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बाबुजी काफी देर ऐसे ही मेरे ऊपर लेटे रहे और मैं रोती रही. बाबुजी का लण्ड उसी तरह पूरा मेरी चूत में घुसा रहा.
बाबुजी मुझे प्यार से बोले
"सुषमा बेटी! सॉरी कि तुम्हे इतना दर्द हुआ. पर जितना दर्द होना था हो चूका. मेरा लौड़ा तुम्हारी चूत की लिए बड़ा है तो जब भी पहली बार अंदर जाता, तो दर्द तो होना ही था. इसलिए मैंने आज पूरा डाल ही दिया,अपने बाबुजी को माफ़ कर दो. हाथ लगा कर देख लो सारा लौड़ा चला गया है. तुम्हारी चूत ने पूरा ले लिया है अंदर. बस अब मजे ही मजे हैं. "
मैंने अपना हाथ नीचे ले जाकर चेक किया, बाबुजी का पूरा लौड़ा मेरी प्यारी चूत को पूरा फैला कर घुसा हुआ था. और बाबुजी के दोनों टट्टे (बॉल्स) मेरी गांड से ऐसे चिपके पड़े थे जैसे फेविकोल से चिपका दिए गए हों.
मैं भी कोई पहली बार तो चुदा नहीं रही थी, तो जानती थी की काम हो गया है. मेरी इतने दिनों की तपस्या सफल हो गयी है. भगवान् ने मुझे बाबुजी के लण्ड का प्रशाद दे दिया है. वो हो गया है जिस के लिए मैं (और बाबुजी भी) कब से तड़प रहे थे और कोशिश कर रहे थे. और आखिर मैं अपने बाबुजी से चुदवाने में कामयाब हो ही गयी थी.
धीरे धीरे मेरा रोना कम हो गया. बाबुजी जान रहे थे कि मेरा दर्द थोड़ा काबू में आ रहा है.
अब बाबुजी ने थोड़ा लण्ड बाहर खींच कर दोबारा डालना चाहा पर मेरी चूत तो दर्द के कारण सूख गयी थी.
बाबुजी ने लौड़ा बाहर कोशिश करी तो मेरी चूत बाबुजी के लण्ड से इस तरह चिपक गयी थी किं लण्ड के साथ मेरी चूत का मांस भी बाहर को आने लगा.
इससे मुझे फिर दर्द होने लगा और मैंने बाबुजी को कहा
"हाय बाबुजी बाहर नहीं निकालिये. अंदर ही रहने दीजिये। "
बाबुजी मेरी आँखों में देख कर मुस्कुराते बोले
"सुषमा! तुम भी अजीब हो. अभी रो रो कर चिल्ला रही थी कि बाबुजी बाहर निकाल लो अब निकाल रहा हूँ तो निकालने नहीं दे रही हो। "
मैं भी शरारत से मुस्कुराते बोली
"बाबुजी! मेरी मर्जी है. मैं चाहे निकालने को बोलू या अंदर डालने को. आप को क्या? मेरे घर में पहली बार यह मेहमान आया है. तो इतनी जल्दी क्या है. थोड़ी देर तो इसे अंदर रहने दो. "
बाबुजी भी हंस पड़े.
थोड़ी देर बाबुजी ऐसे ही पड़े रहे और मेरी छातियां चूसते रहे. अब मेरा दर्द काम हो गया था. मुम्मे चूसे जाने और दर्द ख़त्म हो जाने से मेरी चूत में फिर से गीलापन आ गया था. और मेरा मन कर रहा था कि अब बाबुजी चुदाई शुरू कर दें. पर बाबुजी थे की जैसे चुदाई भूल ही गए थे और ऐसे अपना लण्ड डालें पड़े थे जैसे उनका अपना लौड़ा नहीं बल्कि किसी और का लौड़ा उनकी बहुरानी की चूत में हो.
मैं परेशान हो रही थी. जल्दी से चुदाई करवाना चाहती थी. मैंने बाबुजी को कहा
"बाबुजी! बस भी कीजिये, अब कुछ करो ना, मैं मरी जा रही हूँ. अब रहा नहीं जाता. अपना काम चालू करो."
बाबुजी समझ रहे थे की चुदाई का समय आ गया है पर मुझे छेड़ते हुए बोले
"क्या करूँ बहुरानी? कुछ बताओगी तो ही कुछ करूंगा ना."
अब मैं एक बहु कैसे अपने ससुर को कहती कि बाबुजी अपनी बहुरानी की चुदाई शुरू कर दो. आखिर वो मेरे ससुर थे.
मैंने अपनी गांड ऊपर को धक्का देते हुए बाबुजी को इशारा किया, पर बाबुजी छेड़खानी के मूड में थे तो उसी तरह पड़े रहे और बोले
"सुषमा! क्या चाहती हो. मुंह से बोलो ना, मैं समझा नहीं. "
अब आखिर मैं बेशरम हो कर, पर आँखें मूँद कर बोल ही पड़ी
"बाबुजी! बहुत हो गया, अब और मत सताओ, बस जल्दी लण्ड को अंदर बाहर करना शुरू कर दो. चोद दो अपनी बहुरानी को बाबुजी, अब रहा नहीं जा रहा. जल्दी और जोर से चोदो अपनी सुषमा को."
बाबुजी मुस्कुरा पड़े और फिर मुझे छेड़ा
"सुषमा! अभी तो तुम कह रही थी कि मेरा मेहमान तुम्हारे अंदर आया है. तो बाहर न निकालो, अब अंदर बाहर करने को कह रही हो. "
मैं भी आँखें खोल कर बाबुजी को प्यार से छेड़ते हुए बोली
"मेरा शरीर है और मेरा घर है. मैं मेहमान को अंदर ही रखूँ या अंदर बाहर करुँ, आप को क्या? मेरी मर्जी है, मेहमान ने अंदर काफी देर आराम कर लिया है अब उसे कहो कि कुछ काम शुरू करे। "
बाबुजी भी मुस्कुरा पड़े.
