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उसके बाद होटल मैनेजर के संकेत पर आयोजक ने दूसरा कप उठाया। प्रमुख अतिथि ने यह कप लेकर वन्दना को दिया। वन्दना ने इसे स्वीकार करते हुए प्रसन्नता प्रकट की। हॉल के अन्दर तालियां फिर गूंजने लगीं। वन्दना ने प्रमुख अतिथि को धन्यवाद दिया। ‘वन मिनट प्लीज।’ सहसा एक पत्रकार ने उसके स्टेज पर से सीढ़ियां उतरने से पहले ही उसका रास्ता रोककर कहा और अपने कैमरे का फोकस उस पर निशाना बनाकर ठीक करने लगा। उसके साथ ही वहां और भी पत्रकार अपना कैमरा लिए वन्दना के सामने आ चुके थे। वन्दना को रुक जाना पड़ा। तभी उसके बगल में लपककर खन्ना भी आ खड़ा हुआ। फिर फोटो के लिए अनेक फ्रलैशगन के बल्ब चमक उठे। अमर अपनी सुरक्षित कुर्सी पर बैठा खन्ना तथा वन्दना को देख रहा था। मनचले नवयुवक की फबती जब उसके कानों में पड़ी तो उसे ऐसा लगा मानो उस नवयुवक ने सबके सामने उसके गाल पर थप्पड़ रसीद कर दिया है। दर्शकों के ठहाके उसे यूं सुनाई पड़े मानो थप्पड़ लगने के बाद सब मिलकर उसका मजाक उड़ा रहे हैं। उसका मन किया कि वह यहां से उठकर अपने कमरे में चला जाए। परन्तु
उसने वन्दना को खन्ना के रहम और करम पर छोड़कर जाना उचित नहीं समझा। वन्दना को उसकी सीट तक छोड़ने के बाद खन्ना बड़ी आशा के साथ उसके समीप खड़ा रहा। शायद वन्दना उसे अपने समीप बैठने के लिए कहे। परन्तु खन्ना को वन्दना से कोई भी लिफ्ट नहीं मिली। वन्दना ने अपनी सीट पर बैठकर अपना पुरस्कृत कप मेज पर कुछ पटकते हुए रखा तो खन्ना चला गया। उसने कप मेज पर अमर की ओर बढ़ा दिया। अमर ने कप हाथ में लेकर देखा। फिर सब कुछ भूलकर हर्ष प्रकट करता हुआ बधाई देने लगा। होटल मैनेजर स्टेज के माइक पर फिर पुकारकर कह रहा था, ‘आज की दूसरी प्रतियोगिता नृत्य करने वाले सबसे अच्छे जोड़े के लिए है।’ दर्शकों ने पलटकर वन्दना को देखा। क्या दूसरी प्रतियोगिता में भी तो वन्दना बाजी नहीं मार ले गई? वन्दना तथा युवक के एक नृत्य पर सारा हॉल ही मुग्ध हो गया था। और उनका अनुमान ठीक ही निकला। होटल मैनेजर अपना ‘एनाउन्समेन्ट’ जारी रखते हुए कह रहा था, ‘और नृत्य में अपनी भरपूर कला का प्रदर्शन करने वाला जोड़ा है श्री कमल कुमार तथा कुमारी वन्दना सिंह का। कृपया आप दोनों स्टेज पर पधारें।’
‘हॉल एक बार फिर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज गया। वन्दना इठलाती मुस्कराती तथा बलखाती हुई उठ खड़ी हुई। अमर को प्यार भरी दृष्टि से उसने देखा तो अमर ने खामोश मुस्कान तथा चमकती हुई दृष्टि के साथ उसकी प्रसन्नता में सम्मिलित होते हुए उसे इस जीत पर भी पहले ही बधाई दे दी। वन्दना स्टेज पर जा खड़ी हुई तो साथ में उसके वह युवक भी आ खड़ा हुआ जो उससे आयु में छोटा था तथा जिसने टैब डांस के बाद उसके साथ नृत्य में साथ दिया था। प्रमुख महोदय ने पहले के समान ही आयोजक से इनाम के कप्स लेकर कमल कुमार तथा वन्दना को एक के बाद एक कप थमाते हुए बधाई दी और हाथ मिलाया। फिर वही पत्रकारों के कैमरों की फ्लैशगन की चमक - तालियों का शोर। वन्दना स्टेज की सीढ़ियां उतरी तो उसके पीछे-पीछे कमल कुमार भी उतर आया। कमल कुमार ने सभ्यता का ध्यान रखते हुए वन्दना को उसकी सीट तक छोड़ा। वन्दना ने कमल कुमार को अमर का परिचय दिया। बोली, ‘आप मिस्टर अमर हैं।’
