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एक घंटा सोने के बाद सब जाग गए.. पास ही की एक टपरी पर सबने मसालेदार चाय का लुत्फ उठाया.. तभी रोड के किनारे पर बहते झरने को देखकर.. कुछ जवान औरतों का मन कर गया की पानी में थोड़ी से छब छब की जाएँ.. शीला, रेणुका और उनके साथ कुछ औरतें झरने के किनारे पर जा पहुंची.. नहाने के लिए अलग से कपड़े तो थे नहीं.. और आजूबाजू कोई नजर नहीं आ रहा था.. इसलिए वो औरतें अपनी साड़ी उतारकर.. ब्लाउस और पेटीकोट में ही घुटनों तक गहरे पानी में कूदने के लिए तैयार होने लगी..
रेणुका ने साड़ी का पल्लू हटाकर सबसे पहले अपनी अद्भुत जवानी की झलक दिखाई.. मध्यम उम्र का जिस्म.. गदराए गोरे स्तन और ब्रा की पट्टी ब्लाउस से नजर आ रहे थे.. उन स्तनों को देखते ही शीला आकर्षित हो गई.. रेणुका की सख्त निप्पल थोड़ी सी लंबी थी.. उसकी गहरी नाभि देखकर शीला की चुत में झटके लगने शुरू हो गए.. हल्की चर्बी वाला गोरा गोरा पेट और कमर.. चेतना से करीब ५ साल छोटी थी रेणुका.. पर बेहद आकर्षक थी.. रेणुका के जिस्म के पूरे भूगोल का मुआयना करने के बाद शीला ने कहा
"दो बच्चों के बावजूद आपने बॉडी को अच्छा मैन्टैन किया हुआ है.. " रेणुका हंसने लगी पर कुछ बोली नहीं
चम्पा मौसी: "उसने मैन्टैन नहीं किया.. पर उसके पति ने करवाया है.. बहोत खयाल रखता हो वो रेणुका का.. क्यों ठीक कहा ना मैंने??"
रेणुका ने चम्पा मौसी के कूल्हों पर हल्की सी चपेट लगाते हुए कहा "अब चुप भी करो मौसी.. नहीं तो मैं आपका भी वस्त्राहरण कर दूँगी.. " कहकर वो दुशासन की तरह चम्पा मौसी की साड़ी खींचने लगी..
सारी औरतें मस्ती करते हुए पानी में उतरने लगी.. पानी को देखते ही हर कोई बच्चा बन जाता है.. रेणुका का घाघरा गीला होकर उसकी गांड की दरार में घुस गया था.. गहरे पानी में कमर तक उतर चुकी शीला ने रेणुका के चूतड़ों का आकार देखकर.. पानी के अंदर ही अपने भोसड़े के बेर को घिसकर ठंडा करने की कोशिश की.. सिसकियाँ भरते हुए वो रसिक, जीवा और रघु के लंड को याद करने लगी ताकि उसके भोसड़े का जल्दी छुटकारा हो.. आखिर उसकी चुत ने झरने के पानी को पवित्र कर ही दिया..
नहाते हुए पानी उछालते रेणुका शीला के करीब आई.. शीला के भीगे हुए पतले कॉटन ब्लाउस में दोनों स्तन एकदम तंग थे.. वो भी बिना ब्रा के.. रेणुका बस देखती ही रह गई.. शीला ने रेणुका के मुँह पर पानी उछालकर उसकी समाधि भंग की "क्या देख रही है यार!!"
रेणुका शर्मा गई.. फिर हिम्मत करते हुए वो शीला के करीब आई और धीमे से उसके कान में फुसफुसाई.. "बड़ी कातिल लग रही हो तुम शीला"
शीला के लिए अपनी तारीफ सुनना कोई नई बात नहीं थी.. पर फिर भी उसे सुनकर अच्छा लगा.. उसने रेणुका के चूतड़ों पर हाथ फेरते हुए कहा
"तू भी कुछ कम नहीं है रेणुका.. " दोनों कमर तक पानी के अंदर थी.. इसलिए उनकी हरकत सबकी आँखों से छुपी हुई थी.. सब अपनी मस्ती में मस्त थी.. शीला अभी भी रेणुका के कूल्हों से खेल रही थी.. और रेणुका भी मजे लेकर शीला के साथ अपनी दोस्ती को गाढ़ा करने में जुट गई।
दिन के उजाले में.. भरी दोपहर में.. शीला रेणुका के चूतड़ों के दरार में उंगली फेरते हुए अपने पासे फेंक रही थी
शीला: "ये बता रेणुका.. मेरे घर कब आओगी?"
रेणुका: "जब तुम बुलाओ.. मेरे वो ऑफिस के लिए निकले उसके बाद मैं फ्री होती हूँ.. तुम आ जाओ मेरे घर पर"
शीला: "जरूर आऊँगी.. पर पहले तुम मेरे घर आओ.. "
रेणुका: "अब बस भी करो शीला.. तुम्हारा हाथ जरूरत से कुछ ज्यादा ही आगे बढ़ गया है"
शीला की उँगलियाँ दरार से आगे निकल कर रेणुका की गांड के छेद तक पहुँच गई थी।
शीला: "क्यों तुम्हें अच्छा नहीं लगा?"
