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अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ complete

अनुम का जिस्म थरथरा जाता है, होंठ काँपने लगते हैं, रात भर की जागी हुई उसकी चूत में सरसराहट सी होने लगती है। चूत के होंठों पर भी छोटी -छोटी शबनम की बूँदों की तरह कतरे जमा हो जाते हैं। आज जीशान ने सोई हुई जवान अनुम के जज़्बात को झींझोड़ के रख दिया था। आज उसने वो बात कही थी जिसके बारे में अनुम ने सोची भी नहीं थी, उसके जेहन-ओ-गुमान में भी ये बात नहीं थी कि उसका अपना खून , उसका बेटा उसे एक दिन शादी करने का प्रपोझल पेश करेगा।

आज अनुम का सारा गुरूर सारा घमंड किसी बवंडर में उड़कर गायब हो चुका था। वो उस पल में इस कदर खो गई थी कि बस चन्द लम्हों में उसकी आँखों के सामने उसका बीता कल घूम जाता है। अनुम होंठों से कुछ नहीं कहती, बस दो आँसू के कतरे उसकी आँखों से छलकने लगते हैं।

 
तभी उसी वक्त जीशान उन आँसुओं को अपने होंठों से चूमकर अपने सूखे तड़पते लबों में जज़्ब कर लेता है। अनुम जीशान से लिपट जाती है और जीशान बिछड़े हुये प्रेमी की तरह अपनी अम्मी अनुम को अपनी बाहों में समेट लेता है।

जीशान-अम्मी आइ लव यू , आइ लव यू अम्मी।

अनुम-“उन्ह…” उसका जिस्म, उसकी रुक, उसका वजूद आज जीशान के कब्ज़े में था और जीशान था कि अनुम को माथे से लेकर होंठों तक चूमता चला जाता है।

जीशान वो गोल्डेन रिंग अनुम की उंगली में पहना देता है तो अनुम की आँखें जुगुनू की तरह चमक उठती हैं। उसी वक्त बाहर से लुबना की आवाज़ सुनाई देती है, और अनुम पलटकर दरवाजा खोलकर बाहर निकल जाती है। हकीकत में उस वक्त अनुम भी वहाँ रुकना नहीं चाहती थी। उसका दिल उस वक्त इतने जोरों से धड़क रहा था कि अगर वो कुछ देर और वहाँ रुकती तो शायद वो धड़कते-धड़कते बंद ही हो जाता।

जीशान को कुछ देर पहले गुजरे उस हसीन लम्हे पर अब तय यकीन नहीं हो रहा था। वो बेखयाली में बेड पर गिर जाता है। अनुम का चेहरा अब भी उसकी आँखों के सामने घूम रहा था। वो तो सोच रहा था कि अनुम उसे दो-चार चाटे मारेगी, मगर इसके विपरीत अनुम उसकी मोहब्बत को क़ुबूल कर ली थी। वो जल्दी से जल्दी अपनी अनुम को अपनी बाहों में लेने को बेकरार था, और शायद अनुम का भी यही हाल था।

जीशान का दिल फॅक्टरी जाने का बिल्कुल नहीं था, मगर उसके कुछ ज़रूर काम थे जिनके चलते उसे फॅक्टरी जाना पड़ता है। लंच टाइम पर अनुम का जब काल उसके मोबाइल पर आता है तो बिजली की रफ़्तार से वो काल रिसीव कर लेता है।

अनुम-लंच किया आपने?

जीशान-जी सरकार कर लिया और आपने?

अनुम-“हुम्म… कब आ रहे हैं?”

जीशान-“हाँ, बस अभी निकलता हूँ । ऐसा लग रहा है आपका भी वही हाल है जो इस वक्त मेरा हो रहा है…”

अनुम दिल ही दिल में-“हाँ सच कह रहे हैं आप…”

जीशान काल कट कर देता है और अपनी कार की चाबियाँ उठाकर सीधा अमन विला के तरफ कार दौड़ा देता है। जीशान जब अमन विला पहुँचता है तो उसे सिर्फ़ अनुम का रूम नजर आता है। अनुम अपने रूम में बैठी जीशान के बारे में हीसोच रही थी।

जीशान रूम में दाखिल होता है और अनुम पीछे पलटकर देखती है, दोनों की आँखें एक दूसरे से मिलती हैं। कितने बेचैन थे वो जिस्म? कितनी बेचैन थी उनकी रूहें?

