम से बाहर आता...खैर मैने ऐसा नही किया,इसलिए इस बारे मे ज़्यादा बोलने का कोई मतलब नही लेकिन उसी दिन रात को जब मैं दारू पीने के बाद इस पूरे मसले को नये सिरे से देख रहा था तो तभिच मेरे दारू मे टॅन 1400 ग्रीम के दिमाग़ मे ये बात आई कि...'कही छत्रपाल मेरे साथ कोई गेम तो नही खेल रहा...यदि ऐसा है तो फिर छत्रपाल का बॅकग्राउंड चेक करना पड़ेगा बीड़ू,वरना ये तो मईक हाथ मे पकड़ा कर पिछवाड़े मे सरिया डालेगा... '

लड़कियो से मेरे कनेक्षन के मामले मे मेरी 8थ सेमेस्टर की लाइफ बाकी के सेमएस्टेर्स के मुक़ाबले बहुत ही बढ़िया चल रही थी..जहाँ पहले एक तरफ मेरे कॉलेज मे ऐसी एक भी लड़की नही थी ,जो मुझे मुस्कुरा कर देखे वही इस सेमेस्टर के स्टार्टिंग मे मेरी एश से बात चीत शुरू हुई तो वही दूसरी तरफ आराधना से भी मेरी थोड़ी-बहुत पहचान हुई थी, लेकिन कल एश ने मुझे खुद से दूर तो किया ही साथ मे आराधना डार्लिंग भी मुझसे खफा हो गयी...जिसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पहले जहाँ वो ऑडिटोरियम मे घुसते ही मुझे एक प्यारी स्माइल के साथ गुड मॉर्निंग विश करती थी...वही अब वो एक तरफ अपना गाल फुलाए बैठी हुई थी....

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"सोच रही होगी कि मैं उसके पास जाकर उसे सॉरी बोलूँगा...चूस ले फिर मेरा सॉरी के नाम पर..."आराधना की तरफ देखते हुए मैं बड़बड़ाया और फिर अपनी लाइन्स याद करने लगा....

वैसे तो हमे गोल्डन जुबिली के फंक्षन मे आंकरिंग के वक़्त जो-जो बोलना था, उसका मनुअल मिलने वाला था,लेकिन फिर भी छत्रपाल ने सबको सॉफ हिदायत दी थी कि प्रॅक्टीस के दौरान कोई भी मनुअल को च्छुएगा तक नही... हमसे इतना हार्ड वर्क करने के पीछे च्छत्रु का एक लॉजिक था ताकि लौन्डे फंक्षन के वक़्त कही भी ना रुके....अगेन आ बकवास ट्रिक्स यूज़्ड बाइ छत्रपाल

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"क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ..."

आवाज़ मुझे पहचानी सी लगी और मैं जानता भी था कि इस आवाज़ का मालिक कौन है ,लेकिन फिर भी मैने कन्फर्म करने के लिए उपर की तरफ देखा...

"पूरा ऑडिटोरियम खाली है ,कही भी बैठ जा,कौन रोक रहा है...लेकिन यहाँ मेरे पास नही..."मैने बिना कुच्छ सोचे, बिना कोई पल गँवाए एश को देखते ही कह मारा...

"लेकिन मैं तो यही बैठूँगी....तुम्हे कोई दिक्कत हो तो उठकर दूसरी जगह बैठ जाना..."कहते हुए वो ठीक मेरे बगल मे बैठ गयी...

एश को अपने ठीक बगल वाली चेयर पर बैठा देख मैं वहाँ से उठा और दो कुर्सी छोड़ कर तीसरी पर आ बैठा और आँखे बंद करके मनुअल याद करने लगा.....

"क्या कर रहे हो...ह्म"

"मैं ये याद कर रहा था कि मैने किसको-किसको लोन दिया है... अब चुप रहना वरना मेरा मुँह खुल जाएगा..."एश को खा जाने वाली नज़रों से देखकर मैने कहा और फिर आँखे बंद कर ली...

लेकिन एसा मुझे डिस्टर्ब करने से बाज़ नही आई ,वो बीच-बीच मे मुझे कुच्छ ना कुच्छ बोलती ही रहती...लेकिन मैं फिर किसी सन्यासी की तरह अपनी तपस्या मे लीन ही रहा,मैने दोबारा अपनी आँख नही खोली....लेकिन इस बीच मैं अपनी आँखे बंद करके मनुअल याद करने के बजाय एश के बारे मे सोच रहा था...