कमल कुमार ने अमर से हाथ मिलाते हुए कहा, ‘आपसे भेंट करके वास्तव में बहुत प्रसन्नता प्राप्त हो रही है।’ कमल कुमार अमर के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित था। कमल कुमार के प्यार भरे व्यवहार ने उसका मन जीत लिया था। वन्दना ने कमल कुमार को यहां तक पहुंचाने के लिए धन्यवाद दिया। उसे बैठने के लिए भी पूछा। परन्तु कमल ने दो जवान दिलों के बीच खलल डालना उचित नहीं समझा। वह चला गया। वन्दना अपनी सीट पर बैठ गई। मुस्कराते हुए उसने अपना दूसरा जीता हुआ कप भी अमर की ओर बढ़ा दिया। यह कप पहले कप से अधिक बड़ा तथा सुन्दर था। अमर ने अपनी दोनों हथेलियों के मध्य वन्दना का हाथ दबाकर हर्ष प्रकट करते हुए उसे बधाई दी तथा उस पर गर्व प्रकट किया। वन्दना के लिए अमर की प्रसन्नता से बड़ी कोई प्रसन्नता नहीं थी। उसकी प्रतियोगिता जीतने की प्रसन्नता दोगुनी हो गई। होटल मैनेजर ने अगली प्रतियोगिता का परिणाम सुनाते हुए कुछ मनचलेपन से कहा, ‘और अब अपने दिलों को थामकर सुनिए कि आज की, या यूं कहिए कि इस होटल के पिछले पच्चीस वर्षों की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रतियोगिता
में ‘ब्यूटी क्वीन’ का खिताब किस सुन्दरी के भाग्य में आया है? विचित्र बात तो यह है कि प्रतियोगिता का निर्णय करते समय आदरणीय निर्णायकों में से एक भी ऐसे निर्णायक महोदय नहीं निकले जिन्हें इस सुन्दरी के ‘ब्यूटी क्वीन’ होने पर किसी प्रकार का सन्देह हुआ हो। यह इस होटल के लिए हर्ष तथा ‘ब्यूटी क्वीन’ के लिए बड़े गर्व की बात है कि आज उस सुन्दरी ने---’ होटल मैनेजर ने रुकते हुए दृष्टि उठाकर वन्दना को भेद भरी दृष्टि से मुस्कराकर देखा। वन्दना के दिल की धड़कनें बढ़ गईं - एक अज्ञात प्रसन्नता का आभास करके। उसने अमर को देखा। अमर मुस्करा दिया, इस प्रकार मानो उसे पहले ही वन्दना के ‘ब्यूटी क्वीन’ बनने पर कोई सन्देह नहीं रह गया था। वन्दना की सुन्दरता के आगे तो देश-विदेश में भी दूर तक कोई उसकी बराबरी नहीं थी - विशेष कर उसकी अपनी दृष्टि में। होटल मैनेजर ने अपनी बात जारी रखते हुए फिर आरम्भ की। उसने कहा - ‘आज उस सुन्दरी ने इससे पहले भी दोनों प्रतियोगिताओं में विजेता बनने का सम्मान प्राप्त किया है।’ वन्दना की विजय पर अब किसी को सन्देह ही नहीं रहा। दर्शकों ने वन्दना को देखते हुए इतनी जोर की तालियां बजाईं कि स्वयं उनके कान फटने लगे। हॉल के अन्दर जोश
में आकर दर्शक सीटियां बजाने लगे। वन्दना के भाग्य की सराहना करते हुए अनेक दर्शक चीख उठे - ‘ऑर्केस्ट्रा---ऑर्केस्ट्रा।’ वन्दना को मानो प्रसन्नता का एक बहुत बड़ा खजाना मिल गया जिसे उसके लिए संभालना कठिन हो रहा था। प्रसन्नता से बेकाबू होकर उसका मन किया कि वह अमर की छाती से लग जाए। उससे कहे कि वह उसे अपनी बांहों में समाकर खूब प्यार करे। परन्तु इतने ऊंचे समाज में होने के पश्चात् वह साहस नहीं कर सकी। भारतीय पिता के रक्त ने उसकी इस इच्छा पर लाज की बेड़ियां डाल दीं। ‘तो आइए वन्दना जी---।’ तालियों का जोर कम होते-होते स्टेज पर खड़े होटल मैनेजर ने वन्दना को देखते हुए माइक पर उसका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। उसने कहा, ‘आज की तीसरी तथा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रतियोगिता की विजेता ‘ब्यूटी क्वीन’ बनकर हमारे होटल का सम्मान बढ़ाइए।’ वन्दना स्टेज पर जा खड़ी हुई - दर्शकों की ओर मुखड़ा तथा अमर की ओर दृष्टि बिछाकर। परन्तु फिर वह प्रसन्नता की अधिकता के कारण अमर से भी दृष्टि नहीं मिला सकी तो उसने अपनी पलकें नीचे झुका लीं। होंठ मुस्कराने के
लिए बेकाबू होकर कांप-कांप उठते थे। पत्रकार थे कि स्टेज पर चढ़-चढ़कर उसकी तस्वीरें खींचते हुए उसे उसे और नर्वस कर रहे थे। फिर पिछले वर्ष की सुन्दरी (ब्यूटी क्वीन) ने उसके सामने आकर उसकी छाती पर कंधे से कमर तक एक नीला तथा लगभग छः इंच चौड़ा रेशमी पट्टा टांका जिस पर सामने चांदी के तारों द्वारा मोटे शब्दों में कढ़ा हुआ था ‘ब्यूटी क्वीन ऑफ सिल्वर जुबली - फिरदौस’। फिर पिछले वर्ष की सुन्दरी ने अपने हाथों से वन्दना के सिर पर ‘ब्यूटी क्वीन’ का एक मुकुट रखते हुए पहनाया। तालियों का शोर फिर गूंजा - गूंजता ही गया। फिर जब वह अपनी औपचारिकता पूरी करने के बाद एक किनारे खड़ी हो गई तो आज का सबसे बड़ा तथा सुन्दर चांदी का कप उठाकर प्रमुख अतिथि ने वन्दना को भेंट करके उसे बधाई दी। तालियों का शोर समुद्र की मौजों के समान एक बार फिर उठा। मौजों के इस बहाव में वन्दना मानो बहकर खुशी से पागल हो उठी। इसके बाद होटल मैनेजर ने प्रमुख अतिथि, पिछले वर्ष की सुन्दरी, आज के निर्णायकों तथा आयोजकों के साथ उन सभी यात्रियों, मेहमानों तथा उम्मीदवारों को भी धन्यवाद दिया जिन्होंने अपनी उपस्थिति देकर आज के इस अनूठे जश्न को सफल बनाने में सहायता दी थी।
कुछ देर बाद स्टेज पर ऑर्केस्ट्रा पार्टी ने अपना स्थान लिया। प्रोग्राम का अन्त करने के लिए उन्होंने अन्तिम नृत्य की धुन छेड़ी - मधुर, सुरीली तथा मद्धिम। नवजवान जोड़े फर्श पर उतर कर नृत्य करने लगे। वन्दना तथा अमर अपनी सीट पर बैठे प्रसन्नता में इतना अधिक डूबे हुए थे कि उन्हें आपस में बातें करने से अब तक समय नहीं मिला था। तभी वहां कबाब में हड्डी बनकर खन्ना फिर आ पहुंचा। ‘कांग्रेचुलेशन, वन्दना जी!’ उसने खड़े-खड़े कुछ झुक कर वन्दना से कहा, ‘आपने एक ही फंक्शन में एक के बाद एक तीन प्रतियोगिताएं जीतकर तो कमाल ही कर दिया।’ खन्ना ने अपनी बात पूरी की तो उसके होंठों से शराब का एक झपका उठा। उसने अपनी विजय के उपलक्ष में स्वयं ही खूब शराब नहीं पी थी बल्कि अपनी पार्टनर्स को भी शराब पिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। फंक्शन में आज लगभग सभी पुरुषों ने शराब पीकर वातावरण का भरपूर आनन्द उठाया था। पुरुष क्या, उच्च समाज में शराब पीने पर विश्वास रखने वाली जाने कितनी भारतीय स्त्रियां भी शराब के शौक से वंचित नहीं थीं इसलिए वन्दना ने खन्ना के शराब पीने के शौक को नजरअंदाज कर दिया। परन्तु उससे बातें करते हुए उसे जरा भी खुशी नहीं हो रही थी। फिर भी सभ्यता को स्थिर रखते