वो खामोशी में कितना कुछ कह जाते थे उनके होंठ? जीशान अपनी बाहें खोल देता है और अनुम दौड़ती हुई जीशान की छाती से चिपक जाती है।

अनुम-“मुझे अपने में समा लो जीशान । अपनी जान को आज फन्ना कर दो। बहुत जुल्म किए हैं मैंने तुम पर बस अब और नहीं । मैं अपने सारी जुल्म-ओ-सितम की तुमसे माफी मांगती हूँ । अब और नहीं रह सकती मैं इस तरह घुट-घुटकर, मुझे अपना बना लो। मुझे अपने रूम में बसा लो…”

जीशान दोनों हाथों में अनुम के चेहरे को थाम लेता है, और अपने होंठों में अनुम के काँपते हुये होंठों को लेकर पहली बार अनुम की मर्ज़ी से उसके नाजुक होंठों को चूम लेता है। उस वक्त अनुम भी पिघलने को तैयार थी, वो जीशान की चौड़ी छाती से कसके चिपक जाती है, और दोनों एक दूसरे को मसलते हुये बेड पर गिर जाते हैं। जीशान अनुम को पहली बार अपने नीचे ले लेता है।

हालाँकि दोनों अब भी कपड़े पहने हुये थे। मगर वो ये नहीं जानते थे कि वो कहाँ हैं? और किस हालत में हैं? मोहब्बत का जो लावा बरसों से अंदर ही अंदर बढ़ रहा था आज वो फूट पड़ा था। आज एक मुहाने से दूसरे मुहाने में बहने को तैयार, उस ज्वालामुखी में इतनी तपिश थी कि दोनों उस तपिश में जलने को बेताब थे। जीशान अनुम को चूमते -चूमते अपना एक हाथ अनुम की मखमली चुची पर रख कर जोर से उसे दबा देता है।

अनुम-“उन्ह… आह्ह…”

जीशान-“जान्न मेरी गलपप्प-गलपप्प…”

अनुम की सिसकारियाँ थी की बढ़ती ह जा रही थीं, और जीशान की पकड़ अनुम की चुची पर उतनी ही मजबूत होती जा रही थी। अनुम उस वक्त सलवार कमीज पहनी हुई थी। जीशान जैसे ही अनुम को चूमते -चूमते अपना हाथ नीचे उस जगह ले जाता है, जहाँ वो आज तक नहीं पहुँच पाया था।

अनुम की चूत पर जब जीशान का गरम मजबूत हाथ आ जाता है। अनुम की रूह तक काँप जाती है, उसकी आँखें एक पल के लिए पूरी तरह खुलती हैं और अगले पल वो बंद हो जाती हैं, और जीशान अनुम की चूत को सहलाते हुये उसके होंठों को, गर्दन को, चुचियों को चूमने लगता है।

लुबना दरवाजे पर दस्तक देती है और दोनों जैसे अपनी ख्वाबगाह से जाग जाते हैं। अनुम उठकर बैठ जाती है और जीशान भी हक्का-बक्का सा रह जाता है।

लुबना-“जीशान , मुझे आपसे बात करनी है अभी इसी वक्त…” ये कहकर लुबना अपने रूम की तरफ बढ़ जाती है।

और जीशान अनुम की तरफ देखकर मुश्कुरा देता है। मगर वो भी जानता था कि अनुम का जो दिल का हाल है वही इस वक्त लुबना का भी होगा। जीशान उठकर लुबना के रूम में चला जाता है। वो जैसे ही लुबना के रूम में पहुँचता है, लुबना दरवाजा बंद कर देती है, और जीशान के करीब आकर जोर से एक थप्पड़ जीशान के गाल पर रसीद कर देती है, और बेड पर गिरकर फूट -फूट के रोने लगती है।

 
जीशान उसे समझाने के लिए उसके पास आकर बैठ जाता है। मगर लुबना उसे खुद को छूने भी नहीं देती। लुबना कहती है-“आज आपने मुझे मार दिया जीशान , मेरी मोहब्बत की तौहीन की है आपने। मैं आपको कभी माफ नहीं करूँगी, कभी नहीं ऽऽ… कितना नाज था मुझे अपनी मोहब्बत पर, आप पर। मगर आज आपने ये साबित कर दिया कि मैं कितनी गलत थी। आपको पता है ना मैं कितना प्यार करती हूँ आपसे। नहीं देख सकते मैं किसी को भी आपके साथ, कभी नहीं । आज जो आप अम्मी के साथ कर रहे थे, वो मैं सोच भी नहीं सकती थी। अम्मी भी ऐसी निकलेंगी, मैंने कभी सोचा भी नहीं था। नफरत है मुझे आपसे और अम्मी से भी। चले जाओ मेरे रूम से…?

