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अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ complete

जीशान की आँखें फटी की फटी रही जाती है। लुबना ने फुल बाउन्सर मारी थी, एक सोचा समझा सफेद झूठ।

अमन-“ये क्या हरकत है जीशान, मुझे तुमसे ये उम्मीद नहीं है… अपनी बहन का ख्याल रखने के बजाए तुम उसे गलत नाम से बुलाते हो… वो भी उसके दोस्तों के सामने। आइन्दा ऐसी कोई बात मेरे कानों तक नहीं आनी चाहिए जीशान…”

जीशान- सॉरी अब्बू ।

अमन उठकर चला जाता है

और लुबना जीशान के कंधे पे सर रख कर झूठ मूठ का रोने की एक्टिंग करने लगती है।

जीशान-“दूर हट कम्बख़्त कहीं की। अब तू झूठ भी बोलने लगी है ना… आज के बाद मैं तुझसे कभी बात नहीं करूँगा…”

लुबना अपना एक हाथ उसके लबों पे रख देती है-“चाहे तो जान ले लो, मगर बात बंद करने की बात मत करना मुझसे…”

जीशान उसका हाथ झटक देता है। और उठकर अपने रूम में जाने लगता है। उसका चेहरा सीरियस था।

लुबना का दिल तड़प उठता है। वो भागती हुई जीशान से पहले उसके रूम में पहुँच जाती है। और जैसे ही जीशान रूम में पहुँचता है वो उसके सामने घुटनों पर बैठकर अपने दोनों कान पकड़ लेती है-“ सॉरी भाई, मुझे माफ कर दो, आइन्दा ऐसी गलती नहीं करूँगी…”

जीशान-“मुझे तेरी सूरत भी नहीं देखनी। लुबना निकल जा अभी के अभी यहाँ से…”

लुबना की आँखों में बादल उमड़ आते हैं वो भी काले घने… जो बस किसी भी पल मूसलाधार बारिश कर सकते थे।

शायद जीशान ने वो देख लिया था। वो लुबना को खड़ी रहने के लिए कहता है।

लुबना खुश होकर कि चलो जीशान ने उसे माफ कर दिया, सोचकर खड़ी हो जाती है।

जीशान-“एक शर्त पे माफ करूँगा। अगर तुम 25 बार उठक बैठक करोगी और हर बार अपने दोनों गालों पे चपत मारके ये बोलोगी मुझे माफ कर दो…”

लुबना का मुँह खुला का खुला रह जाता है-“इतनी बड़े शर्त… ये शर्त है या सजा है?”

जीशान-“5 गिनने तक अगर तुम शुरू नहीं हुई तो मुझसे बुरा कोई नहीं -एक-दो-तीन-चार-

लुबना-“आपसे बुरा भला कोई हो भी नहीं सकता भाई। और वो शुरू हो जाती है। और हर बार जैसा जीशान ने उसे कहने के लिए कहा था वैसे ही करने लगती है।

वो 10 तक ही पहुँची थी कि वहाँ सोफिया और नग़मा भी आ धमकते हैं। उन्हें देख लुबना बुरी तरह शरमा जाती है। तीनो बुरी तरह हँसने लगते हैं।

मगर लुबना उठक बैठक बंद नहीं करती ये सोचते हुई की अगर जीशान ने उससे सच में बात बंद कर दिया तो?

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रात के खाने के बाद सभी अपने-अपने कमरे में चले जाते हैं। अनुम रज़िया के साथ उसके रूम में सोने चले जाते हैं। आज अनुम ने बहुत काम किया था। इसलिए वो बहुत थक चुकी थी।

अमन अपने नई नवेली दुल्हन बिटिया के रूम में सोने चला जाता है। सोफिया उसी का इंतजार कर रही थी।

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शीबा एक घायल शेरनी की तरह अपने आख़िरी वार का इंतजार कर रही थी।

उसके सबर का पैमाना किसी भी वक्त छलक सकता था। एक तरफ अमन उससे दूर -दूर रहने लगा था, दूसरी तरफ उसे जिस जीशान पे भरोसा था, वही बेमुरब्बत निकला था।

जीशान को अपने रूम में नींद नहीं … बार-बार उसके आँखें बंद करते ही उसे रज़िया का चेहरा नजर आता था। वो उठकर बैठ जाता है और अपने दादी के रूम को खटखटाता है।

रज़िया दरवाजा खोलती है और सामने जीशान को देखकर हैरान रह जाती है।

जीशान-दादी मुझे नींद नहीं आ रही थी, सर भी दर्द कर रहा है तो क्या मैं यहाँ आपके रूम में सो सकता हूँ ?

रज़िया-आओ अंदर आओ। अनुम अभी-अभी लेटी है…” एक किंग साइज बेड पे एक तरफ अनुम, बीच में रज़िया और उसके पास में जीशान लेट जाते हैं। रज़िया अपने नाजुक हाथों से जीशान का सर दबाने लगती है।

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सोफिया अपने अब्बू को देखते ही उनसे चिपक जाती है।

अमन-“कैसे है मेरी शहज़ादी ?”

सोफिया-“खुद देख लीजिये कैसे हूँ ? आपने तो मुझे घर से निकालने का पूरा इंतज़ाम कर ही दिया ना…”

अमन-“घर से निकालने का नहीं गुड्डो, घर बसाने का… वो भी मेरे साथ…”

सोफिया-“आप मुझे भूल तो नहीं जाएँगे ना अमन…”

अमन-“बिल्कुल नहीं , वैसे आज तू बहुत बातें कर रही है …”

सोफिया-“मुँह बंद कर दो मेरा…”

अमन अपनी पैंट नीचे गिरा देता है और देखते ही देखते सोफिया भी कपड़ों से आजाद हो जाती है। अमन उसे बेड पे लेटाकर अपना लण्ड जैसे ही उसके मुँह में डालता है, हवस के मारे सोफिया उसे पूरा का पूरा मुँह में गटक जाती है। अमन का लण्ड बहुत कम इतने अंदर तक गया था। रज़िया कभी कभार उसे इतने अंदर ले पाती थी। मगर कुछ ही दिनों में ये लड़की अपनी अम्मी और वाला से हर मामले में आगे निकलती जा रही थी और इसी वजह से वो अमन के दिल पे बहुत तेजी से चढ़ती भी जा रही थी।