हुए उसने अपने होंठों पर कृत्रिम मुस्कान उत्पन्न की और बोली, ‘धन्यवाद’। ‘क्या मैं प्रोग्राम के अन्तिम नृत्य में आपकी संगति का आनंद प्राप्त कर सकता हूं?’ उसने वन्दना को उठाने के लिए अपना बायां हाथ वन्दना की ओर बढ़ाया। वन्दना की ओर कुछ और झुकते हुए, इतना कि उसके होंठों से निकली शराब की दुर्गंध भाप बनकर वन्दना के मुखड़े पर छा गई। झुकते समय खन्ना शराब के नशे में कुछ लड़खड़ा भी गया था। वन्दना को मतली-सी आ गई। जो व्यक्ति शराब के नशे में अपने पैरों पर खड़ा होने में असमर्थ है वह उसके साथ नृत्य क्या करता? वैसे भी प्रोग्राम का अन्तिम नृत्य अपने प्रियतम अमर के साथ ही करने का इरादा किए बैठी थी। उसने उसी प्रकार बैठे-बैठे स्पष्ट शब्दों में इंकार किया। बोली, ‘आई एम सॉरी। मैं इस अन्तिम नृत्य के लिए अपना समय मिस्टर अमर के लिए सुरक्षित कर चुकी हूं।’ उसने अमर की ओर इशारा किया। वन्दना ने इंकार कर दिया था परन्तु अनिच्छुक तौर पर मुस्कराती रही ताकि हॉल का यह थिरकता सुन्दर वातावरण स्थिर रहे।
वह इस खुले अपमान को सहन नहीं कर सका, उसने सीधे खड़े होते हुए जोश में कहा, ‘मिस वन्दना, शायद आप नहीं जानतीं कि मैं किसी से किसी भी प्रकार का इन्कार सुनने का आदी नहीं हूं।’ खन्ना की बात सुनकर अमर अपने क्रोध पर काबू नहीं कर सका। वह तुरन्त खड़ा हो गया - अमेरिकी ढंग से कुछ झूलकर कंधे से कुछ झुकते हुए, बिल्कुल सतर्क, इस प्रकार मानो वह अचानक आने वाले हर खतरे से तैयार है। उसके एक हाथ की हथेली ‘करंट’ ढंग से सख्त हो गई। दूसरे हाथ की अंगुलियां पैंट की पॉकेट पर जाकर रुक गईं जहां पॉकेट के अन्दर छोटी-सी रिवॉल्वर थी। उसने दृष्टि मिलाकर खन्ना को देखा, मानो उसे आंखों द्वारा हर प्रकार की चुनौती दे रहा हो। खन्ना ने जोश में आकर जो कुछ कहा था उसे इसका अफसोस नहीं हुआ। अफसोस हुआ तो केवल इस बात का कि जो कुछ उसने कहा है उसे पूरा करने का यह स्थान नहीं था। वह अमर से नहीं घबराया। उसने जाते-जाते वन्दना से कहा, ‘तुम पछताओगी, बहुत पछताओगी। जिस किसी ने कभी मेरी इच्छा का आदर नहीं किया है उसे सारी जिन्दगी पछताने के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं लगा है।’ खन्ना ने घूरकर वन्दना को देखा, फिर अमर को भी। वह क्रोध में एक
झटके से पलटा और फिर मुट्ठी बांधकर अकड़ता हुआ हॉल के द्वार से होकर बाहर चला गया। खन्ना को हॉल के द्वार से होकर बाहर जाने वन्दना ने भी देखा था तथा अमर ने भी। खन्ना ने जिस प्रकार जाते-जाते वन्दना को धमकी दी थी उससे वन्दना का भयभीत होना स्वाभाविक था। आखिर वह एक लड़की ही तो थी। अपने जीवन की सुरक्षा के लिए वह हर क्षण अमर पर कैसे निर्भर रह सकती थी? यह माना कि अमर की आंखों के सामने उसका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता था परन्तु यह आंखों के सामने वाली ही बात थी। पीठ-पीछे छिप-छिपाकर, धोखे से तो उस पर कोई आक्रमण कर सकता था। तब अमर क्या करता? वह कोई भगवान तो था नहीं जिसे हर आने वाले खतरे का एहसास पहले ही हो जाता। ऐसा सोचते हुए अचानक जाने कैसे वन्दना को डाकू शेर सिंह की याद आ गई। डाकू शेर सिंह। उसके नाम से ही वन्दना के दिल की धड़कनें तेज हो गईं। उसने सोचा - डाकू शेर सिंह उसके पीछे पहले ही हाथ धोकर पड़ा हुआ है और अब अपने लिए उसने एक और शत्रु उत्पन्न कर लिया। ‘किस सोच में पड़ गईं?’ अमर ने अपनी कुर्सी पर बैठते हुए वन्दना को चिन्तित देखा तो पूछा।