"ये मुझसे बात क्यूँ करने लगी...बड़ी उल्लू है यार, जब लड़ाई हुई है तो कुच्छ दिन तो निभाना ही चाहिए...या तो इसकी याददाश्त चली गयी है या फिर शायद इसे इसकी ग़लती का अहसास हो गया है और ये मुझसे अब सॉरी बोलने वाली है "

यही सब सोचते हुए मैने अपनी आँख खोली और एश की तरफ देखा..मैने जैसे ही एश की तरफ देखा तभी मुझे एक जोरदार हिचकी आई क्यूंकी एश अपनी जगह से उठकर मेरे ठीक बगल मे बैठी हुई चॉक्लेट खा रही थी....उसकी इस हरक़त पर मेरा सर चकराने लगा और जितना मुश्किल उसे समझना मेरे लिए पहले था ,वो मुश्किल अब और भी बढ़ गयी थी....पता नही एश ऐसा क्यूँ कर रही थी..कही गौतम से इसका ब्रेक अप तो नही हो गया ?

कही ये मुझपर फिदा तो नही हो गयी ?

या फिर ये आर.दिव्या का तो कोई माइंड गेम नही ?

एश के उस प्यार भरे लेकिन ख़तरनाक बर्ताव को देख कर ऐसे कुच्छ पायंट्स मेरे दिमाग़ मे आने लगे थे और उन पायंट्स पर मैं गहराई से सोचता उससे पहले ही एसा ने मेरी तरफ एक चॉक्लेट बढ़ाते हुए कहा...

"कल के लिए सॉरी अरमान, वो मैं कल थोड़ा अपसेट थी,इसलिए इतना सब कुच्छ बोल गयी..लेकिन बाद मे मुझे रियलाइज़ हुआ कि ग़लती मेरी थी...इसलिए तुम्हारे लिए ये चॉक्लेट लाई हूँ..."

"बच्चा समझ के रखी है क्या मुझे जो मैं चॉक्लेट खाउन्गा...मर्द हूँ सीधे जंग के मैदान मे गोली खाउन्गा...बोल जय हिंद..."कड़क कर मैने कहा,जिसके बाद एश तुरंत खड़ी हुई और एक कुर्सी छोड़ कर बैठ गयी....

"ऐज युवर विश..."जो चॉक्लेट वो मुझे देने वाली थी, उसे खुद के मुँह के अंदर डालते हुए बोली"अरमान, वैसे सॉरी तुम्हे भी बोलना चाहिए...क्यूंकी तुमने भी मुझे बहुत कुच्छ कहा था..."

"मैं लड़कियो को सॉरी बोल दूँगा तो ये दुनिया नही पलट जाएगी...."

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उस दिन की हमारी प्रॅक्टीस बड़ी जोरदार हुई ,एश से फिर मेल-जोल बढ़ जाने के कारण मैं एक दम जोश मे था और उसका प्रभाव मेरे परर्फमेन्स मे दिखा, यहाँ तक कि छत्रपाल जो कभी किसी को 'गुड...नाइस' से ज़्यादा नही बोलता, उसने उस दिन मेरी तारीफ की....

जब हमारे प्रॅक्टीस का टाइम ख़त्म हुआ तो छत्रपाल ने मुझे दबी मे लेजा कर कहा कि 'यदि मैं चाहू तो एश की जगह किसी दूसरी लड़की को सेलेक्ट कर सकता हूँ ,लेकिन एक शर्त पर की परर्फमेन्स गिरनी नही चाहिए....'

छत्रपाल ने तो मुझे आराधना के साथ तक ग्रूप बनाने को बोल दिया और साथ मे ये भी कहा कि यदि आराधना मेरे साथ रही तो एश को फिर बाहर बैठना पड़ेगा...यदि यही ऑफर च्छत्रु ने मुझे कल दिया होता तो यक़ीनन मैं इसे आक्सेप्ट कर लेता लेकिन आज की बात अलग थी और आज का दिन भी मेरे लिए बहुत खास था...इसलिए मैने छत्रपाल के नये प्लान पर तुरंत ताला मारा और क्लास की तरफ बढ़ा.....जब मैं क्लास मे पहुचा तो वहाँ से टीचर गायब था, बोले तो हर पीरियड के बीच मिलने वाले 5 मिनिट के गॅप को किसी दूसरे टीचर ने गॅप नही किया था.....मैं अपनी जगह पर जाकर हर दिन की तरह चुप-चाप बैठ गया और सामने बोर्ड पर नज़र डाली और बोर्ड पर जो लिखा था उसे देखकर जैसे मुझे हार्ट अटॅक आ गया....मैने एक बार अपनी आँखे मलि और फिर बोर्ड की तरफ देखा...बोर्ड पर राइटिंग तो सुलभ की थी ,लेकिन नाम मेरा लिखा हुआ था,...मेरे नाम के आगे दो शब्द और लिखे हुए थे और वो दो शब्द थे 'हॅपी बर्तडे'