थोड़े देर में ही अमन का लण्ड खड़ा हो जाता है। वो सोफिया को लेटाकर उसकी गुलाबी चूत की पंखुड़ियाँ चूमने लगता है-“गलप्प्प गलप्प्प…”

सोफिया-“अह्ह… अमन अह्ह… मेरे शौहर आपने मुझे क़ुबूल कर लिया… मैंने आपको क़ुबूल कर लिया। मुझे आपसे एक तोहफा चाहिए अह्ह…”

अमन सोफिया के ऊपर चढ़ जाता है और अपने लण्ड को उसकी चूत पे घिसने लगता है-“क्या चाहिए तुझे सोफिया बोल?”

सोफिया-“मुझे हमारे प्यार की निशानी दे दो अमन। मुझे अपनी बेटी से अपने बच्चे की अम्मी बना दो। अपने शौहर के बजाए मैं आपसे अपना पहला बच्चा चाहती हूँ । मेरी कोख भर दो अमन। मुझे प्रेगनेंट कर दो…”

अमन अपने लण्ड को किसी तलवार की तरह एक ही बार में सोफिया की चूत की गहराईयों में उतार देता है-“अह्ह… तुझे मैं इतना चोदुन्गा कि तू मुझसे प्रेग्नेंट हो जायेगी। बस एक बार शादी की तारीख फ़िक्स होने दे सोफिया। तुझे मैं ही ये तोहफा दे दूँगा अह्ह…”

अमन अपने वादे का पक्का था ये बात घर में हर कोई जानता था।

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सर दबाते-दबाते रज़िया को नींद आ जाती है। मगर जीशान नहीं सो पाता। वो धीरे से अपना एक हाथ अपने दादी की कमर पे रख देता है। जीरो लाइट की रोशनी में रज़िया का चेहरा गुलाब की तरह चमक रहा था अनुम दूसरी तरफ करवट लेकर सोई हुई थी। और रज़िया का चेहरा जीशान की तरफ था। रज़िया ने एक नाइटी पहने हुई थी अंदर ब्रा थी।

जीशान अपने होंठ रज़िया की चुची पे रख देता है और ब्रा के ऊपर से ही उसे चूमने चूसने और काटने लगता है। रज़िया कुछ ही देर में अपने चुची पे किसी के होंठ महसूस करके उठ जाती है और जीशान को ऐसा करता देखकर पहले तो डर जाती है। रज़िया जीशान का मुँह अपनी चुची पे से हटा देती है और उसका मुँह दबाकर दाँत पीसती हुई धीमी आवाज़ में उसे कहती है-आइन्दा ऐसी हरकत मत करना।

जीशान रज़िया की चुचियों को अपने हाथ के मजबूत पींजे में भर लेता है-“नहीं तो क्या करेंगी आप दादी ?”

रज़िया जीशान की हिम्मत देखकर हैरान थी। कुछ पलों के लिए वो भूल गई थी कि जीशान किसका खून है। वो अपनी करवट दूसरे तरफ कर लेती है। उस वक्त जीशान से बात करना बेकार था।

जीशान थोड़ी देर इंतजार करता है और फिर पूरी ताकत से बिना आवाज़ किए रज़िया को वापस अपनी तरफ घुमा लेता है।

रज़िया-“क्या है, क्या चाहिए तुझे?”

जीशान-“दूध पीना है, भूक लगी है…”

रज़िया एक चपत जीशान के गाल पे मार देती है-और चाहिए?

जीशान एक बार और जोर से रज़िया की चुची मरोड़ देता है-हाँ और चाहिए।

रज़िया समझ जाती है की इसे समझाया नहीं जा सकता। वो अपनी नाइटी के ऊपर के दोनों बटन खोल देती है, और दोनों चुचियों को बाहर निकालकर एक करवट लेट जाती है-“ले पी मनहूस कहीं का… कभी नहीं सुधरेगा…”

जीशान अपना मुँह रज़िया के एक निप्पल पे लगाकर दूध के नाम पर चुची को मसलने लगता है। रज़िया अपने होश में रहने की पूरी कोशिश करती है। मगर जिस अंदाज में जीशान उसकी निपल्स को काट-काट के चूसरहा था, उसका संभालना बहुत मुश्किल था। रज़िया को जब महसूस होता है कि अब वो बर्दाश्त नहीं कर पायेगी वो जीशान के मुँह में से निप्पल को खींच लेती है। और जल्दी से दूसरी तरफ करवट मार लेती है।

इससे पहले कि जीशान कुछ कर पाता, वो जीशान को धमका देती है-अनुम के नाम से।

अनुम का नाम सुनते ही जीशान भीगी बिल्ली के तरह चुपचाप सो जाता है।

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सुबह 7:00 बजे-अनुम जब नींद से जागती है तो रज़िया के पास में जीशान को देखकर हैरान हो जाती है। थकान की वजह से अनुम आज लेट उठी थी। जीशान गहरी नींद में सोया हुआ था उसका एक पैर रज़िया के पैर पे था और घुटना रज़िया की जाँघ में घुसा हुआ था।

रज़िया की नाइटी के बटन खुले हुये थे। ये सब अनुम को अजीब लगता है वो रज़िया को धीरे से जगा देती है। रज़िया आँखें खोलकर जब जीशान को अपने पास इस तरह लेटा हुआ देखती है तो फौरन खुद के कपड़े ठीक करती है।

अनुम-“अम्मी जीशान यहाँ कब आया था?”