‘कुछ नहीं - कुछ भी तो नहीं।’ वन्दना ने अपनी चिंता पर मुस्कान का परदा डालते हुए कहा। ‘कुछ-न-कुछ बात तो जरूर ही है।’ अमर ने वन्दना की आंखों में झांकते हुए सच्चाई तलाश की। बोला, ‘बताओ ना क्या बात है? क्या उस रंगरूट की धमकी से डर गई हो?’ वन्दना ने खामोशी से सिर झुका लिया। कोई उत्तर नहीं दे सकी वह।
उसने वन्दना को खन्ना के रहम और करम पर छोड़कर जाना उचित नहीं समझा। वन्दना को उसकी सीट तक छोड़ने के बाद खन्ना बड़ी आशा के साथ उसके समीप खड़ा रहा। शायद वन्दना उसे अपने समीप बैठने के लिए कहे। परन्तु खन्ना को वन्दना से कोई भी लिफ्ट नहीं मिली। वन्दना ने अपनी सीट पर बैठकर अपना पुरस्कृत कप मेज पर कुछ पटकते हुए रखा तो खन्ना चला गया। उसने कप मेज पर अमर की ओर बढ़ा दिया। अमर ने कप हाथ में लेकर देखा। फिर सब कुछ भूलकर हर्ष प्रकट करता हुआ बधाई देने लगा। होटल मैनेजर स्टेज के माइक पर फिर पुकारकर कह रहा था, ‘आज की दूसरी प्रतियोगिता नृत्य करने वाले सबसे अच्छे जोड़े के लिए है।’ दर्शकों ने पलटकर वन्दना को देखा। क्या दूसरी प्रतियोगिता में भी तो वन्दना बाजी नहीं मार ले गई? वन्दना तथा युवक के एक नृत्य पर सारा हॉल ही मुग्ध हो गया था। और उनका अनुमान ठीक ही निकला। होटल मैनेजर अपना ‘एनाउन्समेन्ट’ जारी रखते हुए कह रहा था, ‘और नृत्य में अपनी भरपूर कला का प्रदर्शन करने वाला जोड़ा है श्री कमल कुमार तथा कुमारी वन्दना सिंह का। कृपया आप दोनों स्टेज पर पधारें।’
‘हॉल एक बार फिर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज गया। वन्दना इठलाती मुस्कराती तथा बलखाती हुई उठ खड़ी हुई। अमर को प्यार भरी दृष्टि से उसने देखा तो अमर ने खामोश मुस्कान तथा चमकती हुई दृष्टि के साथ उसकी प्रसन्नता में सम्मिलित होते हुए उसे इस जीत पर भी पहले ही बधाई दे दी। वन्दना स्टेज पर जा खड़ी हुई तो साथ में उसके वह युवक भी आ खड़ा हुआ जो उससे आयु में छोटा था तथा जिसने टैब डांस के बाद उसके साथ नृत्य में साथ दिया था। प्रमुख महोदय ने पहले के समान ही आयोजक से इनाम के कप्स लेकर कमल कुमार तथा वन्दना को एक के बाद एक कप थमाते हुए बधाई दी और हाथ मिलाया। फिर वही पत्रकारों के कैमरों की फ्लैशगन की चमक - तालियों का शोर। वन्दना स्टेज की सीढ़ियां उतरी तो उसके पीछे-पीछे कमल कुमार भी उतर आया। कमल कुमार ने सभ्यता का ध्यान रखते हुए वन्दना को उसकी सीट तक छोड़ा। वन्दना ने कमल कुमार को अमर का परिचय दिया। बोली, ‘आप मिस्टर अमर हैं।’