रेणुका: "अच्छा क्यों नहीं लगेगा भला.. !! पर आजू बाजू देखो तो सही.. सब यहाँ मौजूद है.. हम अकेले थोड़ी है"
शीला: "हाँ वो तो मैं भूल ही गई.. एक बात कहूँ.. तुम बहोत सुंदर हो रेणुका"
रेणुका: "जिसे कदर होनी चाहिए वो ही तारीफ ना करे तो ये सुंदरता किस काम की!!"
शीला: "ऐसा क्यों बोल रही है? तेरे पति तुझे प्यार नहीं करते क्या?"
रेणुका: "उन्हे टाइम ही कहाँ मिलता है.।!! बिजनेस से फुरसत मिले तो मुझे प्यार करे ना!! रात को देर से आकर टीवी देखते देखते सो जाते है.. कभी उनका मूड हो तब मैं थकी हुई रहती हूँ, इसलिए कुछ नहीं हो पाता.. अपने ही घर में हमारी जरूरतों को ही नजर अंदाज किया जा रहा है"
पीछे खड़ी अनुमौसी इन दोनों के संवाद को बड़े चाव से सुन रही थी.. उनसे रहा नहीं गया और बोल पड़ी
अनुमौसी: "शुरू शुरू में ये मर्द हमे सब कुछ सीखा सीखा कर बिगाड़ते है.. और फिर वही सब हम करना चाहे तो कहते है "कैसी गंदी गंदी चीजें करने को कह रही हो" अब बोलो.. क्या करें इनका.. "
रेणुका: "बिल्कुल सच कह रही हो मौसी.. मुझसे तो कहा भी नहीं जाता और सहा भी नहीं जाता.. बुरी फंसी हूँ मैं.. "
शीला: "मौसी मेरे पास इन सारी समस्याओं का हल है.. पर आप मेरे बारे में गलत सोचेगी ये सोचकर कुछ बोलती नहीं मैं"
अनुमौसी: "अरे शीला.. मैं क्यों तेरे बारे में गलत सोचूँगी.. !! तू भी मदन के बिना २ सालों से तड़प रही है.. मैं समझ सकती हूँ"
रेणुका: "क्या बात कर रही हो!! २ साल से अकेली है तू शीला?? बाप रे!! मुझे तो एक हफ्ता बीत जाएँ तो ऐसा लगता है जैसे सालों हो गयें..तुम तुम्हारी रातें अकेले कैसे बिताती हो??"
शीला: "ये सब बातें करके मेरा दिमाग खराब मत करो तुम सब.. चलो.. बहोत देर हो गई है.. कब तक नहाते रहेंगे!!"
रेणुका: "घर जाकर भी क्या करना है!! वहीं सब झाड़ू-पोंछा, सफाई, खाना पकाना.. और पति का इंतज़ार करना.. इससे अच्छा यहीं पानी में पड़े रहते है.. कम से कम नीचे ठंडक तो मिल रही है.. घर में तो दिमाग खराब हो जाता है मेरा!!"
रेणुका की आवाज का दर्द शीला महसूस कर सकती थी.. कमर तक डूबी हुई रेणुका का हाथ पकड़ लिया उसने.. पानी के अंदर किसी को ये नजर नहीं आ रहा था.. रेणुका का हाथ खींचकर शीला ने घाघरे के नीचे अपनी भोस पर रख दिया.. चुत का स्पर्श होते ही रेणुका स्तब्ध रह गई
रेणुका: "ये क्या कर रही हो शीला?? कुछ तो शर्म करो.. !!"
शीला: "मैं तुम्हें ये बताना चाहती हूँ की पानी में रहने से ये ठंडी नहीं होती.. देखो.. कैसे तप रही है!!"
अनुमौसी: "अरे नासपीटी शीला.. शर्म बेच खाई है क्या तूने!! कब सुधरेगी तू!!??"
शीला: "इसमें मैंने क्या गलत क्या मौसी? ये रेणुका बोल रही थी की पानी में रहने से नीचे ठंडक मिलती है.. कुछ ठंडक नहीं मिलती.. ठंडक के लिए कुछ जुगाड़ लगाना पड़ता है.. सिर्फ उँगलियाँ अंदर डालने से बच्चे पैदा नहीं होते.. जहां जिस चीज की जरूरत हो वहाँ वो ही चीज काम करती है.. समझे!!" तीनों एक दूसरे के करीब खड़े गुसपुस कर रही थी.. और साथ ही अपने जीवन के सबसे जटिल प्रश्न का हल ढूँढने का प्रयत्न कर रही थी
ड्राइवर के बार बार हॉर्न बजाने पर सारी औरतें बाहर निकली.. पेड़ के तने के पीछे जाकर कपड़े निचोड़कर सुखाए.. और फिर मज़ाक मस्ती करते हुए बस में बैठ गए.. अनुमौसी, रेणुका और शीला एक साथ बैठे थे। अनुमौसी कुछ कहना चाहती थी पर हिचक रही थी.. ऐसा लगा शीला को.. पर वो कुछ बोली नहीं.. रेणुका शीला के साथ अपनी दोस्ती को ओर घनिष्ठ करने लगी.. शीला भी रेणुका से करीब होती चली..