 
मेरे कॉलेज मे या फिर कहे कि सभी कॉलेज मे लौन्डे सिर्फ़ तीन ही चीज़ ऐसी है जिससे सबसे ज़्यादा घबराते है...पहला एग्ज़ॅम के दिनो मे ,दूसरा जिस दिन एग्ज़ॅम का रिज़ल्ट आने वाला होता है और तीसरा तब जब उनका बर्तडे होता है....हमारी छोटी सी टोली मे जिसका भी बर्तडे होता उसके लिए बहुत बड़ा केक तो लाया जाता था लेकिन फिर बर्तडे बॉय को ठोक-ठोक कर केक का सारा पैसा वसूल भी कर लिया जाता था. जिसका बर्तडे होता था उसको सब मिलकर साले ऐसे मारते जैसे जन्मो जनम की दुश्मनी का बदला ले रहे हो...10, 15 ,20 कितने भी लौन्डे हो ,वो सब एक साथ बर्तडे बॉय के उपर टूट पड़ते और पिछवाड़े को मार-मार कर ऐसे सूज़ा देते थे कि जैसे किसी ने नंगा करके पिछवाड़े मे घंटो हंटर बरसाए हो....इसके बाद ना तो बैठते बनता था और ना ही सोते...फिर कोई पिछवाड़े पर हाथ भी रख ले तो ऐसा दर्द होता जैसे किसी ने धारदार चाकू घुसा दिया हो....

वैसे तो सब खुशी मे मारते थे लेकिन कुच्छ लौन्डे ,जिनको खाने के लिए केक नही मिलता था,वो फिर बर्तडे बॉय को खुन्नस मे मारते थे....बर्तडे के दिन ठुकाई का प्रकोप तो इतना था कि कॉलेज मे कयि लौन्डे अपने फ़ेसबुक अकाउंट से बर्तडे हाइड करे हुए थे...

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सामने बोर्ड पर 'हॅपी बर्तडे अरमान...'लिखा देख मेरी साँसे उल्टी चलने लगी...क्यूंकी मेरे दिमाग़ ने तुरंत आगे होने वाली ठुकाई का एक द्रिश्य मुझे दिखा दिया था...

मेरे क्लास मे घुसते ही लौन्डे मुझे गले लगाकर बर्तडे विश करने लगे तो वही लड़किया मेरी तरफ अपना हाथ बढाकर मुझे'हॅपी बर्तडे' बोलने लगी...लेकिन अपुन ने अपने क्लास की लौन्डियो से हाथ मिलाना तो दूर, थॅंक्स तक नही कहा ,अरे थॅंक्स कहना तो दूर मैं उनको पलटकर देखा तक नही ,वरना साली लंच टाइम पे फुदक-कर मेरे सामने खड़ी हो जाएगी और पार्टी-पार्टी की गुहार मारने लगेगी

लड़कियो को मैने जिस तरह इग्नोर किया उसके ठीक उल्टा लौन्डो से गले मिलकर 'थॅंक्स यार...थॅंक्स भाई' कहा.

मुझे बर्तडे विश करते हुए जो मुझे मज़बूती से,जाकड़ कर गले लगाता(फॉर एक्स. अरुण, सौरभ, सुलभ) ,मैं उसकी तरफ दयादृष्टि से देखता था क्यूंकी यही वो लौन्डे थे,जो मुझे ठोकने वाले थे....बोले तो जो जितनी मज़बूती के साथ मुझे गले लगता ,वो बाद मे उतनी ही मज़बूत लात मेरे पिछवाड़े मे मारने वाला था.....

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"आज तो बेटा मैं नुकीले जूते पहन कर आया हुआ हूँ...तेरा खून कर दूँगा..."मेरे बैठते ही अरुण ने दाँत दिखाते हुए मुझे दूसरी बार हॅपी बर्तडे कहा....

"मैं तो लोहे के रोड से पेलुँगा बेटा इसलिए गान्ड मे तेल-मालिश पहले से किए रहना..."अरुण के सुर मे सुर मिलाते हुए सौरभ ने भी मेरे दिल की धड़कने बढ़ा दी...

लेकिन मेरे दिल की धड़कने बढ़कर रुकने को तब हुई ,जब सुलभ ने मुझसे कहा कि वो आज रात , जन्वरी के ठंड से कडकते महीने मे एक बाल्टी पानी मेरे उपर डाल देगा....."

"तुम लोगो ने मुझे मारने के लिए अपने ये जो अलग-अलग एक्सपेकशन बना कर रखे हो ना, उसको वापस वही डाल लो,जहाँ से निकाले हो....पिछले तीन सालो मे तो मेरा कुच्छ उखाड़ नही पाए और अबकी बार भी मैं कोई ना कोई जुगत लगा कर बच ही जाउन्गा...."

