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sexstories

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अब तक आपने पढा, मै मेरी प्रेमिका संग चुदाई की रासलीला कर चुका था। अब आगे -

हम हॉल में थे, और वहां और कोई नही था। थोडी ही देर में रूपा टॉयलेट से बाहर आई, और उसने हमें बोला, "चलो तुम दोनों पहले फ्रेश हो जाओ। कुछ बाते करनी है।"

तो हम दोनों जल्दी से फ्रेश हो गए, तब तक रूपा ने टेबल पर स्नैक्स लगा दिए। फिर हम स्नैक्स लेने बैठ गए। तभी रूपा ने कहा, "हमारे प्लान के मुताबिक अगले तीन दिनों के लिए सिर्फ हम तीनों ही इस घर में रहनेवाले थे। मेरे बाकी के दोस्त जिनसे तुम मिले वो पहले दो दिन से यहाँ थे।"

तभी भक्ती ने उसे रोकते हुए कहा, "और वो आज निकलने वाले थे, तो वो सब चले गए। अब प्लान के हिसाब से हम सिर्फ तीनो ही है यहाँ।"

फिर रूपा ने उसे रुकने का इशारा करके खुद बोलने लगी, "जब हमने तुम दोनों को कमरे में बंद कर दिया, उसके बाद कुछ देर में भक्ती का फोन बजने लगा, पहले हमने सोचा कि, हम नही उठाएंगे। लेकिन बहुत बार कॉल आया, तो मैंने उठाकर बात की। फोन भक्ती के घर से था, भक्ती तेरे पापा का एक्सीडेंट हुआ है और तुझे बताने के लिए तेरे घर से फोन था।"

यह सुनते ही भक्ती अचानक सीरियस होकर रुआंसी हो गयी। तो मैंने उसे अपने पास लेते हुए उसे समझाया। थोडी देर बाद भक्ती ने कहा, "मैं अपने पापा को देखना चाहती हूँ, तो मैं जा रही हूँ।"

अब उसे ऐसी हालत में मैं अकेले नही छोड सकता था, तो मैंने कहा, "मैं तुम्हे हॉस्पिटल छोड के आता हूँ।"
और हम दोनों निकल लिए, रास्ते में भक्ती मुझसे बोली, "राम अब तुम क्या करोगे? तुमने तो घर में भी बोल दिया की बाहर जा रहे हो।"

मैं सोचने लगा। तभी उसने कहा, "मैं रूपा से बोल दूंगी तुम प्लान के मुताबिक दो-तीन दिन उसी के घर रुक जाना।"

मुझे वैसे भी कुछ समझ नही आ रहा था तो मैंने बस अपनी हामी भर दी। फिर उसने कॉल करके रूपा से पूछा, क्या मैं उसके यहाँ दो दिन के लिए रुक सकता हूँ? तो रूपा ने भी मना नही किया। और इस तरह से जिस घर में आनेवाले तीन दिनों के लिए हम तीनों रहनेवाले थे, अब सिर्फ दोनों को रहना था। और रूपा और मैं एक दूसरे को ठीक से जानते तक नही थे।

खैर मुझे क्या पता था कि, मेरे इसी एक फैसले की वजह से मेरी जिंदगी में एक अलग मोड आ जायेगा। तो मैंने भक्ती को हॉस्पिटल में छोडा और उसको खयाल रखने को कहकर मैं रूपा के घर की तरफ निकल लिया।

रूपा एक बहुत ही सुंदर लड़की थी, लेकिन उसके प्रति मेरे मन में कोई गलत विचार नही था। तो मुझे बस रहने के लिए जगह चाहिए थी जो रूपा के घर में थी। मुझे जरा भी उम्मीद नही थी, की रूपा के मन में क्या चल रहा है। खैर मैं रूपा के घर पहुंच गया और डोरबेल बजा दी। रूपा जैसे मेरे ही आने का इंतजार कर रही थी, जैसे ही मैंने डोरबेल बजाई उसने झट से दरवाजा खोलकर मेरा स्वागत किया। उसे देखते ही मैं दरवाजे में ही रुक गया। मेरे जाते समय वो टॉप और जीन्स में थी और अब उसने एक पतला सा गाउन डाला हुआ था, जो हल्के नील रंग का था।