जीशान-“लुब मेरी बात तो सुन एक मिनट…”

लुबना-“चले जाओ, वरना मैं खुद को कुछ कर बैठूँगी। चले जाओ…”

जीशान एक समझदार लड़का था। वो जानता था इस वक्त लुबना किस दौर से गुजर रह है। वो उसे रो लेने देना चाहता था। वो जानता था कि रो लेने से दिल का बोझ भी हल्का होता है। बारिश हो जाये तो मौसम अच्छा हो जाता है।

जीशान जब बाहर आता है तो उसे दरवाजे के बाहर अनुम खड़ी मिलती है। इससे पहले की जीशान कुछ बोल पाता, अनुम अपने उंगली की रिंग उतारकर जीशान के हाथ में दे देती है-“मुझे माफ कर दो, मैं अपनी बेटी की खुशियों के बीच कभी नहीं आना चाहती…”

जीशान-“अम्मी मेरी बात तो सुन लो…”

अनुम-“मैंने सब सुन लिया जीशान । बस जज़्बात में आकर अच्छा हुआ हमने कोई गलत कदम नहीं उठाया। आइन्दा मेरे करीब भी मत आना…” ये कहकर अनुम वहाँ से भागकर अपने रूम में चली जाती है और दरवाजा बंद कर लेती है।

एक तरफ लुबना रो रही थी और दूसरी तरफ अनुम, और इन सबके बीच जीशान परेशान खड़ा था।

अचानक आई इस आँधी ने जीशान को हिलाकर रख दिया था। कुछ वक्त पहले तक वो खुद को दुनियाँ का सबसे खुशनशीब शख्स समझ रहा था। अनुम उसकी मोहब्बत, उसकी ख्वाहिश, उसकी तमन्ना, जिसे पाने की खातिर वो दर-बदर के ठोकरे खाने को तैयार था। जब वो अपनी मोहब्बत का इजहार जीशान से करने के बाद उसकी दी हुई रिंग पहनने के बाद अचानक से ऐसे रुख़ मोड़कर जीशान का दिल तोड़कर चली गई। ये जीशान के लिए काबिल-ए-नागवार बात थी।

किसी ने ये जानने की कोशिश नहीं की कि जीशान के दिल का क्या होगा? अचानक से जब खुशी मिल जाए तो इंसान वो भी बर्दाश्त नहीं कर पाता। जीशान को एक ही दिन में खुशी और गम दोनों का सामना करना पड़ा। वो अंदर ही अंदर टूट चुका था। वो चीख-चीख के रोना चाहता था, अपना गम किसी के साथ बाँटना चाहता था। मगर उस वक्त वो खुद को तन्हा महसूस कर रहा था।

उस वक्त जीशान को बस एक तिनके की ज़रूरत थी, जो उसे उस नाजुक वक्त में सहारा दे सके। जीशान घर से बाहर अपने दोस्तों से मिलने निकल जाता है।

इधर अनुम अपने रूम में बैठकर आँसू बहा रही थी।

रज़िया अनुम के रूम में दस्तक करके उसके पास आ जाती है। अनुम झट से अपने आँसू पोंछने लगती है। मगर रज़िया अनुम के आँसू अनुम की आँखों से निकलने से पहले देख चुकी थी। वो अनुम को बिना कुछ कहे अपनी बाहों में समेट लेती है, और अनुम एक छोटे से बच्चे की तरह अपनी अम्मी से लिपट कर सिसक-सिसक के रोने लगती है।

रज़िया-“चुप हो जा मेरे बच्चे, बस इतना नहीं रोते। चुप हो जा। देख तू ऐसे रोएगी तो मैं भी रो दूँगी …”

अनुम-“अम्मी ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है? अमन से मोहब्बत दिल की गहराईयों से की, मगर उन्हें हमेशा आपके करीब पाया, और अब जब जीशान दिल के रग-रग में बस गया है, वहाँ तक जहाँ से उन्हें निकालना मेरे इख्तियार में नहीं है, तो ऐसा क्यों हो रहा है कि मेरी अपनी बेटी मेरे और उनके बीच में खड़ी है? मैं क्या करूँ? अम्मी मैं क्या करूँ?”

रज़िया सकून की साँस लेती है ये जानकर की अनुम के दिल में भी जीशान ने अपनी मोहब्बत की रोशनी कर दिया है। मगर जैसे ही अनुम से लुबना का नाम सुना, उसे यकीन हो गया कि किस्मत का पहिया एक बार फिर से उसी मुकाम पर आ गया है, जहाँ 20 साल पहले रज़िया, अमन और अनुम खड़े थे। उस वक्त अमन ने रज़िया का हाथ मजबूती से थामा था।

मगर अब रज़िया जानती थी उससे क्या करना है? वो अपनी बेटी को ऐसे तिल-तिल मरते नहीं देखना चाहती थी। रज़िया ने अनुम से कहा-“इधर देख मेरी तरफ…”

अनुम रज़िया की आँखों में देखने लगती है।

रज़िया-“मुझे ये जानकर बहुत खुशी हुई की तुमने सही फैसला किया है, अपने हाथ जीशान के हाथों में देकर। देखो अनुम जिंदगी हमें बार-बार ऐसे मौके नहीं देती। जब तुम जीशान से इतनी मोहब्बत करती हो तो चाहे कुछ भी हो जाये, उसका हाथ मत छोड़ना। कितनी बार मैंने जीशान के मुँह से तुम्हारे बारे में कहते सुनी हूँ कि वो तुमसे घर में सबसे ज्यादा प्यार करता है…”