"अरे लंड मेरा बचेगा...तू देख आज रात को...और बेटा माफी माँग ,वरना हॉस्टिल की छत से सीधे नीचे फेकुंगा..."सौरभ ने कहा...

"चल बे...देख लूँगा तुझे..."

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उस दिन कॅंटीन मे लौन्डो ने पेल के मेरी जेब खाली करवाई, पहले अपने पैसे से जितना वो कॅंटीन मे हफ्ते भर मे खाते थे, उतना वो उस एक दिन मे खा गये....और जब बिल पे करने की बारी आई तो मेरी आँखो के सामने अंधेरा छाने लगा...सबके सामने मेरी बेज़्ज़ती ना हो ,इसलिए मैं उठकर काउंटर के पास गया और काउंटर मे बैठे हुए आदमी से बाद मे बिल देने की रिक्वेस्ट की...

"ऐसे थोड़े ही चलता है भैया कि जेब मे माल नही और पेट भरकर चल दिए....कल,परसो, नर्सो,सरसो...कुच्छ नही, बिल तो आज ही देना पड़ेगा,वो भी अभी..."

"मान जा यार, कल दे दूँगा..."

"पैसे दो नही तो कंप्लेन करूँगा..."

"एक बात बताऊ, मैं जेब मे पैसे लेकर नही चलता...तू कहे तो चेक साइन करके दे देता हूँ...बॅंक से जाकर निकाल लेना..."

"अपने को तो कॅश चाहिए..."

"वो तो नही है...फिर एक और काम कर एटीएम स्वप कर ले..."वॉलेट से आत्म निकलते हुए मैने कहा...जबकि मुझे मालूम था कि एटीम स्वप करने वाली मशीन कॅंटीन मे नही है....

"ये सब बखेड़ा तुम अपने पास ही रखो,अपने को तो कॅश चाहिए..."

"चूस ले मेरा फिर...कल लेना पैसे..."

कॅंटीन वाला जैसे-तैसे मान तो गया लेकिन उसे मनाने मे मुझे आधा घंटा लग गया...मेरे दोस्त खा-पीकर क्लास की तरफ चले गये और उनके जाने के बाद मैं एक दूसरी टेबल पर बैठकर गहरी चिंता मे डूबा हुआ था कि इतने पैसे कहाँ से आएँगे, अभी तो साला रात मे हॉस्टिल वाले दारू पिएँगे...वो अलग...जी तो करता है कि दो-तीन दिन के लिए कही भाग जाउ, सारा लफडा ही ख़तम

"ओये...दो रस-मलाई भेज इधर..."गहरी चिंता से उबरने के लिए मैने ऑर्डर दिया"साला ये बर्तडे...बर्तडे ना होकर ,एक आफ़त हो गयी है...इनके बर्तडे आने दो, बीसी 5000 का तो मैं अकेले नाश्ता करूँगा और 10,000 का दारू पियुंगा, फिर लवडे दूसरी बार से पार्टी लेना भूल जाएँगे...."

"चम्मच क्या पपाजी लाकर देंगे, जा भागकर चम्मच लेकर आ..."कॅंटीन मे काम करने वाले लौन्डे को मैने हड़काया, जब वो बिना चम्मच के दो रस-मलाई मेरी टेबल पर रखकर चला गया...

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रस-मलाई का रस्पान करने के बाद जैसे मुझे थोड़ा सुकून मिला और मैने एक जोरदार अंगड़ाई मारकर जमहाई ली तो मुझे आराधना कॅंटीन मे अपनी सहेलियो के साथ बैठी हुई दिखाई दी....आराधना को मैने कल एश के कारण धमकाया था,लेकिन आज जब एश से बात-चीत शुरू हो गयी तो मैने सोचा कि इससे भी बातचीत शुरू कर ही लेते है,वैसे भी ग़लती इसकी नही थी....इसलिए मैने आराधना को दो उंगलियो से इशारा करके अपने पास बुलाया...मेरे बुलाने पर आराधना तो वहाँ आई ही साथ मे उसकी सहेलिया भी उसी के साथ वहाँ आ गयी...अब सबके सामने आराधना से वैसी बात करना जैसी बात मैं करने वाला था, वो मैं करता तो मेरे अहम के लिए ये धर्म संकट होता, इसलिए मैने हड़का कर आराधना की सहेलियो को वहाँ से भगाया और आराधना को अपने पास बैठने के लिए बोला....

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"देख...ये गाल फूला कर मत बैठ,मैं कल थोड़ा अपसेट था ,इसलिए तुझपे बरस पड़ा था..."एश ने जो सुबह ऑडिटोरियम मे मुझे कहा था, वही मैने आराधना को चिपका दिया....