जब बस अनुमौसी के घर के बाहर आकर रुकी तब तक रेणुका और शीला अच्छी सहेलियाँ बन चुकी थी.. घर जाने से पहले रेणुका शीला के गले लगी और बोली "कल फोन करना मुझे.. भूल मत जाना.. " रेणुका के जिस्म की भूख शीला अच्छी तरह से महसूस कर पा रही थी
रात के ९ बज रहे थे..
अनुमौसी: "अब इतनी रात को तू अपने लिए कहाँ खाना बनाने बैठेगी!! आजा मेरे घर.. कविता ने खाना तैयार रखा हुआ है.. मेरे घर ही खा लेना.. "
शीला को थोड़ा सा संकोच जरूर हुआ पर वो अनुमौसी को मना नहीं कर पाई.. शीला को लेकर अनुमौसी अपने घर के अंदर पहुंची
"आइए शीला जी" गोल बिस्तर जैसे शरीर वाले, अनुमौसी के पति, चिमनलाल ने शीला का स्वागत किया.. टीवी देखते हुए वो खैनी चबा रहे थे
शीला के सुंदर शरीर ने जैसे ही घर में प्रवेश किया.. अनुमौसी का पूरा घर जगमगा उठा.. उस गदराए जिस्म को ताड़ते हुए चिमनलाल बाहर खैनी थूकने चले गए..
"ओहहों भाभी.. आप!! आइए आइए " पीयूष ने शीला के जिस्म को अपनी आँखों से ही सहलाते हुए कहा.. उसका बस चलता तो शीला को वहीं दबोचकर ऊपर से नीचे तक चूम लेता.. पीयूष के सामने देखकर शीला ऐसे मुस्कुराई के पीयूष के घुटने कमजोर हो गए.. रात का सीन याद आ गया उसे..
अनुमौसी बाथरूम में गए और कविता किचन में खाना तैयार करने में व्यस्त थी.. शीला ने दरवाजे के बाहर देखा तो चिमनलाल कहीं नजर नहीं आए.. ड्रॉइंगरूम में शीला और पीयूष अकेले ही थी.. एक ही पल में शीला ने पीयूष को अपनी तरफ खींचा और कस के चूम लिया.. शीला के इस अचानक आक्रमण से पीयूष के पसीने छूट गए.. शीला ने पेंट के ऊपर से पीयूष के लंड को मुठ्ठी में लेकर दबा दिया.. और पीयूष के डेटाबेज़ में अपना अकाउंट रीन्यू कर लिया.. पीयूष को तब होश आया जब कविता ने उसे किचन से आवाज दी.. घबराया हुआ पीयूष अपने आप को शीला की पकड़ से छुड़ाते हुए दौड़ कर अंदर चला गया
शीला मुसकुराते हुए अनुमौसी का इंतज़ार करते टीवी देखने लगी.. तभी अनुमौसी बाथरूम से आए..
थोड़ी देर में कविता ने किचन से आवाज लगाई "शीला भाभी.. कैसी हैं आप?"
शीला: "ठीक हूँ कविता.. पर तेरे जैसी ठीक तो नहीं हूँ.. तुम जवान लोगों के मजे है.. तकलीफ तो हम जैसे लोगों को ही है"
अनुमौसी ये सुनकर हंसने लगी..
दो थालियों में खाना परोसकर पीयूष बाहर लेकर आया.. और शीला की आँखों में देखते हुए थाली रखकर बोला "खाना खा लीजिए भाभी"
दोनों की आँखें आपस में नैन-मटक्का कर रही थी.. सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनकर अनुमौसी इस द्रश्य का मज़ा ले रही थी
अंदर किचन में रोटियाँ बेलते हुए कविता.. पिंटू के संग मल्टीप्लेक्स में उड़ाएं गुलछर्रे याद कर रही थी.. शीला ने जिस तरह दो दो लंड एक साथ पकड़कर हिलाए थे वो सीन याद करते हुए पीयूष भी उत्तेजित हो रहा था और शीला उस अनजान आदमी के लंड को याद करते हुए अपनी चुत खुजा रही थी..
तभी कविता किचन से थालियाँ और बाकी का खाना ले कर आई.. पीयूष शीला की बगल में बैठ गया.. कविता ने टेबल पर थाली रखने से पहले अपने पल्लू को छाती पर ठीक से दबाकर रखा.. वरना उसके झुकते ही जो द्रश्य दिखता उससे शीला की चुत व्याकुल हो जाती..