रज़िया मुश्कुराते हुये-“ये पगला रात में आया था। तू सो गई थी। मुझसे बोला दादी मुझे नींद नहीं आ रही है और सर भी दर्द कर रहा है। कुछ देर इसका सर दबाने के बाद पता नहीं मुझे कब नींद लग गई।

अनुम-“ओह्ह… अच्छा मैं फ्रेश हो जाती हूँ …” और अनुम अपने रूम में फ्रेश होने चली जाती है।

रज़िया जब जीशान के चेहरे की तरफ देखती है तो उसे उसके भोले से चेहरे में अमन की झलक नजर आती है। उसके जजबात उसे कमजोर कर रहे थे। उसकी मोहब्बत जिसका वो दावा करती थी कि सिर्फ़ अमन के लिए है कम होती जा रही थी।

एक दादी की मोहब्बत अपने पोते के लिए सिर्फ़ पोते तक ही रहते तो ठीक था। मगर ये अमन के जर्खीज जमीन में जिसमें अमन ने तकरीबन हर रोज हल चलाया था और बीज बोया था, आज उस जमीन में हलचल सी होने लगी थी। वो दिल जो सिर्फ़ अमन के लिए धड़कता था। आज क्यों जीशान को देखने के बाद उस नाजुक दिल में फिर से 20 साल पहले वाले जज़्बात अंगड़ाइयाँ लेने लगे थे। उसकी मनमौजी हरकतों पे नाराज होने के बजाए उस नामुराद दिल को उन हरकतों पे प्यार क्यों आने लगा था? यही सारे सवालात रज़िया को परेशान करने लगे थे।

और कहीं ना कहीं इन सवालों के जवाब रज़िया बखूबी जानती भी थी। मगर वो अपनी मोहब्बत और अमन की बेरुख़ी की इंतिहा देखना चाहती थी। रज़िया जीशान की पेशानी को अपने लबों से तर करके बाथरूम में चली जाती है।

जीशान आँखें खोल देता है और उसके लबों पे एक दिलफरेब मुस्कान फैल जाती है।

नाश्ते के टेबल पर आज पूरा परिवार साथ बैठकर नाश्ता कर रहा था। कई दिनों से अंधेरे को अपना आशियाना बनाने वाली सोफिया ने भी सूरज की पहली किरण की हँसते हुये खुशामदीद की थी। अपने अब्बू के बगल की चेयर पे बैठी सोफिया का हुश्न आज अपनी चमक से अमन विला में एक अलग ही रोशनी बिखेर रहा था।

नाश्ता करते-करते कई बार जीशान और सोफिया की नजरें टकरा जाती और हर बार दोनों के दिल कुछ और रफ़्तार से धड़कने लगते।

अमन-“अरे जीशान बेटा, जरा अपने आंटी फ़िज़ा को फोन लगाना तो…”

जीशान फ़िज़ा को काल करता है और बेल बजने के बाद फोन अमन को दे देता है।

अमन-“वालेकुम अस्सलाम…”

अमन के हेलो कहने के बाद उसकी आवाज़ पहचानकर फ़िज़ा सलाम करती है-“आज हम ग़रीबों की कैसे याद आ गई जनाब को?”

अमन हँसते हुये-“वो आपको और आपके परिवार को इन्वाइट करने के लिए काल किया था। सोफिया की इंगेजमेंट तय हो गई है तो आप जल्दी से जल्दी यहाँ आ जाए।

फ़िज़ा-कहाँ? किससे?

अमन-“यहाँ आएँ तो सही पहले, सार बातें आराम से करेंगे। अच्छा खुदा हाफिज़…”

 
फ़िज़ा अमन की चाची रेहाना की बेटी थी। जो शादी के बाद बहुत कम अमन विला में आती थी।

अमन कुछ देर बाद अपने ऑफिस चला जाता है। आज वो रज़िया, अनुम या शीबा से मिलकर दुआ सलाम करके नहीं , बल्की सोफिया के लबों को गीला करके उसके रूम से सीधा ऑफिस के लिए निकला था।

जीशान और लुबना भी अपने कालेज के लिए निकल जाते हैं। लुबना जीशान की बाइक पे बैठ जाती है और उसे पीछे से कस के पकड़ लेती है।

जीशान-“अरे मोटी भैंस, अभी बाइक स्टार्ट भी नहीं किया मैंने और तू सींग मारने लगी। दूर हट…”

लुबना-“भाई मैंने रात में ना एक बहुत खौफनाक ख्वाब देखा उसमें ना मैं आपके बाइक से नीचे गिर गई थी। मुझे तबसे बहुत डर लग रहा है। मैं तो ऐसे ही बैठूँगी…”

जीशान-“तो तू ट्रक के नीचे गिरी थी या टैंकर के?

लुबना जीशान के कंधे पे मुक्का जड़ देती है-“ मरे मेरे दुश्मन भाई…”

जीशान मुँह ही मुँह में बड़बड़ाता हुआ बाइक कालेज की तरफ रवाना कर देता है।

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अनुम रज़िया के पास हाल में बैठी हुई थी-“अम्मी, अपने देखा ना आज क्या हुआ?”

रज़िया-क्या हुआ अनुम?

अनुम-“बनिये मत अम्मी, आपको सब पता है कि अमन क्या कर रहे हैं आजकल…”

रज़िया-“जब तू जानती है कि मुझे भी पता है तो पूछ क्यों रही है? हाँ देख रही हूँ सब मैं।

अनुम-“अमन ऐसा कैसे कर सकते हैं अम्मी?

रज़िया-“बेटी , ये मर्द भी उस चिड़िया की तरह होते हैं, जहाँ भी शख्स-ए-गुल दिखे झूला डाल देते हैं…”

अनुम-“अम्मी अगर अमन ने मेरा भरोसा तोड़ा ना तो सुन लीजिये … या तो वो रहेंगे इस दुनियाँ में या मैं…”

रज़िया अनुम को अपने रूम में जाता देखती रह जाती है और दिल ही दिल में सोचने लगती है-“मैं तो हमेशा दुआ करूँगी बेटी कि तेरा अमन, तुझे रुसवा ना होने दे…”

कालेज में रूबी जीशान के साथ एक बेंच पे बैठी अपना हाथ उसके बगल में दबाए बातें कर रही थी।

रूबी-आप घर कब आने वाले हैं?