"इसका मतलब आप मुझे सॉरी बोल रहे हो "

"सॉरी मैने कब कहा ...वो तो मैं एक्सप्लेन कर रहा था कि मैं तुझपर कल क्यूँ भड़का था...अब फुट यहाँ से..."

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उस दिन जब मैं कॅंटीन के बिल और रात को हॉस्टिल मे होने वाले खर्चे को लेकर परेशान था तभी कुच्छ ऐसा हुआ,जिसने मुझे अपार खुशी दी और वो अपार खुशी मुझे एश के मेसेज के कारण हुई थी....बोले तो उसने अपुन को मेसेज भेजकर बर्तडे विश किया था....

"अरुण...मुँह मे लंड लेगा तो एक खुशी की बात बताता हूँ..."एश का मेस्सेज पढ़ने के बाद चलती हुई क्लास के बीच मे मैने अरुण से कहा...

"बोसे ड्के ,धीरे बोल...वरना ये छत्रपाल तेरे मुँह मे लंड देगा..."मेरे पेट मे एक मुक्का मारते हुए अरुण बोला"और तू खुश क्यूँ हो रहा है..."

"ये देख...तेरी भाभी ने मुझे बर्त डे विश किया है..."मोबाइल डेस्क पर रखकर मैने अरुण को एसा का मेस्सेज दिखाया...

" तू लवडे खुश तो ऐसे हो रहा है,जैसे उसने आइ लव यू लिखकर भेजा हो..."

"बेटा तू समझ नही रहा है...आज उसने मुझे बर्तडे विश किया, फिर धीरे-धीरे करके गुड नाइट, गुड मॉर्निंग के मेस्सेज करेगी और फिर एक दिन ऐसिच वो 'आइ लव यू' का मेस्सेज भी मुझे टपका देगी...आइ नो.."

"लाड मेरा नो...आइ लव यू, का मेस्सेज भेजने के लिए...गौतम ज़िंदा है अभी...उसके बचपन का प्याआआआर...."

"मुँह बंद कर साले...और तू यदि लड़कियो के बारे मे इतना ही जानता तो दिव्या से गान्ड थोड़ी ही मरवाता...बेटा देख लेना, वो एक ना एक दिन आइ लव यू ज़रूर बोलेगी...क्यूंकी मैने फ़िल्मो मे देखा है कि अक्सर लड़किया अपने बचपन के दोस्त से सेट तो होती है,लेकिन कॉलेज मे उन्हे किसी दूसरे लड़के से सच्चा प्यार हो जाता है..."

"देख लेना तू...एश के नाम पर चुदेगा ,फिर मत बोलना कि मैने तुझे आगाह नही किया था..."

"मुँह बंद कर बे लोडू, तुझ जैसा छोटा आदमी ऐसी छोटी ही बात करेगा...साले कभी तो कुच्छ अच्छा बोला कर..."कहते हुए मैने अपना चेहरा अरुण की तरफ से फेर्कर बोर्ड की तरफ कर लिया....

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उस दिन एश ने दो और मेस्सेज किए, जिनमे से एक मे उसने लिखा कि' सॉरी,मुझे तुम्हे बर्तडे विश नही करना चाहिए था' और दूसरे मे लिखा कि' क्या तुम मुझसे पार्किंग मे मिलोगे...'

"बड़ी अजीब लड़की है यार...कही इसका दिमाग़ सटक तो नही गया, ना जाने क्या-क्या सोचते रहती है...."एश के मेसेज पढ़ने के बाद मैने कहा....

 
jay wrote: ↑ 13 Jul 2017 07:36
शानदार अपडेट।

जारी रखे, आगे की प्रतीक्षा में

 
उस दिन एश ने जब खुद मुझे पार्किंग मे मिलने के लिए कहा तो मेरे मन मे एक ख़याल कौधा कि 'ये साला कॉलेज का पार्किंग है या हमारा लवर पॉइंट '

एश से इस सेमेस्टर मे मैं जितनी बार पार्किंग मे मिला था ,उतना तो मैं पिछले चार साल मे शायद उससे मिला भी नही होऊँगा और आज फिर मुझे अपने लवर पॉइंट मे अपने लवर से मिलने जाना था....