बाबुजी ने भी अब देर करना उचित ना समझा और थोड़ा सा अपना लण्ड खींच कर फिर से अंदर धकेल दिया.
मुझे हल्का सा दर्द हुआ, मैंने अपनी आँखें बंद कर ली, बाबुजी मेरी हालत जानते थे, पर उन्होंने रुका नहीं और लगभग 2 इंच लौड़ा खींच कर जोर से दोबारा अंदर धकेल दिया. फिर लगभग 3 इंच लण्ड निकल कर डाला, मैं अपने दांत भींचे चुप चाप लेती रही. बाबुजी मेरी तरफ देखते हुए आँख के इशारे से हे पूछे क्या ठीक सो हो रहा है? और मैंने गर्दन ही हिला कर उन्हें चालू रहने का इशारा किया.
बाबुजी हर बार पिछली बार से थोड़ा सा अधिक लण्ड बाहर खींचते और जोर से अंदर ठोक देते, इस तरह करते करते थोड़ी ही देर में मेरी चूत में उनका पूरा लौड़ा आराम से अंदर बाहर हो रहा था. अब बाबुजी अपने लण्ड के टोपे तक लौड़े को बाहर निकाल लेते और फिर एक जोरदार धक्के से अंदर धकेल देते.
अब मेरी चूत में बहुत कम दर्द हो रहा था. जितना भी दर्द था वो सहन करने योग्य था, तो अब में भी आराम से चुदाई के मजे ले रही थी.
बाबुजी ने मेरी टांगें पूरी खोल ली और पूरी तेजी से चोदने लगे।
उनका लंड रेल के पिस्टन की तरह 100 की स्पीड से अंदर बाहर हो रहा. था. मुझे बहुत ही मजा आ रहा था.
मैं आनंद में सिसकियाँ ले रही थी और चिल्ला रही थी,
"बाबुजी! और जोर से करो, चोद दो बाबुजी अपनी बहुरानी को, जोर जोर से चोदो अपनी सुषमा को बाबुजी. फाड़ दो मेरी चूत को। बहुत प्यासी है यह बाबुजी, इस निगोड़ी ने मुझे बहुत परेशान किया है, टुकड़े टुकड़े कर दो मेरी चूत के आज। आह आह आह बाबुजी, चोद लो अपनी बहुरानी की प्यारी सी मुनिया. "
मुझे पता नहीं चल रह था की आनंद में मैं क्या क्या बोल रही थी. मेरे दिमाग में तो बस बाबुजी से चुदाई ही चल रही थी.
वो मेरे मम्मो पर झुक गए और उनको चूसने लगे। दूसरे हाथ से मम्मो को मसलने लगे। उन के ऐसा करने से मेरे जिस्म में मस्ती सी फैलने लगी। इधर मेरी चूत अंदर ही अंदर उनके लंड को ऐसा दबा रही थी जैसे उसका रस निकाल लेना चाहती हो। सच में अगर कोई लड़का, अनुभवहीन आदमी चुदाई कर रहा होता तो मेरी चूत की गर्मी से वो अब तक झड चुका होता।
लेकिन ये बाबुजी थे जो मेरी चूत की गर्मी को बर्दाश्त करते हुए अब तक टिके हुए थे। मेरी चूत से गरम गरम पानी निकल केर नीचे चादर को गीकर रहा था।
मैं अपनी कमर हिलाने लगी। मेरे मूह से कराह निकल रही थी । मुझे दर्द तो हो रहा था लेकिन इतना नहीं कि मैं बर्दाश्त न कर सकूं।
एक बार फिर बाबुजी मेरे मम्मो का रस निचोड़ने लगे। मुझे काफी राहत मिल रही थी। कुछ देर इंतजार के बाद उन्हें ने हल्के हल्के धक्के मारने शुरू कर दिए।
वो किसी भी लड़की को खुश करने में माहिर थे। एक मंझा हुआ खिलारी, जो चुदाई का लुत्फ ना सिर्फ खुद उठा रहा था बल्कि मुझे भी दे रहा था। आहिस्ता-आहिस्ता चुदाई करते हुए वो मेरे जिस्म को चूस रहे थे, मैं भी उन के सर के बालों में हाथ फेरते हुए आनंद ले रही थी, आहें भर रही थी।
मैंने अपने बाबुजी के पूरे चेहरे पर चुम्मो की बरसात कर दी। इस सारे वक्त में मेरी आंखें बंद थीं।
बाबुजी :- मजा आया बेटी?
मैं:- (सर हां मुझे हिला केर) ह्ह्ह्म्म्म्म....
बाबुजी :- तो आंखें खोल के बोलो ना...
मैं:- (ना मुझे सर हिला केर) उउन्नन्नहहुउउउ....
बाबुजी :- अब मैं इतना बुरा हूँ? कि तुम मुझे देखती भी नहीं.
मैं:- (फोरन आंखें खोल केर) खबरदार! ख़ुद को आइन्दा बुराँ नहीं कहना आप ने..आप तो मेरे सब से प्यारे बाबुजी हो.!
बाबुजी :- मुझे तो ऐसा ही लगा, क्यू कि के तुम ने अब तक अपनी आंखें बंद रखी थीं।
मैं:- अगर आप मुझे अच्छा ना लगे होते तो आप को अपना जिस्म जो मेरा सब से ज्यादा कीमती चीज है नहीं देती। आज के बाद ये बात अपने ज़ेहन में ना लाइयेगा.
बाबुजी :- तो आँखों से आँखें मिला के बोलो ना अपने बाबुजी को कि " चोदो ना मेरे बाबुजी ताकि बाबुजी को भी मजा आये।.
मैं:- मुझे शर्म आती है.
बाबुजी :- किस से? मुझसे?
मैं:- हां!
बाबुजी :- मुझसे कैसी शर्म। अब तो मैं तुम्हारी चूत में अपना पूरा लंड डाल कर चुदाई कर रहा हूँ। और तुमने तो खुद अपना हाथ से चेक करके देख लिया है कि सारा लौड़ा अंदर जा चूका है. तो अभी भी शर्म बाकि है क्या?.
