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कड़क मर्द देखते ही चूत मचलने लगती है-1

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(Kadak Mard Dekh Kar Meri Chut Machalne Lagti Hai-1)

प्रेषिका : किरण
प्रणाम पाठको, मैं सब की तरह HotSexStory.xyz की बहुत बड़ी फैन हूँ। मेरी उम्र छबीस साल है। एक शादीशुदा चुदक्कड़ औरत हूँ और शादी से पहले स्कूल और फिर कॉलेज की एक चुदक्कड़ 'माल' रही हूँ।
मुझे चुदाई बेहद पसन्द है। मैं चुदाई बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकती। मैंने कई तरीके के लंड डलवाए, चूसे और चाटे हैं, लेकिन जब बारी आई मुझे लाईसेंस प्राप्त लंड मिलने की.. तो रब ने मेरे साथ अन्याय किया।

मेरे पति का लंड ना बड़ा था ना मोटा था और वो ना ही चुदाई से पहले खुलकर खेल खेलते। बस पहली रात जब उन्होने शुरुआत की थी तो मुझे पूरी-पूरी उम्मीद थी कि मुझे सही बंदा मिल गया है।
लेकिन धीरे-धीरे उनका जोश सामान्य होने लगा था। उनके पास काफी पैसा था लेकिन एक औरत को पैसे के अलावा ऐसा मर्द चाहिए होता है, जो दिन भर की थकान को उतार कर औरत को फूल जैसी हल्की करके ही सुलाए। लेकिन हाय..! मुझे कहाँ नसीब था यह कि पति मसल कर हल्की करके, मुझे नंगी अपनी बाँहों में सुलाए।

मैंने कई बार कुछ सोचा था। पहली रात आई पति देखने में ठीक-ठाक थे।
मैं रात को ग्यारह बजे के करीब रूम में बैठी हुई थी। वो कमरे में आए, दरवाज़ा बंद किया, मुझे देखा मुस्कुरा कर, मैंने चेहरा झुका लिया। मुझे एक डर था कहीं शादी की पहले की गलतियाँ पकड़ी ना जाएँ।
वे लाईट बंद करके मेरे करीब बैड पर बैठे- कैसी हो जान. इंतज़ार कर रही थी..!
मैंने चुप्पी साधी रखी।
वे मेरे होंठ को धीरे-धीरे चूमने लगे- बोलो न जान.. खाना नहीं खाया क्या..!

अब क्या कहूँ उन्हें.. खैर फिर उन्होंने ही चोली की डोरी खींची, हाथों से अलग किया।
काली ब्रा में मेरा दूध सा सफ़ेद रंग का चिकना पेट.. उन्होने मेरे पेट को चूमा। पहले तो लहंगे में हाथ घुसा दिया, फिर लहंगे को खोल दिया।
मैं बड़ी खुश थी कि शायद जो मर्द मुझे चाहिए था, मिल गया। मैंने शर्म का खूब नाटक किया।
इन्होंने मुझे पलटा और मेरे चूतड़ों पर हाथ फेरा, मेरे ऊपर लेट गए।

मुझे कुछ हार्ड-हार्ड चीज़ फील हुई, मैं खुश थी कि लंड खड़ा था, हाय घुस जाए.. जल्दी से.. लेकिन मैं वैसा कुछ नहीं कर पा रही थी। यह कहानी आप HotSexStory.xyz पर पढ़ रहे हैं !
अचानक पैंटी के ऊपर से मेरी चूत पर हाथ फेरा, मुझको आग लगा डाली और जांघें सहलाने लगे, मेरी ब्रा खोल डाली, मेरे सेक्सी सोफ्ट-सोफ्ट बेहद उत्तेजक बड़े-बड़े मम्मे नंगे हो गए। वो दबाने लगे।

कई हाथों से दब चुके थे मेरे मम्मे..। अब नहीं रहा गया, मैंने भी धीरे से उनकी उसकी तरफ हाथ बढ़ाया। उससे पहले ही वे खड़े हुए, अपना पजामा उतार दिया और अंडरवियर भी उतार दिया। मेरा हाथ अपने लंड पर रख दिया। मैंने आंखें बंद कर रखी थीं।
"लो पकड़ो.. मेरी जान.. सहलाओ।"
मेरा दिल सा टूट गया, मैंने आंखें खोलीं। तोंद निकली हुई थी। नीचे छोटा 'पुच्चू' सा लंड था।
"सहलाओ मेरी जान.."