उस दिन मुझसे बहुत बड़ी ग़लती हुई थी और वो ये कि ना जाने कैसे एश से पार्किंग मे मिलने वाली बात को मैं भूल गया...दोस्ती-यारी..हँसी-मज़ाक मे कॉलेज के लास्ट पीरियड तक आते-आते तक तो जैसे मैं ये भूल ही चुका था कि मुझे एश से मिलना भी है ,उपर से क्लास के लौन्डे ने पूरी क्लास मे ये खबर भी फैला दी कि 'दा डार्क नाइट राइज़स' ह्ड प्रिंट मे आ चुकी है,इसलिए क्लास ख़त्म होने के बाद हम जिन-जिन लौन्डो को राइज़स डाउनलोड करनी थी...वो न्यू इट बिल्डिंग या फिर लाइब्ररी की तरफ और उनमे से एक मैं भी था.....अरुण को बॅटमॅन कुच्छ खास पसंद नही था,इसलिए वो सौरभ के साथ सीधे हॉस्टिल की तरफ हो लिया और मैं, सुलभ के साथ लाइब्ररी मे जा पहुचा....लाइब्ररी रात के 10 बजे तक खुली रहती थी लेकिन कॉलेज के बाद वहाँ एक्का-दुक्का स्टूडेंट ही दिखते थे...इसलिए डाउनलोडिंग स्पीड भी पेल के आती थी...

कॉलेज के बाद लाइब्ररी के सुनसान होने की वजह ये थी कि गर्ल्स हॉस्टिल मे ऑलरेडी वाईफ़ाई लगा हुआ था और लौन्डो को जो डाउनलोड करना होता था ,वो दिन मे ही क्लास बंक करके डाउनलोड कर लेते थे....

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" पहले हमारे हॉस्टिल मे भी वाईफ़ाई चलता था लेकिन इस साले टकलू प्रिन्सिपल ने बाद मे वाईफ़ाई हटवा दिया...वरना कॉलेज के बाद यहाँ आने की ज़रूरत नही होती ..."डार्क नाइट राइज़स ,को डाउनलोडिंग मे लगाकर मैने सुलभ से कहा,इस बात से अंजान कि एश उधर पार्किंग मे मेरा इंतज़ार कर रही है...

"सो तो है...ओये बीसी"

"ऐसे पवित्र शब्द निकालने की कोई वजह...बक्चोद लाइब्ररी मे तो गाली मत दिया कर...वरना अभी वो लाइब्ररी का इंचार्ज इन्सल्ट करके भगा देगा तो क्या इज़्ज़त रह जाएगी तेरी..."

"होना क्या है...यदि उसने ऐसा किया तो उस लवडे की लौंडिया को छोड़ूँगा नही....तूने देखा है उसे ,कैसे मरवा-मरवा का गोल-गप्पा हुए जा रही है...और मैं चौका इसलिए क्यूंकी वो तेरे हॉस्टिल वाला कल्लू शर्मा को चश्मा लग गया है, वो देख साला इधरिच ही आ रहा है..."

"अजीब है यार..."कल्लू को अपनी तरफ आता देख मैने थोड़ी उँची आवाज़ मे कहा, ताकि कल्लू भी सुन सके...मैं बोला"कैसे-कैसे लौन्डो को चश्मा लग जाता है यार, साले अभी तक फर्स्ट एअर क्लियर नही है और चश्मा लगाकर पढ़ाकू की औलाद बनकर घूम रहा है...."

"बोल तो ऐसे रहा है जैसे तू कॉलेज का टॉपर हो..."हम दोनो के पास बैठते हुए कल्लू ने कहा.."और मैने फर्स्ट एअर की सारी बॅक लास्ट एअर मे ही क्लियर कर ली थी...अब सिर्फ़ 5थ सेमिस्टर. के 3 और 6थ सेमिस्टर. के 4 है...इन्ही बॅक को क्लियर करने के लिए दिन रात पढ़ाई करता हूँ,इसीलिए चश्मा लगा है..."

"बेटा ये पढ़ाई करने के कारण चश्मा नही लगा है, ये तो 3जीपी क्वालिटी मे बीएफ देख-देख कर हिलाने का नतीज़ा है...अबे कालिए खुद को देख और मुझे देख...कितना बदसूरत दिखता है तू..."

"बदसूरत भले ही हूँ,लेकिन लौंडिया पटा कर बैठा हूँ...तेरी तरह रॅनडा तो नही हूँ..."

"म्सी..."कल्लू का सर पकड़ कर मैने लाइब्ररी की टेबल मे पटक दिया और बोला"औकात से बाहर बोलता है...बेटा मैं लौन्डियो को भाव नही नही देता,वरना लौन्डियो की तो मैं नादिया बहा सकता हूँ...फ़ेसबुक पर 1332 लड़कियो की फ्रेंड रिक्वेस्ट पेंडिंग पड़ी है अभी...बात करता है..."अपनी शेखी झाड़ते हुए मैने कहा...

"बोल ना कि गे है...और तेरा लंड खड़ा नही होता..."

"फिर औकात से बाहर बोला तूने लवडे..."एक बार फिर मैने कालिए का सर पकड़ा और पहले की तरह टेबल पर दे मारा...