यहाँ वहाँ की बातें करते हुए सब खाना खाने लगे.. २० मिनट में सबने खा लिया था.. शीला गप्पे लड़ाते हुए थोड़ी देर बैठी रही.. और फिर उठते हुए बोली "मैं अब चलती हूँ मौसी.. पूरे दिन की थकान है.. नींद आ रही है मुझे"
अनुमौसी: "ठीक है शीला.. आते रहना.. "
पीयूष के सामने अपनी आँखें नचाते हुए शीला निकलने लगी.. किचन से कविता ने भी हाथ हिलाकर उन्हें "बाय" कहा.. घर से बाहर निकलते.. दरवाजे पर, अनुमौसी के पति चिमनलाल अंदर आ रहे थे.. शीला और चिमनलाल दोनों एक साथ टकरा गए.. शीला के बड़े बड़े भोंपू चिमनलाल की रुक्ष छाती से टकरा गए.. शीला शर्मा गए और वहाँ से भाग निकली.. चिमनलाल का लंड, शीला की मादक खुशबू सूंघते ही.. अंगड़ाई लेकर उठने लगा.. जैसे ५ साल के बाद कुंभकर्ण की निंद्रा टूटी हो!!
"साली.. मेरी वाली भी इसके जैसी करारी होती.. तो मज़ा ही आ जाता.. ये अनु तो कुछ करती ही नहीं है.. उसे देखकर तो उठा हुआ लंड भी लटक जाएँ" चिमनलाल सोचते सोचते घर के अंदर पहुंचे
चिमनलाल अपने बेडरूम के अंदर गए और बिस्तर पर लेट गए.. उनके पीछे पीछे अनुमौसी भी अंदर आई और बेडरूम का दरवाजा बंद कर लिया। जैसे ही उन्होंने अपने ब्लाउस के हुक खोले, उनके दोनों ढीले स्तन लटकने लगे.. देखकर चिमनलाल ने गहरी सांस छोड़ी.. एक तरफ वो शीला के बॉल.. और उसके मुकाबले ये अनु के दो पिचके हुए थन.. आह्ह शीला ने तो आज मुझे जवानी की याद दिला दी.. एक बार मिल जाएँ तो आज भी उसे पूरी रात चोदने की ताकत रखता हूँ.. पर इस अनु को तो देखकर ही मेरी सारी इच्छाएं खतम हो जाती है.. ८० के दशक का पुराना बजाज.. जो २५ बार किक मारने पर भी चालू न हो.. वैसा ही हाल है अनु का.. और बजाज को तो झुकाकर भी चालू कर सकते है.. पर इसका क्या करें?? अब जैसी मेरी किस्मत.. चिमनलाल सोचता रहा
शीला अपने घर पहुंचकर बिस्तर पर लेट गई "वो चिमनलाल जानबूझकर मुझसे टकराया था क्या!! रास्ता तो काफी चौड़ा था.. मेरा ध्यान नहीं था पर उन्हे तो नजर आ रहा था.. वो चाहता तो ये भिड़ंत नहीं होती.. लगता है बूढ़ा जानबूझकर ही टकराया था.. और उसके मुंह से खैनी की कितनी गंदी बदबू आ रही थी.. छीईईई.. "
सिनेमा हॉल में पीयूष के साथ बिताया समय याद करने लगी शीला "कितना हेंडसम है पीयूष!! उसके होंठ भी लाल लाल है.. मस्त चिकना है.. उसका लंड थोड़ा सा दमदार होता तो ओर मज़ा आ जाता" आगे एक विचार ये भी आया "तगड़े लंड की कमी पूरी करने के लिए रसिक और जीवा तो है ही.. "
जीवा के लंड की याद आते ही शीला सिहर उठी.. ये पीयूष का लंड तो जीवा के मुकाबले पतली सी पुंगी जैसा ही है.. हाय.. आज का पूरा दिन बिना चुदाई के ही बीत गया.. शीला ने अपनी भोस पर हाथ फेरा.. लंड तो तरह तरह के देखे.. पर जीवा और रघु जैसा लंड आजतक नहीं देखा था.. अपने गाउन की ऊपर की चैन खोलकर अपने एक स्तन बाहर निकाला शीला ने.. निप्पल पर थूक वाली उंगली लगाकर वो कल्पना करने लगी की जैसे पीयूष उसकी निप्पल को चूस रहा हो.. चूचक गीला होते ही शीला के दोनों स्तन कठोर होने लगे.. आज उसे अनुमौसी और रेणुका के नए स्वरूप के दर्शन हो गए यात्रा के दौरान.. अनुमौसी ने जब साड़ी उतारी.. तब उनके पेट की चर्बी क्या मस्त लटक रही थी.. और वो चम्पा मौसी की जांघें.. आहहाहहहहा.. रेणुका के चूतड़.. ईशशशश.. अपनी चुत को सहला रही शीला के चेहरे पर मुस्कान आ गई.. आज रेणुका की गांड के छेद तक हाथ पहुँच ही गया था.. उसने माना न किया होता तो बेशक गांड में उंगली घुसा देती शीला.. एक बार उस रेणुका की मदमस्त गांड पर चुत रगड़नी है.. आहहह.. ४४० वॉल्ट का झटका लगा शीला के भोसड़े में.. कुछ भी नया कामुक विचार दिमाग में आते ही उसकी चुत में आग लग जाती थी..