मैं कुछ नहीं बोली.
बाबुजी :- अच्छा! अब मुझे समझ. जब तक मैं तुम्हारी चूत में अपना लंड पूरा डाल के धक्के नहीं मारता रहता, तब तक तुम्हारी शर्म पूरी तरह खत्म नहीं हो सकती।
मैं:- अब ऐसी बात नहीं है.
बाबुजी :- तो क्या पूरा लंड ना डालूँ?
मैं:- मैने ये भी तो नहीं कहा.
बाबुजी :- तो क्या करूँ न? बोलो....!
मैं:- (उन के कान में) मेरी चूत में अपना सारा तो डाल दिया है और अब और भी जो बाकि रह गया है वो भी कर लो कहीं कल आप यह ना कह सको कहो कि कुछ कसर रह गई। कि मेरी सुषमा ने मुझे इस ढंग से चोदने से मना कर दिया. जो करना है दिल खोल के कर लो।
मुझे खुद को पता नहीं कि ये लफ्ज कैसे मेरे मुंह से निकल गए शायद चुदाई का ही नतीजा था. । लेकिन इन का नतीज़ा ये हुआ के बाबुजी ज़ोर ओ शोर से मेरी चुदाई करने लगे। उन्होंने मेरी दोनों टांगें हवा में उठा के पूरी तरह से खोल दीया और अपना लंड मेरी चूत में अंदर बाहर होता देखने लगे ।
उन की इस तरह चुदाई से मैं दो बार झर चुकी थी। लेकिन इधर वो मजा से मेरी चूत मार रहे थे । उन के तेज़ धक्को से मेरे मम्मे हिल रहे थे। कभी वो उनसे खेलते तो कभी मेरी कमर पकड़ कर तेज़ झटके मारते।
इतनी देर और इतनी तेज चुदाई से तो मेरी चूत में जलन होने लगी। कुछ देर मैंने बर्दाश्त किया। लेकिन फिर मैं उनको रोकने की कोशिश करने लगी। तब उन्हें ने अपने धक्के रोके या मुझसे वजह पूछी। तो मैने उनको बता दिया.
बाबुजी :- बस इतनी सी बात? मुझे पहले बता देना था. इसका तो आसान सा इलाज है मेरे पास।
मैं:- वो क्या?
बाबुजी :- बस देखती जाओ।
ये कह कर बाबुजी ने अपना लंड बाहर निकाल लिया. और अपने लंड के सुपाडे को चूत के छेड़ पर रगड़ने लगे. मेरी चूत को थोड़ा आराम मिलने लगा। कुछ देर पहले तक मेरी चूत टाइट थी, उसका छेद भी छोटा सा था लेकिन अब उसका छेद कुछ बड़ा दिखायी दे रहा था। उसकी वजह थी बाबुजी का मूसल। जिस ने पता नहीं कितने अंदर तक मेरी चूत को खोल दिया था। मैं इन्ही ख्यालो में खोई हुई थी के बाबुजी के लंड से पेशाब की धार निकल कर मेरी चूत पर गिरने लगी। मुझे इस से दर्द होने लगा। जाहिर है जब एक जख्मी चुत पर नमकीन पानी डालेंगे तो क्या होगा ।
मेरी कराह सुनने के बावज़ूद बाबुजी नहीं रुके। बल्कि अब तो उन्होंने अपने लंड का सुपाड़ा मेरी चूत में फिट कर दिया और पेशाब करने लगे । मुझे बहुत अजीब लग रहा था. गरम गरम पेशाब मुझे अपने अंदर तक महसूस हो रहा था। कुछ ही देर में मेरी चूत पूरी तरह उन के पेशाब से भर गई। मेरे अंदर तक कुछ देर दर्द हो रहा था, लेकिन फिर हमें दर्द के ख़तम होने के बाद मुझे मजा आया।
मेने अपनी टांगें बाबुजी की कमर के गिर्द लपेट दी और उनको अपनी तरफ खींचने लगी। उनके लिए ये सिग्नल था कि वो दोबारा से मेरी चुदाई करें। और उन्होंने भी ऐसा ही किया. वो ताबड़ तोड़ धक्के लगा कर मेरी चूत को खोलने लगे. जब बाबुजी अपना लौड़ा बाहर को निकालते तो मेरी चूत से पेशाब भी बाहर निकलने लगता और जब बाबुजी फिर धक्का मार कर लौड़ा अंदर डालते तो पेशाब रुक जाता है। ये एक अजीब सी सनसनी थी, जिस को लफ़्ज़ों में नहीं बताया जा सकता। सिर्फ महसस ही कर सकते हैं.. मस्ती में एक बार फिर मेरी आंखें बंद हो गयी ।
कुछ देर बाद बाबुजी ने अपना लंड बाहर निकाला और मेरी चूत पर झुक गये। अभी भी उनका कुछ पेशाब मेरी चूत के अंदर था।
वो मेरी चूत के अंदर तक ज़बान डाल कर चाटने लगे । उनको इस बात से ज़रा भी फर्क नहीं पड़ता था कि उन्होंने ही थोड़ी देर पहले मेरी चूत में पेशाब किया था।
मेरी आंखें तो मजे से बंद थी और मैं नीम बेहोसी की हालत में थी,
फिर बाबुजी ने लण्ड बाहर निकाल लिया और मुझे खड़ा कर दिया और मेरी दोनों टांगों के नीचे से हाथ डाल कर मुझे अपनी गोद में उठा लिया।
और बाबुजी नीचे से ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाने लगे। इस पोजीशन में उन के धक्के का सब से ज्यादा असर मेरी चूत के दाने पर हो रहा था।
उन के धक्के की वजह से मेरी चूत बार बार पानी छोड़ रही थी। आप यकीन करें या ना करें, अगले 3 मिनट में झरने की कगार पर पहुँच गई।
उन की चुदाई से मेरी टांगें कांप रही थी, मेरा पूरा जिस्म ख़राब था। मैं बेहाल हो के उन की छाती पर गिर गई.