मुझे खुद के बदन को निहारता देख उसने कहा, "कहा खो गए राज? अंदर आओगे भी या वहीं रुके रहोगे।"

तभी मुझे ध्यान आया, मैंने उसे सॉरी बोला और घर के अंदर आ गया। मेरे अंदर आते ही उसने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। उसने मेरे आने से पहले ही सारी खिड़कियां और उनके पर्दे भी लगा दिए थे।

मैंने इसका कारण पूछा तो वो बोली, "यहाँ पड़ोस वाले दूसरों के घरों में कुछ ज्यादा ही झांकते है, तो उनसे बचने के लिए यह तरीका है।"

जैसे ही मैं हॉल में पहुंचा, उसने पहले से सब इंतजाम करके रखा था। टीवी पर गाने चल रहे थे, एक हल्की रोशनी देने वाला बल्ब जल रहा था और टेबल पर दो ग्लास में पेग बनाकर रेडी रखा था, पेग के बगल में स्नैक्स के लिए भी काफी सारा सामान रखा था। यह सब देखकर मैंने उससे पूछा, "क्या इरादा है मैडम, जबसे मैं आया हूँ बस दारू ही पिला रही हो?"

वो मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा दी और बोली, "इरादे तो बिलकुल नेक थे, लेकिन तुम्हे कमरे के अंदर देखकर मन बहक गया।"

इतना कहकर वो जोर से हसने लगी, मुझे लगा बस उसने मेरी टांग खींचने के लिए कहा होगा, तो उसके साथ मैं भी हंस दिया। फिर हम दोनों ही सोफे पर बैठकर गाने सुनते सुनते जाम पी रहे थे। उस समय लगभग पांच बज रहे होंगे, और जो मौसम घर में बनाया था उसे देखके लग रहा था किसी पब में बैठा हुआ हूं। हम दोनों ही चुपचाप बैठकर जाम पी रहे थे, तो मैंने चुप्पी को तोड़ते हुए कहा, "रूपा, तुम और भक्ती कब से जानते हो एक-दूसरे को?"

तो उसने बताया, "वो दोनों पिछले छह सालों से एक दूसरे के करीबी दोस्त है। और उन दोनों में कोई बात छिपी नही है। हम दोनों एक दूसरी को अपनी बहन से भी ज्यादा मानते है।"

उसका इतना कहना था कि मैंने बोल दिया, "अच्छा तो इस हिसाब से तो तुम मेरी साली हुई।"

और हम दोनों हंसने लगे। फिर ऐसे ही कुछ देर नॉर्मल बाते होने के बाद रूपा ने फिर से मेरी टांग खींचना शुरू कर दिया। वो मुझसे पूछने लगी, "तो राम एक बन्द कमरे में कैद होकर कैसा लगा? मजा आया या नही?"

अब हम दोनों ही थे, तो मैंने भी ना शरमाते हुए सीधा बोल दिया, "यार मजा तो बहुत आया, लेकिन अभी और ज्यादा मजा आता अगर भक्ती भी यहाँ होती।"

इस पर रूपा बोली, "राम अब अगर तुमने मुझे साली कहा ही है, तो साली भी तो आधी घरवाली होती है।"

इतना कहकर उसने मुझे आँख मार दी। अब तक हमारे दो पेग खत्म हो चुके थे, तो मैंने हम दोनों के लिए तीसरा पेग बनाकर चियर्स किया। और फिर बातें चलती रही। फिर मैंने उससे पूछा, "रूपा तुम्हारा कोई बॉयफ्रेंड नही है?"