कमल कुमार ने अमर से हाथ मिलाते हुए कहा, ‘आपसे भेंट करके वास्तव में बहुत प्रसन्नता प्राप्त हो रही है।’ कमल कुमार अमर के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित था। कमल कुमार के प्यार भरे व्यवहार ने उसका मन जीत लिया था। वन्दना ने कमल कुमार को यहां तक पहुंचाने के लिए धन्यवाद दिया। उसे बैठने के लिए भी पूछा। परन्तु कमल ने दो जवान दिलों के बीच खलल डालना उचित नहीं समझा। वह चला गया। वन्दना अपनी सीट पर बैठ गई। मुस्कराते हुए उसने अपना दूसरा जीता हुआ कप भी अमर की ओर बढ़ा दिया। यह कप पहले कप से अधिक बड़ा तथा सुन्दर था। अमर ने अपनी दोनों हथेलियों के मध्य वन्दना का हाथ दबाकर हर्ष प्रकट करते हुए उसे बधाई दी तथा उस पर गर्व प्रकट किया। वन्दना के लिए अमर की प्रसन्नता से बड़ी कोई प्रसन्नता नहीं थी। उसकी प्रतियोगिता जीतने की प्रसन्नता दोगुनी हो गई। होटल मैनेजर ने अगली प्रतियोगिता का परिणाम सुनाते हुए कुछ मनचलेपन से कहा, ‘और अब अपने दिलों को थामकर सुनिए कि आज की, या यूं कहिए कि इस होटल के पिछले पच्चीस वर्षों की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रतियोगिता
में ‘ब्यूटी क्वीन’ का खिताब किस सुन्दरी के भाग्य में आया है? विचित्र बात तो यह है कि प्रतियोगिता का निर्णय करते समय आदरणीय निर्णायकों में से एक भी ऐसे निर्णायक महोदय नहीं निकले जिन्हें इस सुन्दरी के ‘ब्यूटी क्वीन’ होने पर किसी प्रकार का सन्देह हुआ हो। यह इस होटल के लिए हर्ष तथा ‘ब्यूटी क्वीन’ के लिए बड़े गर्व की बात है कि आज उस सुन्दरी ने---’ होटल मैनेजर ने रुकते हुए दृष्टि उठाकर वन्दना को भेद भरी दृष्टि से मुस्कराकर देखा। वन्दना के दिल की धड़कनें बढ़ गईं - एक अज्ञात प्रसन्नता का आभास करके। उसने अमर को देखा। अमर मुस्करा दिया, इस प्रकार मानो उसे पहले ही वन्दना के ‘ब्यूटी क्वीन’ बनने पर कोई सन्देह नहीं रह गया था। वन्दना की सुन्दरता के आगे तो देश-विदेश में भी दूर तक कोई उसकी बराबरी नहीं थी - विशेष कर उसकी अपनी दृष्टि में। होटल मैनेजर ने अपनी बात जारी रखते हुए फिर आरम्भ की। उसने कहा - ‘आज उस सुन्दरी ने इससे पहले भी दोनों प्रतियोगिताओं में विजेता बनने का सम्मान प्राप्त किया है।’ वन्दना की विजय पर अब किसी को सन्देह ही नहीं रहा। दर्शकों ने वन्दना को देखते हुए इतनी जोर की तालियां बजाईं कि स्वयं उनके कान फटने लगे। हॉल के अन्दर जोश
में आकर दर्शक सीटियां बजाने लगे। वन्दना के भाग्य की सराहना करते हुए अनेक दर्शक चीख उठे - ‘ऑर्केस्ट्रा---ऑर्केस्ट्रा।’ वन्दना को मानो प्रसन्नता का एक बहुत बड़ा खजाना मिल गया जिसे उसके लिए संभालना कठिन हो रहा था। प्रसन्नता से बेकाबू होकर उसका मन किया कि वह अमर की छाती से लग जाए। उससे कहे कि वह उसे अपनी बांहों में समाकर खूब प्यार करे। परन्तु इतने ऊंचे समाज में होने के पश्चात् वह साहस नहीं कर सकी। भारतीय पिता के रक्त ने उसकी इस इच्छा पर लाज की बेड़ियां डाल दीं। ‘तो आइए वन्दना जी---।’ तालियों का जोर कम होते-होते स्टेज पर खड़े होटल मैनेजर ने वन्दना को देखते हुए माइक पर उसका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। उसने कहा, ‘आज की तीसरी तथा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रतियोगिता की विजेता ‘ब्यूटी क्वीन’ बनकर हमारे होटल का सम्मान बढ़ाइए।’ वन्दना स्टेज पर जा खड़ी हुई - दर्शकों की ओर मुखड़ा तथा अमर की ओर दृष्टि बिछाकर। परन्तु फिर वह प्रसन्नता की अधिकता के कारण अमर से भी दृष्टि नहीं मिला सकी तो उसने अपनी पलकें नीचे झुका लीं। होंठ मुस्कराने के