मेरे मुंह से आआह्ह्ह... निकल रही थी । इस पोजीशन में उनका लंड अपनी पूरी जड़ तक मेरी चूत में जा रहा था। वो इसी तरह मुझे उछालते हुए चोद रहे थे और मैं उनके गले में अपने बाज़ू डाले अपनी चूत में अंदर बाहर होते लंड को मजा ले रही थी। मेरी चूत का पानी नीचे बहता हुआ बाबुजी के लंड और उनकी गेंदों को गीला करता हुआ नीचे चादर पर गिर रहा था।
मेरे शरीर में अब अजीब ही हलचल होने लगी थी. मैं समझ गयी की मेरा काम होने वाला है.
मैंने बाबुजी के गले में डाली हुई अपनी बाहें कस ली और बाबुजी के कान में हौले से कहा
"बाबुजी! मुझे कुछ हो रहा है. मैं मर जाउंगी कुछ कीजिये ना. मुझे कुछ अलग सा लग रहा है. और साथ ही अपनी स्पीड भी तेज करें। "
बाबुजी अनुभवी थे तो समझ गए कि मेरा होने वाला ही है. खुद बाबुजी का भी स्खलन नजदीक ही था. तो बाबुजी ने फिर से मुझे बेड पर लिटा दिया पर लिटाते समय भी उन्होंने ध्यान रखा कि उनका लौड़ा मेरी चूत से निकल न जाये.
फिर बाबुजी ने जो स्पीड पकड़ी कि मैं आप सब को क्या बताऊं. इतनी जोर जोर से बाबुजी ने चोदना शुरू किया कि मेरी तो अंदर तक सारी नसें ही हिलने लगी.
मेरे मुंह से आह आह की आवाजें अपने आप निकल रही थी और मैं चिल्ला रही थी
"बाबुजी! तेज और तेज. बस मैं गयी अरे मेरे बाबुजी में मर गयी. बाबुजी चुद गयी आपकी बहुरानी अपने ससुर से. बाबुजी अपना माल डाल दो अपनी सुषमा के अंदर."
मैं बेख्याली में ना जाने क्या क्या बोल रही थी.
अचानक मैंने अपनी टाँगें अपने बाबुजी की पीठ पर जोर से कस ली और चिल्लाई
"बाबुजी! मैं गयी। मेरा हो गया बाबुजी। हे भगवान् हो गया मेरा."
और इसके साथ ही मेरी चूत ने अपना पवित्र पानी बाबुजी के लण्ड पर छोड़ना शुरू कर दिया.
बाबुजी के साथ यह मेरी पहली चुदाई थी तो मेरा इतना माल निकला कि मैं जैसे बेहोश ही हो गयी. मुझे कुछ भी होश न रहा बस अपने बाबुजी की बाँहों में झड़ती रही.
उधर बाबुजी के लण्ड पर जब मेरा पानी लगा तो बाबुजी के भी मुंह से एक चीख जैसी निकली और उन्होंने फटाफट 5 - 6 धक्के मार कर अपना लौड़ा मेरी चूत में अंदर तक घुसेड़ दिया. और बाबुजी का लौड़ा खुद ब खुद फूलने लगा और फिर उसके छेद से बाबुजी के वीर्य की पिचकारियां छूटने लगी.
बाबुजी ने पहली बार अपनी बहुरानी चोदी थी तो उनका इतना वीर्य निकला कि मेरी चूत भर गयी और इतना मोटा लौड़ा घुसा होने पर भी उनका गाढ़ा गाढ़ा माल मेरी चूत से बाहर आने लगा.
बाबुजी भी निढाल हो कर मेरे ऊपर ही गिर गए. हम दोनों अपनी पहली चुदाई से इतना थक गए थे कि काफी देर तक हम दोनों ससुर बहु एक दुसरे की बाँहों में लेटे रहे.
कुछ देर के बाद बाबुजी उठे और मुझे भी उठाया. हम दोनों बहुत खुश थे जैसे जीवन में कुबेर का खजाना मिल गया हो।
बाबुजी ने मुझे पूछा "सुषमा! मजा आया?"
मैं:- "बाबुजी बहुत मजा आया लेकिन अभी बहुत दर्द हो रहा है."
बाबुजी ने बोला "कोई बात नहीं. अभी तुम्हे दर्द की गोली ले दूंगा. सब ठीक हो जायेगा. पहली बार इतने हलब्बी लण्ड से चुदी हो ना तो दर्द तो होगा ही. अगली बार बहुत कम दर्द होगा और उसके बाद तो मजे ही मजे हैं. तुम्हे मेरे लौड़े की आदत जो हो जाएगी. "
फिर बाबुजी ने एक बार फिर से मुझे चूमा और एक आखिरी बार फिर से मेरी चूत को चाटा। फिर बाबुजी ने मुझे घुमा दिया और मेरी चूत को पीछे से भी चाटा।
अब चुदाई तो हो चुकी थी. अब सब हो जाने के बाद मुझे बाबुजी से शर्म जैसी आ रही थी.
चाहे हमने कुछ भी कर लिया था पर आखिर थे तो वो मेरे बाबुजी ही,, शायद बाबुजी का भी यही हालत थी,
बाबूजी मेरी चुदाई एक बार और करना चाहते थे पर मेरी चूत इतनी दर्द कर रही थी कि मेरी इच्छा होते हुए भी हिम्मत नहीं हो रही थी.
मेरे ससुर अनुभवी आदमी थे. उन्होंने भी दुबारा चोदने का नहीं कहा. और मुझे चूम कर अपने कमरे में चले गए.
हम दोनों को मालूम जो था कि अब हम ससुर बहु में यह जो प्यार का रिश्ता बन गया है यह चलता रहेगा.
मैं भी बाबूजी की चुदाई और प्यार के बारे में सोचती हुई सो गयी.