रज़िया-अब तुम्हारे बारे में अनुम, उसकी मोहब्बत का जवाब मोहब्बत से दो। लुबना की फिकर मत करो। जीशान जैसा पठान का बच्चा दो क्या पूरे मुहल्ले को संभाल सकता है। अनुम खबरदार जो हमारे सिवा किसी और के बारे में सोचे भी तो उन्हें जान से मार दूँगी …” वो बोलते-बोलते हँस पड़ी।

अनुम रज़िया के सीने से चिमटी जाती है।

 
जीशान का इंतजार घर में हो रहा था। मगर जीशान का कोई अता-पता नहीं था, उसका सेल भी आफ आ रहा था। एक तरफ जहाँ अनुम और रज़िया परेशान थे, वहीं लुबना का दिल भी जोर-जोर से धड़क रहा था। वो जीशान से सख़्त नाराज थी, मगर उसकी गैर मौजूदगी उसे भी अंदर ही अंदर खाये जा रही थी।

रात के 12:00 बजे

डोरबेल बजते ही अनुम लपक के दरवाजा खोलती है, सामने जीशान खड़ा था।

उसके चेहरे से साफ दिखाई दे रहा था कि उसका मूड सख़्त आफ है। जीशान अंदर आता है और बिना कुछ बोले, बिना किसी से मिले , सीधा अपने रूम में चला जाता है।

रज़िया उसके पीछे जाती है। मगर जीशान दरवाजा जोर से बंद कर लेता है।

अनुम और रज़िया एक दूसरे को देखते रह जाते हैं। रज़िया इशारे से अनुम को कहती है-“सबर कर अभी वो गुस्से में है, सुबह बात करेंगे…”

रज़िया किसी तरह समझा बुझा के लुबना को खाना खिलाने में कामयाब तो हो जाती है, मगर हर निवाले के साथ लुबना के आँसू भी आँखों से बह रहे थे। रज़िया उसे जी भरकर रो लेने देना चाहती थी। किसी तरह वो मनहूस रात तो गुजर जाती है।

जब सुबह अनुम जीशान के रूम का दरवाजा धकेलती है तो उसे दरवाजा खुला मिलता है। अनुम अंदर जाकर देखती है, तो जीशान गहरी नींद में सोया हुआ था। अनुम उसके पास आकर बैठ जाती है। बड़े ही गौर से वो जीशान का चेहरा देखने लगती है। आज उसे जीशान के चेहरे में अमन ख़ान नहीं बल्की अपना हमसफर नजर आ रहा था। आज जीशान का चेहरा उसके दिल की गहराईयों में समाता चला जा रहा था। वो जीशान के माथे को जैसे ही चूमती है, उसके होंठ जैसे जल जाते हैं।

अनुम रज़िया के पास भागती हुई किचेन में आती है। वहीं लुबना भी थी और रज़िया के साथ काम में हाथ बटा रही थी।

रज़िया-क्या हुआ अनुम?

अनुम-अम्मी अम्मी वो?

रज़िया-अरे बता भी क्या हुआ?

अनुम-अम्मी आप मेरे साथ चलिए।

रज़िया अनुम के साथ जीशान के रूम में चली जाती है। पीछे-पीछे लुबना भी चली आती है। रज़िया जैसे ही जीशान के माथे पर हाथ रखती है, उसका दिल जोर से धड़कता है। जीशान का माथा आग के गोले की तरह जल रहा था, उससे तेज बुखार था।

अनुम जल्दी से डाक्टर को काल करती है।

डाक्टर जब बुखार देखते हैं, तो पता चलता है कि जीशान को 105° बुखार है। डाक्टर कुछ इजेक्सन जीशान को लगाते हैं, और अनुम से उसके माथे पर गीली पट्टियाँ रखने के लिए कहते हैं।

एक तरफ से अनुम, दूसरी तरफ से रज़िया और पाँव की तरफ से लुबना बैठकर जीशान के जिस्म को ठंडा करने के कोशिश करने बैठ जाते हैं। तीनों औरतें लगातार जीशान के माथे और पैर के तलवो को ठंडे पानी से गीले कपड़े से ठंडा करती रहती हैं। आखिर एक घंटे बाद जीशान का बुखार कुछ कम हो जाता है।

जब जीशान आँखें खोलता है तो अपने आस-पास सभी को देखकर हैरान हो जाता है।

अनुम-अब कैसा लग रहा है जीशान ?