लिए बेकाबू होकर कांप-कांप उठते थे। पत्रकार थे कि स्टेज पर चढ़-चढ़कर उसकी तस्वीरें खींचते हुए उसे उसे और नर्वस कर रहे थे। फिर पिछले वर्ष की सुन्दरी (ब्यूटी क्वीन) ने उसके सामने आकर उसकी छाती पर कंधे से कमर तक एक नीला तथा लगभग छः इंच चौड़ा रेशमी पट्टा टांका जिस पर सामने चांदी के तारों द्वारा मोटे शब्दों में कढ़ा हुआ था ‘ब्यूटी क्वीन ऑफ सिल्वर जुबली - फिरदौस’। फिर पिछले वर्ष की सुन्दरी ने अपने हाथों से वन्दना के सिर पर ‘ब्यूटी क्वीन’ का एक मुकुट रखते हुए पहनाया। तालियों का शोर फिर गूंजा - गूंजता ही गया। फिर जब वह अपनी औपचारिकता पूरी करने के बाद एक किनारे खड़ी हो गई तो आज का सबसे बड़ा तथा सुन्दर चांदी का कप उठाकर प्रमुख अतिथि ने वन्दना को भेंट करके उसे बधाई दी। तालियों का शोर समुद्र की मौजों के समान एक बार फिर उठा। मौजों के इस बहाव में वन्दना मानो बहकर खुशी से पागल हो उठी। इसके बाद होटल मैनेजर ने प्रमुख अतिथि, पिछले वर्ष की सुन्दरी, आज के निर्णायकों तथा आयोजकों के साथ उन सभी यात्रियों, मेहमानों तथा उम्मीदवारों को भी धन्यवाद दिया जिन्होंने अपनी उपस्थिति देकर आज के इस अनूठे जश्न को सफल बनाने में सहायता दी थी।
कुछ देर बाद स्टेज पर ऑर्केस्ट्रा पार्टी ने अपना स्थान लिया। प्रोग्राम का अन्त करने के लिए उन्होंने अन्तिम नृत्य की धुन छेड़ी - मधुर, सुरीली तथा मद्धिम। नवजवान जोड़े फर्श पर उतर कर नृत्य करने लगे। वन्दना तथा अमर अपनी सीट पर बैठे प्रसन्नता में इतना अधिक डूबे हुए थे कि उन्हें आपस में बातें करने से अब तक समय नहीं मिला था। तभी वहां कबाब में हड्डी बनकर खन्ना फिर आ पहुंचा। ‘कांग्रेचुलेशन, वन्दना जी!’ उसने खड़े-खड़े कुछ झुक कर वन्दना से कहा, ‘आपने एक ही फंक्शन में एक के बाद एक तीन प्रतियोगिताएं जीतकर तो कमाल ही कर दिया।’ खन्ना ने अपनी बात पूरी की तो उसके होंठों से शराब का एक झपका उठा। उसने अपनी विजय के उपलक्ष में स्वयं ही खूब शराब नहीं पी थी बल्कि अपनी पार्टनर्स को भी शराब पिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। फंक्शन में आज लगभग सभी पुरुषों ने शराब पीकर वातावरण का भरपूर आनन्द उठाया था। पुरुष क्या, उच्च समाज में शराब पीने पर विश्वास रखने वाली जाने कितनी भारतीय स्त्रियां भी शराब के शौक से वंचित नहीं थीं इसलिए वन्दना ने खन्ना के शराब पीने के शौक को नजरअंदाज कर दिया। परन्तु उससे बातें करते हुए उसे जरा भी खुशी नहीं हो रही थी। फिर भी सभ्यता को स्थिर रखते
हुए उसने अपने होंठों पर कृत्रिम मुस्कान उत्पन्न की और बोली, ‘धन्यवाद’। ‘क्या मैं प्रोग्राम के अन्तिम नृत्य में आपकी संगति का आनंद प्राप्त कर सकता हूं?’ उसने वन्दना को उठाने के लिए अपना बायां हाथ वन्दना की ओर बढ़ाया। वन्दना की ओर कुछ और झुकते हुए, इतना कि उसके होंठों से निकली शराब की दुर्गंध भाप बनकर वन्दना के मुखड़े पर छा गई। झुकते समय खन्ना शराब के नशे में कुछ लड़खड़ा भी गया था। वन्दना को मतली-सी आ गई। जो व्यक्ति शराब के नशे में अपने पैरों पर खड़ा होने में असमर्थ है वह उसके साथ नृत्य क्या करता? वैसे भी प्रोग्राम का अन्तिम नृत्य अपने प्रियतम अमर के साथ ही करने का इरादा किए बैठी थी। उसने उसी प्रकार बैठे-बैठे स्पष्ट शब्दों में इंकार किया। बोली, ‘आई एम सॉरी। मैं इस अन्तिम नृत्य के लिए अपना समय मिस्टर अमर के लिए सुरक्षित कर चुकी हूं।’ उसने अमर की ओर इशारा किया। वन्दना ने इंकार कर दिया था परन्तु अनिच्छुक तौर पर मुस्कराती रही ताकि हॉल का यह थिरकता सुन्दर वातावरण स्थिर रहे।