इस तरह मेरा अपने ससुर से सम्बन्ध बन गया है जो आज तक चल रहा है.
बाबुजी मुझे प्यार से बोले
"सुषमा बेटी! सॉरी कि तुम्हे इतना दर्द हुआ. पर जितना दर्द होना था हो चूका. मेरा लौड़ा तुम्हारी चूत की लिए बड़ा है तो जब भी पहली बार अंदर जाता, तो दर्द तो होना ही था. इसलिए मैंने आज पूरा डाल ही दिया,अपने बाबुजी को माफ़ कर दो. हाथ लगा कर देख लो सारा लौड़ा चला गया है. तुम्हारी चूत ने पूरा ले लिया है अंदर. बस अब मजे ही मजे हैं. "
मैंने अपना हाथ नीचे ले जाकर चेक किया, बाबुजी का पूरा लौड़ा मेरी प्यारी चूत को पूरा फैला कर घुसा हुआ था. और बाबुजी के दोनों टट्टे (बॉल्स) मेरी गांड से ऐसे चिपके पड़े थे जैसे फेविकोल से चिपका दिए गए हों.
मैं भी कोई पहली बार तो चुदा नहीं रही थी, तो जानती थी की काम हो गया है. मेरी इतने दिनों की तपस्या सफल हो गयी है. भगवान् ने मुझे बाबुजी के लण्ड का प्रशाद दे दिया है. वो हो गया है जिस के लिए मैं (और बाबुजी भी) कब से तड़प रहे थे और कोशिश कर रहे थे. और आखिर मैं अपने बाबुजी से चुदवाने में कामयाब हो ही गयी थी.
धीरे धीरे मेरा रोना कम हो गया. बाबुजी जान रहे थे कि मेरा दर्द थोड़ा काबू में आ रहा है.
अब बाबुजी ने थोड़ा लण्ड बाहर खींच कर दोबारा डालना चाहा पर मेरी चूत तो दर्द के कारण सूख गयी थी.
बाबुजी ने लौड़ा बाहर कोशिश करी तो मेरी चूत बाबुजी के लण्ड से इस तरह चिपक गयी थी किं लण्ड के साथ मेरी चूत का मांस भी बाहर को आने लगा.
इससे मुझे फिर दर्द होने लगा और मैंने बाबुजी को कहा
"हाय बाबुजी बाहर नहीं निकालिये. अंदर ही रहने दीजिये। "
बाबुजी मेरी आँखों में देख कर मुस्कुराते बोले
"सुषमा! तुम भी अजीब हो. अभी रो रो कर चिल्ला रही थी कि बाबुजी बाहर निकाल लो अब निकाल रहा हूँ तो निकालने नहीं दे रही हो। "
मैं भी शरारत से मुस्कुराते बोली
"बाबुजी! मेरी मर्जी है. मैं चाहे निकालने को बोलू या अंदर डालने को. आप को क्या? मेरे घर में पहली बार यह मेहमान आया है. तो इतनी जल्दी क्या है. थोड़ी देर तो इसे अंदर रहने दो. "
बाबुजी भी हंस पड़े.
थोड़ी देर बाबुजी ऐसे ही पड़े रहे और मेरी छातियां चूसते रहे. अब मेरा दर्द काम हो गया था. मुम्मे चूसे जाने और दर्द ख़त्म हो जाने से मेरी चूत में फिर से गीलापन आ गया था. और मेरा मन कर रहा था कि अब बाबुजी चुदाई शुरू कर दें. पर बाबुजी थे की जैसे चुदाई भूल ही गए थे और ऐसे अपना लण्ड डालें पड़े थे जैसे उनका अपना लौड़ा नहीं बल्कि किसी और का लौड़ा उनकी बहुरानी की चूत में हो.
मैं परेशान हो रही थी. जल्दी से चुदाई करवाना चाहती थी. मैंने बाबुजी को कहा
"बाबुजी! बस भी कीजिये, अब कुछ करो ना, मैं मरी जा रही हूँ. अब रहा नहीं जाता. अपना काम चालू करो."
बाबुजी समझ रहे थे की चुदाई का समय आ गया है पर मुझे छेड़ते हुए बोले
"क्या करूँ बहुरानी? कुछ बताओगी तो ही कुछ करूंगा ना."
अब मैं एक बहु कैसे अपने ससुर को कहती कि बाबुजी अपनी बहुरानी की चुदाई शुरू कर दो. आखिर वो मेरे ससुर थे.
मैंने अपनी गांड ऊपर को धक्का देते हुए बाबुजी को इशारा किया, पर बाबुजी छेड़खानी के मूड में थे तो उसी तरह पड़े रहे और बोले
"सुषमा! क्या चाहती हो. मुंह से बोलो ना, मैं समझा नहीं. "
अब आखिर मैं बेशरम हो कर, पर आँखें मूँद कर बोल ही पड़ी
"बाबुजी! बहुत हो गया, अब और मत सताओ, बस जल्दी लण्ड को अंदर बाहर करना शुरू कर दो. चोद दो अपनी बहुरानी को बाबुजी, अब रहा नहीं जा रहा. जल्दी और जोर से चोदो अपनी सुषमा को."
बाबुजी मुस्कुरा पड़े और फिर मुझे छेड़ा
"सुषमा! अभी तो तुम कह रही थी कि मेरा मेहमान तुम्हारे अंदर आया है. तो बाहर न निकालो, अब अंदर बाहर करने को कह रही हो. "
मैं भी आँखें खोल कर बाबुजी को प्यार से छेड़ते हुए बोली
"मेरा शरीर है और मेरा घर है. मैं मेहमान को अंदर ही रखूँ या अंदर बाहर करुँ, आप को क्या? मेरी मर्जी है, मेहमान ने अंदर काफी देर आराम कर लिया है अब उसे कहो कि कुछ काम शुरू करे। "
बाबुजी भी मुस्कुरा पड़े.
बाबुजी ने भी अब देर करना उचित ना समझा और थोड़ा सा अपना लण्ड खींच कर फिर से अंदर धकेल दिया.