शीला की नजर घर में चारों तरफ घूमने लगी.. क्या करू? बिना लंड के अब रहा नहीं जाता.. उसने अपने कूल्हों के नीचे गोल तकिया रख दिया.. गाउन ऊपर किया.. और अपनी चिकनी खंभे जैसी जांघों पर हाथ फेरने लगी.. अभी कोई मर्द हाथ लगे तो उसे कच्चा चबा जाने का मन कर रहा था शीला का.. क्लिटोरिस पर हाथ थपथपाते वो दूसरे हाथ से अपनी चूचियाँ मसलने लगी..
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रेणुका ने साड़ी का पल्लू हटाकर सबसे पहले अपनी अद्भुत जवानी की झलक दिखाई.. मध्यम उम्र का जिस्म.. गदराए गोरे स्तन और ब्रा की पट्टी ब्लाउस से नजर आ रहे थे.. उन स्तनों को देखते ही शीला आकर्षित हो गई.. रेणुका की सख्त निप्पल थोड़ी सी लंबी थी.. उसकी गहरी नाभि देखकर शीला की चुत में झटके लगने शुरू हो गए.. हल्की चर्बी वाला गोरा गोरा पेट और कमर.. चेतना से करीब ५ साल छोटी थी रेणुका.. पर बेहद आकर्षक थी.. रेणुका के जिस्म के पूरे भूगोल का मुआयना करने के बाद शीला ने कहा
"दो बच्चों के बावजूद आपने बॉडी को अच्छा मैन्टैन किया हुआ है.. " रेणुका हंसने लगी पर कुछ बोली नहीं
चम्पा मौसी: "उसने मैन्टैन नहीं किया.. पर उसके पति ने करवाया है.. बहोत खयाल रखता हो वो रेणुका का.. क्यों ठीक कहा ना मैंने??"
रेणुका ने चम्पा मौसी के कूल्हों पर हल्की सी चपेट लगाते हुए कहा "अब चुप भी करो मौसी.. नहीं तो मैं आपका भी वस्त्राहरण कर दूँगी.. " कहकर वो दुशासन की तरह चम्पा मौसी की साड़ी खींचने लगी..
सारी औरतें मस्ती करते हुए पानी में उतरने लगी.. पानी को देखते ही हर कोई बच्चा बन जाता है.. रेणुका का घाघरा गीला होकर उसकी गांड की दरार में घुस गया था.. गहरे पानी में कमर तक उतर चुकी शीला ने रेणुका के चूतड़ों का आकार देखकर.. पानी के अंदर ही अपने भोसड़े के बेर को घिसकर ठंडा करने की कोशिश की.. सिसकियाँ भरते हुए वो रसिक, जीवा और रघु के लंड को याद करने लगी ताकि उसके भोसड़े का जल्दी छुटकारा हो.. आखिर उसकी चुत ने झरने के पानी को पवित्र कर ही दिया..
नहाते हुए पानी उछालते रेणुका शीला के करीब आई.. शीला के भीगे हुए पतले कॉटन ब्लाउस में दोनों स्तन एकदम तंग थे.. वो भी बिना ब्रा के.. रेणुका बस देखती ही रह गई.. शीला ने रेणुका के मुँह पर पानी उछालकर उसकी समाधि भंग की "क्या देख रही है यार!!"
रेणुका शर्मा गई.. फिर हिम्मत करते हुए वो शीला के करीब आई और धीमे से उसके कान में फुसफुसाई.. "बड़ी कातिल लग रही हो तुम शीला"
शीला के लिए अपनी तारीफ सुनना कोई नई बात नहीं थी.. पर फिर भी उसे सुनकर अच्छा लगा.. उसने रेणुका के चूतड़ों पर हाथ फेरते हुए कहा
"तू भी कुछ कम नहीं है रेणुका.. " दोनों कमर तक पानी के अंदर थी.. इसलिए उनकी हरकत सबकी आँखों से छुपी हुई थी.. सब अपनी मस्ती में मस्त थी.. शीला अभी भी रेणुका के कूल्हों से खेल रही थी.. और रेणुका भी मजे लेकर शीला के साथ अपनी दोस्ती को गाढ़ा करने में जुट गई।
दिन के उजाले में.. भरी दोपहर में.. शीला रेणुका के चूतड़ों के दरार में उंगली फेरते हुए अपने पासे फेंक रही थी
शीला: "ये बता रेणुका.. मेरे घर कब आओगी?"
रेणुका: "जब तुम बुलाओ.. मेरे वो ऑफिस के लिए निकले उसके बाद मैं फ्री होती हूँ.. तुम आ जाओ मेरे घर पर"
शीला: "जरूर आऊँगी.. पर पहले तुम मेरे घर आओ.. "
रेणुका: "अब बस भी करो शीला.. तुम्हारा हाथ जरूरत से कुछ ज्यादा ही आगे बढ़ गया है"
शीला की उँगलियाँ दरार से आगे निकल कर रेणुका की गांड के छेद तक पहुँच गई थी।
शीला: "क्यों तुम्हें अच्छा नहीं लगा?"
रेणुका: "अच्छा क्यों नहीं लगेगा भला.. !! पर आजू बाजू देखो तो सही.. सब यहाँ मौजूद है.. हम अकेले थोड़ी है"
शीला: "हाँ वो तो मैं भूल ही गई.. एक बात कहूँ.. तुम बहोत सुंदर हो रेणुका"
रेणुका: "जिसे कदर होनी चाहिए वो ही तारीफ ना करे तो ये सुंदरता किस काम की!!"