इस पर वो बहुत ही जोरों से हंसने लगी। और बोली, "पहले थे, लेकिन कोई ऐसा मिला नही जो तुम्हारे जितना दमदार हो। तो अब मैं बिलकुल सिंगल हूँ।"

मैं उसकी बात पर बस मुस्कुरा दिया। उसकी बातों से मुझे अंदाजा हो गया था कि, यह भी मुझसे चुदना चाह रही है। लेकिन मैं भक्ती से सच्चा प्यार करने लगा था, तो उसे धोखा देना मुझे ठीक नही लगा।

इधर ये रूपा थी कि, मुझे अपने बदन के जलवे दिखाने लगी। अब हम दोनों पर दारू का नशा चढने लगा था, और भूख भी लग रही थी। रूपा ने कहा, "चलो अब मुझे बहुत भूख लगी है, पहले खाना खा लेते है।"

तो मैंने कहा, "चलो ठीक है, किचन से खाना ले आने में मैं भी तुम्हारी हेल्प कर देता हूँ।"

फिर हमने खाना लगाया, और मैं अपनी जगह पे बैठ गया। वो भी मेरे सामने ही बैठ गई, और बिच बिच में खाना परोसने के बहाने मुझे अपने चूचों के दर्शन करवाने लगी। अब आप मन में कितना भी सोच लो, लेकिन सामने इतना हसीन नजारा देखकर लंड तो बेकाबू हो ही जाता है। फिर जैसे तैसे हमने खाना खाया, और बर्तन सिंक में रख दिए। और मैं जाकर सोफे पर बैठ गया, अब मुझ पर नींद हावी होने लगी थी।

तभी रूपा के चिल्लाने की आवाज आई, तो मैं भागता हुआ आवाज की दिशा में जाने लगा। आवाज बाथरूम से आई थी, जैसे ही मैं वहां पहुंचा, वहां का हाल देखकर मेरी आँखे खुली की खुली रह गई। वहां नजारा कुछ यूँ था कि, शावर चल रहा था रूपा पूरी नंगी जमीन पे बैठी हुई और उसके बूब्स पे साबुन का झाग था।

वो मुझे वहां देखते ही बोली, "यार राम मेरा पैर फिसल गया, और मुझसे उठा नही जा रहा। लगता है पैर में मोच आई है। उठने में मेरी हेल्प कर दो प्लीज।"

एक तो वो पूरी नंगी थी, और मुझे देखने के बाद भी वो बिलकुल नही शरमाई। उल्टा बिना किसी झिझक के मुझसे हेल्प मांग रही थी। अब मैं कुछ कर भी नही सकता था, तो मैंने आगे बढकर सबसे पहले शावर बंद कर दिया और फिर रूपा को उठाने के लिए उसको हाथ दे दिया।

वो मेरे हाथ को पकड़कर उठने की कोशिश करने लगी, लेकिन वो उठ नही पाई। तो मैंने उसे उसके कंधो को पकड़कर उठाया, जैसे ही वो उठी तो मैंने उसको छोड़ना चाहा तो वो फिर से डगमगाई। और उसने मेरे हाथों को पकड़ लिया, अब तक उसको इस हालत में देखकर मेरा लौडा भी पैंट में तनकर पूरा खड़ा हो चूका था, जिसे रूपा ने भी भांप लिया। अब मैं उसे वैसी हालत में छोड़ भी नही सकता था और अगर मैं उसे कुछ देर तक और देखता तो मेरे लिए खुद को रोकना बहुत मुश्किल होने वाला था।

तभी उसने कहा, "तुम मुझे मग में भरकर थोडा पानी दो, मैं अपने आप को साफ कर देती हूँ। फिर मुझे रूम में छोड़ देना प्लीज।"

उसने जो भी कहा, मैंने बस स्वीकृति में हाँ बोल दिया। और उसे एक हाथ से पकड़े रखकर दूसरे हाथ से पानी लेकर उसे दिया। वो साबुन का झाग निकालने की कोशिश करने लगी, लेकिन तभी उसका बैलेंस बिगड़ने लगा, तो

उसने बोला, "राम, प्लीज तुम ये साफ़ कर दोगे। मुझसे नही होगा।"

आगे की कहानी अगले अंक में लिखूंगा। आपको यह कहानी कैसी लगी जरूर बताइए। धन्यवाद।
 
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