मुझे हल्का सा दर्द हुआ, मैंने अपनी आँखें बंद कर ली, बाबुजी मेरी हालत जानते थे, पर उन्होंने रुका नहीं और लगभग 2 इंच लौड़ा खींच कर जोर से दोबारा अंदर धकेल दिया. फिर लगभग 3 इंच लण्ड निकल कर डाला, मैं अपने दांत भींचे चुप चाप लेती रही. बाबुजी मेरी तरफ देखते हुए आँख के इशारे से हे पूछे क्या ठीक सो हो रहा है? और मैंने गर्दन ही हिला कर उन्हें चालू रहने का इशारा किया.
बाबुजी हर बार पिछली बार से थोड़ा सा अधिक लण्ड बाहर खींचते और जोर से अंदर ठोक देते, इस तरह करते करते थोड़ी ही देर में मेरी चूत में उनका पूरा लौड़ा आराम से अंदर बाहर हो रहा था. अब बाबुजी अपने लण्ड के टोपे तक लौड़े को बाहर निकाल लेते और फिर एक जोरदार धक्के से अंदर धकेल देते.
अब मेरी चूत में बहुत कम दर्द हो रहा था. जितना भी दर्द था वो सहन करने योग्य था, तो अब में भी आराम से चुदाई के मजे ले रही थी.
बाबुजी ने मेरी टांगें पूरी खोल ली और पूरी तेजी से चोदने लगे।
उनका लंड रेल के पिस्टन की तरह 100 की स्पीड से अंदर बाहर हो रहा. था. मुझे बहुत ही मजा आ रहा था.
मैं आनंद में सिसकियाँ ले रही थी और चिल्ला रही थी,
"बाबुजी! और जोर से करो, चोद दो बाबुजी अपनी बहुरानी को, जोर जोर से चोदो अपनी सुषमा को बाबुजी. फाड़ दो मेरी चूत को। बहुत प्यासी है यह बाबुजी, इस निगोड़ी ने मुझे बहुत परेशान किया है, टुकड़े टुकड़े कर दो मेरी चूत के आज। आह आह आह बाबुजी, चोद लो अपनी बहुरानी की प्यारी सी मुनिया. "
मुझे पता नहीं चल रह था की आनंद में मैं क्या क्या बोल रही थी. मेरे दिमाग में तो बस बाबुजी से चुदाई ही चल रही थी.
वो मेरे मम्मो पर झुक गए और उनको चूसने लगे। दूसरे हाथ से मम्मो को मसलने लगे। उन के ऐसा करने से मेरे जिस्म में मस्ती सी फैलने लगी। इधर मेरी चूत अंदर ही अंदर उनके लंड को ऐसा दबा रही थी जैसे उसका रस निकाल लेना चाहती हो। सच में अगर कोई लड़का, अनुभवहीन आदमी चुदाई कर रहा होता तो मेरी चूत की गर्मी से वो अब तक झड चुका होता।
लेकिन ये बाबुजी थे जो मेरी चूत की गर्मी को बर्दाश्त करते हुए अब तक टिके हुए थे। मेरी चूत से गरम गरम पानी निकल केर नीचे चादर को गीकर रहा था।
मैं अपनी कमर हिलाने लगी। मेरे मूह से कराह निकल रही थी । मुझे दर्द तो हो रहा था लेकिन इतना नहीं कि मैं बर्दाश्त न कर सकूं।
एक बार फिर बाबुजी मेरे मम्मो का रस निचोड़ने लगे। मुझे काफी राहत मिल रही थी। कुछ देर इंतजार के बाद उन्हें ने हल्के हल्के धक्के मारने शुरू कर दिए।
वो किसी भी लड़की को खुश करने में माहिर थे। एक मंझा हुआ खिलारी, जो चुदाई का लुत्फ ना सिर्फ खुद उठा रहा था बल्कि मुझे भी दे रहा था। आहिस्ता-आहिस्ता चुदाई करते हुए वो मेरे जिस्म को चूस रहे थे, मैं भी उन के सर के बालों में हाथ फेरते हुए आनंद ले रही थी, आहें भर रही थी।
मैंने अपने बाबुजी के पूरे चेहरे पर चुम्मो की बरसात कर दी। इस सारे वक्त में मेरी आंखें बंद थीं।
बाबुजी :- मजा आया बेटी?
मैं:- (सर हां मुझे हिला केर) ह्ह्ह्म्म्म्म....
बाबुजी :- तो आंखें खोल के बोलो ना...
मैं:- (ना मुझे सर हिला केर) उउन्नन्नहहुउउउ....
बाबुजी :- अब मैं इतना बुरा हूँ? कि तुम मुझे देखती भी नहीं.
मैं:- (फोरन आंखें खोल केर) खबरदार! ख़ुद को आइन्दा बुराँ नहीं कहना आप ने..आप तो मेरे सब से प्यारे बाबुजी हो.!
बाबुजी :- मुझे तो ऐसा ही लगा, क्यू कि के तुम ने अब तक अपनी आंखें बंद रखी थीं।
मैं:- अगर आप मुझे अच्छा ना लगे होते तो आप को अपना जिस्म जो मेरा सब से ज्यादा कीमती चीज है नहीं देती। आज के बाद ये बात अपने ज़ेहन में ना लाइयेगा.
बाबुजी :- तो आँखों से आँखें मिला के बोलो ना अपने बाबुजी को कि " चोदो ना मेरे बाबुजी ताकि बाबुजी को भी मजा आये।.
मैं:- मुझे शर्म आती है.
बाबुजी :- किस से? मुझसे?
मैं:- हां!
बाबुजी :- मुझसे कैसी शर्म। अब तो मैं तुम्हारी चूत में अपना पूरा लंड डाल कर चुदाई कर रहा हूँ। और तुमने तो खुद अपना हाथ से चेक करके देख लिया है कि सारा लौड़ा अंदर जा चूका है. तो अभी भी शर्म बाकि है क्या?.