वह इस खुले अपमान को सहन नहीं कर सका, उसने सीधे खड़े होते हुए जोश में कहा, ‘मिस वन्दना, शायद आप नहीं जानतीं कि मैं किसी से किसी भी प्रकार का इन्कार सुनने का आदी नहीं हूं।’ खन्ना की बात सुनकर अमर अपने क्रोध पर काबू नहीं कर सका। वह तुरन्त खड़ा हो गया - अमेरिकी ढंग से कुछ झूलकर कंधे से कुछ झुकते हुए, बिल्कुल सतर्क, इस प्रकार मानो वह अचानक आने वाले हर खतरे से तैयार है। उसके एक हाथ की हथेली ‘करंट’ ढंग से सख्त हो गई। दूसरे हाथ की अंगुलियां पैंट की पॉकेट पर जाकर रुक गईं जहां पॉकेट के अन्दर छोटी-सी रिवॉल्वर थी। उसने दृष्टि मिलाकर खन्ना को देखा, मानो उसे आंखों द्वारा हर प्रकार की चुनौती दे रहा हो। खन्ना ने जोश में आकर जो कुछ कहा था उसे इसका अफसोस नहीं हुआ। अफसोस हुआ तो केवल इस बात का कि जो कुछ उसने कहा है उसे पूरा करने का यह स्थान नहीं था। वह अमर से नहीं घबराया। उसने जाते-जाते वन्दना से कहा, ‘तुम पछताओगी, बहुत पछताओगी। जिस किसी ने कभी मेरी इच्छा का आदर नहीं किया है उसे सारी जिन्दगी पछताने के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं लगा है।’ खन्ना ने घूरकर वन्दना को देखा, फिर अमर को भी। वह क्रोध में एक
झटके से पलटा और फिर मुट्ठी बांधकर अकड़ता हुआ हॉल के द्वार से होकर बाहर चला गया। खन्ना को हॉल के द्वार से होकर बाहर जाने वन्दना ने भी देखा था तथा अमर ने भी। खन्ना ने जिस प्रकार जाते-जाते वन्दना को धमकी दी थी उससे वन्दना का भयभीत होना स्वाभाविक था। आखिर वह एक लड़की ही तो थी। अपने जीवन की सुरक्षा के लिए वह हर क्षण अमर पर कैसे निर्भर रह सकती थी? यह माना कि अमर की आंखों के सामने उसका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता था परन्तु यह आंखों के सामने वाली ही बात थी। पीठ-पीछे छिप-छिपाकर, धोखे से तो उस पर कोई आक्रमण कर सकता था। तब अमर क्या करता? वह कोई भगवान तो था नहीं जिसे हर आने वाले खतरे का एहसास पहले ही हो जाता। ऐसा सोचते हुए अचानक जाने कैसे वन्दना को डाकू शेर सिंह की याद आ गई। डाकू शेर सिंह। उसके नाम से ही वन्दना के दिल की धड़कनें तेज हो गईं। उसने सोचा - डाकू शेर सिंह उसके पीछे पहले ही हाथ धोकर पड़ा हुआ है और अब अपने लिए उसने एक और शत्रु उत्पन्न कर लिया। ‘किस सोच में पड़ गईं?’ अमर ने अपनी कुर्सी पर बैठते हुए वन्दना को चिन्तित देखा तो पूछा।
‘कुछ नहीं - कुछ भी तो नहीं।’ वन्दना ने अपनी चिंता पर मुस्कान का परदा डालते हुए कहा। ‘कुछ-न-कुछ बात तो जरूर ही है।’ अमर ने वन्दना की आंखों में झांकते हुए सच्चाई तलाश की। बोला, ‘बताओ ना क्या बात है? क्या उस रंगरूट की धमकी से डर गई हो?’ वन्दना ने खामोशी से सिर झुका लिया। कोई उत्तर नहीं दे सकी वह।