"बेटा,मुझपर गुस्सा उतारने से कुच्छ नही होगा...तू रॅनडा था ,रन्डवा है और रन्डवा रहेगा..."बोलकर कल्लू वहाँ से उठा और लाइब्ररी से भाग खड़ा हुआ....

कल्लू की बात सुनकर मेरा रोम-रोम ब्लास्ट फर्नेस मे जलने लगा...मैं कल्लू को मारने के लिए उसके पीछे भागा...लेकिन तभी सुलभ ने 'डाउनलोडिंग फैल हो जाएगी' की गुहार मारकर मुझे रोक दिया, वरना कल्लू तो आज मेरे हाथो शाहिद ही होने वाला था जैसे-तैसे मैं अपमान का घूट पीकर बैठ तो गया, लेकिन सुलभ के सामने अपनी बेज़्ज़ती से मैं थोड़ा निराश और परेशान था क्यूंकी कल कॉलेज मे सुलभ यही बात पूरे लौन्डो को बताने वाला था और तो और मुझसे ये कहते भी नही बन रहा था की 'देख यार...ये बात किसी और को मत बताना...'

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जब डार्क नाइट राइज़स डाउनलोड हुई तो हम दोनो लाइब्ररी से निकल कर बाहर आए...हम दोनो पार्किंग के पास से भी गुज़रे,लेकिन तब भी मुझे ये याद नही आया कि एश ने मुझे पार्किंग मे मिलने के लिए बुलाया था क्यूंकी मेरे दिल-ओ-दिमाग़ मे तो कालिया के वो शब्द घूम रहे थे,जो उसने मुझसे लाइब्ररी मे कहे थे....

"सुलभ...सुन तो.."

"बोल.."

"यदि मैने तीन हफ्ते के अंदर इस कल्लू की बहन को पटाकर नही छोड़ा तो तू मेरा लंड काट देना...लेकिन तब तक आज लाइब्ररी वाली बात किसी को मत बताना...."

"रहने दे,तुझे ये कल्लू की बहन को छोड़ने वाली पार्तिक़या लेने की कोई ज़रूरत नही है...मैं वैसे भी किसी को नही बताउन्गा, बेफिकर रह..."

"कमान से निकला तीर..मुँह से निकला शब्द...लंड से निकला मूत...गान्ड से निकला ***...जिस तरह वापस नही होते,उसी तरह अरमान की प्रातिक़या कभी वापस नही हो सकती..."

"यदि ऐसा ही है तो फिर खा कसम आल्बर्ट आइनस्टाइन की...लेकिन मुझे लगता नही कि तू ये कर पाएगा..."

"अब तो आइनस्टाइन चाचा की कसम ले ली है, इज़्ज़त तो रखनी ही पड़ेगी...बोले तो अब आराधना डार्लिंग तीन हफ़्तो के अंदर चुद कर ही रहेगी..."

उसके बाद सुलभ ने अपना रास्ता नापा और मैने हॉस्टिल का रास्ता नापा...

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उस दिन मेरा बर्तडे था...लेकिन दूसरे जहाँ चाहते है कि उनके बर्तडे के दिन सब उसे विश करे...वही मैं चाहता था कि किसी को मेरा बर्तडे मालूम तक ना चले....इसकी कोई ख़ास वजह तो नही थी बस वजह यही थी कि बर्तडे के दिन जानवरो की तरह पड़ने वाली मार से मैं बहुत घबराता था. लेकिन अब तो जंग का बिगुल बज चुका था और लौन्डे अपने-अपने बर्तडे के दिन मेरे द्वारा हुई ठुकाई का बदला लेने के लिए हॉस्टिल मे तैयार खड़े थे कि ,कब मैं हॉस्टिल के अंदर घुसू और वो मेरी ठुकाई शुरू करे....

8थ सेमेस्टर मे मनाया गया मेरा बर्तडे कयि कारणों से मेरे लिए यादगार साबित हुआ...

पहला कारण ये कि एश ने प्यार से मुझे ऑडिटोरियम मे चॉक्लेट गिफ्ट किया, जिसे मैने लेने से इनकार कर दिया

दूसरा कारण ये कि ज़िंदगी मे पहली बार एश ने मेरा इंतज़ार किया और मैं उससे मिलने नही गया

तीसरा कारण जो मेरे बर्तडे को यादगार बनाने के पीछे था,वो ये कि मैने उसी दिन आराधना को चोदने की प्रातिक़या की थी...

और चौथा कारण ये था कि ज़िंदगी मे पहली बार मैं जैल गया ,वो भी तब जब हमारे डिस्ट्रिक्ट का एस.पी. ही मेरे खिलाफ हो...