मैं कुछ नहीं बोली.
बाबुजी :- अच्छा! अब मुझे समझ. जब तक मैं तुम्हारी चूत में अपना लंड पूरा डाल के धक्के नहीं मारता रहता, तब तक तुम्हारी शर्म पूरी तरह खत्म नहीं हो सकती।
मैं:- अब ऐसी बात नहीं है.
बाबुजी :- तो क्या पूरा लंड ना डालूँ?
मैं:- मैने ये भी तो नहीं कहा.
बाबुजी :- तो क्या करूँ न? बोलो....!
मैं:- (उन के कान में) मेरी चूत में अपना सारा तो डाल दिया है और अब और भी जो बाकि रह गया है वो भी कर लो कहीं कल आप यह ना कह सको कहो कि कुछ कसर रह गई। कि मेरी सुषमा ने मुझे इस ढंग से चोदने से मना कर दिया. जो करना है दिल खोल के कर लो।
मुझे खुद को पता नहीं कि ये लफ्ज कैसे मेरे मुंह से निकल गए शायद चुदाई का ही नतीजा था. । लेकिन इन का नतीज़ा ये हुआ के बाबुजी ज़ोर ओ शोर से मेरी चुदाई करने लगे। उन्होंने मेरी दोनों टांगें हवा में उठा के पूरी तरह से खोल दीया और अपना लंड मेरी चूत में अंदर बाहर होता देखने लगे ।
उन की इस तरह चुदाई से मैं दो बार झर चुकी थी। लेकिन इधर वो मजा से मेरी चूत मार रहे थे । उन के तेज़ धक्को से मेरे मम्मे हिल रहे थे। कभी वो उनसे खेलते तो कभी मेरी कमर पकड़ कर तेज़ झटके मारते।
इतनी देर और इतनी तेज चुदाई से तो मेरी चूत में जलन होने लगी। कुछ देर मैंने बर्दाश्त किया। लेकिन फिर मैं उनको रोकने की कोशिश करने लगी। तब उन्हें ने अपने धक्के रोके या मुझसे वजह पूछी। तो मैने उनको बता दिया.
बाबुजी :- बस इतनी सी बात? मुझे पहले बता देना था. इसका तो आसान सा इलाज है मेरे पास।
मैं:- वो क्या?
बाबुजी :- बस देखती जाओ।
ये कह कर बाबुजी ने अपना लंड बाहर निकाल लिया. और अपने लंड के सुपाडे को चूत के छेड़ पर रगड़ने लगे. मेरी चूत को थोड़ा आराम मिलने लगा। कुछ देर पहले तक मेरी चूत टाइट थी, उसका छेद भी छोटा सा था लेकिन अब उसका छेद कुछ बड़ा दिखायी दे रहा था। उसकी वजह थी बाबुजी का मूसल। जिस ने पता नहीं कितने अंदर तक मेरी चूत को खोल दिया था। मैं इन्ही ख्यालो में खोई हुई थी के बाबुजी के लंड से पेशाब की धार निकल कर मेरी चूत पर गिरने लगी। मुझे इस से दर्द होने लगा। जाहिर है जब एक जख्मी चुत पर नमकीन पानी डालेंगे तो क्या होगा ।
मेरी कराह सुनने के बावज़ूद बाबुजी नहीं रुके। बल्कि अब तो उन्होंने अपने लंड का सुपाड़ा मेरी चूत में फिट कर दिया और पेशाब करने लगे । मुझे बहुत अजीब लग रहा था. गरम गरम पेशाब मुझे अपने अंदर तक महसूस हो रहा था। कुछ ही देर में मेरी चूत पूरी तरह उन के पेशाब से भर गई। मेरे अंदर तक कुछ देर दर्द हो रहा था, लेकिन फिर हमें दर्द के ख़तम होने के बाद मुझे मजा आया।
मेने अपनी टांगें बाबुजी की कमर के गिर्द लपेट दी और उनको अपनी तरफ खींचने लगी। उनके लिए ये सिग्नल था कि वो दोबारा से मेरी चुदाई करें। और उन्होंने भी ऐसा ही किया. वो ताबड़ तोड़ धक्के लगा कर मेरी चूत को खोलने लगे. जब बाबुजी अपना लौड़ा बाहर को निकालते तो मेरी चूत से पेशाब भी बाहर निकलने लगता और जब बाबुजी फिर धक्का मार कर लौड़ा अंदर डालते तो पेशाब रुक जाता है। ये एक अजीब सी सनसनी थी, जिस को लफ़्ज़ों में नहीं बताया जा सकता। सिर्फ महसस ही कर सकते हैं.. मस्ती में एक बार फिर मेरी आंखें बंद हो गयी ।
कुछ देर बाद बाबुजी ने अपना लंड बाहर निकाला और मेरी चूत पर झुक गये। अभी भी उनका कुछ पेशाब मेरी चूत के अंदर था।
वो मेरी चूत के अंदर तक ज़बान डाल कर चाटने लगे । उनको इस बात से ज़रा भी फर्क नहीं पड़ता था कि उन्होंने ही थोड़ी देर पहले मेरी चूत में पेशाब किया था।
मेरी आंखें तो मजे से बंद थी और मैं नीम बेहोसी की हालत में थी,
फिर बाबुजी ने लण्ड बाहर निकाल लिया और मुझे खड़ा कर दिया और मेरी दोनों टांगों के नीचे से हाथ डाल कर मुझे अपनी गोद में उठा लिया।
और बाबुजी नीचे से ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाने लगे। इस पोजीशन में उन के धक्के का सब से ज्यादा असर मेरी चूत के दाने पर हो रहा था।
उन के धक्के की वजह से मेरी चूत बार बार पानी छोड़ रही थी। आप यकीन करें या ना करें, अगले 3 मिनट में झरने की कगार पर पहुँच गई।
उन की चुदाई से मेरी टांगें कांप रही थी, मेरा पूरा जिस्म ख़राब था। मैं बेहाल हो के उन की छाती पर गिर गई.