जीशान-“हाहाहाहा… क्यों, तेरी अम्मी ने बुलाया है क्या?”

रूबी शरमा जाती है-“नहीं , मुझे तुम्हारी याद नहीं आ सकती क्या?”

जीशान-“अब इतने पास बैठी है, बातें कर रही है, गोद में बैठेगी मेरे?”

रूबी-नहीं आपके ऊपर।

लुबना-“क्या ऊपर-नीचे हो रहा है रूबी?”

अपने पीछे खड़ी लुबना की आवाज़ सुनकर रूबी बुरी तरह डर जाती है और झट से जीशान से अलग हो जाती है-“वो लुबना बाजी, मैं तो ऊपर के फ्लोर पे जो लाइब्रेरी है, वहाँ चलकर पढ़ने की बात कर रही थी…”

लुबना-“जितना ऊपर जाएगी ना रूबी, गिरने पे उतनी ही गहरी चोट लगेगी। जरा संभाल के। चल अब निकल ले, मुझे भाई से बात करनी है…”

रूबी जीशान को खुदा हाफिज़ करके वहाँ से चली जाती है।

जीशान-“बेशर्म तो तू थी ही , अब बदतमीज भी बन गई…”

लुबना अपने बड़े भाई जीशान की गर्दन पे अपने अंगूठे का नाखून जो उसने काफी हद तक बढ़ा लिया था, रख देती है-“गले में उतार दूँगी ये नाखून , भाई बोल देती हूँ … ज्यादा चिपको मत इस छिपकली से वरना आपके नाम का वारंट अब्बू के पास पहुँच जाएगा…”

जीशान लुबना के बाल खींचकर उसका सर अपनी गोद में गिरा देता है-“एनफ्फफ इज एनफ्फफ… लुबना, आइन्दा मेरे और मेरे पर्सनल मामलों के बीच में अपनी ये नाक अड़ाई ना तो बहुत बुरा होगा, बोल देता हूँ …”

लुबना-“अपनी ये धमकियाँ अपने पास रखना मिस्टर जीशान ख़ान … और एक औरत पे जुल्म करने से तुम्हारी मर्दानगी साबित नहीं हो जाएगी। मर्द वो होता है जो औरत की हिफ़ाजत में अपने जान दे दे। छोड़ो मेरे बाल…”

जीशान वहाँ से उठकर अपनी क्लास में चला जाता है।

इस तरह हर बार लुबना का बीच में आकर टाँग अड़ाना जीशान को बहुत टॉर्चर करने लगा था। वो उकता गया था लुबना की इन हरकतों से। मगर वो उसे मार भी नहीं सकता था। उसके दिल के एक कोने में वो भी कायम पज़ीर थी। दोपहर के खाने तक जीशान और लुबना कालेज से घर आ चुके थे। वो बस खाना खाने के लिए बैठ ही रहे थे कि फ़िज़ा घर में दाखिल होती है।

 
***** *****फ़िज़ा-उम्र 39 साल गोरा जिस्म, उभरी हुई गाण्ड, गोल सुडौल चुचियाँ , लाल गुल्लाबी गाल और चमकते हुये होंठ वाली फ़िज़ा अपनी उमर से बहुत कम नजर आती थी। इसके पीछे किसका हाथ था ये तो उस वक्त फ़िज़ा ही बेहतर जानती थी। फ़िज़ा के साथ उसका बेटा कामरान भी आया हुआ था।

***** *****कामरान-एक 20 साल का हट्टा-कट्टा गबरू जवान था जिस्म के लिहाज से देखा जाए तो उसकी बाडी अमन और जीशान से बहुत मिलती जुलती थी। आँखों में वही चमक जो अमन और जीशान के दिखाई देती थी।

फ़िज़ा और कामरान सभी से मिलते हैं। मगर जब फ़िज़ा की नजर जीशान पर और कामरान की निगाह नग़मा पर पड़ती है तो दोनों की पलकें झपकना बंद हो जाती हैं।

फ़िज़ा-जीशान बेटा, अपने फुफो से नहीं मिले गा?

जीशान आगे बढ़कर फ़िज़ा को जैसे ही अपनी छाती से लगाता है, उसे ऐसा महसूस होता है जैसे कोई मखमल की चादर उसके जिस्म पे लिपटी हुई है। अचानक उसके हाथ फ़िज़ा की गाण्ड के थोड़ा ऊपर रुक जाते हैं वहाँ सबकी मौजूदगी को ध्यान में रखते हुये जीशान ने शायद ये कदम उठाया था।

मगर फ़िज़ा को बहुत अच्छा लगा था अपना भतीजा।

सोफिया, जीशान और लुबना कामरान से मिलते हैं। कामरान सोफिया को मुबारकबाद देता है। और सोफिया शर्म-ओ-हया का बखूबी मुजाहिरा करते हुये अपने रूम में चली जाती है।

कामरान-कैसी हो नग़मा?

नग़मा-मैं ठीक हूँ , आप कैसे हैं?

कामरान और नग़मा बचपन से एक दूसरे से बहुत कम बातें करते थे। मगर एक कशिश उन दोनों के बीच हमेशा देखने को मिलती थी।

नग़मा बहुत दिनों के बाद कामरान को देख रही थी। कामरान दूसरे शहर में पढ़ाई करता था। जब भी नग़मा फ़िज़ा के घर जाती, कामरान अपने होस्टल में होता।

पिछले महीने ही वो अपनी ग्रेजुयेशन कम्पलीट करके घर वापस आया था।

फ़िज़ा अनुम से बातें ही कर रही थी कि पीछे से अमन की आवाज़ सुनकर उसके होंठों पे लरज़िश आ जाती है। वो अमन को सलाम करती है और अमन फ़िज़ा को देखकर उसे अपने गले से लगा लेता है। अमन फ़िज़ा के साथ बातें करते-करते अपने रूम में चला जाता है।

अमन-कैसी हो फ़िज़ा?

