बस के अंदर...........
दामिनी- क्या कोई बातायगा कि हमे यहा एक साथ क्यो लाया गया है.....
आदमी1- आपको जल्द ही पता चल जायगा....थोड़ा इंतज़ार कीजिए...
दामिनी- हे....मुझे इंतज़ार करने की आदत नही....तुम अभी बताओ वरना....
आदमी1(खड़ा हो कर)- वरना क्या...क्या कर लोगि...हाँ....
आदमी2(हाथ दिखा कर)- शांत रहो तुम....और हाँ... हम सिर्फ़ ऑर्डर फॉलो कर रहे है मेडम...हम आपके किसी भी सवाल का जवाब नही दे सकते....
दामिनी- तो उसका नाम बताओ जिसने तुम्हे ऑर्डर दिया है....समझे...
आदमी2- मैने कहा ना...कोई जवाब नही...मतलब एक भी नही....और अब चुपचाप बैठी रहिए....नही तो....
दामिनी(आँखे दिखा कर)- नही तो क्या...क्या करेगा तू...
आदमी2(गन दिखा कर)- सीधा उपर भेज दूँगा....हमे यही ऑर्डर मिला है....जो भी बात ना माने...उसे उपेर भेज दो...
आदमी1- अब शायद आप सबको अपने जवाब मिल गये होंगे...तो अब बिल्कुल शांति से बैठे रहो...जल्द ही सब जान जाओगे....
दोनो आदमियों की गन्स देखने के बाद बस मे बैठे सब लोगो ने चुप रहना ही बेहतर समझा....
पर हर सक्श मन ही मन बहुत परेशान था...खास कर एक दूसरे को साथ मे देख कर....
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सहर से काफ़ी दूर.....एक गाओं मे......
गाओं मे बने एक आलीशान मकान मे ज़ोर-शोर से काम चल रहा था....मजदूर उस घर को ठीक करने मे जुटे हुए थे....और इस काम की निगरानी करने वाले 2 लोग थे....अकरम और सोनू(सुषमा का बेटा....
अकरम- अब लगभग पूरा काम हो ही गया है.....
सोनू- ह्म्म...पर बहादुर कहाँ रह गये...वही बता सकते है कि हर एक काम सही हुआ कि नही...
अकरम- अरे हाँ...वो बहादुर दूसरे मकान को देखने गये है...आते ही होंगे.....
सोनू- वैसे एक बात समझ नही आई....ये अंकित ने इन मकानो को ठीक करने को क्यो बोला...क्या तुम्हे कुछ पता है...
अकरम(उपर देखते हुए)- नही...बस उसने इतना कहा था कि...यही अंत है....
अकरम की बात सुनकर सोनू सोच मे पड़ गया...पर तभी बहादुर की एंट्री हुई और वहाँ फैली खामोशी को तोड़ दिया ....
बहादुर- चलो...जाने का वक़्त आ गया....वो बस आते ही होगे....
अकरम- हुह...पर आप एक बार देख तो लेते...सब ठीक है या...
बहादुर(बीच मे)- मैं पिछले 1 मंत से देख ही रहा हूँ...सब ठीक है...अब चलो जल्दी....
और फिर बहादुर, अकरम और सोनू को साथ ले कर निकल गया ....
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लगभग शाम के वक़्त वो बस सबको ले कर गाओं के उसी मकान के बाहर आ कर रुकी जिसको अकरम और सोनू सही करवा रहे थे....
बस रुकते ही सब लोग नीचे आए तो मकान देख कर कुछ लोगो के होश उड़ गये...
आकाश, सुजाता, दामिनी, कामिनी,प्रमोद,सूमी और रजनी की हैरानी का कोई ठिकाना नही था....वो सब उस घर को एक टक देखे जा रहे थे....
दामिनी- ये तो...पर हमें यहाँ क्यो लाए .....
रजनी(प्रमोद से)- ये तो आज़ाद का...
प्रमोद(हैरानी मे)- हाँ...सही पहचाना....
सुजाता(आकाश से)- ये घर तो टूट चुका था...फिर ये...किसने ठीक करवाया...क्या आपने....
आकाश(घर देखते हुए)- नही...पर जिसने भी ये सब किया है...वो कोई अपना ही होगा....
आदमी1- अब आप सब अंदर जाइए....अंदर आपको सारे सवालो के जवाब मिल जायगे....चलो...सब अंदर जाओ....
उन आदमियों के तेवेर देख कर सब चुपचाप अपना सामान ले कर अंदर चले गये....
अंदर सब हॉल मे पहुँच कर सहमे हुए से चारो तरफ देखने लगे...सब ये जानने को बेताब थे कि उन्हे यहाँ बुलाने वाला है कौन...और चाहता क्या है....
तभी एक आवाज़ गूजी और उसे देख कर सबकी परेशानी कुछ ज़्यादा ही बढ़ गई.....
""स्वागत है आप सब का...बहुत-बहुत स्वागत है.....""
ये आवाज़ सुनते ही सबकी नज़रे उपेर की तरफ पहुँची और जैसे ही उन्होने उस आवाज़ के मालिक को देखा तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई....
उन सब का स्वागत करने वाला और कोई नही...बल्कि खुद ""आज़ाद मल्होत्रा खड़ा था...........