मेरे मुंह से आआह्ह्ह... निकल रही थी । इस पोजीशन में उनका लंड अपनी पूरी जड़ तक मेरी चूत में जा रहा था। वो इसी तरह मुझे उछालते हुए चोद रहे थे और मैं उनके गले में अपने बाज़ू डाले अपनी चूत में अंदर बाहर होते लंड को मजा ले रही थी। मेरी चूत का पानी नीचे बहता हुआ बाबुजी के लंड और उनकी गेंदों को गीला करता हुआ नीचे चादर पर गिर रहा था।
मेरे शरीर में अब अजीब ही हलचल होने लगी थी. मैं समझ गयी की मेरा काम होने वाला है.
मैंने बाबुजी के गले में डाली हुई अपनी बाहें कस ली और बाबुजी के कान में हौले से कहा
"बाबुजी! मुझे कुछ हो रहा है. मैं मर जाउंगी कुछ कीजिये ना. मुझे कुछ अलग सा लग रहा है. और साथ ही अपनी स्पीड भी तेज करें। "
बाबुजी अनुभवी थे तो समझ गए कि मेरा होने वाला ही है. खुद बाबुजी का भी स्खलन नजदीक ही था. तो बाबुजी ने फिर से मुझे बेड पर लिटा दिया पर लिटाते समय भी उन्होंने ध्यान रखा कि उनका लौड़ा मेरी चूत से निकल न जाये.
फिर बाबुजी ने जो स्पीड पकड़ी कि मैं आप सब को क्या बताऊं. इतनी जोर जोर से बाबुजी ने चोदना शुरू किया कि मेरी तो अंदर तक सारी नसें ही हिलने लगी.
मेरे मुंह से आह आह की आवाजें अपने आप निकल रही थी और मैं चिल्ला रही थी
"बाबुजी! तेज और तेज. बस मैं गयी अरे मेरे बाबुजी में मर गयी. बाबुजी चुद गयी आपकी बहुरानी अपने ससुर से. बाबुजी अपना माल डाल दो अपनी सुषमा के अंदर."
मैं बेख्याली में ना जाने क्या क्या बोल रही थी.
अचानक मैंने अपनी टाँगें अपने बाबुजी की पीठ पर जोर से कस ली और चिल्लाई
"बाबुजी! मैं गयी। मेरा हो गया बाबुजी। हे भगवान् हो गया मेरा."
और इसके साथ ही मेरी चूत ने अपना पवित्र पानी बाबुजी के लण्ड पर छोड़ना शुरू कर दिया.
बाबुजी के साथ यह मेरी पहली चुदाई थी तो मेरा इतना माल निकला कि मैं जैसे बेहोश ही हो गयी. मुझे कुछ भी होश न रहा बस अपने बाबुजी की बाँहों में झड़ती रही.
उधर बाबुजी के लण्ड पर जब मेरा पानी लगा तो बाबुजी के भी मुंह से एक चीख जैसी निकली और उन्होंने फटाफट 5 - 6 धक्के मार कर अपना लौड़ा मेरी चूत में अंदर तक घुसेड़ दिया. और बाबुजी का लौड़ा खुद ब खुद फूलने लगा और फिर उसके छेद से बाबुजी के वीर्य की पिचकारियां छूटने लगी.
बाबुजी ने पहली बार अपनी बहुरानी चोदी थी तो उनका इतना वीर्य निकला कि मेरी चूत भर गयी और इतना मोटा लौड़ा घुसा होने पर भी उनका गाढ़ा गाढ़ा माल मेरी चूत से बाहर आने लगा.
बाबुजी भी निढाल हो कर मेरे ऊपर ही गिर गए. हम दोनों अपनी पहली चुदाई से इतना थक गए थे कि काफी देर तक हम दोनों ससुर बहु एक दुसरे की बाँहों में लेटे रहे.
कुछ देर के बाद बाबुजी उठे और मुझे भी उठाया. हम दोनों बहुत खुश थे जैसे जीवन में कुबेर का खजाना मिल गया हो।
बाबुजी ने मुझे पूछा "सुषमा! मजा आया?"
मैं:- "बाबुजी बहुत मजा आया लेकिन अभी बहुत दर्द हो रहा है."
बाबुजी ने बोला "कोई बात नहीं. अभी तुम्हे दर्द की गोली ले दूंगा. सब ठीक हो जायेगा. पहली बार इतने हलब्बी लण्ड से चुदी हो ना तो दर्द तो होगा ही. अगली बार बहुत कम दर्द होगा और उसके बाद तो मजे ही मजे हैं. तुम्हे मेरे लौड़े की आदत जो हो जाएगी. "
फिर बाबुजी ने एक बार फिर से मुझे चूमा और एक आखिरी बार फिर से मेरी चूत को चाटा। फिर बाबुजी ने मुझे घुमा दिया और मेरी चूत को पीछे से भी चाटा।
अब चुदाई तो हो चुकी थी. अब सब हो जाने के बाद मुझे बाबुजी से शर्म जैसी आ रही थी.
चाहे हमने कुछ भी कर लिया था पर आखिर थे तो वो मेरे बाबुजी ही,, शायद बाबुजी का भी यही हालत थी,
बाबूजी मेरी चुदाई एक बार और करना चाहते थे पर मेरी चूत इतनी दर्द कर रही थी कि मेरी इच्छा होते हुए भी हिम्मत नहीं हो रही थी.
मेरे ससुर अनुभवी आदमी थे. उन्होंने भी दुबारा चोदने का नहीं कहा. और मुझे चूम कर अपने कमरे में चले गए.
हम दोनों को मालूम जो था कि अब हम ससुर बहु में यह जो प्यार का रिश्ता बन गया है यह चलता रहेगा.
मैं भी बाबूजी की चुदाई और प्यार के बारे में सोचती हुई सो गयी.
इस तरह मेरा अपने ससुर से सम्बन्ध बन गया है जो आज तक चल रहा है.