फ़िज़ा-आपके बिना बिल्कुल ठीक नहीं हूँ ।

अमन-“कामरान तो बिल्कुल…”

फ़िज़ा-“अपने अब्बू के जैसा दिख रहा है, यही ना? आपका खून है तो आपके जैसा ही देखेगा ना…”

अमन-तुम्हारे शौहर नहीं आए?

फ़िज़ा-“पिछले 3 महीनों से चेन्नई की खाक छान रहे हैं। वहाँ कोई प्रॉजेक्ट मिला है उन्हें…”

अमन-“भाई इंजीनियर से शादी करने का एक नुकसान तो यही है…”

फ़िज़ा-हाँ, आपने नहीं किया तो नुकसान तो झेलना ही पड़ेगा।

शीबा उन दोनों के पास आकर खड़ी हो जाती है।

अमन-“तुम दोनों बातें करो मैं अभी आता हूँ …”

शीबा-“फ़िज़ा, मुझे तो यकीन नहीं हो रहा तुझे देखकर। क्या नूर नजर आ रहा है तेरे चेहरे पे। क्या बात है? मैंने सुना है भाई साहब तो चेन्नई में है फिर ये तेज किसका है?”

फ़िज़ा शीबा को अपनी छाती से चिपकाकर उसे अपनी सुडौल चुची का साइज बताने लगती है-“शौहर ना सही बेटा तो है मेरा…”

शीबा का मुँह खुला का खुला रह जाता है-“कामरान्न्न्न…”

फ़िज़ा उसके मुँह पे हाथ रख देती है।

शीबा-ओह्ह।

फ़िज़ा-धीरे, कोई सुन लेगा।

शीबा को हँसी आ जाती है-“मतलब अब आप भी उसी रास्ते पे चल निकले हैं, जहाँ से शुरूआत की थी…”

फ़िज़ा-“क्या करूँ शीबा? शौहर घर पे रहते नहीं , बाहर के किसी भी मर्द से मैं रिलेशन बनाना नहीं चाहती। अमन तो आप सब में खोए रहते हैं। इसलिए कामरान के साथ…” वो बोलते-बोलते चुप हो गई।

शीबा उसका झुका हुआ चेहरा अपने हाथ से उठाकर उसकी पेशानी चूम लेती है-“मैं जानती हूँ बिना मर्द के औरत की क्या हालत होती है? मगर कामरान राजी कैसे हुआ?”

फ़िज़ा इतराते हुये-“अमन की औलाद है ना… जहाँ औरत देखी नहीं कि चढ़ना चाहता है। जरा अपनी जवानी की नुमाइश की उसके सामने तो पीछे-पीछे दुम हिलाता हुआ बेडरूम तक चला आया…”

शीबा-“बिस्तर में कैसा है कामरान?”

फ़िज़ा-“अपने अब्बू जैसा एकदम मस्त। रात भर सोने नहीं देता कमीना…”

शीबा-“हाई रे किस्मत… और एक मैं हूँ , शौहर को भी दूसरी औरतों के साथ बाँटना पड़ता है…”

फ़िज़ा-“अपनी-अपनी किस्मत है। वैसे जीशान भी तो जवान है…”

शीबा-“क्या बताऊँ बाजी… वो भी कमीना निकला। सोची थी काम आएगा, मगर दो-तीन बार के बाद ऐसा बदला कि देखता भी नहीं …”

फ़िज़ा-तो क्या जीशान के साथ तुम भी?

शीबा-“हाँ, क्या करती? अमन तो अपनी अम्मी और बहन के साथ सोते हैं। कभी-कभी आते हैं बेडरूम में। कब तक अपने हाथ को तकलीफ़ देती? एक दिन खींच लिया जीशान को अपने ऊपर…”

फ़िज़ा-एक बात कहूँ शीबा?

शीबा-ह्म्म्म्म।

फ़िज़ा-“मुझे ना नग़मा बहुत पसंद है। कामरान के लिए लड़की की जब भी बात निकलती है, मुझे तेरी बेटी याद आती है। अगर वो मेरे घर की बहू बन जाए तो मुझे बहुत खुशी होगी…”

 
शीबा फ़िज़ा को गले लगा लेती है-“सच बाजी, मुझे तो यकीन नहीं हो रहा कि आप कामरान के लिए नग़मा का हाथ माँग रही हैं…”

फ़िज़ा-“हाँ… मगर बदले में मुझे रिश्वत लगेगी…”

शीबा-“रिश्वत… बोलिए क्या चाहिए? मैं अपनी बेटी की खुशी के लिए कुछ भी देने को तैयार हूँ …”

फ़िज़ा-जीशान मुझे चाहिए।

शीबा के चेहरे पे मुस्कान फैल जाती है-“अच्छा… तो बूढ़ी चूत को भी जवान लण्ड का चस्का लग ही गया। मिल जाएगा, मगर मैं उससे बात नहीं करूँगी। ये काम आपको करना होगा। हाँ थोड़ा बहुत मदद मैं कर दूँगी …”

फ़िज़ा-“तो ठीक है, जब जीशान मुझे मिले गा तभी कामरान और नग़मा की बात आगे बढ़ेगी…”

दोनों चुदासी औरतों के बीच एक ऐसा समझोता हुआ था, जो आगे चलकर दोनों खानदान को फिर से एक करने वाला था। मगर दोनों इस बात से अंजान थीं कि इस सब में कितनी चूतें पिसेंगी।

कामरान और नग़मा बालकनी में खड़े बातें कर रहे थे।

कामरान-पेपर्स कैसे गये तुम्हारे?

नग़मा-जी, बहुत अच्छे गये हैं।

कामरान-चलो अच्छा है। आगे पढ़ने का इरादा है या नहीं ?