यदि मैं चाहता तो पिछले तीन साल की तरह इस साल भी बर्तडे के दिन मार खाने से बच सकता था ,लेकिन अबकी बार मैने खुद ही मार खाने का सोचा...क्यूंकी ये कॉलेज मे मेरा आख़िरी साल था इसलिए मैं कॉलेज मे बनाए गये अपने आख़िरी बर्तडे को यादगार बनाना चाहता था...फिर भले ही वो यादगार पल मेरी ठुकाई से ही क्यूँ ना जुड़ी हो....

मैं हँसते-मुस्कुराते हुए हॉस्टिल के अंदर घुसा तो जिन लौन्डो ने मुझे पहले देखा वो गला फाड़कर मेरा नाम चिल्लाने लगे कि'सब जल्दी आ जाओ बे, अरमान आ गया है...'

उसके बाद फोर्त एअर के लड़को ने मुझे उठाया और मेरे रूम मे लेजा कर मुझे बंद कर दिया...उन लोगो को शायद ये डर था कि मैं कही भाग ना जाउ, लेकिन उन्हे क्या पता कि बकरा खुद बलि चढ़ने आया था....

मुझे रूम मे बंद करने के तक़रीबन 10 मिनिट बाद लड़को ने गेट खोला और गेट खुलने के कुच्छ ही सेकेंड्स के बाद अरुण ने मेरा हाथ पकड़कर सौरभ को पैर पकड़ कर उठाने के लिए कहा....

"मारो साले को, पूरे चार साल की कसर निकाल देना..."

इसके बाद जो मार मुझे पड़ी, वो साली अब तक मुझे याद है...बहुत देर तक फोर्त एअर के लड़के मेरी धुलाई करते रहे और जूनियर्स वहाँ खड़े होकर मज़ा ले रहे थे...इसके बाद उन लोगो ने मुझे मेरे बिस्तर पर लेजा कर पटक दिया और अरुण,सौरभ को भी बाकी लड़को ने पेलने के लिए उठा लिया...

"अबे ओययय्ए...मुझे क्यूँ मार रहे हो बे...मेरा बर्तडे थोड़ी है..."जब लौन्डो ने अरुण का हाथ-पैर पकड़ कर उठाया तो अरुण की गान्ड फट गयी और वो बोला...

"तुम दोनो अरमान के रूम पार्ट्नर हो, लात तो तुम दोनो भी खाओगे...देख क्या रहे हो बे, मारो लवडो को...."फोर्त एअर के झुंड मे से किसी ने कहा और फिर अरुण ,सौरभ के पिछवाड़े को लाल करके उन्हे भी मेरी तरह उनके-उनके बिस्तर पर फेक दिया गया.....साले बिना मतलब के चुद गये

"कसम से ,यदि मुझे मालूम होता कि तेरे रूम पार्ट्नर होने के कारण मैं भी लात खाउन्गा तो मैं फर्स्ट सेमेस्टर मे ही रूम चेंज कर लेता...सालो ने मार-मार के पिछवाड़ा सूजा दिया..."दर्द से कराहते हुए सौरभ बोला"वैसे अरमान तेरे तकिये के नीचे तेरा गिफ्ट है...देख तो..."

"गिफ्ट "मैने बड़ी उम्मीद के साथ अपना तकिया उठाया लेकिन मेरे अरमानो पर पानी तब फिरा जब मैने देखा कि वहाँ सिवाय कॉंडम के कुच्छ नही था...

"बोसे ड्के ,ये कॉंडम को गिफ्ट कहता है तू... दिखा दी ना तूने अपनी औकात...कम से कम 32 जीबी का पेन ड्राइव तो दिया होता ,बक्चोद..तेरे मुँह मे अरुण का लंड..."

"अबे अरमान, मेरा गिफ्ट देखने के लिए दाई तरफ पलट और बिस्तर उठा कर देख...."

अबकी बार बड़ी उम्मीद से मैं दाई तरफ पलटा और बिस्तर के नीचे देखा तो वहाँ दारू का एक क्वॉर्टर रखा हुआ था....

"अरे गजब...सारी तबीयत खुश हो गयी...लेकिन बमपर देता तो मैं और ज़्यादा खुश होता, खैर कोई बात नही इससे काम चला लूँगा..."

क्वॉर्टर निकालकर मैने फाटक से अपने लिए पेग बनाए और दर्द कम करने के लिए एक के बाद एक 2 पेग पी गया.....

"आअहह....तुम दोनो कोई वरदान माँगो बे मुझसे, मैं भगवान हूँ "

"आज रात को बार मे पार्टी दे फिर..."

"तथास्तु..."बोलते मैने फिर एक पेग चढ़ाया और सिगरेट सुलगा कर बिस्तर पर वापस लेटकर जगजीत सिंग का ग़ज़ल गाने लगा...

"ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो

 
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