जीशान-चले जाइए आप दोनों मेरे रूम से।

रज़िया-“जीशान , क्या हुआ बेटा? तुम्हें तेज बुखार आ गया था, सभी कब से तुम्हारे सिर पर ठंडा कपड़ा रख कर बुखार कम कर रहे हैं…”

जीशान चिल्लाते हुये-“मैं कहता हूँ चले जाइए आप दोनों यहाँ से अभी के अभी, वरना मैं खुद बाहर चला जाउन्गा घर के…”

अनुम और लुबना बेड से उठ जाती हैं, और बड़ी उम्मीद भरी नजरों से जीशान की तरफ देखने लगती हैं।

रज़िया-ऐसा क्या हो गया जीशान ? क्यों ऐसा कह रहे हो?

जीशान-“बे-मुरव्वत बे-हिस लोगों को मैं देखना भी नहीं चाहता। और तुम लुबना, तुम्हें तो मुझ पर बहुत गुस्सा था ना, चली जाओ और आइन्दा मेरे सामने भी मत आना। आप भी जाइए यहाँ से, कोई नहीं चाहिए मुझे। जिंदा हूँ , मैं मर जाउन्गा तो पता चल जाएगा आप दोनों को…”

अनुम मुँह पर दुपट्टा रख कर रोती हुई वहाँ से चली जाती है। लुबना भी आँखों में आँसू लिए अपने रूम में जाकर सिसक के रोने लगती है।

रज़िया-मैं भी जाऊूँ?

जीशान-नहीं , आप मत जाओ।

रज़िया गीला कपड़ा जीशान के माथे पर रखती हुई-“क्या गलती हो गई मेरी बच्चियों से, जो तुम उन्हें इतना डाँट रहे हो?”

जीशान-“आपकी बेचारी बच्ची को मैंने रिंग पहनाया था, मगर उन्हें अपनी बेटी की मोहब्बत याद आ गई, और मेरी रिंग निकालकर मेरे मुँह पर दे मारी आपके बेटी ने, और आप उनकी हिमायत कर रही हैं…”

अनुम दरवाजे के पास से-“मैंने रिंग नहीं फेंकी थी आपके मुँह पर…” उसकी आवाज़ भरी थी, जैसे बहुत जब्त करके कह रही हो।

रज़िया उठकर अनुम के पास चली जाती है, और धीरे से अनुम को कहती है-“अनुम, तुम अभी अपने रूम में जाओ, मैं जीशान से बात करती हूँ …”

अनुम अपने रूम में चली जाती है, और रज़िया बेड पर आकर बैठ जाती है। वो जीशान की टाँगों के पास बैठी हुई थी।

रज़िया-“मेरी जान को बुखार चढ़ गया है, अभी सारी गर्मी खींच लेती हूँ मेरी जान की…” कहकर रज़िया जीशान की पैंट शर्ट निकालकर फेंक देती है, और अपने ऊपर के कमीज भी उतार देती है।

जीशान रज़िया को ही देख रहा था-बुखार है मुझे?

रज़िया जीशान का लण्ड पकड़ती हुई-“बुखार में तो मर्द ख़ूँख़ार हो जाते हैं। मेरी जान के होंठ बुखार से सूख गये हैं…”

जीशान रज़िया को अपने ऊपर खींच लेता है-“तो अब गीले कर इसे रज्जो…”

रज़िया-“वही तो करने आई हूँ जी…” और रज़िया अपनी शलवार का नाड़ा खोलकर नीचे गिरा देती है। फिर पैर घुमाकर अपनी चूत को जीशान के होंठों की तरफ कर देती है। जीशान का लण्ड रज़िया के मुँह की तरफ और रज़िया के गीली चमकती हुई चूत जीशान के होंठों के तरफ आ जाती है।

 
जीशान पहले रज़िया की चूत को चूमता है, और फिर अपने जीभ बाहर निकालकर उसे रज़िया की चूत में घुसा देता है-गलपप्प-गलपप्प।

रज़िया-“हाय रे ईई जालिम… गलपप्प-गलपप्प…” वो भी जीशान के लौड़े को मुँह में लेती चली जाती है-“बुखार से लौड़ा गरम हो गया है आपका गलपप्प-गलपप्प…”

जीशान-“तेरी चूत की ठंडक देने पड़ेगी इसे अब…”

रज़िया-“दीजिए ना… गलपप्प रोका किसने है गलपप्प…”

जीशान का लण्ड पूरी तरह तन चुका था, उसके सामने रज़िया की ठंडी चूत से आती सर्द हवाएँ लग रह थीं। जीशान रज़िया को नीचे ले लेता है और पीछे से दोनों चुचियों को पकड़कर लण्ड रज़िया की चूत पर घिसने लगता है।

रज़िया-“आह्ह… डाल दो जी अंदर… मुझे भी गरम होना है अंदर से उन्ह…”