नग़मा-मुझे नहीं पता, सब अम्मी और अब्बू डिसाइड करेंगे।

वो ऐसे ही इधर-उधर की बातें कर रहे थे कि वहाँ शीबा आ जाती है-“कामरान बेटा, खाना तैयार है भूक लगी हो तो मैं खाना लगा दूँ …”

कामरान-शीबा की गोल-गोल चुचियों को देखते हुये कहता है-“नहीं आंटी , अभी भूक नहीं है। लगेगी तो आपको बोल दूँगा…”

शीबा दिल में सोचने लगती है-“इसे पटाने में फ़िज़ा को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी होगी। कमीना कैसे घूर रहा है। पक्का अपने अब्बू अमन पे गया है…”

शीबा-“नग़मा, देख तो किचेन में क्या चल रहा है?”

नग़मा किचेन में चली जाती है।

कामरान आंटी , आप वक्त के साथ-साथ और खूबसूरत होती जा रही हैं।

 
शीबा के लाल लाल गाल और सुर्ख हो जाते हैं-थैंक्स बेटा।

कामरान अपना हाथ का नाप बताइए?

शीबा-क्यूँ ?

कामरान बताइए ना? फिर कामरान शीबा का हाथ अपने हाथ में ले लेता है-“मेरा एक दोस्त है जुवैद उसकी चूड़ियों की दुकान है। अम्मी के लिए मैं उसी के पास से चूड़ियाँ लेता हूँ । आपके हाथ सुने-सुने दिखाई दिए तो सोचा क्यों ना आपको भी कुछ चूड़ियाँ दिला दूँ …”

शीबा-“मेरे पास बहुत चूड़ियाँ है मगर पहनना भूल जाती हूँ …”

कामरान शीबा के नाजुक हाथों को मसलने लगता है और उससे इधर-उधर की बातें करने लगता है। शीबा बातें तो कामरान से कर रही थी मगर उसके हाथों में पशीना आने लगा था।

कामरान-आपके हाथ बहुत नाजुक है आंटी ।

शीबा-“ह्म्म्म्म… तो आपको अब बूढ़ी औरतें अच्छी लगने लगी हैं लगता है फ़िज़ा बाजी से बोलकर आपकी शादी की बात करनी पड़ेगी…”

कामरान एक ऐसी हरकत करता है जिसके बारे में शीबा सोच भी नहीं सकती थी। वो शीबा का हाथ अपनी तरफ खींच लेता है जिससे शीबा कामरान से चिपक जाती है।

शीबा-“अह्ह… बेटा क्या कर रहे हो? कोई देख लेगा…”

कामरान- आपने खुद को बूढ़ी क्यों कहा? इतनी खूबसूरत और जवान तो हो आप। एक बार देखो तो देखता रह जाये बंदा।

शीबा का दिल जोर से धड़कने लगता है उसकी उम्मीद से कहीं ज्यादा तेज था कामरान। वो अपना हाथ छुड़ाते हुये उसके पास से भाग जाती है।

कामरान जब भी अपनी अम्मी फ़िज़ा को चोदता था। फ़िज़ा उसे सारी बातें बताती थी, कैसे उसे अमन ने सबसे पहले किया था, अमन विला के हर एक शख्स के बारे में फ़िज़ा कामरान को बता चुकी थी, और नग़मा के बारे में फ़िज़ा जो सोच रही थी बहू बनाने के बारे में, ये बात भी कामरान अच्छी तरह जानता था। एक शातिर मर्द की तरह कामरान इस नतीजे पे पहुँचा था कि अमन विला में एक ही ऐसी औरत है, जो बहुत जल्दी अपनी टाँगें खोल सकती है और वो है शीबा।

क्योंकी फ़िज़ा की बातों से उसे अंदाज़ा हो चुका था कि रज़िया और अनुम दोनों अमन से कितनी मोहब्बत करती है और उन दोनों पे बुरी नजर डालना मतलब मुशीबत मोल लेना।

शीबा अपने रूम में जाकर बेड पे बैठ जाती है। उसका जिस्म आज एक और मर्द के तरफ झुकने लगा था। उसका दिल उसे गुनाह करने के लिए मजबूर कर रहा था, मगर शायद अभी वो वक्त नहीं आया था।

रज़िया के रूम में फ़िज़ा और अनुम तीनो औरतें बातें कर रह थीं, पास में जीशान भी बैठा हुआ था।

रज़िया-बहुत अच्छा हुआ फ़िज़ा तुम आ गई, घर में बहुत रौनक सी हो गई है। तुम्हारी अम्मी के साथ वो हादसा नहीं हुआ होता तो आज वो भी हमारे साथ होती।

फ़िज़ा-किस्मत के आगे किसकी चली है बड़ी अम्मी।

जीशान उठकर सोफिया के रूम में चला जाता है।

सोफिया अपने हाथों में मेहंदी लगा रही थी। लुबना और नग़मा किचेन में साफ सफाई का काम निपटाने में लगी हुई थीं।

जीशान धड़ाम से सोफिया के बेड पे आकर बैठ जाता है-“छीः ये क्या गोबर लगा रही हो बाजी?”

सोफिया-“बेवकूफ़ मेहंदी है ये। तू क्या कर रहा है यहाँ?”

जीशान-“आपके गोबर लगे हाथों को देखने आया था…”

सोफिया बुरी तरह चिढ़ जाती है-“देख फिर से इसे… कुछ उल्टा सीधा कहा ना तो मैं अब्बू को आवाज़ दूँगी …”

जीशान सोफिया के कान के पास आकर धीरे से उसके कान में कहता है-“रात में अमन और दिन में अब्बू … बहुत गलत बात है बाजी…”

सोफिया की आँखें फटी की फटी रह जाती हैं-“ तू … तू कहना क्या चाहता है जीशान?”