शीला: "ऐसा क्यों बोल रही है? तेरे पति तुझे प्यार नहीं करते क्या?"
रेणुका: "उन्हे टाइम ही कहाँ मिलता है.।!! बिजनेस से फुरसत मिले तो मुझे प्यार करे ना!! रात को देर से आकर टीवी देखते देखते सो जाते है.. कभी उनका मूड हो तब मैं थकी हुई रहती हूँ, इसलिए कुछ नहीं हो पाता.. अपने ही घर में हमारी जरूरतों को ही नजर अंदाज किया जा रहा है"
पीछे खड़ी अनुमौसी इन दोनों के संवाद को बड़े चाव से सुन रही थी.. उनसे रहा नहीं गया और बोल पड़ी
अनुमौसी: "शुरू शुरू में ये मर्द हमे सब कुछ सीखा सीखा कर बिगाड़ते है.. और फिर वही सब हम करना चाहे तो कहते है "कैसी गंदी गंदी चीजें करने को कह रही हो" अब बोलो.. क्या करें इनका.. "
रेणुका: "बिल्कुल सच कह रही हो मौसी.. मुझसे तो कहा भी नहीं जाता और सहा भी नहीं जाता.. बुरी फंसी हूँ मैं.. "
शीला: "मौसी मेरे पास इन सारी समस्याओं का हल है.. पर आप मेरे बारे में गलत सोचेगी ये सोचकर कुछ बोलती नहीं मैं"
अनुमौसी: "अरे शीला.. मैं क्यों तेरे बारे में गलत सोचूँगी.. !! तू भी मदन के बिना २ सालों से तड़प रही है.. मैं समझ सकती हूँ"
रेणुका: "क्या बात कर रही हो!! २ साल से अकेली है तू शीला?? बाप रे!! मुझे तो एक हफ्ता बीत जाएँ तो ऐसा लगता है जैसे सालों हो गयें..तुम तुम्हारी रातें अकेले कैसे बिताती हो??"
शीला: "ये सब बातें करके मेरा दिमाग खराब मत करो तुम सब.. चलो.. बहोत देर हो गई है.. कब तक नहाते रहेंगे!!"
रेणुका: "घर जाकर भी क्या करना है!! वहीं सब झाड़ू-पोंछा, सफाई, खाना पकाना.. और पति का इंतज़ार करना.. इससे अच्छा यहीं पानी में पड़े रहते है.. कम से कम नीचे ठंडक तो मिल रही है.. घर में तो दिमाग खराब हो जाता है मेरा!!"
रेणुका की आवाज का दर्द शीला महसूस कर सकती थी.. कमर तक डूबी हुई रेणुका का हाथ पकड़ लिया उसने.. पानी के अंदर किसी को ये नजर नहीं आ रहा था.. रेणुका का हाथ खींचकर शीला ने घाघरे के नीचे अपनी भोस पर रख दिया.. चुत का स्पर्श होते ही रेणुका स्तब्ध रह गई
रेणुका: "ये क्या कर रही हो शीला?? कुछ तो शर्म करो.. !!"
शीला: "मैं तुम्हें ये बताना चाहती हूँ की पानी में रहने से ये ठंडी नहीं होती.. देखो.. कैसे तप रही है!!"
अनुमौसी: "अरे नासपीटी शीला.. शर्म बेच खाई है क्या तूने!! कब सुधरेगी तू!!??"
शीला: "इसमें मैंने क्या गलत क्या मौसी? ये रेणुका बोल रही थी की पानी में रहने से नीचे ठंडक मिलती है.. कुछ ठंडक नहीं मिलती.. ठंडक के लिए कुछ जुगाड़ लगाना पड़ता है.. सिर्फ उँगलियाँ अंदर डालने से बच्चे पैदा नहीं होते.. जहां जिस चीज की जरूरत हो वहाँ वो ही चीज काम करती है.. समझे!!" तीनों एक दूसरे के करीब खड़े गुसपुस कर रही थी.. और साथ ही अपने जीवन के सबसे जटिल प्रश्न का हल ढूँढने का प्रयत्न कर रही थी
ड्राइवर के बार बार हॉर्न बजाने पर सारी औरतें बाहर निकली.. पेड़ के तने के पीछे जाकर कपड़े निचोड़कर सुखाए.. और फिर मज़ाक मस्ती करते हुए बस में बैठ गए.. अनुमौसी, रेणुका और शीला एक साथ बैठे थे। अनुमौसी कुछ कहना चाहती थी पर हिचक रही थी.. ऐसा लगा शीला को.. पर वो कुछ बोली नहीं.. रेणुका शीला के साथ अपनी दोस्ती को ओर घनिष्ठ करने लगी.. शीला भी रेणुका से करीब होती चली..