जीशान रज़िया के चेहरे को पकड़कर होंठों को मुँह में लेकर लण्ड चूत में घुसा देता है। रज़िया कमर को पीछे की तरफ करती है और जीशान अपने लण्ड को रज़िया की चूत के अंदर तक घुसाता चला जाता है।

रज़िया-“आह्ह… जान , मेरी बेटी को मत तड़पाओ… आह्ह… उसे भी ये खुशी दे दो…”

जीशान-“नहीं … उसने मुझे तड़पाया है, मैं उसे हाथ भी नहीं लगाउन्गा आह्ह…”

रज़िया-“आह्ह… नहीं ना उन्ह… आह्ह… इतने जोर सीईई…”

जीशान सटासट रज़िया की चूत पेलने लगता है। रज़िया जानती थी ये जोश दुगुना क्यों हो गया है। अनुम का नाम सुनते ही जीशान का लण्ड फौलाद की तरह सख़्त हो जाता था, और पिस्टन की तरह चूत को उधेड़ के रख देता था।

रज़िया-“आह्ह… अनुम की चूत में भी डाल दो ना… मेरी बच्ची को कब तक तड़पाओगे आप्प?”

जीशान बिना कुछ बोले सटासट रज़िया को चोदता रहता है और रज़िया कमर आगे पीछे करती हुई अपने पोते और होने वाले जमाई के लण्ड से चुदवाती जाती है। दो घंटे बाद थकी हारी रज़िया खुले बालों का जूडा बाँधती हुई जीशान के रूम से बाहर निकलती है, और सीधा अपने रूम के बाथरूम में घुस जाती है।

जीशान रात का हल्का फुल्का खाना खाकर सो जाता है।

रात के करीब 2:00 बजे-

जीशान का दरवाजा खुलता है और अनुम ब्लैक नाइटी में उसके रूम में दाखिल होती है। जीशान को बुखार की वजह से नींद नहीं लग रही थी, वो अनुम को अंदर आता देखता है, मगर खुद को सोता हुआ जाहिर करता है।

अनुम जीशान के पास आकर बैठ जाती है। वो गौर से जीशान के चेहरे को देखने लगती है, और फिर झुक के जीशान के माथे को चूम लेती है। उसकी आँखों से एक आँसू निकलकर जीशान के गाल पर गिर जाता है। अनुम उस आँसू को अपने होंठों में जज़्ब कर लेती है।

उस वक्त जीशान के लिए खुद को कंट्रोल कर पाना बहुत मुश्किल हो रहा था।

अनुम-“आइ लव यू । मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ । मगर आपकी नाराजगी मुझसे बर्दाश्त नहीं होती। देखो मैंने आपकी दी हुई रिंग भी पहन ली है, अब इसे मुझसे कोई अलग नहीं कर सकता। आप मुझसे नाराज मत रहा करो, चाहे तो मुझे दो थप्पड़ मार दो, मगर ऐसी नाराजगी मुझसे नहीं सही जाएगी जान्न…” वो जीशान को गहरी नींद में सोता देखकर खुद से बातें कर रही थी।

एक पल के लिए जीशान का दिल किया कि अनुम को अपनी बाहों में समेट ले। मगर वो ऐसा नहीं करता।

और अनुम उसके माथे को एक बार और चूमकर अपने रूम में चली जाती हैं।

सुबह 7:00 बजे-

जीशान अपने रोजाना की एक्सरसाइज ख़तम करके नाश्ता करने के लिए डाइनिंग टेबल पर आकर बैठ जाता है। रोज की तरह लुबना भी वहीं मौजूद थी। जीशान एक नजर लुबना पर डालकर कुस़ी खींचकर बैठ जाता है। अनुम भी अपनी प्लेट लेकर वहीं रज़िया के पास आकर बैठ जाती है।

रज़िया-जीशान कैसा चल रहा है फॅक्टरी का काम?

जीशान-ठीक चल रहा है। बस कुछ दिन और जाना पड़ेगा, उसके बाद तो बेफिकर ही बेफिकर है।

रज़िया के साथ-साथ अनुम और लुबना भी जीशान की तरफ देखने लगती हैं-क्या मतलब?

जीशान-मैंने फॅक्टरी बेचने का फैसला किया है।

अनुम और रज़िया के मुँह से बेसाख्ता एक साथ निकलता है-क्या?

जीशान-“जी हाँ… और मैं इंडिया छोड़कर भी हमेशा-हमेशा के लिए जा रहा हूँ ।

अनुम-“ये क्या कह रहे हो तुम जीशान ? ऐसे कैसे तुम इतना बड़ा डिसीजन ले सकते हो? हमें इस बारे में पूछना भी गँवारा नहीं समझा तुमने?”