जीशान-“मैंने आपके रूम से वो आवाज़ सुनी थी, जब आप अब्बू को अमन कहकर सिसक रह थीं और भी बहुत कुछ सुना है मैंने। बस देखना बाकी रह गया था…”

सोफिया से कुछ बोला नहीं जाता, वो अपना सर झुका लेती है।

जीशान-“डरो मत बाजी… ये तो इस घर का दस्तूर रहा है। बेटा अपनी अम्मी के साथ, बेटी अपने अब्बू के साथ। मुझे अमन विला के सारे राज पता हैं और अब मुझे इन सब बातों की आदत सी हो गई है…”

सोफिया- तू … तू जा यहाँ से।

जीशान अपना एक हाथ सोफिया की चुची पे रख कर उसे जोर से मसल देता है।

सोफिया-“उम्ह्ह… जीशान …” मेहंदी लगे हाथों से वो जीशान को कुछ कर भी नहीं सकती थी। उसे भी जीशान के हाथ अपनी चुची पे अच्छे लगे थे और वो अपनी आँखें बंद कर लेती है।

जीशान-“अब्बू को तो सब कुछ दे चुकी हो, भाई का हक कब अदा करोगी?”

सोफिया-“तेरा कोई हक नहीं मुझपे, कुछ नहीं दूँगी तुझे। ज्यादा फोर्स करेगा या ब्लैकमेल करेगा ना तो अब्बू को बता दूँगी …” बड़ी हिम्मत करके सोफिया ने जीशान से ये बात कही थी।

जीशान-“अच्छा ये बात है…” और वो दोनों हाथों से सोफिया की चुची मसलने लगता है-“तुम्हें पता है ना… जब भी मुझे कोई चेलेंज करता है तो मेरे जिस्म में का खून डबल स्पीड से दौड़ने लगता है…”

सोफिया- तू चला जा यहाँ से।

 
जीशान सोफिया का चेहरा अपनी तरफ करता है और उसकी बंद आँखों का फायेदा उठाकर उसके होंठों पे अपने होंठ रख देता है। थोड़ी देर चूमने के बाद वो उसके होंठों को आजाद कर देता है।

जब सोफिया आँखें खोलकर देखती है तो जीशान वहाँ से जा चुका होता है। सोफिया के दिल में जीशान के लिए कुछ भी नहीं था। वो तो अमन से मोहब्बत का दावा करती थी। मगर क्या वो दावे सच थे? ये तो सिर्फ़ वक्त और हालात ही अच्छी तरह बता सकते थे।

जीशान अपने रूम की तरफ जाने लगता है। तभी उसे लुबना और अनुम रूम में जाते दिखाई देते हैं। वो भी अनुम के रूम में घुस जाता है।

अनुम-जीशान कुछ काम था?

जीशान-क्यों, बिना काम के यहाँ आना मना है?

लुबना-“जी हाँ… देख नहीं रहे दो औरतों बातें कर रही हैं। जाओ ना… अपने लफन्तु दोस्तों के साथ घूमने क्यों नहीं जाते?”

जीशान-“तेरी जीभ बड़ी कैंची की तरह चलने लगी है, रुक जरा उसे काट के फेंक देता हूँ …”

अनुम दोनों को डाँटती है-“जीशान, ये क्या शब्द इश्तेमाल करने लगे हो तुम लुबना के साथ? बहन है वो तुम्हारी , कुछ तो शर्म करो। घर में मेहमान हैं…”

जीशान चुपचाप अनुम के पास बैठ जाता है-“आप इसे क्यों नहीं कहते?”

अनुम-“उससे भी कहूँ गी और तुमसे भी कह रही हूँ कि दोनों प्यार मोहब्बत से रहो तो घर में सकून भी दिखाई देगा। जब देखो बिल्लियों की तरह लड़ते रहते हो…”

लुबना-सारी भाई।

जीशान लुबना को घुरने लगता है।

अनुम-“अब वो सारी बोल रही है ना…”

जीशान-“ठीक है, मगर अम्मी आपको ये जितनी भोली दिखाई देते है ना उतनी है नहीं …”

लुबना-“अम्मी… तुमने अम्मी कहा अभी?”

अनुम के चेहरे पे मुश्कान आ जाती है। जीशान अनुम को पहले अम्मी नहीं फुफो कहता था।

जीशान-“हाँ अम्मी कहा मैंने। अब फुफो अम्मी जैसा ख्याल रखती हैं तो अम्मी ही कहूँ गा ना?”

लुबना-“फिर तो मैं भी फुफो को अम्मी कहूँ गी आज से। क्यों फुफु आपको कोई ऐतराज तो नहीं है ना?”

अनुम की आँखों में आँसू आ जाते हैं और वो उन्हें छुपाने के लिए दोनों को अपने सीने से लगा लेती है। जहाँ अनुम बहुत खुश थी अपने दोनों बच्चों को अपने सीने से लगाकर, वहीं जीशान भी अपनी अम्मी के इतने करीब महसूस करके पिघलने लगता है।

जब दोनों अनुम से अलग होते हैं, उसी वक्त नग़मा लुबना को आवाज़ देती है और लुबना बाहर चली जाती है।

अनुम-ऐसे क्या देख रहा है?

जीशान-अम्मी आपके आँखों में आँसू ?

अनुम-ये खुशी के आँसू है जीशान ।

जीशान-“अम्मी…” वो जज़्बात में अनुम को फिर से अपनी छाती से चिपका लेता है। मगर इस बार वो कुछ ज्यादा ही कसके अनुम से गले मिलता है। जिससे अनुम की दोनों चुचियाँ जीशान की छाती से चिपक जाती हैं।

अनुम-“अह्ह…”

जीशान-बहुत सकून मिलता है मुझे आपके पास अम्मी।

अनुम-“हुींन्नने्…”

जीशान अपने हाथों को अनुम की पीठ पे घुमाने लगता है।

और उसकी नीयत को पहचान के अनुम उसे अपने से अलग कर देती है। अनुम उसे घुरने लगती है। उसकी आँखें साफ-साफ जीशान को वार्निग दे रही थी।

मगर जीशान भी वो सख्श की औलाद था जिसने डरना तो जैसे सीखा ही नहीं था।

रात के खाने के बाद सभी कमरे में सोने चले जाते हैं। शीबा के साथ उसके रूम में फ़िज़ा और कामरान सोए हुये थे। वही लुबना और नग़मा भी अपने-अपने कमरे में सोने चले जाते हैं।

अमन सभी की नजरें बचाकर सोफिया के रूम में चला जाता है।

जीशान हाल में बैठा टीवी देख रहा था तभी उसे रज़िया आवाज़ देती है-“जीशान, आज सर दर्द नहीं कर रहा है क्या?”