जब बस अनुमौसी के घर के बाहर आकर रुकी तब तक रेणुका और शीला अच्छी सहेलियाँ बन चुकी थी.. घर जाने से पहले रेणुका शीला के गले लगी और बोली "कल फोन करना मुझे.. भूल मत जाना.. " रेणुका के जिस्म की भूख शीला अच्छी तरह से महसूस कर पा रही थी
रात के ९ बज रहे थे..
अनुमौसी: "अब इतनी रात को तू अपने लिए कहाँ खाना बनाने बैठेगी!! आजा मेरे घर.. कविता ने खाना तैयार रखा हुआ है.. मेरे घर ही खा लेना.. "
शीला को थोड़ा सा संकोच जरूर हुआ पर वो अनुमौसी को मना नहीं कर पाई.. शीला को लेकर अनुमौसी अपने घर के अंदर पहुंची
"आइए शीला जी" गोल बिस्तर जैसे शरीर वाले, अनुमौसी के पति, चिमनलाल ने शीला का स्वागत किया.. टीवी देखते हुए वो खैनी चबा रहे थे
शीला के सुंदर शरीर ने जैसे ही घर में प्रवेश किया.. अनुमौसी का पूरा घर जगमगा उठा.. उस गदराए जिस्म को ताड़ते हुए चिमनलाल बाहर खैनी थूकने चले गए..
"ओहहों भाभी.. आप!! आइए आइए " पीयूष ने शीला के जिस्म को अपनी आँखों से ही सहलाते हुए कहा.. उसका बस चलता तो शीला को वहीं दबोचकर ऊपर से नीचे तक चूम लेता.. पीयूष के सामने देखकर शीला ऐसे मुस्कुराई के पीयूष के घुटने कमजोर हो गए.. रात का सीन याद आ गया उसे..
अनुमौसी बाथरूम में गए और कविता किचन में खाना तैयार करने में व्यस्त थी.. शीला ने दरवाजे के बाहर देखा तो चिमनलाल कहीं नजर नहीं आए.. ड्रॉइंगरूम में शीला और पीयूष अकेले ही थी.. एक ही पल में शीला ने पीयूष को अपनी तरफ खींचा और कस के चूम लिया.. शीला के इस अचानक आक्रमण से पीयूष के पसीने छूट गए.. शीला ने पेंट के ऊपर से पीयूष के लंड को मुठ्ठी में लेकर दबा दिया.. और पीयूष के डेटाबेज़ में अपना अकाउंट रीन्यू कर लिया.. पीयूष को तब होश आया जब कविता ने उसे किचन से आवाज दी.. घबराया हुआ पीयूष अपने आप को शीला की पकड़ से छुड़ाते हुए दौड़ कर अंदर चला गया
शीला मुसकुराते हुए अनुमौसी का इंतज़ार करते टीवी देखने लगी.. तभी अनुमौसी बाथरूम से आए..
थोड़ी देर में कविता ने किचन से आवाज लगाई "शीला भाभी.. कैसी हैं आप?"
शीला: "ठीक हूँ कविता.. पर तेरे जैसी ठीक तो नहीं हूँ.. तुम जवान लोगों के मजे है.. तकलीफ तो हम जैसे लोगों को ही है"
अनुमौसी ये सुनकर हंसने लगी..
दो थालियों में खाना परोसकर पीयूष बाहर लेकर आया.. और शीला की आँखों में देखते हुए थाली रखकर बोला "खाना खा लीजिए भाभी"
दोनों की आँखें आपस में नैन-मटक्का कर रही थी.. सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनकर अनुमौसी इस द्रश्य का मज़ा ले रही थी
अंदर किचन में रोटियाँ बेलते हुए कविता.. पिंटू के संग मल्टीप्लेक्स में उड़ाएं गुलछर्रे याद कर रही थी.. शीला ने जिस तरह दो दो लंड एक साथ पकड़कर हिलाए थे वो सीन याद करते हुए पीयूष भी उत्तेजित हो रहा था और शीला उस अनजान आदमी के लंड को याद करते हुए अपनी चुत खुजा रही थी..
तभी कविता किचन से थालियाँ और बाकी का खाना ले कर आई.. पीयूष शीला की बगल में बैठ गया.. कविता ने टेबल पर थाली रखने से पहले अपने पल्लू को छाती पर ठीक से दबाकर रखा.. वरना उसके झुकते ही जो द्रश्य दिखता उससे शीला की चुत व्याकुल हो जाती..
यहाँ वहाँ की बातें करते हुए सब खाना खाने लगे.. २० मिनट में सबने खा लिया था.. शीला गप्पे लड़ाते हुए थोड़ी देर बैठी रही.. और फिर उठते हुए बोली "मैं अब चलती हूँ मौसी.. पूरे दिन की थकान है.. नींद आ रही है मुझे"
अनुमौसी: "ठीक है शीला.. आते रहना.. "
पीयूष के सामने अपनी आँखें नचाते हुए शीला निकलने लगी.. किचन से कविता ने भी हाथ हिलाकर उन्हें "बाय" कहा.. घर से बाहर निकलते.. दरवाजे पर, अनुमौसी के पति चिमनलाल अंदर आ रहे थे.. शीला और चिमनलाल दोनों एक साथ टकरा गए.. शीला के बड़े बड़े भोंपू चिमनलाल की रुक्ष छाती से टकरा गए.. शीला शर्मा गए और वहाँ से भाग निकली.. चिमनलाल का लंड, शीला की मादक खुशबू सूंघते ही.. अंगड़ाई लेकर उठने लगा.. जैसे ५ साल के बाद कुंभकर्ण की निंद्रा टूटी हो!!