जीशान कोई जवाब नहीं देता और अपना नाश्ता ख़तम करके अपने रूम में चला जाता है। उसके पीछे-पीछे रज़िया, अनुम और लुबना भी चले आते हैं। तीनों जीशान के बेड पर बैठकर उससे सवाल करने लगते हैं

जीशान-“बस मैं डिसीजन ले चुका हूँ , अब मैं यहाँ नहीं रह सकता। और मैं यहाँ रहूँ भी तो किसके लिए?

आपके लिए लुबना जो मुझसे नफरत करती है।

आपके लिए अनुम की तरफ इशारा करते हुये-“जिसने कभी अपनी मोहब्बत की दरिया में से मुझे कभी एक कतरा भी पीने नहीं दिया। अब मुझसे और बर्दाश्त नहीं होता…”

अनुम की आँखों में आँसू आ जाते हैं, और रज़िया उठकर अपने रूम में चली जाती है।

जीशान-“तुम भी जा सकती हो लुबना…”

लुबना-“कितनी आसानी से अपने कह दिया जीशान कि आप हमेशा के लिए हमें छोड़कर जाना चाहते हैं। मगर एक बार भी आपने ये नहीं सोचा कि इस फैसले से हम पर क्या गुजरेगी? और मोहब्बत की बात आप ना करें तो बेहतर होगा। मोहब्बत जैसे पाकीजा जज़्बात को आप समझ ही नहीं सकते…”
 


जीशान अनुम की तरफ देखने लगता है।

अनुम का दिल भी खौफजदा सा था। वो कल रात तक खुले आसमानों में उड़ रही थी, और आज सुबह ही जीशान ने उसे आसमान से फर्श पर फेंक दिया था।

जीशान-“आप दोनों मुझसे प्यार नहीं करते तो मैं क्यों रहूँ यहाँ? मुझे बताइए।

अनुम और लुबना-किसने कहा आपसे?

लुबना अनुम की तरफ देखती हुई-“मैं आपसे प्यार नहीं करती जीशान ? मैं? आप ऐसा सोच भी कैसे सकते हो? अ आप ने कभी मुझे मोहब्बत भरी निगाह से नहीं देखा, कभी भी नहीं । आप मुझे एक रिंग भी नहीं पहना सकते? और आप मुझे कह रहे हैं कि मैं आपसे प्यार नहीं करती…” लुबना के सारे जज़्बात सारे एहसासात जो कुछ दिन से अंदर ही अंदर जमा हो रहे थे, जीशान के कुछ लफ़्ज़ों ने उन सब एहसासात को एक लम्हें में दिल से बाहर निकाल दिया था।

जीशान मुश्कुरा देता है, और लुबना का हाथ पकड़कर अपनी तरफ खींचता है।

लुबना सिसकती हुई-“हाथ छोड़िए मेरा, और चले जाइए आपको जहाँ जाना है…”

जीशान ख़ान लुबना और अनुम दोनों का हाथ अपने हाथों में पकड़ लेता है-“जो मैं कई सालों से नहीं कर पाया, वो मेरी बेरखी ने कर दिया लुबु। मैं जानता हूँ आप दोनों मुझसे बेपनाह मोहब्बत करते हो, और इस बात का सबूत मुझे रात में मिल चुका है…” वो अनुम का हाथ थोड़ा दबाता है, जिसकी वजह से अनुम के होंठों पर लाल फैल जाती है।

जीशान-“मैं जानता हूँ लुब तुम मुझसे रिंग को लेकर थोड़े बदजबान हो गई हो। मगर तुम ये नहीं जानती कि मैं एक रिंग नहीं , बल्की दो रिंग लाया था। एक इनके लिए और एक तुम्हारे लिए। ये देखो?

जीशान अपने पाकेट की जेब से एक और रिंग सेम टु सेम जैसे अनुम की उंगली में उस वक्त मौजूद थी, उसे दिखाता है-“ रही बात यहाँ से जाने की तो मैं कई महीनों से सोच चुका हूँ । अरे भाई जब हम तीनों एक साथ रहने वाले हैं और मुझे तुम दोनों प्यारे-प्यारे बेबी देने वाले हो, तो क्या वो यहाँ पॉसीबल है? मैंने सब कुछ प्लान कर लिया है। यहाँ का बिजनेस बंद करके हम चारों यू ॰के॰ सेटल हो जाएँगे और वहाँ अपनी नई दुनियाँ बसाएँगे…”

जीशान ये कहते हुये अपने हाथ से रिंग लुबना की उंगली में डाल देता है और बिना देर किए उसे अपने ऊपर खींच लेता है। ये सब इतनी जल्दी में होता है कि ना अनुम कुछ बोल पाती है और ना लुबना कुछ कर पाती है।

लुबना-“आह्ह… बेशर्म इंसान छोड़ो मुझे…”

जीशान-“पहले कुछ मीठा हो जाए…” कहकर अपनी अम्मी के सामने अपनी बहन के गीले गुलाबी रसीले होंठों को चूम लेता है।