और फिर मेरी टांगें खोलने लगे, वो लंड घुसाना चाहते थे। मैंने भी रास्ता दे दिया और उन्होने अपना लंड घुसा दिया और चोदने लगे। मैंने उनका साथ दिया 'आहें' भर-भर कर चुदवाया और पांच मिनट में लुड़क गए, हांफने लगे, लेट गए..।
मैं आधी अधूरी सी उनके बगल में लेट गई और नाईटी पहन ली। बस रोज़ ऐसे होता अब तो वो चूमते-चामते भी कम थे। निकाला और डालते.. हिलाते.. निकालते.. धुस्स.. और सो जाते थे।
खैर ऐसे समय बीता, एक दिन इनके मौसा जी ने हमें खाने पर बुलाया। वो अकेले रहते थे, मौसी कनाडा में बेटे के पास रहती थीं।
मौसा जी ने खुद को खूब मेंटेन कर रखा था।

मैंने खुले गले का सूट, ऊपर से कसा हुआ था, पहन लिया। मेरा क्लीवेज बेहद कामुक नजर आ रही थी।
वो अकेले थे इसलिए मैं खुद सब सर्व कर रही थी, सब होटल से मंगवाया था।
मैंने नोट किया मौसा जी की तिरछी नजर मेरे वक्ष पर थी। उधर पटियाला सलवार में मेरे चूतड़ उभर कर सेक्सी दिख रहे थे।
मौसा जी बोले- तुम टी.वी. देखो, हम थोड़ी महफ़िल सजा लें।

दोनों दारु पीने लगे। मैं उनको कुछ न कुछ देने तो जाती ही जाती थी। मौसा जी की तिरछी नज़र ने मेरे जिस्म में भी कुछ पल के लिए हलचल की थी।
मेरे देवता जी जल्दी टल्ली होते थे।
तभी मुझे माँ का फ़ोन आया, मैं सुनने के लिए बाहर पोर्च में खड़ी बात कर रही थी, तभी किसी ने पीछे से मेरी उभरी गांड को सहलाया। मैं चौंकी और घूमी.. सीधी मेरी कड़क छाती.. मौसा जी के सीने से सट गई।
वे बोले- सॉरी.. सॉरी.. हमने सोचा ना जाने तू कहाँ चली गई। चलो खाना खाते हैं, तेरे पति को काफी हो गई है।
"बस अभी आती हूँ मौसा जी।"

उन्होंने बेहद ललचाई नज़रों से मुझे देखा और बोले- अगर कहो तो यहीं कुछ खिला दूँ !
मैं कुछ नहीं बोल पाई और अन्दर चली गई सोफे पर बैठे बैठे ही मेरे देवता जी झूल रहे थे।
मैं रसोई में गई और माइक्रोवेव में सब्जी वगैरह गर्म करने लगी।
मौसा जी फिर से आए, बोले- चलो मैं मदद कर देता हूँ।
मैंने कुछ नहीं कहा, जहाँ मैं खड़ी थी वो वहीं ऊपर से डिब्बा उतारने के लिए बढ़े, तो उनका निशाना शायद मेरी गांड थी। बहाने से उनका लंड वहाँ मुझे छूने लगा। मुझे अजीब सा सुख मिला। उनका लंड काफी कड़क था। मदद के बहाने कई बार मुझे जगह-जगह पर हाथ लगाया।
बोले- तुम कितनी गुणी और खूबसूरत हो, तुझे तो कोई हैण्डसम लड़का मिलना चाहिए था। कहाँ यहाँ आकर बंध सी गई हो !
मैंने कहा- छोड़िये मौसा जी.. मैं बहुत खुश हूँ।
"वो तो कहोगी ही।"

मुझे लगा शायद आज कुछ न कुछ होने वाला है, तभी मौसा जी लॉबी से गिलास उठा लाए। उसमें शराब थी।
बोले- पी लो थोड़ी सी.. तुझे भी मस्त नींद आएगी।
"नहीं.. मौसा जी, मैंने कभी नहीं पी.."
"आज पी लो.. देखो मैंने तुम दोनों को दावत पर बुलाया है। पहली बार आई हो.. मेरा दिल रखने के लिए दो घूँट खींच डालो।"
उनके जोर देने पर मैंने वो पैग खींचा। तब तक मैंने पूरा खाना गर्म कर दिया था, टेबल पर लगाने लगी मेरा सर घूमने लगा था। मस्त दुनिया दिख रही थी, मानो पाँव ज़मीन पर नहीं लग रहे थे।
कहानी जारी रहेगी।
मुझे आप अपने विचार यहाँ मेल करें।
 
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