"साली.. मेरी वाली भी इसके जैसी करारी होती.. तो मज़ा ही आ जाता.. ये अनु तो कुछ करती ही नहीं है.. उसे देखकर तो उठा हुआ लंड भी लटक जाएँ" चिमनलाल सोचते सोचते घर के अंदर पहुंचे
चिमनलाल अपने बेडरूम के अंदर गए और बिस्तर पर लेट गए.. उनके पीछे पीछे अनुमौसी भी अंदर आई और बेडरूम का दरवाजा बंद कर लिया। जैसे ही उन्होंने अपने ब्लाउस के हुक खोले, उनके दोनों ढीले स्तन लटकने लगे.. देखकर चिमनलाल ने गहरी सांस छोड़ी.. एक तरफ वो शीला के बॉल.. और उसके मुकाबले ये अनु के दो पिचके हुए थन.. आह्ह शीला ने तो आज मुझे जवानी की याद दिला दी.. एक बार मिल जाएँ तो आज भी उसे पूरी रात चोदने की ताकत रखता हूँ.. पर इस अनु को तो देखकर ही मेरी सारी इच्छाएं खतम हो जाती है.. ८० के दशक का पुराना बजाज.. जो २५ बार किक मारने पर भी चालू न हो.. वैसा ही हाल है अनु का.. और बजाज को तो झुकाकर भी चालू कर सकते है.. पर इसका क्या करें?? अब जैसी मेरी किस्मत.. चिमनलाल सोचता रहा
शीला अपने घर पहुंचकर बिस्तर पर लेट गई "वो चिमनलाल जानबूझकर मुझसे टकराया था क्या!! रास्ता तो काफी चौड़ा था.. मेरा ध्यान नहीं था पर उन्हे तो नजर आ रहा था.. वो चाहता तो ये भिड़ंत नहीं होती.. लगता है बूढ़ा जानबूझकर ही टकराया था.. और उसके मुंह से खैनी की कितनी गंदी बदबू आ रही थी.. छीईईई.. "
सिनेमा हॉल में पीयूष के साथ बिताया समय याद करने लगी शीला "कितना हेंडसम है पीयूष!! उसके होंठ भी लाल लाल है.. मस्त चिकना है.. उसका लंड थोड़ा सा दमदार होता तो ओर मज़ा आ जाता" आगे एक विचार ये भी आया "तगड़े लंड की कमी पूरी करने के लिए रसिक और जीवा तो है ही.. "
जीवा के लंड की याद आते ही शीला सिहर उठी.. ये पीयूष का लंड तो जीवा के मुकाबले पतली सी पुंगी जैसा ही है.. हाय.. आज का पूरा दिन बिना चुदाई के ही बीत गया.. शीला ने अपनी भोस पर हाथ फेरा.. लंड तो तरह तरह के देखे.. पर जीवा और रघु जैसा लंड आजतक नहीं देखा था.. अपने गाउन की ऊपर की चैन खोलकर अपने एक स्तन बाहर निकाला शीला ने.. निप्पल पर थूक वाली उंगली लगाकर वो कल्पना करने लगी की जैसे पीयूष उसकी निप्पल को चूस रहा हो.. चूचक गीला होते ही शीला के दोनों स्तन कठोर होने लगे.. आज उसे अनुमौसी और रेणुका के नए स्वरूप के दर्शन हो गए यात्रा के दौरान.. अनुमौसी ने जब साड़ी उतारी.. तब उनके पेट की चर्बी क्या मस्त लटक रही थी.. और वो चम्पा मौसी की जांघें.. आहहाहहहहा.. रेणुका के चूतड़.. ईशशशश.. अपनी चुत को सहला रही शीला के चेहरे पर मुस्कान आ गई.. आज रेणुका की गांड के छेद तक हाथ पहुँच ही गया था.. उसने माना न किया होता तो बेशक गांड में उंगली घुसा देती शीला.. एक बार उस रेणुका की मदमस्त गांड पर चुत रगड़नी है.. आहहह.. ४४० वॉल्ट का झटका लगा शीला के भोसड़े में.. कुछ भी नया कामुक विचार दिमाग में आते ही उसकी चुत में आग लग जाती थी..
शीला की नजर घर में चारों तरफ घूमने लगी.. क्या करू? बिना लंड के अब रहा नहीं जाता.. उसने अपने कूल्हों के नीचे गोल तकिया रख दिया.. गाउन ऊपर किया.. और अपनी चिकनी खंभे जैसी जांघों पर हाथ फेरने लगी.. अभी कोई मर्द हाथ लगे तो उसे कच्चा चबा जाने का मन कर रहा था शीला का.. क्लिटोरिस पर हाथ थपथपाते वो दूसरे हाथ से अपनी चूचियाँ मसलने लगी..
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