जीशान खुश होकर रज़िया की तरफ देखता है-“हाँ, हो रहा है ना…”

रज़िया-चल तेरा सर दबा देती हूँ ।

जीशान रज़िया के पीछे-पीछे उसके रूम में चला जाता है। अनुम बेड पे बैठी सोने की तैयार कर रही थी। जीशान को रज़िया के पीछे आता देखकर वो थोड़ा हैरत में पड़ जाती है।

रज़िया अनुम की आँखों में उठते सवाल जा जवाब जीशान से पहले दे देती है-“अरे ये जीशान भी ना… पता नहीं रोज सर दुखा रहा है…”

अनुम-जीशान सर दर्द कर रहा है तुम्हारा?

जीशान-हाँ अम्मी।

अनुम-“इधर आ जा मेरे पास…” अनुम थोड़ा साइड में खिसक के जीशान को अपने पास बुला लेती है। जीशान अनुम की गोद में अपना सर रख देता है। अनुम पूछती है-“कुछ सोच रहा है क्या तू जिससे सर दर्द कर रहा है?”

जीशान-“नहीं तो, ऐसी तो कोई बात नहीं है…”

रज़िया भी बेड पे लेट जाती है और अनुम जीशान का सर दबाने लगती है। रज़िया की नजरें आज जीशान के जिस्म पे घूम रही थीं। सर से लेकर पाँव तक वो जीशान को गौर से देखने लगती है, और दिल ही दिल में सोचने लगती है-“बिल्कुल अपने अब्बू की तरह दिखता है जीशान । अगर अपने अब्बू की तरह देखता है तो आदतें भी… मतलब वो सब करने का तरीका भी अमन की तरह ही होगा जीशान का…”

रज़िया बे-ख्याल में जीशान से पूछ बैठती है-“है ना जीशान ?”

अनुम और जीशान रज़िया की तरफ देखने लगते हैं

जीशान-क्या दादी ?

रज़िया-“ना नहीं कुछ नहीं । मैं कह रही थी कि पढ़ाई की टेंशन से सर दर्द कर रहा होगा बच्चे का…”

जीशान-दादी , मैं बच्चा नहीं हूँ ।

अनुम और रज़िया दोनों एक दूसरे को देखकर हँसने लगती हैं

रज़िया-“उफफ्फ़ हो… जीशान बेटा, हमारी नजर में तो तुम अभी बच्चे ह हो ना…”

जीशान रज़िया की चुची को देखने लगता है।

रज़िया जीशान की आँखों की तपिश अपनी चुची पे महसूस करके सिहर उठती है।

जीशान-बस अम्मी, मैं सो जाता हूँ ।

अनुम-ठीक है, तू यहाँ बीच में सो जा।

जीशान-“नहीं , मैं दादी के पास सोऊूँगा। मुझे नींद में हाथ पैर चलाने की आदत है। आप दोनों को लग गई तो?”

रज़िया-इधर आ जा मेरे लाल।

और जीशान अपनी दादी के साइड में आकर लेट जाता है। जीशान उठकर रूम की लाइट बंद कर देता है। पूरे रूम में अंधेरा हो जाता है।

अनुम-लाइट क्यों बंद कर दिया जीशान?

जीशान-अम्मी, लाइट आँखों पे आने से और सर दर्द करता है।

रज़िया-अब सो भी बच्चे।

जीशान मुस्कुराता हुआ रज़िया के पास आकर बिल्कुल उससे चिपक के लेट जाता है।

रज़िया भी उसे अपने पास इस तरह चिपक के सोने से मना नहीं करती, बल्की उसके घने बालों में उंगलियाँ फेरने लगती है।

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उधर शीबा के रूम में-कामरान, फ़िज़ा और शीबा तीनों थोड़े-थोड़े फासले से सोये हुये थे। शीबा के हल्के-हल्के खर्राटे बता रहे थे कि वो गहरी नींद में सो चुकी है फ़िज़ा भी नींद की आगोश में जाने लगती है मगर उसे कामरान वापस उस ख्वाबों की दुनियाँ से हकीकत की दुनियाँ में खींच लाता है, अपना हाथ फ़िज़ा की चुची पे रख कर।

फ़िज़ा आँखें खोलकर कामरान को देखती है और गर्दन हिलाकर उसे और कुछ करने से मना करती है। मगर कामरान के दिमाग़ में तो उस वक्त कुछ और ही चल रहा था। वो अपने हाथ को घुमाता हुआ फ़िज़ा के चूतड़ों पे रख देता है, और फ़िज़ा के मखमली चूतड़ों को मसलने लगता है।

फ़िज़ा अपने बेटे के हाथों को अपने चूतड़ों पे घूमता देखकर पहले उसके हाथों को झटक देती है। मगर इरादे के पक्के कामरान को उस वक्त कोई नहीं रोक सकता था।

कामरान फ़िज़ा की गर्दन खींचकर उसके होंठों को अपने करीब करता है।

फ़िज़ा बिल्कुल धीमी आवाज़ में उससे कहती है-“शीबा जाग जाएगी कामरान बेटा…”

कामरान-“मुझे अभी चाहिए…” और ये कहते हुये कामरान अपने होंठों को अपनी अम्मी फ़िज़ा के होंठों से मिला देता है। उसके दोनों हाथ बराबर फ़िज़ा के जिस्म के नाजुक हिस्सों को मसल रहे थे जिसकी वजह से आखिरकार फ़िज़ा अपनी आँखें बंद कर देती है और जो होगा देखा जाएगा सोचकर कामरान से थोड़ा और चिपक जाती है। दोनों माँ-बेटे अपनी जीभ को लड़ाने में लग जाते हैं।

 
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