और लुबना अपनी आँखें बंद कर लेती है। मगर अगले ही पल उसे अनुम की मौजूदगी का एहसास होता है और वो जीशान को धकेलती हुई वहाँ से अपने रूम में भाग जाती है।

जीशान अनुम की तरफ घूमता है। अनुम की नजरें झुकी हुई थी, मगर दिल की धड़कनें बहुत तेज चल रह थीं। अनुम बेड से खड़ी हो जाती है।

हजारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पर दम निकले,

बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले।

जीशान शेर गुन गुनाता हुआ अनुम के पास आकर खड़ा हो जाता है-“क्या आप मुँह मीठा नहीं करवाएँगी?”

अनुम-“बिल्कुल नहीं … और हाँ किसने कहा तुमसे ऐसी वाहियात बात कि मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ ? वो तो लुब बेवकूफ़ है जो तुम्हारी बातों में आ गई, जाओ यहाँ से…”

जीशान अनुम को अपनी छाती से झटके से लगा लेता है-“बस अनुम बस… बहुत सह चुका हूँ मैं। मैं जानता हूँ तुम मुझसे पागलों की तरह मोहब्बत करती हो। कसम है मुझे तुम्हारी , मैं तुम्हें इतना प्यार दूँगा की तुम सिर्फ़ एक नाम याद रखोगी, और वो होगा मेरा, तुम्हारे शौहर जीशान ख़ान का…”

अनुम की आँखें बंद हो जाती हैं और वो जीशान से लिपट जाती है।

जीशान-“मैं तुम्हारे लिए कुछ लाया हूँ …”

अनुम धीमी आवाज़ में-क्या?

जीशान अपने पैंट के जेब से एक गोल्डेन पेंडेंट निकालकर अनुम के हाथ में रख देता है-कैसा है?

अनुम-बहुत खूबसूरत ।

जीशान-मैं चाहता हूँ कि तुम आज रात इसे पहनो।

अनुम-अभी पहन लूँ?

जीशान-अभी नहीं । रात में ये पहनकर मेरे रूम में देखना चाहता हूँ मैं तुम्हें।

अनुम-ठीक है। पहन लूँगी।

जीशान-सिर्फ़ ये पहनकर आना।

अनुम गौर से जीशान को देखने लगती है-मैं समझी नहीं ?

जीशान अनुम के होंठों के करीब आकर-“सिर्फ़ ये पहनकर, और इस जिस्म पर कुछ भी नहीं होना चाहिए…”

अनुम की टाँगे काँपने लगती हैं-“नहीं नहीं , मैं नहीं ऐसे आ सकती…”

जीशान-“अगर मेरी मोहब्बत सच्ची है, और तुम मुझे अपना सब कुछ मान चुकी हो तो तुम ज़रूर आओगी। ये मैं यहीं रख रहा हूँ , इस उम्मीद के साथ कि जब मैं फॅक्टरी से वापस आऊूँ, तो ये मुझे यहाँ नहीं , इस गर्दन में दिखाई दे। और इस दुनियाँ की सबसे खूबसूरत औरत मेरा इंतजार करती हुई मुझे दिखाई दे…”

अनुम लरजती हुई आवाज़ में-तुम ऐसा क्यों करना चाहते हो?

जीशान-“क्योंकी मैं तुम्हें आज ही प्रेगनेंट कर देना चाहता हूँ अनुम…”

अनुम जीशान की बात सुनकर खामोश हो जाती है-“मैं नहीं आउन्गि…”

जीशान अनुम की आँखों में देखते हुये रूम से बाहर चला जाता है और अनुम धड़कते दिल के साथ जीशान को देखती रह जाती है

अनुम दिल में सोच लेती है कि आखिर कुछ भी हो जाये, मैं ऐसे नहीं जाउन्गी, बिल्कुल नहीं । मगर बार-बार जीशान के वो कुछ शब्द उसके कानों में गूँजने लगते हैं कि मैं तुम्हें आज ही प्रेगनेंट कर देना चाहता हूँ । ऐसी मोहब्बत ऐसे जज़्बात तो अनुम की जिंदगी में उस वक्त भी नहीं आए थे, जब अमन उसके साथ था। इतनी शिद्दत से उससे किसी ने भी मोहब्बत नहीं की थी, जितनी शिद्दत से जीशान करने का दावा करता था। अनुम एक बार उस गोल्डेन पेंडेंट को छू कर देखती है और उसे बिना उठाए जीशान के रूम से बाहर चली जाती है।

जीशान फॅक्टरी के लिए रवाना हो जाता है, इस उम्मीद के साथ कि शायद अनुम वो पेंडेंट पहन ले और उसे वो सब मिल जाए, जो वो हमेशा से चाहता था।

 
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